गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

फिर बसंत आया

हिंदु धर्म-शास्त्रों में मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ अनिवार्य बताए गये हैं, "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।" इसीसे स्पष्ट है कि प्राचीन काल में काम के प्रति कितना स्वस्थ एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। जिसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में जगह-जगह उल्लेखित भी हुआ है।कामोत्सव तो काम-कुंठाओं से मुक्ति पाने की प्राचीन परंपरा है।मर्यादित रह कर, शालीनता के साथ, किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए  बिना मनाने में ही इसकी सार्थकता है।   
शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट के बीच आगमन होता है बसंत का। इसे ऋतुओं का राजा माना गया है अर्थात ऋतुराज। आदिकाल से कवि आकंठ श्रृंगार रस में डूब कर अपनी रचनाओं में इसका वर्णन करते आए हैं। पर ऐसा क्या है इस ऋतु में कि इंसान को यह इतनी प्रिय है। इसका जवाब तो यही है कि इसमें वह सब कुछ है जिसकी चाहत इंसान को रहती है। इसमें फूल सिर्फ खिलते हैं, झडते नहीं। बयार तक बासंती हो जाती है। धरा धानी चुनरी ओढ़ अपने सर्वोत्तम निखार से जीवन का बोध कराती है। जीव-जगत  में उल्लास छा जाता है। जिंदगी से मोह उत्पन्न होने लगता है, और चाहता भी क्या है इंसान?

दूसरी ऋतुओं से तुलना करें तो पाएंगे कि गर्मियों में फसलें जरूर पकती हैं पर जैसे नैराष्य चारों ओर बिखरा पडा होता है। हर जगह सुखा, गर्मी, पतझड जैसे सब का अंत आ गया हो। वर्षा धरा को जिंदगी जरूर देती है पर जब तक रहती है मेघों का अंधकार धरती पर छाया रहता है, उजाला गायब सा हो जाता है। पानी अपनी मर्यादा खो देता है। शीत में ठिठुरन होती है। जीव जगत संकुचित सा हो रह जाता है। उतनी जीवनी शक्ति नहीं रह पाती।

तभी शीत की विदाई के साथ ही आगमन होता है बसंत का। यही वह समय होता है जब सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक अंगडाई ले आलस्य त्याग जागने लगती है। जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता है। यह महीना होता है फागुन का यानि मधुमास का अर्थात मधुऋतु का। जब सर्वत्र माधुर्य और सौंदर्य का बोलबाला हो जाता है। "हल्की सी शोखी, हल्का सा नशा है, मिल गयी हो भंग जैसे पूरी बयार में" बसंत के आते ही टहनियों में कोंपलें फूटने लगती हैं। वृक्ष नये पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते हैं। वायु के नर्म-नर्म झोंकों से फल-फूल, लताएं-गुल्म, पेड-पौधे सभी जैसे मस्ती में झूमने लगते हैं। इसी समय आम की मंजरियों में भी बौर आने लगते हैं जैसे ऋतुओं के राजा ने फलों के राजा को दावत दी हो।

जब सारी प्रकृति ही मस्ती में डूबी हो तो इस आलम से जीव-जंतु कैसे दूर रह सकते हैं। उनमें भी एक नयी चेतना आ जाती है। भौंरों का गुंजाएमान होना, पक्षियों का नये नीडों को बनाने की तैयारियों में जुट जाना, कोयल की कूक। चारों ओर नज़र दौडा कर देखें हर कोई एक नये जोश से अपने काम में जुटा नज़र आएगा। मनुष्य तो मनुष्य, कीट-पतंग, पशु-पक्षी, पेड-पौधे अर्थात सारी प्रकृति ही जैसे बौरा जाती है। मौसम की अनुकूलता से मानव जीवन में भी निरोगता छाई रहती है, मन प्रफुल्लित रहता है जिससे चारों ओर हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता है। इसी माहौल में शुमार होती है होली की फगुनौटी फिजा, रंगों की रंगीली फुहार, फागों की गमगमाती गमक, धमालों की धमधमाती धमक के साथ भांग का भनभनाता सरूर। चारों ओर उल्लास ही उल्लास। इन्हीं गुणों के कारण अनादिकाल से इसी समय बसंतोत्सव मनता चला आ रहा है। एक ऐसा उत्सव जिसमें जात-पात, धनी-गरीब, राजा-रंक, छोटे-बडे का कोई भेद-भाव नहीं बरता जाता। इतिहास गवाह है कि रंगों के इस उत्सव में धर्म भी आड़े नहीं आता था। मुगल बादशाह और नवाब भी इसकी मस्ती से अछूते नहीं रह पाए थे। चाहे वह वाजिद अली शाह हों चाहे सम्राट अकबर या फिर अमीर खुसरो। मानव की तो बात ही क्या स्वंय भगवान कृष्ण ने इसे आध्यात्म की उंचाईयों पर ले जा बैठाया था। उन्हें तो इस ऋतु से इतना लगाव था कि ब्रज में सदा बसंत ही छाया रहता था। वृंदावन सदा प्रफुल्लित रहता था। पशु-पक्षी मुग्ध और उन्मत्त बने रहते थे। कुंज-कुंज को भौरे गुंजायमान किए रहते थे। चारों ओर उल्लास छाया रहता था।

बसंत को कामदेव का पुत्र माना जाता है। इसीलिए इस समय मनाए जाने वाले उत्सव को मदनोत्सव भी कहते हैं। मदन का अर्थ होता है काम। जो मनुष्य जीवन का अभिन्न अंग है। हिंदु धर्म-शास्त्रों में मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ अनिवार्य बताए गये हैं, "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।" इसीसे स्पष्ट है कि प्राचीन काल में काम के प्रति कितना स्वस्थ एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। जिसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में जगह-जगह उल्लेखित भी हुआ है।

पर पता नहीं धीरे-धीरे कैसे सब बदलता चला गया। कहते हैं बसंत का आगमन शहरों में नहीं होता। ऐसा नहीं है यह तो अबाध रूप से सारे जग में संचरण करता है। यह दूसरी बात है कि इस की आहट प्रकृति-विहीन माहौल और संगदिलों को सुनाई नहीं पडती। इसीलिए लोग इसे भूल आयातित त्योहारों को गले लगाने लग गये हैं। उस सात्विक उन्मुक्त वातावरण और व्यवहार का स्थान व्यभिचार, यौनाचर और कुठाएं लेती चली गयीं। भाईचारे, प्रेम की जगह नफरत और बैर ने ले ली। कामोत्सव तो काम-कुंठाओं से मुक्ति पाने की प्राचीन परंपरा है। इसे मर्यादित रह कर शालीनता के साथ बिना किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए, बिना किसी को कष्ट या दुख दिए मनाने में ही इसकी सार्थकता है। आज फिर जरूरत है लोगों को अपने त्योहारों,  उनकी विशेषताओं, उनकी उपयोगिताओं को बताने की, समझाने की। जिससे इन उत्सवों की गरिमा वापस लौट सके।

7 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

शुभकामनायें आदरणीय ।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद रविकर जी।

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

.बंधू पुरुष भी बाँझ होते हैं मात्र महिला नहीं .कभी लो स्पर्म काउंट (कमतर तादाद शुक्राणुओं की ,कभी पूअर स्पर्म मोटीलिटी ,ऐसे में फिमेल एग ,ओवम या अंडाणु

तक शुक्राणु के पहुँचने के मौके कम हो जाते हैं . खतरे का वजन नया प्रयोग है .खतरे की डिग्री का सूचक है .बाँझ सिर्फ औरत ही नहीं होती मर्द भी होते हैं .आपके अन्दर के पुरुष को अटपटा लगा

होगा यह प्रयोग .

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

.बंधू पुरुष भी बाँझ होते हैं मात्र महिला नहीं .कभी लो स्पर्म काउंट (कमतर तादाद शुक्राणुओं की ,कभी पूअर स्पर्म मोटीलिटी ,ऐसे में फिमेल एग ,ओवम या अंडाणु

तक शुक्राणु के पहुँचने के मौके कम हो जाते हैं . खतरे का वजन नया प्रयोग है .खतरे की डिग्री का सूचक है .बाँझ सिर्फ औरत ही नहीं होती मर्द भी होते हैं .आपके अन्दर के पुरुष को अटपटा लगा

होगा यह प्रयोग .

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

विरेन्द्र जी, शब्दों का खेल है। बांझ का अर्थ उपजायू ना होने के अर्थ में लिया जाता है। मर्दों के लिए अनुर्वरक शब्द चलन में है। वैसे आप स्वतंत्र हैं अपनी भाषा गढने में :-)

P.N. Subramanian ने कहा…

वसंत तो अपनी जगह है परन्तु आपने शब्दों का जादू चला दिया.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुब्रमनियन जी, आपका आना बहुत अच्छा लगता है। स्नेह बना रहे।