गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

पति पत्नी और घोड़ा "आप" पर लागू थोडा-थोडा


ठीक यही हाल आज केजरीवाल और उनके दल का है। लोग ताक लगाए बैठे रहते हैं कि ये बंदा कुछ भी करे हमें "कमेंट" करना ही है। अब देखना यह है कि कहीं तानों से घबड़ा कर पति-पत्नी घोड़े को ही तो नहीं सर पर उठा लेते :-)  

आज दिल्ली में केजरीवाल की हालत और उन पर होते शब्द बाणों के प्रहार से एक पुरानी कहानी याद आ रही है।  
एक बार एक व्यक्ति अपनी पत्नी और अपने घोड़े के साथ भ्रमण पर निकलता है। घोड़े के साथ दोनों पैदल चल रहे थे।  उन्हें देख लोग हंसने लगे , देखो मूर्खों को साथ में घोड़ा है फिर भी पैदल चल रहे हैं। ऐसा सुन उस व्यक्ति ने अपनी पत्नी को घोड़े पर बैठा दिया और खुद साथ-साथ चलने लगा. कुछ देर बाद वे लोग एक गांव से गुजरे तो वहाँ के लोग उसकी पत्नी पर ताना मारने लगे कि देखो पति बेचारा पैदल चल रहा है और ये महारानी घोड़े पर सवार है।  ऐसा सुन गांव के बाहर आ पति घोड़े पर बैठ जाता है और पत्नी घोड़े की रास थाम पैदल चलने लगती है।  कुछ दूरी पर उन्हें  महिलाओं का झुंड मिलता है जो उन्हें देख कर गुस्से में आ पति को फटकारने लगता है कि देखो कितना निर्दयी पति है खुद तो घोड़े पर बैठा है और बेचारी पत्नी को पैदल घसीट रहा है। धिक्कार है ऐसे व्यक्ति पर।  
इतना सुनते ही पति ने पत्नी को भी घोड़े पर बैठा लिया। पर क्या दुनिया में सब को खुश रखा जा सकता है ? अभी कुछ ही दूर गए थे कि कुछ लोगों ने इन्हें घेर लिया और डांटते हुए बोले कि क्या तुम मे ज़रा सी भी दया-ममता नहीं है। एक निरीह जानवर पर दोनों जने लदे हुए हो शर्म नहीं आती ?  

ठीक यही हाल आज केजरीवाल और उनके दल का है। लोग ताक लगाए बैठे रहते हैं कि ये बंदा कुछ भी करे हमें "कमेंट" करना ही है। अब देखना यह है कि कहीं तानों से घबड़ा कर पति-पत्नी घोड़े को ही तो नहीं सर पर उठा लेते :-) 

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

दिल के रिश्ते

एक छोटे से स्कूल में छोटी सी तनख्वाह पाने वालों का मन कितना विशाल हो सकता है इसका प्रमाण उसी दिन मैंने जाना। उनके उपकार का सिला तो मैं जिंदगी भर नहीं चुका पाऊँगी पर खून के रिश्तों से परे दिल के रिश्तों में पहले से भी ज्यादा विश्वास करने लग गयी हूँ।  

हमारी जिंदगी तरह-तरह की अनुभूतियों, खट्टे-मीठे अनुभवों, अनोखे घटना चक्रों से भरी पड़ी होती है। इन्हीं में से कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो सदा मन-मस्तिष्क पर अपनी छाप ताउम्र के लिए छोड़ जाती हैं, कर जाती हैं   इंसान को कायल इंसानियत का, बाँध जाती हैं परायों को भी एक अनोखे रिश्ते में।  

ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। मैं एक छोटे से स्कूल की शिक्षिका हूँ। बात करीब सात साल पहले की है। कुछ समय पहले जबर्दस्त आर्थिक नुक्सान से अभी पूरी तरह उबर नहीं पाए थे पर इसी बीच मेरे छोटे बेटे का पूना के एक एम. बी. ए. संस्थान में चयन हो गया।  उसकी कड़ी मेहनत रंग लाई थी, खुशी का माहौल था। पर मन के एक कोने में दाखिले की भारी-भरकम फीस के पैसों की चिंता भी जरूर थी, पर पढ़ाई के लिए मिलने वाले बैंक लोन के लुभावने विज्ञापनों से निश्चिंतता भी थी कि पैसों का इंतजाम हो ही जाएगा। इसके पहले कभी लोन लेने की जरूरत न पड़ने से ऐसे इश्तहारों की सच्चाई से हम अनभिज्ञ ही थे। पर जब बैंकों के चक्कर लगने शुरू हुए तो असलियत से सामना हुआ। बैंक में वर्षों से अच्छा भला खाता होने के बावजूद कर्मचारियों का रवैया ऐसा था मानो हम बैंक को ठगने आए हों। जिरह ऐसी जैसे इनकम टैक्स की चोरी की हो. उनकी रूचि लोन देने में नहीं न देने में ज्यादा थी। एक बार तो बैक के एक वरीयता प्राप्त सज्जन को शेखी बघारते भी सुना कि उन्होंने अपने कार्य काल में कभी किसी का लोन पास नहीं किया, कौन मुसीबत मोल ले। वहाँ किसी को भी इस बात का मलाल नहीं था कि वह किसी के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है। बीस दिन निकल गए थे। सारे कागजात पूरे होने के बावजूद काम सिरे नहीं चढ़ रहा था। कभी किसी कर्मचारी का तबादला हो जाता था, कभी कोई अफसर अवकाश पर चला जाता था, कभी निश्चित दिन और कोई अड़चन आड़े आ जाती थी। ज्यों-ज्यों फीस जमा करवाने की तारीख नजदीक आती जाती थी त्यों-त्यों हमारी मानसिक हालत बदतर होती जाती थी।  भीषण मानसिक तनाव के दिन थे।  ऐसा लगता था कि बेटे का भविष्य हाथ से निकला जा रहा है।  अब सिर्फ चार दिन बचे थे और किसी तरह आधी रकम का ही इंतजाम हो पाया था। 

उस दिन परेशानी की हालत में मैं स्कूल के स्टाफ रूम में बैठी थी, मन उचाट था, धैर्य जवाब दे चुका था. ऐसे में मन पर काबू न रहा और आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। वजह तो सहकर्मियों से छुपी न थी, सब मुझे घेर कर ढाढस बधाने लग गए। पर फिर जो कुछ हुआ उसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी, वह सब याद आते ही आज भी आँखें भर आती हैं। दो-तीन घंटे के अंतराल में ही मेरे सामने मेज पर दो लाख. जी हाँ दो लाख रुपयों का ढेर लगा हुआ था। ऐसी रकम जो हफ्तों से आँख-मिचौनी कर रही थी, मेरे सामने पड़ी थी। समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ क्या न कहूँ। हालत यह कि जुबान बंद, आँखें भीगी हुई और मन अपने सहयोगियों के उपकार के आगे नतमस्तक था।  ऐसे आड़े  वक्त जब हम चारों ओर से थक-हार कर निराश हो चुके थे तब स्कूल में कुछ घंटे साथ बिताने वाले सहकर्मी देवदूत बन कर सामने आए। सुना था कि प्रभू किसी न किसी रूप में अपने संकट-ग्रस्त बच्चों की सहायता जरूर करते हैं, उस दिन ईश्वर ही मानों मेरे सहकर्मियों के रूप में आए थे।  

एक छोटे से स्कूल में छोटी सी तनख्वाह पाने वालों का मन कितना विशाल हो सकता है इसका प्रमाण उसी दिन मैंने जाना। उनके उपकार का सिला तो मैं जिंदगी भर नहीं चुका पाऊँगी पर खून के रिश्तों से परे दिल के रिश्तों में पहले से भी ज्यादा विश्वास करने लग गयी हूँ।  

बाद में लोन तो मिला पर कैसे मिला उसका जिक्र नाही किया जाए तो बेहतर है. आज मेरा बेटा बैंक में ही मैनेजर के पद पर है पर उसे यही सीख दी है कि किसी भी जरुरत मंद को जूते ना घिसने पड़ें यह सदा याद रखे।

सच्ची घटना पर आधारित।         

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

अब स्वर्ग में भीड़-भाड़ कम है

वही रोज की रुटीन, ना काम ना काज, ना थकान ना सुस्ती, ना हारी ना बीमारी, ना चिंता ना क्लेश, न लड़ाई न झगड़ा। कुछ भी तो नही था "टेस्ट" बदलने को. वैसे यह सब किस चिड़िया का नाम है, वहाँ के लोग जानते भी नहीं थे।  समय पर इच्छा करते ही हर चीज उपलब्ध। बस सुबह-शाम भजन-कीर्तन, स्तुति गायन, मौज-मस्ती। एकरसता से जीवन जैसे ठहर गया था।  

बात काफी पुरानी है। प्रभू ने नया-नया शौक पाला था, सृजन का। वे दिन-रात अपनी सृष्टि में मग्न रहा करते थे। नई-नई तरह की आकृतियां, वस्तुएं, कलाकृतियां बना-बना कर अपने क्रीड़ास्थल को सजा-सजा कर खुश होते रहते थे। समय के साथ और लगातार कुछ न कुछ निर्माण होते रहने से हो-हल्ला बढ़ने लगा. जगह की तंगी भी महसूस होने लगी। ऊपर से धीरे-धीरे स्वर्ग में रहनेवाली उनकी सर्वोत्तम रचनाएं वहां की एक जैसी जिंदगी और दिनचर्या से ऊबने लग गयीं। वही रोज की रुटीन, ना काम ना काज, ना थकान ना सुस्ती, ना हारी ना बीमारी, ना चिंता ना क्लेश, न लड़ाई न झगड़ा। कुछ भी तो नही था "टेस्ट" बदलने को. वैसे यह सब किस चिड़िया का नाम है, वहाँ के लोग जानते भी नहीं थे।  समय पर इच्छा करते ही हर चीज उपलब्ध। बस सुबह-शाम भजन-कीर्तन, स्तुति गायन, मौज-मस्ती। एकरसता से जीवन जैसे ठहर गया था।  

फिर वही हुआ जो होना था। सब जा-जा कर प्रभू को तंग करने, उनके काम में बाधा डालने लग गए। सुख का आंनद भी तभी महसूस होता है जब कोई दुख: से गुजर रहा होता है। अब स्वर्ग में निवास करने वाली आत्माएं जो परब्रह्म में लीन रह कर उन्मुक्त विचरण करती रहती थीं, उन्हें क्या पता था कि बिमारी क्या है, दुख: क्या है, क्लेश क्या है, आंसू क्यों बहते हैं, बिछोह क्या होता है, वात्सल्य क्या चीज है ममता क्या है, मंहगाई क्या है, अभाव क्या होता है। उन्हें आलू-प्याज या आटे-दाल का भाव क्या मालुम था।  

भगवान भी वहां के वाशिंदों की मन:स्थिति से वाकिफ थे। वैसे भी वहां की बढती भीड़ ने उनके काम-काज में रुकावट डालनी शुरु कर दी थी। सो उन्होंने इन सब ऊबे हुओं को सबक सिखाने के लिये एक "क्रैश कोर्स" की रूपरेखा बनाई। इसके तहत सारी आत्माओं को स्वर्ग से बाहर जा कर तरह-तरह के अनुभव प्राप्त कर उसके अनुसार फिर अपना हक़ प्राप्त करना था। पर इसके लिये एक रंगमंच की आवश्यकता थी सो प्रभू ने काफी चिंतन-मनन के बाद पृथ्वी का निर्माण किया। वहां के वातावरण को रहने लायक तथा मन लगने लायक बनाने के लिये मेहनत की गयी। हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रख उसे अंतिम रूप दे दिया गया। पर आत्माओं पर तो कोई गति नहीं व्यापति। इसलिये उन्हें संवेदनशील बनाने के लिये एक माध्यम की जरूरत महसूस हुई इस के लिये शरीर की रचना की गयी. एकरसता ना रहे इसका पूरा ध्यान रखा गया।  किसी को गोरा, किसी को काला, किसी को पीत, किसी को गेहुंवां वर्ण दिया गया. रहने के लिए भी अलग-अलग वातावरणों की व्यवस्था की गयी।  किसी भी तरह की किसी को भी कोई कमी न हो इसका पूरा ध्यान रख प्रभू ने सब को धरा पर भिजवा दिया।  जहां स्वर्ग के एक क्षणांश की अवधि में रह कर हरेक को तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे।

अब हर आत्मा का अपना नाम था, अस्तित्व था, पहचान थी। उसके सामने ढेरों जिम्मेदारियां थीं। समय कम था काम ज्यादा था। पर यहां पहुंच कर भी बहुतों ने अपनी औकात नहीं भूली। वे पहले की तरह ही प्रभू को याद करती रहीं। कुछ इस नयी जगह पर बने पारिवारिक संबंधों में उलझ कर रह गयीं। पर कुछ ऐसी भी निकलीं जो यहां आ अपने आप को ही भगवान समझने लग गयीं। अब इन सब के कर्मों के अनुसार भगवान ने फल देने थे। तो अपनी औकात ना भुला कर भग्वद भजन करने वालों को तो जन्म चक्र से छुटकारा मिल फिर से स्वर्ग की सीट मिल गयी। गृहस्थी के माया-जाल में फसी आत्माओं को चोला बदल-बदल कर बार-बार इस धरा धाम पर आने का हुक्म हो गया। और उन स्वयंभू भगवानों ने, जिन्होंने पृथ्वी पर तरह-तरह के आतंकों का निर्माण किया था, दूसरों का जीना मुहाल कर दिया था, उनके लिये एक अलग विभाग बनाया गया जिसे नरक का नाम दिया गया। पर कुछ पहुंचे हुए भी थे जो नरक के लायक भी नहीं थे,  ऐसे महानुभावों के लिए के लिए पृथ्वी पर ही "व्यवस्था" कर दी गयी।  

अब स्वर्ग में भीड़-भाड़ काफी कम हो गयी है। वहां के वाशिंदों को भी आपस में अपने-अपने अनुभव बता-बता कर अपना टाइम पास करने का जरिया मिल गया है।

प्रभू निश्चिन्त हो आराम से अपनी निर्माण क्रिया में व्यस्त हैं।

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

सोच, पहली बार मतदाता बने युवाओं की

 इनमें इक्का-दुक्का ही ऐसे थे जिन्होंने परिपक्वता का कुछ आभास देते हुए शहर के विकास को मद्देनज़र रख अपना मत दिया था। कुछ का मापदंड सायकिल और लैपटॉप रहे। अच्छे खासे प्रतिशत ने अपने परिवार का अनुसरण किया था। कईयों ने ऐसे ही "नाटो" को आजमाया था तो कईयों ने बिना सोचे समझे मौज-मस्ती में पहली बार मिली इस जिम्मेदारी को खिलवाड़ समझ दो-तीन बटन दबा दिए थे बिना परिणाम की चिंता किए।  

अभी-अभी संपन्न हुए चुनावों में लाखों युवाओं को, जो एक आंकड़े नुमी उम्र को पार कर गए थे, शिरकत करने का सिर्फ उस आंकड़े को पार करते ही अवसर मिल गया। आज नहीं तो कल उन्हें इस प्रक्रिया में आना ही था। पर सवाल यह उठता है कि क्या उस आंकड़े को छू जाने से ही बालक से युवा हुआ व्यक्ति क्या इतना परिपक्व हो जाता है कि वह अपनी बुद्धि से अच्छे-बुरे, हानि- लाभ की पहचान बिना किसी बाहरी प्रभाव के कर सके ? बालपन में अपनी ही दुनिया में रहने वाले को अचानक बड्डपन का भार दे क्या उससे यह आशा की जा सकती है कि वह देश की भलाई के लिए देश पर शासन करने वालों का चुनाव कर देश का भविष्य निर्धारित कर सके ? कहने का मतलब यह नहीं है कि यह उम्र अभी कम है या सारे युवा परिपक्व नहीं होते। कभी न कभी तो उन्हें यह भार अपने कंधों पर लेना ही है पर अधिकाँश ऐसे नए मतदाता पेशोपेश में रहते हैं. अपनी समझ, अपनी बुद्धी या अपनी सोच पर दृढ नहीं होते। ज्यादातर अपने परिवार के बड़ों का अनुसरण करते हैं।  कुछेक अपने साथियों के कहने पर चलते हैं, कुछेक के लिए यह छुट्टी की मौज-मस्ती का एक मनोरंजक पहलू होता है।  

यह सत्य मेरे सामने तब आया जब मैंने पहली बार मतदाता बने अपने भतीजे से पूछा कि उसने किसे वोट दिया। उसका जवाब बड़ा अप्रत्याशित था, उसने कहा कि वह सब को खुश रखने के लिए हर बार अलग-अलग दलों को वोट देगा। इस बार "इस" को दिया है अगली बार "उस" को और फिर किसी तीसरे को।  मैंने पूछा ऐसा क्यों ? तो बोला हमारे ग्रुप ने ऐसा ही फैसला किया है। हो सकता है कि अगले एक दो साल में उसे मतदान का महत्व समझ में आ जाए पर उसके पीछे आने वाली पीढ़ी भी क्या ऐसा ही करेगी? 
   
यह सुन मेरे में एक जिज्ञासा जगी कि कुछ ऐसे ही बच्चों से बात की जाए। यह कोई "सर्वे" नही था नहीं किसी नतीजे पर पहुँचने का मार्ग, सिर्फ एक जिज्ञासा को शांत करने का जरिया था। मैंने अलग-अलग जगहों के 100  बच्चों का लक्ष्य रखा था पर समयाभाव के कारण  63 से ही बात कर सका, जिनके जवाब गरीब तो नहीं अजीब जरूर थे।  इनमें इक्का-दुक्का ही ऐसे थे जिन्होंने परिपक्वता का कुछ आभास देते हुए शहर के विकास को मद्देनज़र रख अपना मत दिया था। कुछ का मापदंड सायकिल और लैपटॉप रहे। अच्छे खासे प्रतिशत ने अपने परिवार का अनुसरण किया था। कईयों ने ऐसे ही "नाटो" को आजमाया था तो कईयों ने बिना सोचे समझे मौज-मस्ती में पहली बार मिली इस जिम्मेदारी को खिलवाड़ समझ दो-तीन बटन दबा दिए थे बिना परिणाम की चिंता किए।  
अब सवाल यह उठता है कि क्या हमारी या शिक्षण संस्थानों की जवाबदेही नहीं बनती कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी देने के पहले उस पौध को उसकी गंभीरता से अवगत करवा दिया जाए? उसे बताया और समझाया जाए कि इस जिम्मेदारी की  देश के भविष्य को तय करने में कितनी अहम् भूमिका है।  उनकी नासमझी कितने गलत हाथों को सक्षम बनाने की उत्तरदायी हो सकती है।  

यह तो शहर के पढने-लिखने वाले स्कूली शिक्षा पाने वाले बच्चों का हाल है. सोच कर ही मन घबड़ाता है कि दूर-दराज के ज्यादातर उचित शिक्षा विहीन उम्र के इस आंकड़े को प्राप्त करने वाले युवा कैसे-कैसे प्रलोभनों से और किस-किस से प्रभावित हो कैसे-कैसे लोगों को अधिकार सौंप देते होंगे।    

                 

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

"ऐसी वाणी बोलिए सब का आपा खोए, औरन को विचलित करे आपहूं विचलित होए।"

जब पहली बार विपक्षी गुटों ने अपनी सरकार बनाई थी तो जनता या देश के हित में कुछ करने के बजाए सारे अंत्री-मंत्री श्रीमती इंदरा गांधी की बुराईयों, उनकी नीतियों के पीछे हाथ धो कर पड़ गए पर इंदिरा जी खुद तो शालीन बनी ही रहीं इसके अलावा अपने साथियों को भी कुछ कहने नहीं दिया था।  

समय ने भी क्या करवट बदली, कि हर शै बदली-बदली नज़र आने लगी है।  आदमी के रहन-सहन से लेकर कथो-किताबत पर असर साफ दिखाई पड़ रहा है।  पहले कहा जाता था "ऎसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए, औरन को शीतल करे, आपहू शीतल होए।" पर आज अन्य मान्यताओं के साथ इसको भी बदल कर कुछ ऐसा कर दिया गया है "ऐसी वाणी बोलिए सब का आपा खोए, औरन को विचलित करे आपहूं विचलित होए।" 

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण अभी के चुनावों में भाषण वीरों के संवादों ने सब को दिया है। यह जानते हुए भी कि जुबान की चोट का घाव सब घावों से गहरा होता है और इसके अनगिनत प्रमाण हमारे इतिहास, कथा-कहानियों में बिखरे पड़े हैं. इसके बावजूद खुशफहमियों में सांस भरते कुछ लोगों ने अपने आकाओं को खुश करने के लिए अपनी बेलगाम, निरंकुश, अमर्यादित वाणी का ऐसा अंधड़ उड़ाया जिसमें उन्हीं के दल के द्वारा किए गए जनपयोगी कार्यों पर भी पर्दा पड़ गया।  उनके विष बुझे तीरों से लैस अनर्गल प्रलाप रूपी हाथियों ने अपने ही लोगों में हलचल मचा दी। 

आदि काल से हमारे देश में जनता ने कभी भी कटु भाषियों का साथ नहीं दिया है. कटु बोलने वाला सदा अपना ही अहित करता रहा है।  ज्यादा पीछे जाने की आवश्यकता नहीं है, जब पहली बार विपक्षी गुटों ने अपनी सरकार बनाई थी तो जनता या देश के हित में कुछ करने के बजाए सारे अंत्री-मंत्री श्रीमती इंदरा गांधी की बुराईयों, उनकी नीतियों के पीछे हाथ धो कर पड़ गए पर इंदिरा जी खुद तो शालीन बनी ही रहीं इसके अलावा अपने साथियों को भी कुछ कहने नहीं दिया। जनता ने नए लोगों से जो आशाएं बांधी थी वे चकनाचूर हो गयीं। जनता को जन हित में कुछ होता न दिखने पर उसके जेहन में उनके द्वारा उठाए गए लौह कदमों की याद फिर ताजा हो गयी, परिणाम क्या रहा, लोगों ने उनके द्वारा लगाए आपात काल को भी भुला कर उन्हें फिर प्रचंड मतों के साथ सत्ता सौंप दी। 
इससे सबक न लेते हुए विश्व प्रताप सिंह ने भी वही गलती दोहराई, अपना सारा जोर शालीन राजीव गांधी की छवि बिगाड़ने, उन्हें नीचा दिखाने का एकमंत्र अपनाया जिसके फलस्वरूप जनता ने उन्हें ऎसी पटकनी दी कि कोई पूछने वाला भी नहीं रहा। उलटे राजीव जी और लोक-प्रिय बन कर उभरे।  

पता नहीं अपने ही परिवार, अपनी ही पार्टी में हुई ऐसी बातों से कोई सीख आज के देश के सबसे पुराने, संगठित और देश के हर हिस्से में अपनी उपस्थिति का अहसास करवाने वाले दल ने क्यों नहीं ली। यह और बात है कि दल के शिखर पर बैठे लोगों ने संयम बरता पर अपने कार्यकर्ताओं और प्रवक्ताओं पर नकेल नहीं कसी। जिससे कुछ ऐसी छवि उभर कर आई कि लोगों को लगने लगा कि यह सारी ब्यान बाजी ऊपर के इशारे पर हो रही है, जिसमे कुछ सच्चाई तो थी ही, साथ ही यह भी एहसास होने लगा कि खुद हर मोर्चे पर नाकाम रहने वाले अब दूसरों को भी काम नहीं करने देना चाहते। इसके विपरीत यदि यदि मुंहफट लोगों द्वारा दूसरों को इतिहास सिखाने की बजाए अपना इतिहास ही याद रहता और उनके बयानों पर लगाम कस उन्हें अपने द्वारा किए गए कार्यों और उनसे हुए फायदों की जनता को याद दिलाते रहने को कहा जाता तो दो फायदे होते एक तो जन-जन के बीच इनकी सभ्य और शालीन छवि बनती साथ ही जनता की अल्पकालीन स्मृति से किए गए अच्छे कामों का भी असर बरकरार रहता।  और फिर यदि विपक्ष के आग उगलाऊ भाषणों पर संयम बरता जाता तो भी जनता में भी दल के सुसंस्कृत होने का संदेश जाता। पर धनुष से निकला तीर तो शायद वापस आ भी जाए पर दल के तथाकथित हितैषियों ने वह कर डाला है जो सारा विपक्ष मिल कर भी नहीं कर पाता।          

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

कोलकाता का नेहरु बाल संग्रहालय

पहले पूरे देश की, अब पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता को महलों का शहर भी कहा जाता है।  वैसे तो यहाँ अनगिनत दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें छोटे-बड़े करीब सात संग्रहालय भी शामिल हैं। उन्हीं संग्रहालयों में से एक है पूरी तरह बच्चों को समर्पित जवाहर लाल नेहरु बाल संग्रहालय। मेट्रो रेल का नजदीकी स्टेशन जो कोलकाता के दिल धर्मतल्ला से भवानीपुर की तरफ, 94/1 जवाहर लाल मार्ग पर, विख्यात विक्टोरिया मेमोरियल से कुछ ही दूर मुख्य मार्ग पर ही स्थित है। यहाँ  के लिए देश की पहली मेट्रो रेल का स्टेशन "रविन्द्र सदन" है।  मुख्य मार्ग पर होने की वजह से यहाँ पहुँचने के लिए हर तरह के  आवागमन की सुविधा उपलब्ध है.  
  
मुख्य भवन 
इस म्यूजियम को 1972 में नेहरु जी के जन्म दिवस 14 नवम्बर को पूरी तरह बच्चों को समर्पित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को अपनी संस्कृति से परिचित और अवगत कराना। बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी अभिभूत करने वाले इस मनोरंजक स्थल को चार विभागों में बांटा गया है। खिलौनों का खंड, जिसमें देश-विदेश के तरह-तरह के खिलौनों को प्रदर्शित किया गया है। 
खिलौनों की दुनिया 

 दूसरे हिस्से में है गुड़ियों का अद्भुत संसार, जहां तकरीबन 90 देशों की गुड़ियाँ दर्शकों को मोह लेने के लिए सजी खडी हैं। हर देश की गुड़िया अपने देश के सुसज्जित लिबास में नजर आती है।
गुड़ियों का संसार 

फिर आता है सबसे अहम् तीसरा और चौथा भाग, जहां छोटी-छोटी पर बिलकुल सजीव लगती मिट्टी की पुतलियों से पूरी रामायण और महाभारत की कथा को दर्शाया गया है। दोनों महाकाव्यों की प्रमुख घटनाओं को सिद्धहस्त कलाकारों द्वारा अति दक्षता से दर्शाया गया है. ये दोनों भाग किसी को भी सम्मोहित करने का जादू रखते हैं।
रामायण 
महाभारत 

अब तक करोंड़ों देसी-विदेशी लोगों द्वारा देखा और सहारा गया यह संग्रहालय विख्यात समाजसेवी जुगल श्रीमाल जी, जिनका मानना था कि बच्चों को खेल-खेल में या उनकी पसंददीदा अभिरुचि से किसी विषय को ज्यादा अच्छी तरह समझाया जा सकता है बनिस्पत कक्षा में किताबों द्वारा पढ़ाने या समझाने के। यह म्यूजियम उन्हीं की कल्पना का मूर्तिमान रूप है। उन्हीं की प्रेणना से प्रेरित हो कर यह संस्थान देश के पिछड़े इलाकों में कार्यशालाएं लगा कर बच्चों की शिक्षा में भी हाथ बंटाता रहता है। अक्षम पर मेधावी बच्चों को आर्थिक सहायता का भी प्रावधान रखा गया है।

अब जब भी कोलकाता जाना हो तो अन्य दर्शनीय स्थानों के साथ इसे भी देखना ना भूलें। यह सोमवार को छोड़ सप्ताह के बाक़ी दिनों सुबह से शाम तक खुला रहता है। यह दावा है कि आप यहाँ जा "वाह" बोले बिना नहीं रह पाएंगे।       
  

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

स्वंयप्रभा, रामायण का एक उपेक्षित पात्र

थके-हारे, निश्चित समय में सीता माता को ना खोज पाने के भय से व्याकुल, वानर समूह को उचित मार्गदर्शन दे, लंका का पता बताने वाली सिद्ध तपस्विनी "स्वयंप्रभा" को वाल्मीकि रामायण के बाद कोई विशेष महत्व नहीं मिल पाया। हो सकता है, श्री राम से इस पात्र का सीधा संबंध ना होना इस बात का कारण हो।

हारा-थका, हताश वानर यूथ  
शबरी की तरह ही स्वयंप्रभा भी श्री राम की प्रतीक्षा, एकांत और प्रशांत वातावरण में संयत जीवन जीते हुए कर रही थी। परन्तु ये शबरी से ज्यादा सुलझी और पहुंची हुई तपस्विनी थीं। इनका उल्लेख किष्किंधा कांड के अंत में तब आता है, जब हनुमान, अंगद, जामवंत आदि सीताजी की खोज में निकलते हैं। काफी भटकने के बाद भी सीताजी का कोई सुराग नहीं मिल पाता है। सुग्रीव द्वारा दिया गया समय भी स्माप्ति पर आ जाता है। थके-हारे दल की भूख प्यास के कारण बुरी हालत होती है। सारे जने एक जगह निढ़ाल हो बैठ जाते हैं। तभी हनुमानजी को एक अंधेरी गुफा में से भीगे पंखों वाले पक्षी बाहर आते दिखते हैं। जिससे हनुमानजी समझ जाते हैं कि गुफा के अंदर कोई जलाशय है। गुफा बिल्कुल अंधेरी और बहुत ही डरावनी थी। सारे जने एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अंदर प्रविष्ट होते हैं। वहां हाथ को हाथ नहीं सूझता था। बहुत दूर चलने पर अचानक प्रकाश दिखाई पड़ता है। वे सब अपने आप को एक बहुत रमणीय, बिल्कुल स्वर्ग जैसी जगह में पाते हैं। पूरा समूह आश्चर्य चकित सा खड़ा रह जाता है। चारों ओर फैली हरियाली, फलों से लदे वृक्ष, ठंडे पानी के सोते, हल्की ब्यार सब की थकान दूर कर देती है। इतने में सामने से प्रकाश में लिपटी, एक धीर-गंभीर साध्वी, आती दिखाई पड़ती है। जो वल्कल, जटा आदि धारण करने के बावजूद आध्यात्मिक आभा से आप्लावित लगती है। हनुमानजी आगे बढ़ कर प्रणाम कर अपने आने का अभिप्राय बतलाते हैं, और उस रहस्य-लोक के बारे में जानने की अपनी जिज्ञासा भी नहीं छिपा पाते हैं। साध्वी, जो की स्वयंप्रभा हैं, करुणा से मंजुल स्वर में सबका स्वागत करती हैं तथा वहां उपलब्ध सामग्री से अपनी भूख-प्यास शांत करने को कहती हैं। उसके बाद शांत चित्त से बैठा कर वह सारी बात बताती हैं।

यह सारा उपवन देवताओं के अभियंता मय ने बनाया था। इसके पूर्ण होने पर मय ने इसे देवराज इंद्र को समर्पित कर दिया। उनके कहने पर, इसके बदले कुछ लेने के लिए जब मय ने अपनी प्रेयसी हेमा से विवाह की बात कही तो देवराज क्रुद्ध हो गये, क्योंकि हेमा एक देवकन्या थी और मय एक दानव। इंद्र ने मय को निष्कासित कर दिया, पर उपवन की देख-भाल का भार हेमा को सौंप दिया। हेमा के बाद इसकी जिम्मेदारी स्वयंप्रभा पर आ गयी।

इतना बताने के बाद, उनके वानर समूह के जंगलों में भटकने का कारण पूछने पर हनुमानजी उन्हें सारी राम कथा सुनाने के साथ-साथ समय अवधी की बात भी बताते हैं कि यदि एक माह स्माप्त होने के पहले सीता माता का पता नहीं मिला तो हम सब की मृत्यु निश्चित है। स्वयंप्रभा उन्हें कहती हैं कि घबड़ायें नहीं, आप सब अपने गंतव्य तक पहुंच गये हैं। इतना कह कर वे सबको अपनी आंखें बंद करने को कहती हैं। अगले पल ही सब अपने-आप को सागर तट पर पाते हैं। स्वयंप्रभा सीताजी के लंका में होने की बात बता वापस अपनी गुफा में चली जाती हैं। आगे की कथा तो जगजाहिर है।

यह सारा प्रसंग अपने-आप में रोचक तो है ही, साथ ही साथ कहानी का महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित होता है। पर पता नहीं स्वयंप्रभा जैसा इतना महत्वपूर्ण पात्र महाग्रंथ में उपेक्षित क्यूं रह गया. 

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

दिल्ली के कनाट प्लेस में एक कुंआ, अग्रसेन की बावडी

देश का दिल दिल्ली और दिल्ली का दिल कनाट प्लेस। हर अधुनातन चीज का केंद्र।  पर इस आधुनिकता में भी कुछ ऐसा समेटे जो हमें अपने समृद्ध विगत की याद दिलाता रहता है। चाहे वह मुगल कालीन हनुमान मंदिर हो, बंगला साहब  गुरद्वारा हो, जंतर-मंतर हो या फिर अग्रसेन की बावडी  हो। 


जी हां बावडी। एक गहरा कुआं जिसके तल तक जाने के लिए चौडी सीढियां बनी होती हैं। पुराने जमाने में पानी संरक्षित करने और रखने का  एक नायाब तरीका था।  राजस्थान  और    गुजरात के कुछ इलाकों में, जहां पानी अनमोल होता है वहां तो  इन्हें  मंदिर का स्थान मिला हुआ है। ऐसी ही एक 60 मीटर लम्बी और 15 मीटर चौडी, एक विशाल पर खंडहर होती बावडी, कनाट प्लेस से कुछ ही दूरी पर स्थित है।   जिसे आजकल पुरातत्व विभाग का संरक्षण तो प्राप्त है पर   स्थिति सोचनीय है।   इसके तल  तक   जाने के लिए 106 सीढियां उतरनी पड़ती हैं। किसी समय  इनमें से  कुछ सदा  पानी में  डूबी रहती थीं पर  अब समय की  मार,  बढती  आबादी,   आस - पास की आकाश  छूती इमारतों के कारण लोगों की आँखों के साथ-साथ यहाँ का पानी भी सूख कर अपना अतीत याद कर रो भी नहीं पाता।   


बावड़ी की जानकारी का तो यह हाल है कि यहाँ  पहुँचने के लिए आप कनाट प्लेस में खड़े होकर भी पूछेंगे तो भी आशंका यही है कि दस में से नौ लोग अनभिज्ञता जाहिर कर दें। वैसे कनाट प्लेस से बाराखम्बा मार्ग पर चलते हुए पहली लाल बत्ती से टालस्टाय मार्ग पर दाहिने मुड़ने पर करीब 20-25 मीटर दूर एक छोटी सड़क, हैली लेन, बाएं हाथ की तरफ पड़ती है उस पर करीब 35-40 मीटर चलने पर दाएं हाथ की तरफ फिर एक गली मिलती है जो अपने साथ-साथ आपको करीब 150-200 मीटर चलवा कर, धोबी घाट होते हुए, बावड़ी तक पहुंचा देती है।    




                                                                                                 धोबी घाट

                                                                          पहुँच मार्ग, बांई ओर बावड़ी की दिवार

                                                                                                      मुख्य द्वार

                                                                                                 प्रवेश द्वार


                                                                                         अंदर का खुला दालान


      
                                                                        सीढ़ियों के साथ की दीवारों पर बनी मेहराबें

                                                              दुर्दशाग्रस्त सीढ़ियां

                                                                                 बदहाली का आलम

                                                                                        तल और निकासी द्वार

                                                                                        कुँए का अंदरूनी तल

                                                                                              कुँए की दीवारें

तल से दिखता ऊपर का छिद्र 
                                                                                बाहर निकलने से पहले

पर दुखद आश्चर्य है कि वर्षों से पानी के अक्षय स्रोत और लोगों को असहय गर्मी से निजात दिलाने वाला यह एतिहासिक महत्व का स्थान दिल्ली के बीचोबीच स्थित होने और आवागमन की हर सुविधा की उपलब्धि के बावजूद, जहां अभी तक कोई प्रवेश शुल्क भी नहीं है, अनजान और उपेक्षित सा पडा है। कभी कभार किसी स्कूल के बच्चों की शिक्षण यात्रा या आस-पास के दफ्तर के कुछ लोगों का गर्मी से राहत पाने के लिए यहां आ बैठने या एकांत खोजते जोड़ों की चुहल  से यहां कुछ हलचल हो तो हो नहीं तो यहां पसरे सन्नाटे में कोई खलल नहीं पडता। अलबत्ता तो लोगों को इसके अस्तित्व की जानकारी ही नहीं है जिन्हें है भी वे भी इसे विस्मृत करते जा रहे हैं।















रविवार, 3 नवंबर 2013

"अनदेखे अपनों" को सपरिवार दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं

इस विधा यानि ब्लागिंग के माध्यम से जितना स्नेह, अपनापन तथा हौसला आप सब की तरफ से मुझे मिला है उससे अभिभूत हूँ। कितनी अजीब सी बात है कि एक-दो दिनों में जब तक सबके नाम दिख न जाएं तो खाली-खाली सा महसूस होता है। यदि खुदा न खास्ता किसी की उपस्थिति चार-पांच दिनों तक न दिखे तो मन बरबस उसकी ओर खींचा सा रहता है। इस "अनदेखे अपनों" से हुए लगाव को क्या नाम देंगे? जबकि इन कुछ सालों में सिर्फ अपनी कूपमंडूकता के कारण बहुत कम लोगों से आमने-सामने मुलाक़ात हो पाई है। चाह कर, मौका रहते हुए भी वैसा नहीं हो पाया। पर ऐसा ही स्नेह सब से बना रहे यही कामना है।

इस दीपोत्सव के पावन पर्व पर मेरी ओर से आप सब को सपरिवार हार्दिक शुभ कामनाएं।

आने वाले समय में सभी सुखी, स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें।

प्रभू से यही प्रार्थना है।

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

धन के संरक्षक होने के बावजूद कुबेर की कहीं पूजा नहीं होती

कुबेर को धन का संरक्षक माना जाता है। पूराने मंदिरों में उनकी मुर्तियां दरवाजे पर स्थापित मिलती हैं। परंतु उन मुर्तियों में उन्हें कुरूप, मोटा और बेड़ौल ही दिखाया गया है। दिग्पाल के रूप में या यक्ष के रूप में उनका विवरण मिलता है। पर उन्हें कभी दूसरी श्रेणी के देवता से ज्यादा सम्मान नहीं दिया गया। नाहीं कहीं उनकी पूजा का विधान है। उनके पिता ऋषि विश्रवा थे, जो लंकापति रावण के भी जनक थे। हो सकता है कि रावण के कुल गोत्र का होने से उनकी उपेक्षा होती गयी हो।

धन के संरक्षक होने के बावजूद उन्हें कभी भी लक्ष्मीजी के समकक्ष नहीं माना गया। क्योंकि लक्ष्मीजी के साथ परोपकारी भावना जुड़ी हुई है। कल्याणी होने की वजह से वे सदा गतिशील रहती हैं। वे धन को एक जगह ठहरने नहीं देतीं। पर कुबेर के साथ ठीक उल्टा है। इनके बारे में धारणा है कि इनका धन स्थिर रहता है। इनमें संचय की प्रवृति रहती है (शायद इसीलिये अपने रिजर्व बैंक आफ इंड़िया के बाहर इनकी प्रतिमा स्थापित की गयी है)। उनसे परोपकार की भावना की अपेक्षा नही की जाती।

वैसे भी कुबेर के बारे में जितनी कथायें मिलती हैं उनमें इन्हें पूर्व जन्म में चोर, लुटेरा यहां तक की राक्षस भी निरुपित किया गया है। यह भी एक कारण हो सकता है कि इनकी मुर्तियों में वह सौम्यता और सुंदरता नहीं नजर आती जो देवताओं की प्रतिमाओं में नज़र आती है।

इनकी कल्पना धन का घड़ा लिये हुए की गयी है तथा निवास सुनसान जगहों में वट वृक्ष पर बताया गया है। लगता है कि इनको जो भी सम्मान मिला है वह इनके धन के कारण ही मिला है श्रद्धा के कारण नहीं। क्योंकी वह धन भी सद्प्रयासों द्वारा नहीं जुटाया गया था। इसीलिये इनकी कहीं पूजा नहीं होती।

बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

उसे अपनी माँ से विवाह करना पड़ा था, दुनिया की दर्दनाक कहानियों में से एक

कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। इन्होंने भी प्रारब्ध को चुन्नौती दी थी, जिससे जन्म हुआ संसार की सबसे दर्दनाक कथा का।

यूनान में एक राज्य था थीबिज। इसके राजा लायस तथा रानी जोकास्टा के कोई संतान नहीं थी। कफी मिन्नतों और प्रार्थनाओं के बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी। पर खुशियां ज्यादा दिन नहीं टिक सकीं। एक भविष्यवक्ता ने भविष्वाणी की कि उनका पुत्र, पित्रहंता होगा और अपनी ही मां से विवाह करेगा। यह जान दोनो आतंकित हो गये और अपने नवजात शिशु के हाथ पैर बंधवा कर उसे सिथेरन पर्वत पर फिंकवा दिया। पर बच्चे की मृत्यु नहीं लिखी हुई थी। जिस आदमी को यह काम सौंपा गया था, वह यह अमानवीय कार्य ना कर सका। उसने पहाड़ पर शिशु को पड़ोसी राज्य, कोरिंथ, के चरवाहे को दे बच्चे की जान बचा दी। उस चरवाहे ने अपने राजा 
पोलिबस, जिसकी कोई संतान नहीं थी, को खुश करने के लिए बच्चे को उसे सौंप दिया। रस्सी से बंधे होने के कारण शिशु के पांव सूज कर कुछ टेढे हो गये थे, जिनको देख कर पोलिबस के मुंह से निकला “ईडिपस” याने सूजे पैरोंवाला और यही नाम पड़ गया बच्चे का।     

समय बीतता गया। ईडिपस जवान हो गया। होनी ने अपना रंग दिखाया। एक समारोह में एक अतिथी ने उसका यह कह कर मजाक उड़ाया कि वह कोई राजकुमार नहीं है। वह तो कहीं पड़ा मिला था। ईडिपस के मन में शक घर कर गया। एक दिन बिना किसी को बताए वह अपोलो के विश्वप्रसिद्ध भविष्य वक्ता से मिलने निकल पड़ा। मंदिर की पुजारिन ने उसे स्पष्ट उत्तर तो दिया नहीं पर एक चेतावनी जरूर दी कि वह अपने पिता की खोज ना करे नहीं तो वह तुम्हारे हाथों मारा जाएगा और तुम अपनी ही मां से शादी करोगे।

ईडिपस यह सुन बहुत डर गया। उसने निर्णय लिया कि वह वापस कोरिंथ नहीं जाएगा। जब इसी उधेड़बुन में वह चला जा रहा था उसी समय सामने से लेयस अपने रथ पर सवार हो उधर से गुजर रहा था। लेयस का अंगरक्षक रास्ते से सबको हटाता जा रहा था। ईडिपस के मार्ग ना देने पर, अंगरक्षक से उसकी तकरार हो गयी, जिससे खुद को अपमानित महसूस कर ईडिपस ने उसकी हत्या कर दी। यह देख लेयस ने क्रोधित हो उस पर वार कर दिया, लड़ाई में लेयस मारा गया। अनजाने में ही सही ईडिपस के हाथों उसके पिता की हत्या हो ही गयी। इसके बाद भटकते-भटकते वह थीबिज जा पहुंचा। वहां जाने पर उसे मालुम पड़ा कि वहां के राजा की मौत हो चुकी है। जिसका फायदा उठा कर स्फिंक्स नामक एक दैत्य वहां के लोगों को परेशान करता रहता है। उसने एक शर्त रखी हुई थी कि जब तक कोई मेरी पहेली का जवाब नहीं देगा तब तक मैं यहां से नहीं जाऊंगा। उसकी उपस्थिति का मतलब था मौत, अकाल और सूखा। राज्य की ओर से घोषणा की गयी थी कि इस मुसीबत से जो छुटकारा दिलवाएगा उसे ही यहां का राजा बना दिया जाएगा तथा उसीके साथ मृत राजा की रानी की शादी भी कर दी जाएगी। ईडिपस ने यह घोषणा सुनी, उसने वापस तो लौटना नहीं था, एक अलग राज्य पा जाने का अवसर मिलते देख उसने पहेली का उत्तर देने की इच्छा जाहिर कर दी। उसे स्फिंक्स के पास पहूंचा दिया गया। डरावना स्फिंक्स उसे घूर रहा था पर इसने बिना डरे उससे सवाल पूछने को कहा। स्फिंक्स ने पूछा कि वह कौन सा प्राणी है जो सुबह चार पैरों से चलता है, दोपहर में दो पैरों से और शाम को तीन पांवों पर चलता है और वह सबसे ज्यादा शक्तिशाली अपने कम पांवों के समय होता है। ईडिपस ने बिना हिचके जवाब दिया कि वह प्राणी इंसान है। जो अपने शैशव काल में चार पैरों पर, जवानी यानि दोपहर में दो पैरों पर और बुढ़ापे में लकड़ी की सहायता से यानी तीन पैरों से चलता है। इतना सुनना था कि स्फिंक्स वहां से गायब हो गया। थीबिज की जनता ने राहत की सांस ली। घोषणा के अनुसार ईडिपस को वहां का राजा बना दिया गया और रानी जोकास्टा से उसका विवाह कर दिया गया।

होनी का खेल चलता रहा। दिन बीतते गये। ईडिपस सफलता पूर्वक थीबिज पर राज्य करता रहा। प्रजा खुशहाल थी। पूरे राज्य में सुख-शांति व समृद्धि का वातावरण था। यद्यपि रानी जोकास्टा ईडिपस से उम्र में काफी बड़ी थी फिर भी दोनों में अगाध प्रेम था। इनकी चार संतानें हुयीं। बच्चे जब जवान हो गये तो समय ने विपरीत करवट ली। राज्य में महामारी फैल गयी। लोग कीड़े-मकोंड़ों की तरह मरने लगे। तभी देववाणी हुई कि इस सब का कारण राजा लेयस का हत्यारा है। दुखी व परेशान जनता अपने राजा के पास पहुंची। ईडिपस ने वादा किया कि वह शीघ्र ही लेयस के हत्यारे को खोज निकालेगा। उसने राज्य के प्रसिद्ध भविष्यवक्ता टाइरसीज को आमंत्रित कर समस्या का निदान करने को कहा। टाइरसीज ने कहा, राजन कुछ चीजों का पता ना लगना ही अच्छा होता है। सच्चाई आप सह नहीं पायेंगें। पर ईडिपस ना माना उसने कहा प्रजा की भलाई के लिए मैं कुछ भी सहने को तैयार हूं । जब टाइरसीज फिर भी चुप रहा और ईडिपस के सारे निवेदन बेकार गये तो ईडिपस को गुस्सा आ गया और उसने टाइरसीज और उसकी विद्या को ही ठोंग करार दे दिया। इससे टाइरसीज भी आवेश में आ गया। उसने कहा कि आप सुनना ही चाहते हैं तो सुनें, आप ही राजा लेयस के हत्यारे हैं। वर्षों पहले आपने मार्ग ना छोड़ने के कारण जिसका वध किया था वही राजा लेयस आपके पिता थे। ईडैपस को सब याद आ गया। उसने चिंतित हो रानी से पूछ-ताछ की तो उसने विस्तार से अपनी बीती जिंदगी की सारी बातें बताईं कि राजा की मौत अपने ही बेटे के हाथों होनी थी। पर आप चिंता ना करें हमारा एक ही बेटा था जिसे राजा ने उसके पैदा होते ही मरवा दिया था। जोकास्टा ने ईडिपस को आश्वस्त करने के लिए उस आदमी को बुलवाया जिसे शिशु को मारने की जिम्मेदारी दी गयी थी। पर इस बार वह झूठ नहीं बोल पाया और उसने सारी बात सच-सच बता दी। रानी जोकास्टा सच जान पाप और शर्म से मर्माहत हो गयी। इतने कटु सत्य को वह सहन नहीं कर पायी। उसने उसी वक्त आत्महत्या कर ली। ईडिपस देर तक रानी जोकास्टा के शव पर यह कह कर रोता रहा कि तुमने तो अपने दुखों का अंत कर लिया, लेकिन मेरी सजा के लिए मौत भी कम है। उसी समय ईडिपस ने अपनी आंखें फोड़ लीं और महल से निकल गया। कुछ ही समय में उसका पूरा परिवार नष्ट हो गया क्योंकि वह भी उसी पाप की उत्पत्ति था, जो भाग्यवश अनजाने में हो गया था।

शायद यह दुनिया की सबसे दर्दनाक कहानी है।

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

श्याम खाटु जी के दर्शनोपरांत तीन दिनों के एक यादगार सफर का समापन

17 अक्टूबर की सुबह दिल्ली से चल कर राजस्थान के झुंझनु शहर के रानी सती जी के मंदिर के दर्शन कर रात सालासर में गुजार दूसरे दिन 18 अक्टूबर, दोपहर सालासर बालाजी के दरबार में हाजरी लगा फिर सुजानगढ़ के डूंगर बालाजी के दर्शन कर अपरान्ह में दिल्ली वापसी के दौरान पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सीकर में खाटु श्याम जी के दर्शनों हेतु रवानगी शुरू हुई.
अब आगे ..........    
18.10.13 दोपहर बाद पौने तीन बजे गाड़ी का रुख राजस्थान के सीकर जिले के खाटु कस्बे की ओर हो चुका था, जो डूंगर बालाजी से करीब 120-125 किलो मीटर पड़ता है. सफर को मद्दे-नज़र रख सबने सुबह हल्का नाश्ता ही किया था. सो घंटे भर बाद 'च्यास' उभर आई थी जिसका निवारण एक चाय प्रदाता गुमटी के पास रुक कर किया गया. शाम के पौने पांच बजे के लगभग हम खाटु में सुविधा जनक आश्रय स्थल की खोज में थे. आज जब हर जगह बाजार हावी है तो उसका असर अब ऐसे धार्मिक स्थलों के पुराने रिवाजों पर भी हो चुका है. पहले जहां धर्मशालाएं लोगों की सुविधा के लिए होती थीं अब उनका रूप नव निर्मित, आधुनिक सर्व सुविधा युक्त सेवा सदन ले चुके हैं. दिखावा तो वे  धर्मशाला का करते हैं पर व्यवहार आधुनिक होटलों जैसा होता है.  दो-तीन जगह देखने के बाद मंदिर के पास ही एक शांत, साफ-सुथरे आश्रय स्थल, लाला मांगे राम सेवा सदन, का चुनाव कर लिया  गया.
सेवा सदन की छत 
छत से जूम कर लिया गया मंदिर का चित्र 
मंदिर की ओर जाता मार्ग 

वहाँ से मंदिर सिर्फ पांच-सात मिनट की पैदल दूरी पर था. जैसा नाम से आभास होता है कि यहाँ श्री कृष्ण जी का मंदिर होगा वैसा नहीं है। असल में यहाँ  घटोत्कच के पुत्र और भीम के पौत्र बर्बरीक की पूजा होती है। कथा इस प्रकार है :-

श्याम खाटु जी महाराज 
महाभारत का युद्ध शुरू होने ही वाला था कि एक दिन श्री कृष्ण जी ने देखा कि एक दीर्घकाय, बलिष्ठ, अलौकिक आभा से युक्त युवक चला आ रहा है जिसके चहरे पर एक दिव्य तेज विद्यमान था। उसकी पीठ पर एक तरकस था जिसमें सिर्फ तीन तीर थे।  प्रभू तो सब जानते ही थे फिर भी उन्होंने युवक को रोक उसका परिचय और इधर आने का प्रयोजन पूछा। युवक ने बताया कि उसका नाम बर्बरीक है, वह महान योद्धा घटोत्कच का पुत्र है और अपनी माता की आज्ञा लेकर इधर होने वाले युद्ध में भाग लेने आया है।  श्री कृष्ण ने पूछा कि तुम किस और से युद्ध करोगे?
जो भी पक्ष कमजोर होगा उसकी तरफ से, बर्बरीक ने जवाब दिया।  प्रभू ने फिर कहा कि क्या तुम इन तीन तीरों से युद्ध लड़ोगे, ऎसी क्या विशेषता है इन में ? बर्बरीक बोला, प्रभू ये दिव्यास्त्र हैं, इनमें से एक अपने लक्ष्य का पता लगाता है, दूसरा लक्ष्य-भेदन करता है और तीसरा यदि लक्ष्य भेद न करना हो तो वह पहले को निरस्त कर देता है. प्रभू ने प्रमाण स्वरूप सामने के एक विशाल और घने पीपल के पेड़ के पत्तों को निशाना बनाने को कहा। जब बर्बरीक निशाना साधने के पहले मंत्र का आह्वान कर रहा था तो उन्होंने पेड़ का एक पत्ता तोड़ अपने पैर के नीचे दबा लिया। बर्बरीक ने अपना  बाण छोड़ा जो सभी पत्रों में छिद्र कर परभू के चरणों के पास आ घूमने लगा. प्रभू समझ गए कि कमजोर कौरवों की तरफ से लड़ते हुए यह युवक कुछ ही समय में पांडवों का नाश कर देगा। इसीलिए उनहोंने जनहित के लिए युवक से कुछ देने को कहा, बर्बरीक के तत्पर होने पर उन्होंने उसका सर मांग लिया। बर्बरीक बिना किसी हिचकिचाहट के इस पर तैयार भी हो गया. पर सर त्यागने से पहले उसने परभू से दो वर चाहे। पहला कि प्रभू उसे अपना नाम दें और दूसरा वह पूरा युद्ध देख सके। परभू ने उसे वरदान दिया कि उसे सदा उनके नाम श्याम के नाम से जाना जाएगा और कलियुग में जो कोई भी सच्चे दिल से उसका नाम लेगा, उसकी आराधना करेगा उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होंगी और उसकी विपत्तियों का नाश हो जाएगा।   इतना कह प्रभू ने बर्बरीक का सर वहाँ स्थापित कर दिया और युद्ध के पश्चात उसे वहीं समाधी दे दी गयी। जहां समाधी दी गयी थी वहाँ आज एक कुंड है. ऐसी धारणा है कि उस कुंड में स्नान करने से सारी शारीरिक व्याधियां दूर हो जाती हैं।
कुंड का मुख्य द्वार 
कुंड की ओर जाती सीढ़ियां 
पवित्र कुंड 
निर्देश
स्नानोपश्चात 

शाम के साढ़े छह बज रहे थे. लाला मांगे राम सेवा सदन में दो कमरे ले लिए गए, किराया था सुबह बारह बजे तक का 700 रुपये प्रति वातानूकुलित कमरे के हिसाब से. खाने का पहले बताना पड़ता था प्रति व्यक्ति 50/- की थाली, एक सब्जी और दाल के साथ, जिसका समय रात आठ से दस का था।  कमरों में सामान वगैरह रख हम सब खाटू श्याम जी के दर्शनों हेतु मंदिर चले गए. उस समय वहाँ सिर्फ 25-30 लोग ही थे। श्याम जी का श्रृंगार सफेद फूलों से बहुत सुंदर तरीके से किया गया था। वहाँ से लौट खाना खा सब  नींद के आगोश में समा गए।
19. 10. 13 सुबह-सुबह सदन की छत पर  कुछ यादगार पल कैद कर फिर नित्य कर्म से निवृत हो हम सब एक बार फिर मंदिर की ओर अग्रसर हो लिए। कुछ का दर्शनोपरांत कुंड में स्नान का भी इरादा था।


मंदिर में रात की अपेक्षा भीड़ ज्यादा थी.  वैसे यहाँ फाल्गुन के माह में मेला भरता है जब यहाँ पैर रखने की भी जगह नहीं होती।  दर्शनों के बाद हम कुंड पहुंचे जहां स्नान के बाद करीब सवा बारह बजे  हल्का नाश्ता कर हमने दिल्ली का रुख कर लिया, जो जयपुर मार्ग पर चौमूं - रींगस-गुड़गांव होते हुए था। रास्ते में मानेसर में एक जगह चाय पकौड़ों का सेवन कर रात नौ के करीब घर पहुँच गए थे।  इस तरह तीन दिनों के एक यादगार, खुशनुमा सफर का समापन हुआ.                      

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

सुजानगढ़ के डुंगर बालाजी, जहां पूरी होती है अपना घर बनने की मन्नत

सालासर बालाजी धाम से सुजानगढ़ करीब 34 किलोमीटर दूर स्थित है। सुजान गढ़ के रेलवे स्टेशन से रेल पटरी पार करने के बाद वहाँ से करीब 11-12 की दूरी पर गोपालपुर की पहाड़ी पर 600 फुट की ऊंचाई पर हनुमान जी का एक मंदिर है जिसे डूंगर बालाजी के नाम से जाना जाता है।  उस ऊंचाई से चारों ओर का सुंदर विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
डूंगर बाला जी 


मंदिर की सीढ़ियां 

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गाड़ी खडी करने की जगह से मंदिर तक जाती सीढ़ियां 


पार्किंग 


नीचे का दृश्य 
किसी आस्थावान द्वारा बनाया गया घर 


मंदिर के पास तक गाड़ी जाने का मार्ग बना हुआ है पर चढ़ाई बहुत ही तीखी तथा घुमावदार होने की वजह से कुशल ड्रायवर ही गाड़ी ऊपर ले जाए तो ठीक है। गाड़ी खडी करने की जगह से मंदिर तक जाने के लिए करीब तीस-पैंतीस सीढ़ियां चढ़नी होतीं हैं।  इस मंदिर के सिर्फ 80-90 साल पुराना होने के बावजूद यहाँ की मान्यता बहुत है। लोगों की दृढ मान्यता है कि यहाँ बिखरे ईंट-पत्थरों से यदि एक घर का आकार बना दिया जाए तो उस इंसान का असल जीवन में घर जरूर बन जाता है। इसके साथ ही यह भी चेतावनी दी जाती है कि पहले से बना किसी आस्थावान द्वारा बनाया गया घर का ढांचा न तोड़ा जाए।      

हम सब सालासर बालाजी के दरबार में हाजरी लगा डूंगर बालाजी के दर्शनार्थ करीब दो बजे पहुँच गए थे।  जहां से तीन बजे के लगभग सीकर की ओर श्याम खाटु जी के दर्शनों का लाभ उठाने हेतु गाड़ी का मुंह मोड़ लिया गया।  
यदि कभी सालासर जाएं तो थोड़ा सा समय निकाल डूंगर बाला जी के भी दर्शन भी जरूर कर आएं। 
कल श्याम खाटु जी महाराज के दरबार में .....