रविवार, 30 सितंबर 2012

अविश्वसनीय भारत


दोस्तो, कई  मायनों में हमारा देश महान था और है पर उसका एक पहलू और भी है उस पर भी नज़र डाल लेते हैं :

हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां गेहूं 25 रुपये कीलो मिलता है पर सिम कार्ड मुफ्त में उपलब्ध है। 

घायलों या बीमारों के लिए अम्बुलेंस या तो मिलती नहीं या आने में इतनी देर कर देती है कि..... पर विदेशी पिज्जा खिलाने वाले उसको ग्राहक तक आधे घंटे से भी पहले पहुंचाने की कुव्वत रखते हैं। 

आपने कार लेनी है तो सिर्फ 5% के ब्याज पर तुरंत मिल जाएगी पर यदि आप अपने बच्चे की पढाई के लिए लोन लेना चाहते हैं तो वह 12% पर किसी तरह जूते घिसवाने के बाद ही मिल पाएगा या नहीं निश्चित नहीं होता। 

विडबंना है कि जिसे जरूरत होती है उसे बैंक लोन देने में ढेर सारी अडचने खडी कर देते हैं पर उस रसूखदार या सक्षम को यह आसानी से उपलब्ध करवा दिया जाता है, जहां से पैसा वापस आने की संभावना क्षीण होती है।   

यहां फल तथा सब्जियों को तो अस्वास्थ्यकर माहौल में ज्यादातर सडक किनारे बेचा और खरीदा जाता है वहीं जूते और कपडे आलीशान वातानुकूलित माल में बिकते हैं। 

शायद यहीं पेय पदार्थों में नकली सुगंध मिला कर उसे आम, संतरे, मौसम्बी का स्वाद दिया जाता है और असली नींबू से जूठे बर्तनों को साफ करने की सलाह दी जाती है।  

यहां जन्म के सर्टिफिकेट पर अच्छे संस्थान में 40% पर भी दाखिला मिल जाता है पर मेहनत कर मेरिट में 90% आने पर भी धक्के खाने पडते हैं। 

इस देश में जहां लाखों लोगों को एक समय भी भर पेट भोजन नसीब नहीं होता वहां क्रिकेट के विवादास्पद तमाशे पर लोग अरबों रुपये किसी टीम को बनाने और नचाने पर बर्बाद कर देते हैं।  

यहां हर आदमी तुरंत अमीर और मशहूर होने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है पर सही रास्ता अख्तियार करने से दूर भागता है।

सरकारी नुमायंदों के आवास, निवास, दफ्तर तो तुरंत बन जाते है, उनकी सजावट और रख-रखाव पर हर साल करोडों रुपये भी खपाए जाते हैं पर उसी जनता, जिसके रहमो-करम पर वे यह मुकाम हासिल करते हैं उसकी सहूलियतों पर ध्यान ही नहीं दिया जाता और कभी ऐसा हो भी जाता है तो उसको पूरा करने में दशक लग जाते हैं।                         

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

एक अच्छे उद्देश्य के आंदोलन का बुरा अंत

करीब दो साल पहले अन्ना हजारे के दिशा-निर्देश में शुरू हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का जो हश्र हुआ है,वह दुखदाई तो है ही साथ ही करोड़ों देश वासियों की उम्मीदों पर भी पानी फेरने वाला साबित हुआ। आम-लोगों को एक आस बंधी थी कि उनकी मेहनत की कमाई का वह हिस्सा जो टैक्स के रूप में सरकार लेती है और जिसका अच्छा-खासा प्रतिशत बेईमानों की जेब में चला जाता है, उसका जनता की भलाई में उपयोग हो सकेगा। उनको अपना हक पाने के लिए दर-दर भटकना नहीं पडेगा। भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी और भ्रष्टाचारियों की नकेल कसी जा सके। 

रोज-रोज की घोटाले की खबरों और उसमें लिप्त सफेद पोशों के काले चेहरों को देख आम आदमी पूरी तरह हताश-निराश हो चुका था। ऐसे में अन्ना के अवतरण, उनके व्यक्तित्व, उनके चरित्र, उनकी निस्पृहता से उसे अंधेरे में एक आशा की किरण दिखाई दी जिसे वह सुहानी सुबह की रोशनी समझ, उत्साह से भर आंदोलन का हिस्सा बन कभी राम-लीला मैदान तो कभी जंतर-मंतर पर जा खडा हुआ। उअसने आंधी-पानी की परवाह नहीं की। उसे पुलिस की लाठियां ना डरा सकीं, उसे जेल जाने का कौफ नहीं रहा। क्योंकि उसमें एक आशा जगी थी कि सामने वाला अपने जैसा आदमी जिसे सत्ता या धन का लोभ नहीं है वह व्यवस्था में जरूर कुछ ना कुछ फेर-बदल कर सुराज लाने में सफल होगा। कभी-कभी अन्ना के मंच पर विवादास्पद लोगों को जुटते देख एक शंका भी होती थी पर फिर अन्ना की ओजस्वी वाणी उसे आश्वस्त कर देती थी। यहां तक कि सत्तारूढ लोगों की चालों का जवाब देते हुए जब अन्ना ने चुनाव लडने की घोषणा की तब भी उस आम आदमी ने उन्हें जिताने का मन ही मन संकल्प ले लिया था। मगर जिस तरह से अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की राहें अलग हुईं हैं, जैसे इस आंदोलन के अंतर्विरोध और आपसी मतभेद उभर कर सामने आए हैं उससे भिर जन-मानस में हताशा-निराशा घर कर गयी है। क्योंकि इस आंदोलन ने सीधे सत्ता को चुन्नौती दी थी, राजनीति के सामने हुंकार भरी थी, आम इंसान जिनके सामने पडने में घबराता है उन हस्तियों को शीशा दिखलाया था। 

अब केजरीवाल जो करने जा रहे हैं यदि उसमें अन्ना का साथ ना रहा तो वह कहां तक सफल होंगे, क्या वह जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतर पाएंगे, क्या वे अपनी प्रतिबद्धताओं से जुड़े रह पाएंगे? क्या वे चुने जाने के बाद ईमानदार बने रह सकेंगे या फिर खिचडी सरकार बनने, जिसकी आशंका बहुत ज्यादा है, वे भी गठबंधन का फायदा उठा कर आज की नौटंकी की तरह नीतियों का विरोध करने के नाटक और साथ-साथ सत्ता में हिस्सा पाने के लिए कुछ भी करने को तत्पर हो मौकापरस्त बन जाएंगे यह तो समय ही बताएगा। पर अभी तो एक अच्छे उद्देश्य को लेकर शुरु हुए आंदोलन का हश्र बुरा ही रहा है।   

सोमवार, 24 सितंबर 2012

श्री गणपतिजी की अष्टोत्तरशत नामावली यानी श्री गणेशजी के १०८ नाम,


ये श्री गणेशजी के १०८ नाम हैं। रोज इनका जाप करें और सुखीस्वस्थ एवं प्रसन्न रहें

1, ॐ श्री विघ्नेशाय नम:
2, ॐ श्री विश्व्वरदाय नम:
3, ॐ श्री विश्वचक्षुषे नम:        
4, ॐ श्री जगत्प्रभवे नम:
5, ॐ श्री हिरण्यरुपाय नम:
6, ॐ श्री सर्वात्मने नम:
7, ॐ श्री ज्ञानरूपाय नम:
8, ॐ श्री जगन्मयाय नम:
9, ॐ श्री ऊर्ध्वरेतसे नम:
10, ॐ श्री महाबाहवे नम:
11, ॐ श्री अमेयाय नम:
12, ॐ श्री अमितविक्रमाय नम:
13, ॐ श्री वेदवेद्याय नम
14, ॐ श्री महाकालाय नम:
15, ॐ श्री विद्यानिद्यये नम:
16, ॐ श्री अनामयाय नम:
17, ॐ श्री सर्वज्ञाय नम:
18, ॐ श्री सर्वगाय नम:
19, ॐ श्री गजास्याय नम:
20, ॐ श्री चित्तेश्वराय नम:
21, ॐ श्री विश्वमूर्तये नम:
22, ॐ श्री विगतज्वराय नाम:
23, ॐ श्री अमेयात्मने नम:
24, ॐ श्री विश्वाधाराय नम:
25, ॐ श्री सनातनाय नम:
26, ॐ श्री सामगाय नम:
27, ॐ श्री प्रियाय नम:
28, ॐ श्री मंत्रिणे नम:
29, ॐ श्री सत्वाधाराय नम:
30, ॐ श्री सुराधीशाय नम:
31, ॐ श्री समस्तसाक्षिणे नम:
32, ॐ श्री निर्द्वेद्वाय नम:
33, ॐ श्री निर्लोकाय नम:
34, ॐ श्री अमोघविक्रमाय नम:
35, ॐ श्री निर्मलाय नम:
36, ॐ श्री पुण्याय नम:
37, ॐ श्री कामदाय नम:
38, ॐ श्री कांतिदाय नम:
39, ॐ श्री कामरूपिणे नम:
40, ॐ श्री कामपोषिणे नम:
41, ॐ श्री कमलाक्षाय नम:
42, ॐ श्री गजाननाय नम:
43, ॐ श्री सुमुखाय नम:
44, ॐ श्री शर्मदाय नम:
45, ॐ श्री मुषकाधिपवाहनाय नम:
46, ॐ श्री शुद्धाय नम:
47, ॐ श्री दीर्घतुंडाय नम:
48, ॐ श्री श्रीपतये नम:
49, ॐ श्री अनंताय नम:
50, ॐ श्री मोहवर्जिताय नम:
51, ॐ श्री वक्रतुंडाय नम:
52, ॐ श्री शूर्पकर्णाय नम:
53, ॐ श्री परमाय नम:

54, ॐ श्री योगीशाय नम:
55, ॐ श्री योगधाम्रे नम:
56, ॐ श्री उमासुताय नम:
57, ॐ श्री आपद्धंत्रे नम:
58, ॐ श्री एकदंताय नम:
59, ॐ श्री महाग्रीवाय नम:
60, ॐ श्री शरण्याय नम:
61, ॐ श्री सिद्धसेनाय नम:
62, ॐ श्री सिद्धवेदाय नम:
63, ॐ श्री करुणाय नम:
64, ॐ श्री सिद्धाय नम:
65, ॐ श्री भगवते नम:
66, ॐ श्री अव्यग्राय नम:
67, ॐ श्री विकटाय नम:
68, ॐ श्री कपिलाय नम:
69, ॐ श्री ढुंढिराजाय नम:
70, ॐ श्री उग्राय नम:
71, ॐ श्री भीमोदराय नम:
72, ॐ श्री शुभाय नम:
73, ॐ श्री गणाध्यक्षाय नम:
74, ॐ श्री गणेशाय नम:
75, ॐ श्री गणाराध्याय नम:
76, ॐ श्री गणनायकाय नम:
77, ॐ श्री ज्योति:स्वरूपाय नम:
78, ॐ श्री भूतात्मने नम:
79, ॐ श्री धूम्रकेतवे नम:
80, ॐ श्री अनुकूलाय नम:
81, ॐ श्री कुमारगुरवे नम:
82, ॐ श्री आनंदाय नम:
83, ॐ श्री हेरंबाय नम:
84, ॐ श्री वेदस्तुताय नम:
85, ॐ श्री नागयज्ञोपवीतिने नम:
86, ॐ श्री दुर्धषाय नम:
87, ॐ श्री बालदुर्वांकुरप्रियाय नम:
88, ॐ श्री भालचंद्राय नम:
89, ॐ श्री विश्वधात्रे नम:
90, ॐ श्री शिवपुत्राय नम:
91, ॐ श्री विनायकाय नम:
92, ॐ श्री लीलासेविताय नम:
93, ॐ श्री पूर्णाय नम:
94, ॐ श्री परमसुंदराय नम:
95, ॐ श्री विघ्नांधकाराय नम:
96, ॐ श्री सिंधुरवरदाय नम:
97, ॐ श्री नित्याय नम:
98, ॐ श्री विभवे नम:
99, ॐ श्री प्रथमपूजिताय नम:
100, ॐ श्री दिव्यपादाब्जाय नम:
101, ॐ श्री भक्तमंदाराय नम:
102, ॐ श्री शूरमहाय नम:
103, ॐ श्री रत्नसिंहासनाय नम:
104, ॐ श्री मणिकुंड़लमंड़िताय नम:
105, ॐ श्री भक्तकल्याणाय नम:
106, ॐ श्री कल्याणगुरवे नम:
107, ॐ श्री सहस्त्रशीर्ष्णे नम:
108, ॐ श्री महागणपतये नम:

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

ममता, स्नेह, वात्सल्य को पैसे से नहीं तौला जा सकता



यदि ऐसा कोई  कानून बनता है तो क्या यह देश के सभी समुदायों, सभी धर्मावलंबियों पर लागू होगा या अपनी कुर्सियों पर पकड मजबूत करने के लिए सिर्फ "हिंदू मैरेज एक्ट" पर लागू कर हिंदुओं को ही फिर बली का बकरा बनाया जाएगा ?   एक और बात  इन सबसे घबडा कर कुछ पुरुष विवाह के नाम से ही बिदकने लगें तो? क्योंकि पैसा देकर जब बाजार से हर सेवा उपलब्ध होगी तो कोई क्यूं मुफ्त की सरदर्दी पालेगा? वैसे भी विदेशी प्रभाव में आ कर "एक अलग तरह का" जीवन-यापन बडे शहरों में शुरु हो ही चुका है। तब समाज का क्या रूप बनेगा इसका जवाब किस के पास है ?


विज्ञापन के क्षेत्र और बाजार में एक जुमला काफी प्रसिद्ध है, "जो दिखता है वही बिकता है।" चाहे गुणवत्ता से उसका दूर-दूर तक कोई सबंध ना हो। अब यही बात समाज के हर क्षेत्र पर लागू होने लगी है। अपने को खबरों में और मीडिया में बनाए रखने के लिए कोई भी कुछ भी कहने-करने को तैयार रहता है, खासकर 'शो बिज' और राजनीति के खिलाडी। अब कुछ दिन पहले तक महिला व बाल कल्याण मंत्रालय को कौन संभालता है यह "कौन बनेगा करोडपति" में पच्चीस लाख वाला सवाल हो सकता था। पर जबसे पुरुष की कमाई का एक हिस्सा घर की स्वामिनी को देने का शगूफा चला है तबसे अनजानी सी मंत्री महोदया श्रीमती कृष्णा तीरथ को देशवासी ही नहीं बाहर के मुल्कों में रहने वाले भी जानने लगे हैं। इस कानून का क्या हश्र होगा यह तो समय ही बतला पाएगा पर मंत्री महोदया ने खुद को प्रसिद्ध करवा ही लिया। 

कुछ तथाकथित समाज सुधारकों का मानना है कि मर्द सदियों से औरत को भावनात्मक रूप से बेवकूफ बना घर के काम करवाता रहा है तो यह उनकी घटिया सोच है। उन्हें नहीं मालुम कि ममता क्या होती है, स्नेह कैसे सदस्यों को एकजुट रखता है, उत्सर्ग की भावना क्या होती है। पुरुष के दूर-दराज के क्षेत्र में काम पर रहने पर महिला कैसे घर को घर बनाए रखती है। कुछ अपवादों को छोड दें तो क्या पुरुष बाहर जी-तोड मेहनत नहीं करता जिससे उसके परिवार का भविष्य सुखमय हो। क्या वह अपनी पत्नी का दुख-सुख में ख्याल नहीं रखता या फिर वह पूरे परिवार को पालने की चिंता नहीं करता? यदि वह भी मुआवजा मांगने लगे तो? ऐसा भी नहीं है कि सारे पुरुष कर्तव्यपरायण ही होते हैं फिर भी अधिकांश घरों में पति अपनी कमाई का एक बडा हिस्सा पत्नी को सौंप इसलिए निश्चिंत हो जाता है क्योंकि उसे पत्नी की कार्क्षमता पर भरोसा होता है, उसे वह अपने से अलग नहीं मानता। पर इस नासमझदारी वाले कदम से नारी का भला हो या नहो पर इस बात की आशंका जरूर है कि परिवारों में विघटन  शुरु हो रिश्तों में दरारें पडनी शुरु हो जाएंगी। अपरोक्ष रूप से नारी को फिर दोयम दर्जे में ढकेलने की बात हो जाएगी।  हमारे देश की मजबूती में हमारे परिवारों की एकजुटता का बहुत बडा हाथ है ऐसा तो नहीं कि यह भी देश को विखंडित करने की कोई साजिश हो। 

भले ही उनका प्रतिशत नगण्य ही हो पर बहुतेरी महिलाएं ऐसी हैं जो सर उठा कर गर्व से अपना जीवन-यापन कर रही हैं। ऐसा ही एक अच्छा खासा प्रतिशत उन महिलाओं का भी है जो अपने पति से ज्यादा कमा कर परिवार को सुखमय बना रहा है। देश में कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहां आज भी मातृ-सत्ता का चलन है, वहां महिलाओं का ही बर्चस्व है। इन सब को भी आप नकार नहीं सकते। सिर्फ वातानुकूल कक्ष में बैठ घडियाली आंसूं बहा किसी का भला नहीं हो सकता। कानून ऐसा हो जो सर्व मान्य हो, बिना किसी को ठेस पहुंचाए उसे सम्मान पूर्वक जीने का हक दिला सके चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, बाल हो या वृद्ध।           

यदि सरकार सही मायनों में महिलाओं का उत्थान चाहती है तो भी यह रास्ता उचित नहीं लगता। इससे बेहतर होता कि पुरुष की सारी संपत्ति का आधा भाग महिला के नाम कर दिया जाता। इस तरह काम के बदले पैसा देना ओछी मानसिकता का प्रतीक है। कोई भी स्वाभिमानी, प्रेमल, ममतामयी नारी इस तरह अपना मेहनताना लेना स्वीकार नहीं करेगी। जो स्त्री अपने स्नेहिल, वात्सल्यता भरे व्यवहार से दुख-तकलीफ, खुशी-गम, ऊंच-नीच में परिवार को एकजुट रखती रही हो, जिसका अधिकार सारे घर पर माना जाता रहा हो उसे इस तरह कैसे उसी की नजरों में कमतर साबित किया जाना चाहिए। यह तो उसका व्यवसायिककरण हो जाएगा।  पति-पत्नी का पवित्र बंधन  मालिक और नौकर का रिश्ता बन कर रह जाएगा। फिर यदि ऐसा होता है तो पैसे के बदले करवाए गये काम में मीन-मेख निकालना शुरु हो जाएगा। काम पूरा ना होने की स्थिति में आक्रोश और क्रोध की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। दूसरी बात दुनिया में सिरफिरों की कोई कमी नहीं है ऐसा ही कोई पति काम के बदले पैसा दे अपनी और जिम्मेदारियों से मुंह मोड ले तो महिला की अन्य जरूरतों यथा कपडे-लत्ते, दवा-दारू, मनोरंजन, निजी वस्तुओं की जरूरत तथा अन्य ढेरों खर्चों के लिए आवश्यक रकम क्या सरकार अपने कोष से देगी? एक बात और भी गौर-तलब है बहुतेरे घरों में पति-पत्नी में नोक-झोंक, अनबन, तनाव या कलह-क्लेश की स्थिति बनी रहती है। उस पर यदि इस प्रकार के उट-पटांग कानून लाद दिए जाएंगे तो इन सबसे घबडा कर कुछ पुरुष विवाह के नाम से ही बिदकने लगें तो? क्योंकि पैसा देकर जब बाजार से हर सेवा उपलब्ध होगी तो कोई क्यूं मुफ्त की सरदर्दी पालेगा? वैसे भी विदेशी प्रभाव में आ कर "एक अलग तरह का" जीवन-यापन बडे शहरों में शुरु हो ही चुका है। तब समाज का क्या रूप बनेगा इसका जवाब किस के पास है? 

सबसे बडी बात यदि यह कानून बनता है तो क्या यह देश के सभी समुदायों, सभी धर्मावलंबियों पर लागू होगा या अपनी कुर्सियों पर पकड मजबूत करने के लिए सिर्फ "हिंदू मैरेज एक्ट" पर लागू कर हिंदुओं को ही फिर बली का बकरा बनाया जाएगा?  

देश के "सेव फ़ैमिली फाउंडेशन", जिसकी देश भर में करीब चालीस शाखाएं हैं, का कहना है कि कोई भी कानून लिंग भेद नहीं करता पर इस बार यह एक तरफा बात लगती है जिसमें दूसरे पक्ष को पूरी तरह नजरंदाज किया गया है। जिसका सबसे खतरनाक पहलू पारिवारिक विखंडता होगी। 

इसलिए यदि सरकार अपनी राजनीति से उपर उठ कर सचमुच महिलाओं का भला और उनका सर्वांगीण उत्थान चाहती है तो कोई तर्कसम्मत कदम उठाए। नहीं तो जैसी हमारी व्यवस्था है उसमें किसी की भलाई के लिए दिल से उठाये गये कदम को भी गलत रास्ते में डलवाने में देर नहीं लगती। बाल-विवाह, विधवा-उद्धार, बाल-श्रम, बालिका-पुनुरुत्थान, रेवडी की तरह बंटती छात्र-वृत्तियों का हश्र सभी देख ही चुके हैं। 


सोमवार, 17 सितंबर 2012

हम्माम का तमाशा देखने को तैयार रहें


आज जहां आम जनता की क्रय क्षमता दिन पर दिन लगातार कम होती जा रही है या यूं कहें कि करवाई जा रही है। जहां मिडिल क्लास में जन्म लेना श्राप सरीखा हो गया है, वहीं राजनीतिक पार्टियों और उनसे जुडे महानुभावों की तिजोरियों में लगातार लक्ष्मी की आवक बनी हुई है। साथ ही विडंबना यह है कि ये अपनी आय की जानकरी न देने में भी हिचकिचाते नहीं हैं। जिनमें अपने आप को जमीन से जुडी पार्टी कहलवाने वाली तृणमूल और नेशनल कांफ्रेंस सर्वोपरि हैं।

आरटीआई की दिन-रात की मेहनत से यह खबर जनता तक पहुंची कि पिछले सात सालों में राजनीतिक दलों ने चंदे के रूप में जनता से करीब चार हजार सात सौ करोड रुपये हासिल किए हैं। इसमें सब से बडा हिस्सा कांग्रेस को उसके बाद भाजपा फिर बसपा जैसी दलित कहलाने वाली पार्टी तथा फिर समाज में एकरूपता लाने का दम भरने वाली माकपा का शेयर रहा है। पर मजे की बात यह है कि इस मुफ्त की आमदनी का जरिया बताने को कोई भी तैयार नहीं है। इस मुद्दे पर सारे दल एक समान हैं। कुरेदने पर कोई इसे अपने प्रति जनता का प्रेम कहता है, कोई इसे दान के खाते से आया बताता है तो कोई कूपन बेचने से हुई आमदनी कहता है। इन दलों ने मान लिया है कि लोग बेवकूफ हैं कुछ भी कह दो क्या फर्क पडता है। अब गंवार से गंवार आदमी भी यह नहीं मान सकता कि कूपनों से अरबों की आय हो सकती है पर किसे परवाह है?

हमारे देश में कानून है कि चंदे वगैरह की रकम बीस हजार से ज्यादा नहीं हो सकती। पर इस कानून का हश्र भी बाकी धाराओं जैसा ही कर दिया गया है। हर पार्टी का यही कहना है कि उन्हें देने वाले लोगों ने इस सीमा का उल्लंघन नहीं किया है। सबने थोडी-थोडी राशि दे कर हमारे हाथ मजबूत किए हैं।
   
किसी तरह सामने आयी यह खबर हमारी अपने को पाक-साफ कहने वाली पार्टियों का चरित्र और नीयत का पर्दाफाश करती है। अब ऐसे कारूं के खजाने पर बैठे देश के कर्णधारों को कहां सुध है जनता की हालत देखने और उसकी दिनों-दिन जर्जर होती जिंदगी की सुध लेने की। किसी के घर चुल्हा जले ना जले इनकी बला से। कोई अधभूखा रहे तो इनकी बला से और तो और कोई मंहगी दवा-इलाज के कारण दम तोड दे तो इनकी बला से। इन्हें सिर्फ एक ही चिंता है कि आने वाले समय में कुर्सी ना खिसक जाए और उसके लिए कोई भी दल किसी भी हद तक जाने में नहीं झिझक रहा। पर्दा उठ चुका है बस कुर्सी बचाने, सामने वाले की कमजोरी का फायदा उठाने, लोलूपता का किस्सा दोहराने-तिहराने, मौका-परस्त अपना जलवा दिखाने उजागर होने ही वाले हैं।

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

ऐसे शतक पर वारी जाएं।



धन्य हैं वे मुट्टी भर भारत के सपूत जो आज के कदाचार, भ्रष्टाचार, अनाचार से भरे माहौल की तरफ़ ध्यान ना दे अपने देश का नाम रौशन करने में दिन रात जुटे हुए हैं। 

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) ने पिछले रविवार को पीएसएलवी (ध्रुवीय प्रक्षेपण यान) से फ्रांस और जापान के दो उपग्रहों को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेजकर अपना सौंवा अभियान पूरा किया यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, जो अंतरिक्ष विज्ञान और उससे जुड़े कारोबार में भारत की काबिलियत को रेखांकित करती है।

आजादी मिलने के शुरुआती दशक मे जब इसरो की स्थापना की गई थी तब किसी को अनुमान भी नहीं था हमारे जैसा गरीब और सैंकडों समस्याओं से जूझने वाला देश ऐसी उपलब्धि हासिल कर लेगा कि अपने से विकसित देशों के उपग्रहों को भी अंतरिक्ष में पहुंचाने में सक्षम हो जाएगा। 

19 अप्रैल, 1975 को अपने पहले उपग्रह आर्यभट्ट को रूसी रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में स्थापित करने के बाद से इसरो ने कभी पीछे मुड कर नहीं देखा। फिर 1999 में पीएसएलवी-सी2 से पहली बार एक विदेशी जर्मन उपग्रह को अंतरिक्ष में भेज अमीर देशों को चमत्कृत कर दिया था। वरना इस क्षेत्र में अमेरिका, यूरोप और रूस का ही दबदबा हुआ करता था। वास्तव में पीएसएलवी भारत का सबसे भरोसेमंद प्रक्षेपण यान साबित हुआ है, जिससे अब तक पचास से ज्यादा उपग्रहों को उनकी कक्षाओं में स्थापित किया जा चुका है, जिनमें 28 विदेशी उपग्रह भी शामिल हैं।  

पीएसएलवी का यह लगातार 21वां सफल अभियान था, जिसमें उसने फ्रांस के 712 किग्रा के उपग्रह स्पॉट-6 को ले जाकर एक नया कीर्तिमान भी बनाया है। यही नहीं, चार साल पहले भारत ने चंद्रयान-1 के जरिये धरती माता के भाई की भी कुशल-क्षेम पूछी थी, और जिसकी नजर अब मंगल ग्रह की ओर है।  

ऐसा नहीं है कि इसरो को सदा सफलता ही मिलती रही है। पर उन असफलताओं से सीख ले कर ही आज यह मुकाम हासिल हो पाया है। जिसकी बदौलत संचार से लेकर खेती तथा मौसम की जानकारियों के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं। 

धन्य हैं वे मुट्टी भर भारत के सपूत जो आज के कदाचार, भ्रष्टाचार, अनाचार से भरे माहौल की तरफ़ ध्यान ना दे अपने देश का नाम रौशन करने में दिन रात जुटे हुए हैं। 


शनिवार, 8 सितंबर 2012

सीख तो किसी से भी ली जा सकती है।


हमारे यहां सीख दी जाती है कि अंधे को अंधा या लंगडे को लंगडा नहीं कहना चाहिए पर जिन देशों की हम नकल करते हैं वहां ऐसा रिवाज नहीं है वह तो जैसा है वैसा ही सच बोलते हैं, फिर चाहे उनके निशाने पर कोई  भी क्यों ना हो। 

कभी जगतगुरु होने का दावा करने वाला अपना देश आज कहाँ आ खडा हुआ है? चारों ओर भर्ष्टाचार, बेईमानी, चोर-बाजारी का आलम है । कारण सब जानते हैं। साफ सुथरी छवि वाले, पढ़े-लिखे, ईमानदार, देश-प्रेम का जज्बा दिल में रखने वालों के लिए सत्ता तक पहुँचना सपना बन गया है। धनबली और बाहूबलियों ने सत्ता को रखैल बना कर रख छोडा है।

वर्षों तक हम इसी मुगालते में रहे कि हम चुन-चुन कर लायक लोगों को देश की बागडोर सौंपते हैं। जबकि सत्य तो यह था कि ज्यादातर तिकडमी लोग खुद को चुनवा कर सत्ता हथियाते रहे हैं। ऐसे चरित्रवान लोगों का रवैया जनता विधान-सभाओं और लोक-सभा में साक्षात देख चुकी है। अभी तक राज्य-सभा के बारे में सबकी धारणा कुछ अलग थी। लोगों की ऐसी मान्यता थी कि इस उच्च सदन में आने वाले सदस्य राजनीति की तिकडमों से कुछ हद तक बचे रहते हैं। खासकर अपने क्षेत्र में महारत हासिल करने वाले कुछ सदस्यों के कारण भी इस सदन का गौरव बढ जाता है।

पर जब से कुछ नेताओं ने अपने "चारणों" और चाटुकारों को येन-केन-प्रकारेण यहां त्रिशंकू बना भेजना शुरु किया है तब से इस सदन की मर्यादा भी धूल-धूसरित होने लग गयी है। पिछले दिनों इन वरिष्ठ सदस्यों की हाथा-पाई अपनी कहानी खुद कहती है। जब की इस नौटंकी के एक मूक दर्शक के रूप में हमारे प्रधान मंत्री भी वहां मौजूद थे।

ऐसे में समय आ गया है कि हम पुरानी यादों से अपने को गौरवान्वित करना छोड सच्चाई का सामना करें। अपनी बुराईयों को दूर करने के लिए छोटे-बडे का झूठा दंभ तोड जहां भी अच्छाई हो उसे ग्रहण करें। इसके लिए बहुत दूर ना जाकर हम अदने से भूटान से भी सीख ले सकते हैं।

हमारे इस छोटे से पड़ोसी "भूटान" ने अपने स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों के लिए कुछ मापदंड तय कर रखे हैं। उसके लिए पढ़े-लिखे योग्य व्यक्तियों को ही मौका देने के लिए पहली बार लिखित और मौखिक परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है। इसमें प्रतियोगियों की पढ़ने-लिखने की क्षमता, प्रबंधन के गुण,  राजकाज करने का कौशल तथा कठिन समय में फैसला लेने की योग्यता को परखा जाता है। इस छोटे से देश ने अच्छे तथा समर्थ लोगों को सामने लाने का जो कदम उठाया है, क्या हम उससे कोई सीख लेने की हिम्मत कर सकते हैं?

यदि देश को आगे ले जाना है, आने वाली पीढियों को एक स्वस्थ, भ्रष्टाचार से मुक्त, सिर उठा कर खडे होने का, दूसरे देशों से आंख मिला कर बात करने का माहौल देना है तो पहल तो करनी ही पडेगी। हमारे यहां सीख दी जाती है कि अंधे को अंधा या लंगडे को लंगडा नहीं कहना चाहिए पर जिन देशों की हम नकल करते हैं वहां ऐसा रिवाज नहीं है वह तो जैसा है वैसा ही सच बोलते हैं, फिर चाहे उनके निशाने पर कोई शीर्ष नेता ही क्यों ना हो। उनके इस कदम से आग-बबूला हो उन्हें कोसने की बजाए हम अपना आचरण ठीक कर लें इसी में बेहतरी है। 


शनिवार, 1 सितंबर 2012

बदलना बड़ा-मस्तान में ब्रह्मस्थान का


अक्सर स्थानों या जगहों के ऐसे-ऐसे नाम सुनने-जानने को मिलते हैं जिनका उस स्थान से दूर-दूर का रिश्ता नहीं होता, नाहीं उस नाम के अर्थ से उसका कोई सम्बंध होता है। फिर भी उसी नाम से उसे प्रसिद्धि मिल जाती है। अनेक जगहों में स्मारक इत्यादि के समय के आगोश में समा जाने के बाद भी नाम यथावत रह जाता है। पर ज्यादातर ऐसे नामकरण जाने-अंजाने, कलीष्ट शब्दों के सहजीकरण या फिर नासमझी के कारण हो जाते हैं। अपने देश के अधिकांश शहरो-गावों में ऐसे नाम मिल जाएंगे।

अब जैसे मुंबई  में चर्चगेट पर ना चर्च है ना गेट। लोहार-चाल में लोहार नहीं मिलते। भिंडी बाजार में भिंडी या नल-बाजार में नल नहीं बिकते। तीन बत्ती पर तीन लैंप-पोस्ट नहीं तीन रास्ते आपस में मिलते हैं। अंधेरी एक पाश इलाका है वहां अंधेरा नहीं छाया रहता। किंग सर्कल में राजा-महाराजा नहीं रहते। इस जगहों के नाम ऐसे कैसे पडे यह शोध का विषय हो सकता है। जिसका कुछ-कुछ अंदाज लगाया जा सकता है।    

पश्चिम बंगाल की बात बतलाता हूं। कोलकाता से लगभग पन्द्रह की.मी. की दूरी पर टीटागढ नामक एक जगह है। यहां एक पेपर मील भी है। सडक से यह स्थान कोलकाता से जुडा हुआ है। इसी के बाद अगला कस्बा बैरकपुर का है। वही बैरकपुर जो ब्रिटिश काल में अंग्रेजी फौजों का केंद्र हुआ करता था। आज यहां भारतीय सेना की छावनी है। बैरकपुर से कोलकाता के लिए अच्छी बस-सेवा उपलब्ध है। इन बसों के साथ चलने वाले सहायक लडके यात्रियों की सुविधा के लिए बस-स्टापों के नाम जोर-जोर से बोलते रहते हैं। बैरकपुर और टीटागढ के बीच एक बस स्टाप है जिसे ये लडके 'बडा मस्तान' के नाम से पुकारते हैं। जिसका अर्थ होता है, कोई बलशाली या दबंग इंसान। या फिर कोई पीर या सिद्ध बाबा जो इस नाम से मशहूर रहा हो और समय के साथ उसकी समाधी या मजार बना दी गयी हो। छुटपन में तो इन सब बातों पर ध्यान कहां जाता है पर होश संभालने पर जब कुछ खोज-खबर लेनी चाही तो आस-पास कोई समाधी या मजार का पता नहीं लग पाया। लोगों से जानकारी ली तो भी यही पता चला कि ऐसा कोई फकीर यहां हुआ ही नहीं। हां बस-स्टाप से थोडी दूरी पर एक छोटे से अहाते में एक मंदिर है। उस जगह को ब्रह्म-स्थान के नाम से जाना जाता है। तब जाकर यह रहस्य खुला कि यह ब्रह्म-स्थान ही धीरे-धीरे नासमझ लडकों की 'नीम-हकीमी' के कारण बडा-मस्तान का रूप लेता चला गया है।

हो सकता है की इस तरह के कई  नाम ऐसे ही "व्याकरण के ज्ञाताओं" के दिमाग की उपज हों।