बुधवार, 25 अप्रैल 2012

कलकत्ते की शान, हावडा पुल



कलकत्ता  के स्मारकों की अंतिम किस्त  - 
आज जब कहीं ना कहीं कुछ साल पुराने पुलों के टूटने, नवनिर्मित या बनने के दौरान ही गिर जाने वाले पुलों की खबर आती है तो इस पुल को इस उम्र में भी सीना ताने, अथक मेहनत करते देख इसके बनाने वालों के प्रति आदर से सर झुक जाता है।

हावडा पुल। वर्षों-वर्ष इस अनूठे अजूबे के ऊपर से दिन में दो बार गुजरना होता रहा। कभी बस से, कभी ट्राम से     और कभी-कभी पैदल भी, पर कभी इसको ध्यान से नहीं देखा था। अलबत्ता नवागंतुकों को हावडा स्टेशन से निकलते ही पूरा सर उठा कर इसे देखना ध्यान में जरूर आ जाता था। पर अब दूर रह कर इसकी अहमियत समझ में आती है।  

कस्बे हावडा की खुशकिस्मति थी कि दुनिया के व्यस्ततम कैंटीलीवर पुलों में से एक यह पुल यहां बना जिससे वह भी संसार भर में मशहूर हो गया, नहीं तो दुनिया के विशाल और व्यस्ततम रेल स्टेशनों में से एक होते हुए भी शायद उसका इतना नाम नहीं होता।  

हुगली नदी के दोनों किनारों पर पसरा, हावडा और कलकत्ते को जोडता, बाहर से आने वालों के लिए प्रवेश-द्वार सरीखा, विश्व का अनोखा कैंटिलीवर पुल, कब कलकत्ते की एक पहचान बन गया पता ही नहीं चला। यह सिर्फ एक पुल ही नहीं कलकत्ते की जीवन रेखा है। रोज हजारों-हज़ार लोग कलकत्ते के आस-पास के इलाकों से काम करने, अपनी रोजी-रोटी कमाने और शहर की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस पर से गुजरते हैं। देश के कोने-कोने के विभिन्न स्थानों से लोग हावडा स्टेशन पर उतर शहर जाने से पहले इसी के दर्शन करते हैं। 

इसके पहले इस जगह पर एक पुराना पुल हुआ करता था, पर नदी में रोज दो बार तेज ज्वार-भाटे के कारण खतरे की आशंका  सदा बनी रहती थी। इसीलिए तत्कालीन सरकार ने एक मजबूत और ऊंचा पुल बनवाने का निर्णय लिया। जिसके फलस्वरूप 1939 में बनना शुरु हो कर 1943 में इस नये पुल का स्वरूप सामने आया। 

करीब सात सालों में पूरे हुए इस 8 लेन के 705 मीटर लम्बे और 71 फुट चौडे पुल के दोनों तरफ 15-15 फुट के दो पैदल पथ पद-यात्रियों के लिए बने हुए हैं। इस पूरी बनावट का भार इसके दोनों सिरों पर 90 मीटर ऊंचे दो विशाल जल-रोधक स्तभों ने उठा रखा है। उनके अलावा बीच में कोई सहारा या खंभा नहीं है। इसे बनाने में करीब 26500 टन लोहे की खपत हुई थी। एक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि इसमें कहीं भी "नट-बोल्ट" का इस्तेमाल नहीं किया गया है। सारी की सारी जुडाई "रिवेट" के द्वारा हुई है। उस जमाने में इसके बनने में 2,5000000 रुपये का खर्च आया था। आज तो इतने पैसे पर बिचौलिए भी नहीं मानते।  

आज इसके ऊपर से करीब 60 से 70 हजार विभिन्न तरह की गाडियां और अनगिनत लोग आवाजाही करते हैं। आजादी के बाद इसका नाम "रविंद्र सेतु" कर दिया गया है। पर ज्यादातर लोग अभी भी इसे "हावडा ब्रिज" के नाम से ही जानते हैं। इसकी खूबसूरती को निहारना हो तो नदी में नौका में या स्टीमर में बैठ इसके बीचो-बीच जा कर देखें, एक अद्भुत नजारा पेश आएगा। तभी समझ भी आएगा कि क्यों इसका अनगिनत, विभिन्न भाषाओं की फिल्मों में फिल्माकन किया गया है। 

आज जब कहीं ना कहीं कुछ साल पुराने पुलों के टूटने, नवनिर्मित या बनने के दौरान ही गिर जाने वाले पुलों की खबर आती है तो इस पुल को इस उम्र में भी सीना ताने, अथक मेहनत करते देख इसके बनाने वालों के प्रति आदर से सर झुक जाता है।


# सारे  आंकड़े  और चित्र अंतरजाल से साभार

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

कोलकाता की शहीद मीनार

कलकत्ता/कोलकाता से संबंधित चौरंगी, विक्टोरिया मेमोरियल के बाद यह तीसरी किस्त है.  शहीद मीनार भी कोलकाता में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है तथा अच्छे-बुरे समय की गवाह रही है.  
  
कलकत्ता/कोलकाता की पहचान बताने वाले स्मारकों में एक मीनार भी शामिल है। जो कोलकता के दिल चौरंगी के पास स्थित है। यह भी दिल्ली की कुतुब मीनार की तर्ज पर जंग में फतह की निशानी के तौर पर बनाई गयी थी। सन 1848 में सर डेविड आक्टरलोनी ने नेपाल की लडाई में अपनी विजय को यादगार बनाने के लिए इसे बनवाया था। इसी लिए पहले इसे "आक्टरलोनी मौन्यमंट" के नाम से जाना जाता  था। पर सन 1969 से इसे एक नया नाम दे दिया गया, "शहीद मीनार"। जो देश की आजादी के लिए शहीद हुए देशभक्तों की याद में रखा गया था। 

आजकल यहां, दिल्ली के 'जंतर-मंतर' की तरह, विभिन्न दलों के जुलुसों की शुरुआत, ऐतिहासिक समारोहों का आयोजन या दलों द्वारा विरोध प्रदर्शन के लिए बैठकें आयोजित की जाती हैं। यहां हुई ऐसी सबसे पहली बैठक का ब्योरा 1931 का मिलता है, जब कवि-गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने एक दिक्षांत समारोह का सभापतित्व करते हुए अंग्रेज सरकार के कार्यों के प्रति विरोध प्रगट किया था।               
     
इस मीनार की ऊंचाई 158 फिट है तथा ऊपर की तरफ दो छज्जे, खडे होने के लिए बने हुए हैं। ऊपर जाने के लिए मीनार की गोलाई के साथ-साथ अंदर की ओर सीढियां बनी हुई हैं जिनकी संख्या 223 है। मीनार के ऊपर से शहर की खूबसूरती को बखूबी निहारा जा सकता है। पर कुछ वर्षों पहले कुछ दुखद हादसों के कारण इस पर निर्बाध चढना बंद करवा दिया गया है। अब इस पर चढने के लिए कोलकाता पुलिस से इजाजत लेनी पडती है।

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

तीन टन की मूर्ति, जो हवा के झोंके से घूमती है


इस  इमारत की  सबसे   अनोखी,   आश्चर्यजनक,   अनूठी  तथा   हैरतंगेज वस्तु है,  मेमोरियल  के सिरे पर स्थापित एक परी की मूर्ति, जिसके एक हाथ में बिगुल है।  काले  कांसे से  बनी   इस मूर्ति  का वजन तीन टन है। इसे ऐसे स्थापित किया गया है कि 15 की.मी. की  गति से  हवा के  चलते ही यह उसकी दिशा में घूम जाती है। इंजीनियरिंग का यह बेजोड़ और अनूठा कमाल है

विक्टोरिया मेमोरियल, कोलकाता की शान और पहचान। जिसे अंग्रेजों ने अपनी साम्राज्ञी रानी विक्टोरिया और अंग्रेजों के स्वर्णिम शासन काल की याद में उस समय की भारत की राजधानी में इस भव्य इमारत को बनवाया था। उनकी इच्छा थी कि यह इमारत आगरे के ताजमहल से भी ज्यादा भव्य हो। संसार के कुशलतम शिल्पी विलियम एमर्सम के अथक प्रयास और देश के सबसे उत्तम मकराना के संगमरमर से सजने के बावजूद, अपने आप में शिल्प और कला का यह नायाब नमूना ताज की बराबरी तो नहीं कर पाया पर संसार की सुंदरतम इमारतों में अपने आप को शुमार जरूर करवा लिया। इसके अंदर एक छोटा सा पर बहुत खूबसूरत सलीके से सजाया गया म्यूजियम भी है जहां विक्टोरिया युग के आयुध, पेंटिंग, मुर्तियां, सिक्के, डाक-टिकट, कपडे, कलाकृतियां आदि बडे आकर्षक तरीके से लोगों के ज्ञानार्जन के लिए रखे गये हैं।       

ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोलकाता आने वाला कोई भी पर्यटक इस 338x228 और 184 फिट की कलाकृति को देखे बिना वापस चला जाए। बाहर से आने वालों को छोडिए बंगवासी यहां के रहवासी भी यहां बार-बार आने का मोह छोड नहीं पाते हैं। 

पर इस इमारत की सबसे अनोखी, आश्चर्यजनक, अनूठी तथा हैरतंगेज वस्तु है, मेमोरियल के सिरे पर स्थापित एक परी की मूर्ति जिसके एक हाथ में बिगुल है। इसे "एंजल आफ़ विक्टरी" के नाम से जाना जाता है। काले कांसे से बनी 16 फिट की इस मूर्ति का वजन तीन टन है। 23 बाल-बेयरिंगों की सहायता से इसे ऐसे स्थापित किया गया है कि 15 की.मी. की गति से हवा के चलते ही यह उसकी दिशा में घूम जाती है। यानि यह हवा की दिशा बतलाने वाला यंत्र यानि  "Weather-Cock"  है। इतने ज्यादा वजन के बावजूद हवा के झोंके से घूम जाने वाला इंजिनियरिंग का कमाल। जो पूरे ३६० डिग्री तक घूमने की क्षमता रखता है.   

1921 में बनाया गया यह अजूबा वर्षों-वर्ष बिना किसी खराबी के अपनी कसौटी पर खरा उतरता रहा। पहली बार 1985 में इसके घूमने में रुकावट आयी थी, वह भी इमारत का रख-रखाव करते हुए धूल-मिट्टी के कारण इसके बेयरिंग के जाम होने से। उसे तुरंत ठीक भी कर लिया गया था। पर 1999 में आकाशीय बिजली के गिरने से इसका घूमना बिल्कुल बंद हो गया था। पर 6 सालों की अथक मेहनत से इसे फिर अपनी पूर्वावस्था में लाने में कामयाबी हासिल कर ली गयी।  पूरा काम बहुत जोखिम भरा था जरा सी चूक इस ऐतिहासिक  इमारत को मंहगी पड सकती थी। इसी लिए बहुत सावधानी पूर्वक हर कदम को फूंक-फूंक कर रखते हुए सारे काम को अंजाम दिया गया था। 

बंगवासी बेहद संवेदनशील होते हैं। मूर्ति  भले ही अंग्रेजों की देन हो पर उससे सारे बंगाल के रहवासियों को हार्दिक लगाव था तभी तो उसके खराब होने पर पूरे बंगाल में जैसे शोक की लहर दौड गयी थी। पर उसका ठीक होना भी किसी उत्सव से कम नहीं रहा।




सोमवार, 16 अप्रैल 2012

कभी न कभी आप के साथ भी ऐसा जरूर हुआ होगा :-D


बहुतेरी बार कुछ ऐसा घटता है जो कभी-कभी सोच में डाल देता है, कुछ सोचने-समझने लायक ना होने पर भी दिमाग में कुछ सवाल पैदा कर देता है, क्यूं एक-दो बार नहीं, ऐसा कई-कई   बार होता है। आपने भी जरूर यह "महसूसा" होगा कि बाथ-रूम में जाने पर ही द्वार-घंटी बजती है,  या फिर :-  

* जब आप घर में अकेले हों और नहा रहे हों तभी फ़ोन की घंटी बजती है।

* जब आपके दोनों हाथ तेल आदि से सने हों तभी आपके नाक में जोर की खुजली होती है।

* जब भी कोई छोटी चीज आपके हाथ से गिरती है तो वहाँ तक लुढ़क जाती है जहाँ से उसे उठाना कठिन होता है।

* जब भी आप गर्म चाय या काफ़ी पीने लगते हैं तो कोई ऐसा काम आ जाता है जिसे आप चाय के ठंडा होने के
   पहले पूरा नहीं कर पाते।

* जब आप देर से आने पर टायर पंचर का बहाना बनाते हैं तो दूसरे दिन सचमुच टायर पंचर हो जाता है।

* जब आप यह सोच कर कतार बदलते हैं कि यह कतार जल्दी आगे बढेगी तो जो कतार आपने छोडी होती है
   वही जल्दी बढ़ने लगती है।

क्यों -----हुआ  है क्या  :-D

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

कब तक हम बाबाओं की जमात में वृद्धि करवाते रहेंगे?



जब पढे-लिखे लोग ही ऐसे बाबाओं के मकडजाल में उलझ जाते हैं तो सोचिए निरक्षर, अनपढ सीधे-सरल लोगों पर इनकी धार्मिक अफीम का कितना और कैसा घातक असर होता होगा।  पर साथ ही साथ यह भी सच है कि जब तक हम किसी चमत्कार के तहत अपने भविष्य को सवारने, खुशहाल होने के सपने देखते रहेंगे तब तक ऐसे बाबाओं की जमात मे वृद्धि होती रहेगी। 

हमारे पवित्र ग्रन्थ गीता में खुद भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान देते हुए कहा था कि "कर्म किए जा, फल की इच्छा मत कर"। यानि हम यथाशक्ति अपनी सामर्थानुसार कर्म करें, बाकी उसके अच्छे या बुरे परिमाण की चिंता प्रभू पर छोड दें। 

किसके जीवन में सुख-दुःख नहीं आते।  यह तो जीवन चक्र है। स्थाई कुछ भी नहीं है। पर सुख में हम सारी बातें तिरोहित कर जश्न मनाने में जुटे रहते हैं और विपरीत परिस्थितियों में दुख से जल्द से जल्द छुटकारा पाने के लिए इसका-उसका दरवाजा खटखटाने लगते हैं। भूल जाते हैं कि जिसने कष्ट दिया है वही दूर करेगा, छोड देते हैं अपनी आस्था को पीछे, डगमगा जाने देते हैं अपने विश्वास को उस सर्वोच्च सत्ता के प्रति और बन जाते हैं ठगों के हाथ की कठपुतली। 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि दुःख हमारे जीवन में आते हैं तो क्या इन तथाकथित बाबाओं को इनसे मुक्ति मिल पाती होगी? कदापि नहीं। ये भी हमारी तरह पांच तत्वों के जीव हैं, इन्हें भी आदि-व्याधी सताती है। इन्हें भी देह धारण करने का दंड भोगना पडता है। ऐसा शायद ही कोई संत-महात्मा-बाबा या चमत्कारी पुरुष हुआ होगा जिसने अपने जीवन में रोग या हारी-बिमारी का सामना ना किया हो, जिसके जीवन में कभी विपरीत परिस्थितियां ना आईं हों, जिसने कभी कोई कष्ट ना भुगता हो।  किन्तु ये आजकल के मजमेबाज येन-केन-प्रकारेण अपने चारों ओर ऐसा आभा-मंडल रच लेते हैं जिससे आम इंसान की आंखें चौंधिया कर सच देखना बंद कर देती हैं और हम एक अलौकिक पद प्रदान कर इन्हें पूजकर भगवान का दर्ज़ा दे देते हैं। बिना यह सोचे-समझे कि एक आम मनुष्य भगवान कभी नहीं बन सकता है। इन तथाकथित बाबाओं को लेकर पूर्व के अनुभव तो यही कहते हैं कि हमारी अंध श्रद्धा का फायदा उठाकर इनका कद इतना बड़ा हो जाता है जिसकी आड़ में ये गलत काम करने से भी गुरेज नहीं करते। तब शासन से लेकर प्रशासन तक इनके समक्ष निरीह नज़र आता है। 

जब पढे-लिखे लोग ही ऐसे बाबाओं के मकडजाल में उलझ जाते हैं तो सोचिए निरक्षर, अनपढ सीधे-सरल लोगों पर इनकी धार्मिक अफीम का कितना और कैसा घातक असर होता होगा।  पता नहीं देश की जनता कब समझ पाएगी भगवान और आदमी का फर्क, कब समझेगी कि बाबाओं से उसका भला नहीं होने वाला नहीं है? पर साथ ही साथ यह भी सच है कि जब तक हम किसी चमत्कार के तहत अपने भविष्य को सवारने, खुशहाल होने के सपने देखते रहेंगे तब तक ऐसे बाबाओं की जमात मे वृद्धि होती रहेगी। 

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

चाह होनी चाहिए राह तो खुद-बखुद सामने आ जाती है

बहुत पहले सुना था कि जी. टी. रोड पर पंजाब के ढाबों में भीड़ अधिक होने और ग्राहकों के पास समय कम होने की वजह से लस्सी या शेक जैसे पेय पदार्थों को "वाशिंग मशीन" में बनाया जाने लगा था. एक साथ ढेर सारा पेय पदार्थ और समय भी कम. अब यह जिसके दिमाग की भी उपज हो उसकी बुद्धि की बलिहारी. 
पर इस चित्र को देख क्या ऐसा  लगता है कि किसी आविष्कार के लिए बड़ी-बड़ी डिग्रियों की आवश्यकता जरूरी है, नहीं न :-) 
  
 तो दाद दीजिए अपने इस  देसी वैज्ञानिक को. जिसने सिद्ध कर दिया है कि चाह होनी चाहिए, राह अपने आप सूझ जाएगी.  

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

भाव संप्रेषित करने की क्षमता हर प्राणी में होती है।


यदि ध्यान से पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों के कार्य-कलाप को देखा जाए तो बहुत सारे आश्चर्यजनक तथ्य सामने आते हैं। यदि इनकी आवाजों पर ध्यान दिया जाए तो साफ पता चलता है कि विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न ध्वनियों द्वारा ये आपस में संवाद स्थापित करने में सक्षम हैं। खासकर प्रजनन के समय नर अपनी ओर से तरह-तरह की ध्वनी उत्पन्न कर मादा को पास बुलाने और रिझाने का प्रयास करता है।

संसार मं इंसान को तरह-तरह की भाषाएं, बोलियां और ध्वनियां उत्पन्न करने की क्षमता प्राप्त है। पर इसका यह मतलब नहीं है कि दुनिया के और जीव आपस में अपने भावों का संप्रेषण करने में असमर्थ हैं। पर उनके इस काम के होने नहीं होने का हमें पता ही नहीं चल पाता।  मनुष्य को छोड कर शेष जीव-जंतु भी विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न कर अलग-अलग समय में अलग-अलग भाव संप्रेषित करने की क्षमता रखते हैं।  

यदि ध्यान से पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों के कार्य-कलाप को देखा जाए तो बहुत सारे आश्चर्यजनक तथ्य सामने आते हैं। यदि इनकी आवाजों पर ध्यान दिया जाए तो साफ पता चलता है कि विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न ध्वनियों द्वारा ये आपस में संवाद स्थापित करने में सक्षम हैं। खासकर प्रजनन के समय नर अपनी ओर से तरह-तरह की ध्वनी उत्पन्न कर मादा को पास बुलाने और रिझाने का प्रयास करता है। 

कहते हैं कि मोर बादलों को देख अपने पंख फैलाता है पर वहीं वह अपने पंख फैला और नृत्य कर मोरनी को आकर्षित भी करता है। वैसे ही मेढक जो जाडे भर सुप्तावस्था में मिट्टी के नीचे खुद को  दबा रख कर अपने शरीर के तापमान को बनाए रख पडा रहता है वह वर्षा ऋतु के आते ही अपनी टर्राहट से अपनी मादा को संदेश भेजना शुरु कर देता है। मेढक की विभिन्न प्रजातियों में यह ध्वनी अलग-अलग होती है। हमें भले ही यह टर्राहट कर्ण-कटु लगे पर इसे ही सुन कर अंडे देने की स्थति में मादा मेढक अनायास ही नर मेढक की ओर आकर्षित हो जाती है। ज्यादा दूर नहीं अपने घरेलू कुत्ते के व्यवहार पर ही नज़र डालें तो पाएंगे कि सिर्फ भौंकने के लिए बदनाम यह प्राणी भूख लगने, प्यार पाने, प्रेम प्रदर्शन या दुखी होने पर तरह-तरह की ध्वनियां उत्पन्न करता है। यही हाल दूसरे पालतू जानवरों जैसे गाय, बकरी या बिल्ली का भी है। घरों में आने या पाए जाने वाले पक्षियों यथा तोता, कबूतर , गौरैया या कोव्वे के क्रिया-कलाप को ध्यान से देखें तो इनके अलग-अलग भावों में अलग-अलग तरह की आवाजें सुनने को मिलेंगी। पानी के जीवों में छोटी-बडी मछलियों, सील, व्हेल, शार्क या फिर डाल्फिन द्वारा उत्पन्न ध्वनियों या उनके आपस में अपने भावों को पहुंचाने के तरीकों की बात करें तो पन्ने भर जाएंगे। और तो और मच्छर जैसा क्षुद्र कीट भी अपने पंख की फडफडाहट से ध्वनी उत्पन्न कर अपनी बात को अपने साथी तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। और यह बहुत ही आश्चर्य की बात है कि हजारों तरह की ध्वनियों के बीच भी मादा मच्छर द्वारा भेजे गये संदेश को नर बखूबी ग्रहण कर उसके पास पहुंच जाता है। टीड्डे और झिंगुर जैसे कीडे भी जबान ना होने पर भी अपने पंखों को अपने पैरों से रगड कर विभिन्न तरह की ध्वनियां उत्पन्न कर अपनी मादा तक अपना संदेश पहुंचा देते हैं। इनके द्वारा उत्पन् ध्वनियां बडी विचित्र होती हैं। हमारे कान सहसा यह अंदाज नहीं लगा पाते कि किस कोने में बैठा टिड्डा अपनी मादा को संदेश भेज रहा है। पता तो हम बहुत कुछ नहीं लगा पाए हैं, पर संसार भर के वैज्ञानिक ध्वनी संप्रेषण के नये-नये पहलुओं को खोजने में लगे हुए हैं इसी उम्मीद से कि भविष्य में इन तथाकथित मूक प्राणियों की 'बात' समझ पाएंगे। 

तो यदि कभी भी किसी पशु या पक्षी की आवाज सुनें तो गौर जरूर करें कि किस तरह की परिस्थिति में वह कैसी आवाज कर रहा है। कुछ ही समय में आप फर्क जरूर महसूस करने लग जाएंगे।

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

परिवर्तन की आहट !!!


 
कहते हैं आग के बिना धुंआं नहीं होता। तो इन दिनों जैसी-जैसी खबरें आ रही हैं वह मात्र संयोग तो नहीं ही हो सकता। सेना प्रमुख का बयान, फौज का दिल्ली की तरफ कूच, सेना में असले की कमी। यह सब ऐसे ही सामने आ गया हो, गले से नहीं उतरता। भले ही इन सब का खंडन होता रहा हो।

देश की जनता का एक बहुत बडा प्रतिशत सत्तारूढ नेताओं से असंतुष्ट है।  सब मानते हैं कि केन्द्र, जहां अधिकांश जन-सेवकों के दामन काले कारनामों से सने हैं, से निजात मिलनी चाहिए। पर विकल्प किसी को नहीं सूझ रहा है। वैसे सत्ता हस्तगत करने के लिए जिनकी जीभें लपलपा रही हैं उनकी असलियत भी जनता जानती है। मीडिया और संचार माध्यमों की बदौलत आज अंतिम सिरे पर खडा इंसान भी कुछ-कुछ जागरुक हो गया है। वह भी जान गया है कि अब वैसे नेता नहीं रहे जिनके लिए देश सर्वोपरी हुआ करता था। आज तो सब कुछ ‘निज व निज परिवार हिताय’ हो गया है। अब तो तथाकथित क्षेत्रीय नेता भी यह कहने का दुस्साहस करने लग गये हैं कि देश के पहले उनकी पार्टी है, पार्टी यानि वे खुद। आम इंसान की किसी को भी फिक्र नहीं है अब सरकार द्वारा हर फैसला खुद को या बडे घरानों या बडी कंपनियों के हित को मद्दे नज़र रख कर किया जाता है। करोंडों-अरबों डकारने वाले खुले सांड की तरह घूम रहे हैं क्योंकि कमजोर नेतृत्व की हिम्मत नहीं है उन पर नकेल कसने की और उस नुक्सान की भरपाई का खामियाजा देश के मध्यम वर्ग को चुकाना पडता है।

चारों तरफ फैले इस असंतोष को सभी बखूबी महसूस कर रहे है। आजादी के बाद के कुछ साल छोड दें तो भी दबी जुबान से तीस पैंतीस सालों में सैन्य शासन की बात उठ चुकी है। जिसे बडी चतुराई से दबा दिया जाता रहा है। बहुत संभव है कि देशवासियों के आक्रोश और नेतृत्व की अक्षमता को देखते हुए देश का एक धडा इस बात का आकलन कर भविष्य की संभावना को टटोल रहा हो। वैसे भी आज
सेनाध्यक्ष से लेकर आम आदमी भी जानता है कि कहीं भी कुछ भी कह देना पत्थरकी लकीर नहीं हो जाता। बहुसंख्यक यदि पक्ष में हों तो ठीक नहीं तो दूसरे दिन अपनी ही बात का खंडन करना आम बात हो गयी है। वैसे भी किसी की कही बात को आधे लोग तो पढते-सुनते नहीं, जो सुनते हैं उनमें से आधे गौर नहीं करते, बचे हुए आधों को ऐसी बातों पर विश्वास नहीं होता। फिर दूसरे-तीसरे दिन खंडन आ जाता है और हल्के-फुल्के अंदाज में बात आई-गयी हो जाती है। 

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

सीख ऐसी भी तो हो सकती थी।


पुरानी कहानी है कि एक गुरु अपने शिष्यों को लेकर एक जंगल से कहीं जा रहे थे। एक दिन पहले ही भयानक तूफान वहां से तबाही मचाते हुए गुजरा था। जिसके फलस्वरूप बडे-बडे पेड धराशाई हो गये थे पर लता, गुल्म, ऊंची घास, खर-पतवार वैसे के वैसे अपने स्थान पर झूम रहे थे। गुरु ने इन सब की ओर इंगित कर अपने शिष्यों से कहा कि देखो जो गरूर में अकडा रहा उसका नाश हो गया और जो परिस्थिति के अनुसार अपने को ढाल गये वे जीवित बच गये। तुम भी इनसे सीख ले अपने को ऐसा ही बना डालो।

सोचता हूं कि गुरु यह भी तो कह सकते थे कि इन रीढ विहीन, मतलब परस्त, अन्याय का सामना ना कर सकने वाले खर-पतवार की बजाए इन  पेडों से सीख लो कि भले ही हमारा नामोनिशान मिट जाए हम कभी भी  आतंक, अत्याचार, अन्याय या आक्रमणकारी के आगे सर नहीं झुकाएंगे।

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

बंगाल का दिल कलकत्ता और कलकत्ते का दिल धर्मतल्ला यानि चौरंगी यानि एसप्लेनेड


तब कलकत्ता, कलकत्ता ही हुआ करता था. कोलकाता नहीं.  



बंगाल का दिल कलकत्ता और कलकत्ते का दिल धर्मतल्ला यानि चौरंगी यानि एसप्लेनेड। धर्मतल्ला नाम कुछ अजीब सा है खासकर इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि दिल्ली से पहले अंग्रेजों ने कलकत्ता को ही देश की राजधानी बनाया था। खैर बात तब की है जब अभी कलकत्ते में मेट्रो रेल चलने की बात अभी बात ही थी। तब यह इलाका बहुत सुंदर हुआ करता था। हालांकी बंगाल हरियाली से भरपूर है पर शहर कलकत्ता इससे महफूज ही है। जो थोडी-बहुत हरियाली इस शहर के पास थी वह सिर्फ धर्मतल्ला के इलाके के पास से "विक्टोरिया मेमोरियल" तक सीमित थी। वह भी पेड-पौधों के रूप में ज्यादा ना हो कर मैदान के रूप में उपलब्ध थी। वहीं दसियों फुटबाल के क्लब थे। जिनकी जरुरतों के कारण मैदानी हरियाली बची हुई थी। शहर के सघन इलाकों में रहने वाले लोग रविवार और छुट्टी के दिनों ताजी हवा के लिए इधर का रुख जरूर करते थे। रविवार के दिन तो मेला लगा रहता था हर जगह। इस जगह थोडी-थोडी दूर पर करीब 14-15 सिनेमा घर थे, मजाल है कि किसी में भी किसी भी तरह की फिल्म की किसी भी क्लास की टिकट मिल जाए। खूब ब्लैक हुआ करती थी टिकटें। नयी और अच्छी फिल्म की 8-10 रुपये की टिकट 100 रुपये में भी मुश्किल से मिलती थी। इधर से निराश लोग मैदान का रुख कर लिया करते थे। जहां तरह-तरह के जायकों वाली चाट-पकौडी, कचौडी, पुचके और झाल-मुडी वाले जीभ के जरिए लोगों को तरो-ताज़ा बना देते थे। या फिर ऐसे ही मेट्रो सिनेमा से लेकर ग्रैंड होटल के नीचे से होते हुए लोग पार्क स्ट्रीट के मंहगे इलाके तक पहुंच जाते थे "विंडो शापिंग" करते हुए।     

कलकत्ता को महलों का शहर कहा जाता है। ज्यादातर अट्टालिकाएं इसी इलाके में हैं, जो वास्तु और शिल्प का बेजोड नमूना हैं। धर्मतल्ला के 8-10 की.मी. के दायरे मे अंग्रेजी कलाकारी का बेहतरीन कार्य दिखाई पडता है। चाहे वह ताजमहल की तर्ज पर बना विक्टोरिया मेमोरियल हो, चाहे देश के सुंदरतम भवनों में से एक गवर्नर हाउस हो, या फिर फोर्ट विलियम, एक ऐसा किला जो जमीन की सतह से नीचे बनाया गया है, दूर से पता ही नहीं चलता कि वहां कुछ है भी कि नहीं। इनके अलावा ग्रैंड होटल की विशाल इमारत, राइटर्स बिल्डिंग, विक्टोरिया हाउस, अजायब घर, मुख्य पोस्ट आफिस का भव्य भवन, मेट्रोपोलेटिन बिल्डिंग, सेना का मुख्यालय, शहीद मिनार, मेट्रो सिनेमा, टीपू की मस्जिद, स्टेटस मैन का भवन या फिर देश का पहला प्लैनेटेरियम जो बिडलाजी की सौगात है इस शहर को, क्या-क्या गिनाया जाए। 
   
आदमी घूमता-घूमता थक जाए तो पास ही बहती गंगा के किनारे बना बाबूघाट जैसे बाहें पसारे लोगों की थकान मिटाने को आतुर हुआ करता था। शाम ढले किताबों के शौकीनों के लिए हर तरह की किताबों का एक विशाल "जखीरा" पसरा रहता था मेट्रो सिनेमा और शहीद मिनार के बीचो-बीच।      

पर अब सब कुछ बदल सा गया है, ना वह शांति है ना पहले जैसा सकून नाही फुरसत का वैसा माहौल। पैदल पथों पर फेरी वालों ने अतिक्रमण कर चलना दूभर कर दिया है। मेट्रो के बनने से अब वह खुलापन भी दिखाई नहीं देता। शाम ढलते-धलते असामाजिक तत्वों के डर से लोगों ने मैदान की तरफ हवाखोरी के लिए जाना बंद सा कर दिया है। चारों ओर अफरा-तफरी और भागम-भाग ही दिखाई पडती है। कभी जाओ तो हूक सी उठती है दिल में, बरबस याद आ जाता है वह गुजरा जमाना।