बुधवार, 12 दिसंबर 2012

अभी दस तो लो, फिर सौ का देखते हैं

सबको लग रहा है की यही वक्त है कर ले  पूरी आरजू। क्या पता बाद में मौका मिले न मिले। 

ससंद ने भारत में खुदरा व्यापार के लिए बड़ी विदेशी कंपनियों के लिए लाल कार्पेट बिछवा दिया है। जिसके झाडने, संवारने और बिछवाने में सरकार को बसपा और सपा ने आदतानुसार  नौंटंकी रूपी छुपा समर्थन दे विपक्षी प्रस्ताव को धाराशाई करवा दिया।

बसपा अध्यक्ष मायावती से मिले समर्थन और मुलायम सिंह की राजनीति के बाद सरकार के लिए मतदान महज संसदीय औपचारिकता रह गया था। भले ही इसे विपक्ष ने सरकार की नैतिक हार करार दिया हो। मत-विभाजन के बाद भाजपा ने आरोप लगाया कि सरकार ने जोड़-तोड़ से मत हासिल किए हैं। जबकि सरकार ने इसे किसान, व्यापारी संघों और राजनीतिक दलों के साथ विचार-विमर्श के बाद उठाया गया कदम बताया है।

इस बार एक मजेदार वाकया यह रहा कि मतदान से पहले खुद प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी, राजनीतिक खिलाडियों को अपने पक्ष में करने की कवायद करते नजर आए। मनोनीत सदस्यों ने तो सरकार को उपकृत करना ही था पर विपक्षी खेमे में भी कई दरारें नजर आई।
सरकार की जीत में सरकार का एक पहले उठाया गया कदम भी काफी मददगार रहा, जिसमें सरकार ने विदेशी किराना स्टोर को इजाजत देने का फैसला राज्यों पर छोड दिया था। इसी कारण कई क्षेत्रीय दलों ने सरकार का साथ दिया।

यह विडंबना ही कही जाएगी कि जिस बात को लेकर सरकार ने अपने सबसे बडे हितैषी तृणमूल का साथ खोया, जिसके कारण देश को बंद झेलना पडा, संसद का बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ, उसका असर सिर्फ दस शहरों में ही दिखेगा। वह भी दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहर ही होंगे। जबकी ऐसे शहरों की संख्या तकरीबन 53 है।

विदेशी स्टोर खोलने को अब तक केवल 11 राज्यों व केंद्र शासित प्रांतों ने अनुमति दी है। इनमें आंध्र प्रदेश, असम, दिल्ली, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, राजस्थान, उत्तराखंड, चंडीगढ़, दमन और दियू तथा दादर और नागर हवेली शामिल हैं। जबकी खुद कांग्रेस शासित राज्य केरल ने भी अब तक रिटेल में एफडीआइ को इजाजत नहीं दी है। इसके अलावा महाराष्ट्र सरकार भी अभी पेशोपेश में नज़र आ रही है, क्योंकि राज्य की सत्ता में साझेदार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को इस मुद्दे पर ऐतराज है। इन सब बातों से विदेशी कंपनियां भी अचंभित हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि देश की वित्तीय राजधानी का दर्जा रखने वाली मुंबई में ही वे कारोबार क्यों नहीं कर सकतीं? इसकी भी संभावना कम ही है कि ये विदेशी कंपनियां छोटे शहरों की ओर रुख करेंगीं। ऊपर से उन्हें कुछ क्षेत्रीय सरकारों की वह धमकी भी हिचकिचवाएगी जिसमें ऐसे स्टोरों को आग लगा देने वाली धमकियां दी गयी हैं।    

जानकारों का आकलन है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल को देखते हुए विदेशी कंपनियां अगले लोकसभा चुनाव तक इंतजार कर सकती हैं। उन्हें अपने व्यापार से मतलब है,  आखिर वे यहां धंदा  कर पैसे कमाने आईं हैं नाकी अपना नुक्सान करवाने। उधर क्षेत्रीय दल मौके का फ़ायदा उठा सरकार से जितनी सहूलियतें  बटोर सकें बटोरने में लगे हैं। उन्हें सिर्फ अपने गणित से मतलब है। उनका ऊसूल ही है कि  "जैसी बहे बयार, पीठ पुनि तैसी कीजे".  

अब सबको इंतजार है ऊंट की करवट का।