मंगलवार, 24 जुलाई 2012

रायसीना के नये महामहिम


'रायसीना पहाडी' पर बने महल की दरो-दिवारों को भी पता था कि इस बार प्रणव मुखर्जी का आना तय है। राजनीति की काजल की कोठरी से कोई बिरला ही अपना दामन पाक-साफ रख सकता है क्योंकि विपक्ष की तो छोडें अपने ही कोई कसर नहीं छोडते दाग लगाने में, फिर वह चाहे टीके के रूप में ही क्यों ना हो।

अभी बहुत अरसा नहीं हुआ और नाहीं प. बंगाल इसे कभी भुला पाएगा जब ज्योति बसु के प्रधान मंत्री बनने के रास्ते में उन्हीं की पार्टी ने रोडे अटका दिए थे। प्रणव मुखर्जी की इस उपलब्धी से बंगवासियों के दर्दे दिल को जरूर राहत मिलेगी। हालांकि यहां भी पहले राह उतनी आसान नहीं थी पर कहीं ना कहीं दिलों में फांस होने के बावजूद पार्टी ने अपना पूरा जोर लगा दिया था। साथ ही इक्के-दुक्के आरोपों के बावजूद प्रणव जी की छवि, राजनीतिक कद तथा मौके-बेमौके सामने आता रहा तारनहार का रूप भी इस राह में काफी सहायक रहा।  

देश के इस सर्वोच्च पद के लिए ऐसा व्यक्तित्व चाहिए होता है, जिसकी छवि बेदाग हो, सभी दलों में जिसकी समान स्वीकार्यता हो जो सबको साथ लेकर चल सके। जिसे अच्छा-खासा राजनीतिक अनुभव हो, जिसमें मुश्किलात के समय सबसे आगे खड़े होने का साहस हो, जो कठिन परिस्थियों में भी त्वरित निर्णय ले सके, जिसे संसदीय प्रक्रियाओं की गहरी जानकारी हो, जिसकी विलक्षण स्मृति और शालीन व्यक्तित्व हो। ये सारे गुण कलाम साहब और कुछ कमोबेश दादा में उपलब्ध हैं जो उन्हें समकालीन राजनीति में औरों से अलग करते हैं।

इतना तो निर्विवाद सत्य है कि प्रणब मुखर्जी की राजनीतिक और आर्थिक समझ पर कोई उंगली नहीं उठा सकता।  क्लर्क से प्रोफेसर, पत्रकार, और फिर बांग्ला कांग्रेस से राजनीति की यात्रा शुरू करने वाले मुखर्जी इंदिरा गांधी की गैरमौजूदगी में भी कैबिनेट की बैठकों को बखूबी संभालते रहे थे।

हालांकि इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद कुछ कारणों से उन्होंने कांग्रेस पार्टी से खुद को अलग कर लिया था पर उनकी प्रतिभा, क्षमता और लियाकत के कारण पार्टी उन्हें ज्यादा दिन अपने से अलग ना रख सकी। इस वापसी के बाद तो उन्होंने तमाम महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी सफलतापुर्वक संभाली। पिछले करीब आठ वर्षों से वह यूपीए सरकार के संकटमोचक की भूमिका बार-बार निभाते  रहे हैं।

अब देश को उनकी इस नई भूमिका में उनसे सार्थक दिशा-निर्देश की उम्मीद रहेगी।

4 टिप्‍पणियां:

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

जिस तरह से राष्ट्रपति के पद पर कब्जा किया गया है.... पद की गरिमा घटी है.

अब तो मुझे वर्तमान कब्जेदार के लिये 'भ्रष्टपति' संबोधन ही उपयुक्त प्रतीत होगा है.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

इसके पहले भी बहुतेरी बार जनता मन मसोस चुकी है। राह कोई दिखती नहीं 'खुदा की मेहरबानी' काम आ जाती है।

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

लोकतंत्र में जब लोकरुचि का ध्यान नहीं रखा जाता... तब लोकतंत्र का ढोल पीटने वालों पर भारी गुस्सा आता है.

जितने भी महत्वपूर्ण पद हैं ....... उनपर पर जब 'पपेट' आ बैठते हैं. तब वे मनोरंजन तो जरूर देते हैं लेकिन

लोकतंत्र और देश के आम नागरिक के साथ भद्दा मजाक भी करते हैं.

और वे सभी 'पपेट्स' अपने अंत तक पापी पेट को फुलाने में ही लगे रहते हैं... उनकी इसी परंपरा को देर-सबेर आगे बढ़ाने वाले उनके ही कुनबे के लोग आ जाते हैं.

आज जो लोग इसको बदलने में लगे हैं... वे जब भी अकेले दिखते हैं... मन व्याकुल हो जाता है.

एक कहावत याद आ रही है, कहता हूँ.... "गधे गुलाबजामुन खा रहे हैं, घोड़ों को घास नसीब नहीं."

P.N. Subramanian ने कहा…

क्या ऐसा ही लोकतंत्र हम चाहते हैं?