सोमवार, 4 जून 2012

संत कबीर एक लोकचेता कवि, युगांतकारी संत, दार्शनिक, एवं समाजसुधारक भी थे।


कबीर का युग कटु संघर्ष का युग था। जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में कटुता छायी हुए थी। हिन्दु-मुस्लिम के आपसी सिद्धातों का टकराव अपने चरम पर था। इस सबसे कबीर दुखी और व्यथित रहते थे। उन्होंने नयी चेतना जागृत करने, समभाव पैदा करने, वैमनस्य मिटाने के लिए यात्राएं की। कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के समर्थक थे। इसी विचारधारा के अनुसार उन्होंने अपना पंथ चलाया। उनकी भाषा खड़ी बोली, अवधी, पूर्वी, पंजाबी तथा उर्दू भाषाओं का मिश्रण थी। इसे लोग “सुधक्ड़ी” भाषा कहते हैं।

महाभारत काल में माँ के द्वारा त्यागे जाने और फिर अधिरथ द्वारा पाले जाने वाले कर्ण ने जैसे उस युग में अपनी गौरव गाथा फैलाई थी उसी प्रकार कबीर ने अपनी जननी द्वारा त्यागे जाने और जुलाहा परिवार में परवरिश पाने के बाद भक्ति काव्यधारा में अपने नाम को सूर्य की भांति स्थापित कर दिया। 

संसार में ऐसे अनेक साहित्यकार हुए हैं जो अपने युग से प्रभावित ना हो युग को ही प्रभावित करते रहे हैं। निर्गुण संप्रदाय के प्रतिनिधी संत कबीर ऐसे ही लोकचेता कवि थे। जाति संप्रदाय से उपर उठ कर उन्होंने मनुष्य धर्म को प्रतिष्ठित किया। वे युगांतकारी संत, दार्शनिक, कवि एवं समाजसुधारक थे। उनकी सपूर्ण काव्य रचना “ बीजक” नामक ग्रंथ में संकलित है।

कबीर के जन्म पर विद्वान एकमत नहीं हैं। जनश्रुति के अनुसार इनका जन्म 1453 ई। में बनारस में एक विधवा ब्राह्मणी के यहां हुआ था। लोकलाज के ड़र से जननी के द्वारा नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास छोड़ देने के पश्चात नीरू-नीमा जुलाहा दंपत्ति ने वहां से ला कर अपने घर में उनका पालन-पोषण किया। कबीर की शिक्षा घर की हालत और गरीबी के कारण ठीक से नहीं हो पाई थी। उन्हीं के अनुसार “मसि कागद छुओ नहीं, कलम गहि नहीं हाथ”। पर बौद्धिक विलक्षणता उनमें कूट-कूट कर भरी हुए थी। उन पर स्वामी रामानंद के विचारों का बहुत प्रभाव था। कबीर उन्हें ही अपना गुरु मान अपने विचार लोकार्पित करते थे।

कबीर का युग कटु संघर्ष का युग था। जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में कटुता छायी हुए थी। हिन्दु-मुस्लिम के आपसी सिद्धातों का टकराव अपने चरम पर था। इस सबसे कबीर दुखी और व्यथित रहते थे। उन्होंने नयी चेतना जागृत करने, समभाव पैदा करने, वैमनस्य मिटाने के लिए यात्राएं की। कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के समर्थक थे। इसी विचारधारा के अनुसार उन्होंने अपना पंथ चलाया। उनकी भाषा खड़ी बोली, अवधी, पूर्वी, पंजाबी तथा उर्दू भाषाओं का मिश्रण थी। इसे लोग “सुधक्ड़ी” भाषा कहते हैं।

कबीर ने धर्मों में व्याप्त कुरीतियों और पाखंड़ों पर निर्मम प्रहार किए पर साथ ही उनकी समरसता और एकात्म्यता पर भी जोर दिया। उन्होंने भगवान राम को “अनहदनूर” कह कर हिन्दु-मुस्लिम धर्मों की सभ्यता को रेखाकिंत किया। यह विशाल और शाश्वत भाव किसी और के पास नहीं था। इसीलिए सैकड़ों लोग उनके मुरीद बन गये। हिन्दु मुसलमान समान रूप से उनकी जमात में शामिल हो गये। आज कबीर पंथी भारत में ही नहीं विदेशों में भी फैले हुए हैं। कबीर पंथ सुदूर फीजी तथा मारिशस तक अपनी शाखाओं द्वारा लोगों में धर्म समभाव का प्रसार कर रहा है।

कबीर ने कविताएं नहीं लिखीं अपने विचार प्रकट किये हैं। वे मस्त मौला थे, जो दिल में आता था स्पष्ट कह देते थे। तभी तो कहते हैं “चुभ-चुभ कर भीतर चुभे ऐसे कहे कबीर”। उनके लिये सब बराबर थे। सभी खुदा के बंदे थे। उनका चिंतन लोकहित में होता था – “सांई के सब जीव हैं, कीरी कुंजर दोय। का पर दया कीजिए, का पर निर्दय होय।”
उन्हें सभी धर्मों के लोग प्रेम करते थे। वे मुसलमान नहीं थे, हिन्दु हो कर हिन्दु नहीं थे, साधू हो कर गृहस्थ नहीं थे, योगी हो कर भी योगी नहीं थे। पर विड़ंबना यह रही कि कुछ तंगदिल अनुयायियों ने सांप्रदायिक सौहार्द के इस प्रतीक के अवसान के बाद उनके हिन्दु मुस्लिम होने को ले संघर्ष शुरु कर दिया। कहते हैं कि उनका शव फूलों के ढेर में तब्दील हो गया जिसे आधा आधा बांट हिन्दु तथा मुस्लिम रस्मों के अनुसार अंतिम रूप दिया गया। इसके बाद भी आपसी वैमनस्य खत्म नहीं हुआ तो मजार और समाधि के बीच दिवार खड़ी कर दी गयी। ऐसे ही लोगों के लिए कबीर अपने जीवन काल में ही कह गये थे -
“कबीरा तेरी झोपड़ी गलकटियन के पास, करनगे सो भरनगे तू क्यों होत उदास"।

अंधविश्वासों के विरोधी :-  

कबीर के समय में काशी विद्या और धर्म साधना का सबसे बड़ा केन्द्र तो था ही, वस्त्र व्यवसायियों, वस्त्र कर्मियों, जुलाहों का भी सबसे बड़ा कर्म क्षेत्र था। देश के चारों ओर से लोग वहां आते रहते थे और उनके अनुरोध पर कबीर को भी दूर-दूर तक जाना पड़ता था।

“ मगहर” भी ऐसी ही जगह थी। पर उसके लिए एक अंध मान्यता थी कि यह जमीन अभिशप्त है। कुछ आड़ंबरी तथा पाखंड़ी लोगों ने प्रचार कर रखा था कि वहां मरने से मोक्ष नहीं मिलता है। इसे नर्क द्वार के नाम से जाना जाता था।

उन्हीं दिनों वहां भीषण अकाल पड़ा। ऊसर क्षेत्र, अकालग्रस्त सूखी धरती, पानी का नामोनिशान नहीं। सारी जनता त्राहि-त्राहि कर उठी। तब खलीलाबाद के नवाब बिजली खां ने कबीर को मगहर चल दुखियों के कष्ट निवारण हेतु उपाय करने को कहा। वृद्ध तथा कमजोर होने के बावजूद कबीर वहां जाने के लिए तैयार हो गये। शिष्यों और भक्तों के जोर देकर मना करने पर भी वह ना माने। मित्र व्यास के यह कहने पर कि मगहर में मोक्ष नहीं मिलता, उन्होंने कहा - “क्या काशी, क्या ऊसर मगहर, जो पै राम बस मोरा। जो कबीर काशी मरे, रामहीं कौन निहोरा”।

सबकी प्रार्थनाओं को दरकिनार कर उन्होंने वहां जा लोगों की सहायता करने और मगहर के सिर पर लगे कलंक को मिटाने का निश्चय कर लिया। उनका तो जन्म ही हुआ था रूढियों और अंध विश्वासों को तोड़ने के लिए।

मगहर पहुंच कर उन्होंने एक जगह धूनी रमाई। जनश्रुति है कि वहां से चमत्कारी ढंग से एक जलस्रोत निकल आया, जिसने धीरे-धीरे एक तालाब का रूप ले लिया। आज भी इसे गोरख तलैया के नाम से जाना जाता है। तालाब से हट कर उन्होंने आश्रम की स्थापना की। यहीं जब उन्होंने अपना शरीर त्यागा तो उनकी अंत्येष्टि पर उनके हिन्दु तथा मस्लिम अनुयायियों में विवाद खड़ा हो गया। कहते हैं कि इस कारण उनके चादर ढके पार्थिव शरीर की जगह सिर्फ पुष्प रह गये थे। जिन्हें दोनों समुदायों ने बांट कर अपनी-अपनी धार्मिक विधियों के अनुसार अंतिम संस्कार किया। आश्रम को समाधि स्थल बना दिया गया। आधे पर तत्कालीन काशी नरेश बीरसिंह ने समाधि बनवाई और आधे पर नवाब बिजली खां ने मकबरे का निर्माण करवाया। लखनऊ -गोरखपुर राजमार्ग पर गोरखपुर के नजदीक यह निर्वाण स्थल मौजूद है। पर यहां भी तंगदिली ने पीछ नहीं छोड़ा है। इस अनूठे सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के भी समाधि और मजार के बीच दिवार बना कर दो टुकड़े कर दिये गये हैं। वैसे भी यह समाधि स्थल अब घोर उपेक्षा का शिकार है।

1 टिप्पणी:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सत्य को बेबाक ढंग से कहने के लिये विख्यात थे कबीर।