सोमवार, 9 अप्रैल 2012

परिवर्तन की आहट !!!


 
कहते हैं आग के बिना धुंआं नहीं होता। तो इन दिनों जैसी-जैसी खबरें आ रही हैं वह मात्र संयोग तो नहीं ही हो सकता। सेना प्रमुख का बयान, फौज का दिल्ली की तरफ कूच, सेना में असले की कमी। यह सब ऐसे ही सामने आ गया हो, गले से नहीं उतरता। भले ही इन सब का खंडन होता रहा हो।

देश की जनता का एक बहुत बडा प्रतिशत सत्तारूढ नेताओं से असंतुष्ट है।  सब मानते हैं कि केन्द्र, जहां अधिकांश जन-सेवकों के दामन काले कारनामों से सने हैं, से निजात मिलनी चाहिए। पर विकल्प किसी को नहीं सूझ रहा है। वैसे सत्ता हस्तगत करने के लिए जिनकी जीभें लपलपा रही हैं उनकी असलियत भी जनता जानती है। मीडिया और संचार माध्यमों की बदौलत आज अंतिम सिरे पर खडा इंसान भी कुछ-कुछ जागरुक हो गया है। वह भी जान गया है कि अब वैसे नेता नहीं रहे जिनके लिए देश सर्वोपरी हुआ करता था। आज तो सब कुछ ‘निज व निज परिवार हिताय’ हो गया है। अब तो तथाकथित क्षेत्रीय नेता भी यह कहने का दुस्साहस करने लग गये हैं कि देश के पहले उनकी पार्टी है, पार्टी यानि वे खुद। आम इंसान की किसी को भी फिक्र नहीं है अब सरकार द्वारा हर फैसला खुद को या बडे घरानों या बडी कंपनियों के हित को मद्दे नज़र रख कर किया जाता है। करोंडों-अरबों डकारने वाले खुले सांड की तरह घूम रहे हैं क्योंकि कमजोर नेतृत्व की हिम्मत नहीं है उन पर नकेल कसने की और उस नुक्सान की भरपाई का खामियाजा देश के मध्यम वर्ग को चुकाना पडता है।

चारों तरफ फैले इस असंतोष को सभी बखूबी महसूस कर रहे है। आजादी के बाद के कुछ साल छोड दें तो भी दबी जुबान से तीस पैंतीस सालों में सैन्य शासन की बात उठ चुकी है। जिसे बडी चतुराई से दबा दिया जाता रहा है। बहुत संभव है कि देशवासियों के आक्रोश और नेतृत्व की अक्षमता को देखते हुए देश का एक धडा इस बात का आकलन कर भविष्य की संभावना को टटोल रहा हो। वैसे भी आज
सेनाध्यक्ष से लेकर आम आदमी भी जानता है कि कहीं भी कुछ भी कह देना पत्थरकी लकीर नहीं हो जाता। बहुसंख्यक यदि पक्ष में हों तो ठीक नहीं तो दूसरे दिन अपनी ही बात का खंडन करना आम बात हो गयी है। वैसे भी किसी की कही बात को आधे लोग तो पढते-सुनते नहीं, जो सुनते हैं उनमें से आधे गौर नहीं करते, बचे हुए आधों को ऐसी बातों पर विश्वास नहीं होता। फिर दूसरे-तीसरे दिन खंडन आ जाता है और हल्के-फुल्के अंदाज में बात आई-गयी हो जाती है। 

3 टिप्‍पणियां:

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

सही कहा आपने...लोगो की उदासीनता क कारण भी यही है..बढिया पोस्ट।

Shiv Kumar ने कहा…

बिलकुल सही लिखा है आपने ...यह हम लोगों की ही उदासीनता का परिणाम है ....

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बिलकुल सही लिखा है.बहुत बढिया प्रस्तुति।