शनिवार, 31 मार्च 2012

एक बार सिर्फ एक बार फिर अवतार लो मेरे देवा !!!!!!

हे प्रभू आज हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है। एक बार सिर्फ एक बार अपने सुंदर, सजीले, उतंग शिखरों वाले मंदिरों से बाहर आकर आप अपनी मातृभूमि की हालत देखो। तुम तो अंतर्यामी हो, दीनदयाल हो, सर्वशक्तिमान हो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी अगम नहीं है।


हे श्री राम,
प्रणाम।
फिर तुम्हारा जन्म दिवस आया है। चारों ओर उल्लास छाया हुआ है। भक्तिमय वातावरण है। पूजा अर्चना जोरों पर है। पर यह सब भी आज के भौतिक युग की बाजारू संस्कृति का ही एक अंग है। एक बहुत छोटा सा प्रतिशत ही होगा जो सच्चे मन से तुम्हें याद कर रहा होगा। आधे से ज्यादा लोग तो सिर्फ तुम्हारे नाम से मिलने वाले आज के अवकाश से खुश हैं। कुछ लोगों की दुकानदारी है और कुछ लोगों की तुम्हारे नाम की आड़ में अपनी रोटी सेकने का बहाना।
तुम्हारे जन्म दिवस का तो सब को याद है, पर तुम्हारे आदर्शों, तुम्हारी मर्यादा, तुम्हारे चरित्र, तुम्हारी बातों का इस देश से तिरोधान होता जा रहा है।

तुमने माँ-बाप की आज्ञा शिरोधार्य की, आज के माँ-बाप ड़रे रहते हैं कि ऐसा कुछ ना हो जाए जिससे उनके कुलदीपक को कुछ नागवार गुजरे। आज माँ-बाप की बात मानना तो दूर उनकी बात सुननी भी बच्चे गवारा नहीं करते। तुमने नारी का सम्मान करने की बात कही तो आज यहां हालात ऐसे हैं कि जन्म से पहले ही कन्या को परलोकगमन की राह दिखा दी जाती है। नारी उद्धार के पीछे अपना उद्धार करने पर कटिबद्ध हैं आज के समाज के कर्णधार। तुमने भाईयों के लिए सर्वत्याग किया आज अपने लिए लोग भाईयों को त्यागने में नहीं हिचकते। तुमने अपनी शरण में आनेवाले का सदा साथ दिया चाहे उसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़ी हो पर आज मुसीबत में पड़े लोगों से भी कीमत वसूली जाती है। तुमने दीन-हीन-दुखियारे-पिछड़ों को सदा गले लगाया, उन्हें सम्मान का हकदार बनाया। आज ऐसे ही लोगों के कंधों का सहारा लेकर मतलबपरस्त अपनी पीढीयों का भविष्य सवारने में लगे हैं। तुमने धन-दौलत-एश्वर्य को सदा हेय समझा आज यही प्रतिष्ठा का माध्यम हैं। तुम्हारे समय में तो एक ही रावण था जिसे मार कर तुमने इस धरा को भयमुक्त किया था। पर आज तो घट-घट में रावण विराजमान हैं जो अपनी अभेद्य लंकाओं में बैठे-बैठे जाने कितनी सीताओं को अपमानित, लांछित तथा प्रताड़ित करने के बावजूद समाज में प्रतिष्ठित एवं सम्मानित हैं। तुम्हारे समय में शिक्षा, आध्यात्म, मोक्ष आदि पाने का जरिया होता था ऋषि, मुनियों का सान्निध्य, जिसमें वे आदरणीय पुरुष अपना जीवन लगा देते थे, आज के बाबा अपने एश्वर्य, भोग, लिप्सा के लिए दूसरों का जीवन ले रहे हैं। तुमने तो अपने शत्रु की अच्छाईयों को अपनाने में भी कभी देर नहीं की आज ऐसा करने की कोई सोचता भी नहीं है उल्टा उसके लिए कोई भी बुराई अपनाने में लोग नहीं हिचकते। तुमने अपने धुर-विरोधियों को भी सम्मान दिया आज लोग अपने विरोधियों को मिटा देने में विश्वास करते हैं।

हे प्रभू आज हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है। एक बार सिर्फ एक बार अपने सुंदर, सजीले, उतंग शिखरों वाले मंदिरों से बाहर आकर आप अपनी मातृभूमि की हालत देखो। तुम तो अंतर्यामी हो, दीनदयाल हो, सर्वशक्तिमान हो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी अगम नहीं है।

एक बार सिर्फ एक बार फिर अवतार लो मेरे देवा !!!!!!

गुरुवार, 29 मार्च 2012

अंकल, कन्या खिलाओगे ?

नवरात्रों में,  खास कर अष्टमी के दिन, आस-पडोस की अभिन्न सहेलियों में भी अघोषित युद्ध छिड़ जाता है । सप्तमी की रात से ही कन्याओं की बुकिंग शुरु हो जाती है। फिर भी सबेरे-सबेरे हरकारे दौड़ना शुरु कर देते हैं। गृहणियां परेशान, हलुवा कडाही में लग रहा है पर चिंता इस बात की है कि "पन्नी" अभी तक आई क्यूं नहीं? "खुशी" सामने से आते-आते कहां गायब हो गयी 

सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी। द्वार खोल कर देखा तो पांच से दस साल की चार-पांच बच्चियां लाल रंग के कपड़े पहने खड़ी थीं। छूटते ही उनमें सबसे बड़ी लड़की ने सपाट आवाज में सवाल दागा, 'अंकल, कन्या खिलाओगे'?
मुझे कुछ सूझा नहीं, अप्रत्याशित सा था यह सब। अष्टमी के दिन कन्या पूजन होता है। पर वह सब परिचित चेहरे होते हैं, और आज वैसे भी षष्ठी है। फिर सोचा शायद गृह मंत्रालय ने कोई अपना विधेयक पास कर दिया हो इसलिये इन्हें बुलाया हो। अंदर पूछा, तो पता चला कि ऐसी कोई बात नहीं है। 
मैं फिर कन्याओं की ओर मुखातिब हुआ और बोला, बेटा आज नहीं, हमारे यहां अष्टमी को पूजा की जाती है .
"अच्छा कितने बजे"? फिर सवाल उछला, जो सुनिश्चित भी कर लेना चाहता था, उस दिन के निमंत्रण को। 
मुझसे कुछ कहते नहीं बना, कह दिया, बाद में बताऐंगे।
तब तक बगल वाले घर की घंटी बज चुकी थी।

मैं सोच रहा था कि बड़े-बड़े व्यवसायिक घराने या नेता आदि ही नहीं आम जनता भी चतुर होने लग गयी है। सिर्फ दिमाग होना चाहिये। दुह लो, मौका देखते ही, जहां भी जरा सी गुंजाईश हो। बच ना पाए कोई।
जाहिर है कि ये छोटी-छोटी बच्चियां इतनी चतुर सुजान नहीं हो सकतीं। यह सारा खेल इनके माँ, बाप, परिजनों द्वारा रचा गया है। जोकि दिन भर टी.वी. पर जमाने भर के बच्चों को उल्टी-सीधी हरकतें करते और पैसा कमाते देख, हीन भावना से ग्रसित होते रहते हैं। अपने नौनिहालों को देख कुढते रहते हैं कि लोगों के कुत्ते-बिल्लियाँ भी छोटे पर्दे पर पहुँच कमाई करने लग गए हैं, दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी और हमारे बच्चे घर बैठे सिर्फ रोटियां तोड़े जा रहे हैं। 

फिर ऐसे ही किसी कुटिल दिमाग में इन दिनों  बच्चों को घर-घर जीमते देख यह योजना आयी होगी और उसने इसका कापी-राइट कोई और करवाए, इसके पहले ही, दिन देखा ना कुछ और बच्चियों को नहलाया, धुलाया, साफ सुथरे कपड़े पहनवाए, एक वाक्य रटवाया, "अंकल/आंटी, कन्या खिलवाओगे? और इसे अमल में ला दिया।

ऐसे लोगों को पता है कि इन दिनों लोगों की धार्मिक भावनाएं अपने चरम पर होती हैं। फिर बच्ची स्वरुपा देवी को अपने दरवाजे पर देख भला  कौन मना करेगा। सब ठीक रहा तो सप्तमी, अष्टमी और नवमीं तीन दिनों तक बच्चों और हो सकता है कि पूरे घर के खाने का इंतजाम हो जाए। ऊपर से बर्तन, कपड़ा और नगदी अलग से। वैसे भी इन तीन दिनों तक आस्तिक गृहणियां चिंतित रहती हैं, कन्याओं की आपूर्ती को लेकर। जरा सी देर हुई या अघाई कन्या ने खाने से इंकार किया और हो गया अपशकुन। इसलिए होड़ रहती है पहले अपने घर कन्या बुलाने की। 

नवरात्रों में,  खास कर अष्टमी के दिन, आस-पडोस की अभिन्न सहेलियों में भी अघोषित युद्ध छिड़ जाता है । सप्तमी की रात से ही कन्याओं की बुकिंग शुरु हो जाती है। फिर भी सबेरे-सबेरे हरकारे दौड़ना शुरु कर देते हैं। गृहणियां परेशान, हलुवा कडाही में लग रहा है पर चिंता इस बात की है कि "पन्नी" अभी तक आई क्यूं नहीं? "खुशी" सामने से आते-आते कहां गायब हो गयी  कोरम पूरा नहीं हो पा रहा है।

इधर काम पर जाने वाले हाथ में लोटा, जग लिए खड़े हैं कि देवियां आएं तो उनके चरण पखार कर काम पर जाएं। देर हो रही है, पर आफिस के बास से तो निपटा जा सकता है {वैसे आज के दिन तो वह भी लोटा लिए खड़ा होगा :)} घर के इस बास से कौन पंगा ले, वह भी तब जब बात धर्म की हो।

आज इन "चतुर-सुजान" लोगों ने कितना आसान कर दिया है  सब कुछ।  पूरे देश को राह दिखाई है, घर पहुंच सेवा प्रदान कर।

"जय माता दी"

बुधवार, 28 मार्च 2012

कुत्ता बच्चों को "ईडेन का सेव" खिलाने पर उतारू


बहुतेरी बार विदेशी "कुत्तों" ने हमारे देश पर हमले किए, हमें लूटा-खसोटा, हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारी धरोहरों को नष्ट करने की पुरजोर कोशिश की। वह तो कहते हैं ना कि दुश्मनों ने तो पूरा जोर लगाया एकाधिक बार सफल भी रहे पर कोई बात थी जो हस्ति नहीं मिटी हमारी। इतिहास से सभी वाकिफ हैं। पर उनकी कोशिशें शायद थमी नहीं हैं।

इधर फिर एक विदेशी कुत्ता अपने मालिकों के नापाक इरादों को पूरा करने में लगा हुआ है। यह वही 'वोडाफोन' का कुत्ता है जो पिछले सालों अपनी मासूमियत के कारण हम सब के दिलों का चहेता बन गया था। पर इस बार के विज्ञापनों पर ध्यान दें उसकी मासूमियत में एक षडयंत्र का आभास हो रहा है। लगता है वह बच्चों की कमसिन उम्र का भोलापन छीन लेना चाहता हो। इस छोटी सी उम्र में जैसे वह उन्हें "ईडेन का सेव" खिलाने पर उतारू हो। जिस तरह वह विज्ञापन के बालक-बालिका के एकांत की रक्षा करता है, जिस तरह उन्हें खींच-तान कर एक-दूसरे के सामने ला खडा करता है, जिस तरह बच्चों को आमने-सामने लाने का कोई मौका नहीं चूकता, उससे इस धारणा को बल मिलता है कि कहीं ना कहीं कुछ तो गडबड है। ये विदेशी कंपनियां अपने यहां के जहर को यहां भी फैलाने से बाज नहीं आ रही हैं।  

मंगलवार, 20 मार्च 2012

अति विचित्र परंतु सत्य

संसार में कभी-कभी कुछ ऐसा भी घटित हो जाता है जिस पर सहज ही विश्वास   कर पाना कठिन होता है। कुछ ऐसी ही अमेरिका के प्रेसिडेंट अब्राहम लिंकन तथा उनके सौ साल बाद प्रेसिडेंट बने केनेडी के जीवन मे घटी घटनाओं की समानता, दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर देती है। सहसा विश्वास नहीं होता कि ऐसा भी हो सकता है, पर यह सच है ---


* प्रेसिडेंट लिंकन 1860 मे राष्ट्रपति चुने गये थे, केनेडी का चुनाव 1960 मे हुआ था।

* लिंकन के सेक्रेटरी का नाम केनेडी तथा केनेडी के सेक्रेटरी का नाम लिंकन था।

* दोनों राष्ट्रपतियों का कत्ल शुक्रवार को अपनी पत्नियों की उपस्थिति मे हुआ था।

* लिंकन के हत्यारे बूथ ने थियेटर मे लिंकन पर गोली चला कर एक स्टोर मे शरण ली थी और केनेडी का हत्यारा ओस्वाल्ड, एक स्टोर मे केनेडी को गोली मार कर एक थियेटर मे जा छुपा था।

* बूथ का जन्म 1839 मे तथा ओस्वाल्ड का 1939 मे हुआ था।

* दोनों हत्यारों की हत्या मुकद्दमा चलने के पहले ही कर दी गयी थी।

* दोनों राष्ट्रपतियों के उत्तराधिकारियों का नाम जानसन था। एन्ड्रयु जानसन का जन्म 1808 मे तथा लिंडन जानसन का जन्म 1908 मे हुआ था।

* लिंकन और केनेडी दोनों के नाम मे सात अक्षर हैं।

* दोनों का संबंध नागरिक अधिकारों से जुडा हुआ था।

* लिंकन की हत्या फ़ोर्ड के थियेटर में हुई थी, जबकी केनेडी फ़ोर्ड कम्पनी की कार मे सवार थे।

बुधवार, 14 मार्च 2012

अतिथि तुम ना ही आओ

देश-परदेस, जात-पात, भाषा-रंग, अमीर-गरीब, राजा-रंक किसी का भी भेद ना करने वाले ऐसे दरियादिल को लोग अलग-अलग जगहों में भिन्न-भिन्न नामों से जानते हैं।

उनके आने का आभास तो शुक्रवार सुबह ही हो गया था और शाम तक तो उपस्थिति भी दर्ज हो चुकी थी। पर नौकरी-पेशा लोगों की कुछ मजबूरियां होती हैं, पर   इसका अहसास उन्हें क्यूंकर हो सकता था.   उनके आने के बावजूद मेरे शनिवार को काम पर चले जाने को इन्होंने अपनी उपेक्षा के रूप में लिया और नाराज हो गये। पूरे रविवार भृकुटियां ताने वक्री बने रहे। अपने को फिर भी कुछ खास समझ नहीं आई और सोमवार को फिर इन्हें अनदेखा कर कार्यालय जाने की भूल दोहरा दी। गल्ती तो मेरी थी ही, अब  बाहर से आए मेहमान की ना तो कोई खातिरदारी की नाहीं फल-फुंगा भेंट किया। बस फिर क्या था ये अपने रौद्र रूप में आ गये। मेरा पूरा तन-बदन अपनी गिरफ्त में ले लिया। हर अंग पर उन्होंने अपनी पकड और जकड बना ली। हिलना-डुलना तक दूभर कर डाला। तब जा कर अपुन को भी अपनी गल्तियों का अहसास हुआ। मंगल तथा बुधवार पूरी तरह से उनपर न्योछावर कर डाले। "प्रसाद" ला कर मान-मनौवल किया। तब जा कर कुछ बात बनती दिखी। वैसे दिखने में ये जितने उग्र दिखते हैं उतने स्वभाव से हैं नहीं, इसीलिए मेरे इतने से प्रयास से ही ढीले पड गये और बुध की शाम को अपने-आप वापस हो लिये।
हालांकि उनके आने से कोई भी खुश नहीं होता, कोई नहीं चाहता कि वे उनके घर किसी भी बहाने से आएं। इनके रुकने का समय भी तो निर्धारित नहीं होता, ना हुआ तो दूसरे दिन ही चल दें और कहीं मन रम गया तो दसियों दिन लगा दें। पर  इन दसेक दिनों में घर-बाहर वालों की ऐसी की तैसी कर धर देते हैं। इनका एक ही ध्येय है कि संसार में सब जने स्वस्थ प्रसन्न रहें, कोई अपने प्रति लापरवाही ना बरते, अनियमित दिनचर्या ना अपनाए, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे, किसी तरह की काहली को जीवन में स्थान ना दे। इन्हें बदपरहेजी से सख्त नफरत है। दुनिया के किसी भी कोने में इन्हें अपनी शर्तों का उल्लंघन होते दिखता है तो ये अपने को रोक नहीं पाते और वहां बिना किसी जान-पहचान या रिश्तेदारी के पहुंच जाते हैं।

देश-परदेस, जात-पात, भाषा-रंग, अमीर-गरीब, राजा-रंक किसी का भी भेद ना करने वाले ऐसे दरियादिल को लोग अलग-अलग जगहों में भिन्न-भिन्न नामों से जानते हैं। कोई बुखार कहता है, कोई ताप, कोई फिवर तो कोई हरारत।

आप  इन्हें   किस नाम से जानते हैं ?

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

"होली " वेदों-पुराणों में इससे सम्बंधित अनेक कथाएं मिलती हैं।


पर इतने उल्लास, खुशी, उमंग, वैमन्सय निवारक त्यौहार का स्वरूप आज विकृत होता या किया जा रहा है। हंसी-मजाक की जगह अश्लील गाने, फूहड़ नाच, कुत्सित विचार, द्विअर्थी संवाद, गंदी गालियों की भरमार, काले-नीले ना छूटने वाले रंगों के साथ-साथ वैर भुनाने के अवसर के रूप में इसका उपयोग कर इस त्यौहार की पावनता को नष्ट करने की जैसे साजिश चल पड़ी है। समय रहते कुछ नहीं हुआ तो धीरे-धीरे लोग इससे विमुख होते चले जायेंगे। 

होली का त्यौहार कबसे शुरू हुआ यह कहना बहुत ही मुश्किल है। वेदों-पुराणों में इससे सम्बंधित अनेक कथाएं मिलती हैं।

महाभारत में उल्लेख है कि ढोढा नामक एक राक्षसी ने अपने कठोर तप से महादेवजी को प्रसन्न कर अमर होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। अंधेरे में रहने के कारण उसे रंगों से बहुत चिढ थी। उसने अपने स्वभावानुसार चारों ओर अराजकता फैलानी शुरू कर दी। तंग आकर लोग गुरु वशिष्ठजी की शरण में गये तब उन्होंने उसे मारने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि सिर्फ निष्पाप बच्चे ही उसका नाश कर सकते हैं। इसलिये यदि बच्चे आग जला कर उसके चारों ओर खूब हंसें, नाचें, गाएं, शोर मचाएं तो उससे छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा ही किया गया और ढोढा का अंत होने पर उसके आतंक से मुक्ति पाने की खुशी में रंग बिखेरे गये। तब से दुष्ट शक्तियों के नाश के लिये इसे मनाया जाने लगा।

दूसरी कथा ज्यादा प्रामाणिक लगती है। कहते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने देवताओं, सूर्य, इंद्र, वायू, की कृपा से प्राप्त नये अन्न को पहले, धन्यवाद स्वरूप, देवताओं को अर्पित कर फिर ग्रहण करने का विधान बनाया था। जाहिर है नया अन्न अपने साथ सुख, स्मृद्धि, उल्लास, खुशी लेकर आता है। सो इस पर्व का स्वरूप भी वैसा ही हो गया। इस दिन यज्ञ कर अग्नि के माध्यम से नया अन्न देवताओं को समर्पित करते थे इसलिये इसका नाम ”होलका यज्ञ” पड़ गया था। जो बदलते-बदलते होलिका और फिर होली हो गया लगता है।

इस पर्व का नाम होलका से होलिका होना भक्त प्रह्लाद की अमर कथा से भी संबंधित है। जिसमें प्रभु भक्त प्रह्लाद को उसके पिता हिरण्यकश्यप के जोर देने पर उसकी बुआ होलिका उसे गोद में ले अग्नि प्रवेश करती है पर प्रह्लाद बच जाता है।

इसी दिन राक्षसी पूतना का वध कर व्रजवासियों को श्री कृष्ण जी ने भयमुक्त किया था। जो त्यौहार मनाने का सबब बना।


पर इतने उल्लास, खुशी, उमंग, वैमन्सय निवारक त्यौहार का स्वरूप आज विकृत होता या किया जा रहा है। हंसी-मजाक की जगह अश्लील गाने, फूहड़ नाच, कुत्सित विचार, द्विअर्थी संवाद, गंदी गालियों की भरमार, काले-नीले ना छूटने वाले रंगों के साथ-साथ वैर भुनाने के अवसर के रूप में इसका उपयोग कर इस त्यौहार की पावनता को नष्ट करने की जैसे साजिश चल पड़ी है। समय रहते कुछ नहीं हुआ तो धीरे-धीरे लोग इससे विमुख होते चले जायेंगे।

सोमवार, 5 मार्च 2012

नबेलिन में बेलिन में, वनन में बागन में बगरयो बसंत है।

बसंत को कामदेव का पुत्र माना जाता है। इसीलिए इस समय मनाए जाने वाले उत्सव को मदनोत्सव भी कहते हैं। मदन का अर्थ होता है काम। जो मनुष्य जीवन का अभिन्न अंग है। हिंदु धर्म-शास्त्रों में मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ अनिवार्य बताए गये हैं,   "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।" 

शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट के बीच आगमन होता है बसंत का। इसे ऋतुओं का राजा माना गया है अर्थात ऋतुराज। आदिकाल से कवि आकंठ श्रृंगार रस में डूब 
  कर अपनी रचनाओं में इसका वर्णन करते आए हैं। यही वह समय होता है जब सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक अंगडाई ले आलस्य त्याग जागने लगती है। जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता है। यह महीना होता है फागुन का यानि मधुमास का अर्थात मधुऋतु का। जब सर्वत्र माधुर्य और सौंदर्य का बोलबाला हो जाता है। "हल्की सी शोखी, हल्का सा नशा है, मिल गयी हो भंग जैसे पूरी बयार में"बसंत के आते ही टहनियों में कोंपलें फूटने लगती हैं। वृक्ष नये पत्तों के स्वागत की 

तैयारियां करने लगते हैं। वायु के नर्म-नर्म झोंकों से फल-फूल, लताएं-गुल्म, पेड-पौधे सभी जैसे मस्ती में झूमने लगते हैं। इसी समय आम की मंजरियों में भी बौर आने लगते हैं जैसे ऋतुओं के राजा ने फलों के राजा को दावत दी हो। जब सारी प्रकृति ही मस्ती में डूबी हो तो इस आलम से जीव-जंतु कैसे दूर रह सकते हैं। उनमें भी एक नयी चेतना आ जाती है। भौंरों का गुंजाएमान होना, पक्षियों का नये नीडों को बनाने की तैयारियों में जुट जाना, कोयल की कूक चारों ओर नज़र दौडा कर देखें हर कोई एक नये जोश से अपने 
काम में जुटा नज़र आएगा। मनुष्य तो मनुष्य, कीट-पतंग, पशु-पक्षी, पेड-पौधे अर्थात सारी प्रकृति ही जैसे बौरा जाती है। मौसम की अनुकूलता से मानव जीवन में भी निरोगता छाई रहती है, मन प्रफुल्लित रहता है जिससे चारों ओर हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता है। इसी माहौल में शुमार होती है होली की फगुनौटी फिजा, रंगों की रंगीली फुहार, फागों की गमगमाती गमक, धमालों की धमधमाती धमक के साथ भांग का भनभनाता सरूर। चारों ओर उल्लास ही उल्लास। इन्हीं गुणों के कारण अनादिकाल से इसी समय बसंतोत्सव मनता चला आ रहा है। एक ऐसा उत्सव जिसमें जात-पात, धनी-गरीब, राजा-रंक, छोटे-बडे का कोई भेद-भाव नहीं बरता जाता। इतिहास गवाह है कि रंगों के इस उत्सव में धर्म भी आड़े नहीं आता था। मुगल बादशाह और नवाब भी इसकी मस्ती से अछूते नहीं रह पाए थे। चाहे वह वाजिद अली शाह हों चाहे सम्राट अकबर या फिर अमीर खुसरो। मानव की तो बात ही क्या स्वंय भगवान कृष्ण ने इसे आध्यात्म की उंचाईयों पर ले जा बैठाया था। उन्हें तो इस ऋतु से इतना लगाव था कि ब्रज में सदा बसंत ही छाया रहता था। वृंदावन सदा प्रफुल्लित रहता था। पशु-पक्षी मुग्ध और उन्मत्त बने रहते थे। कुंज-कुंज को भौरे गुंजायमान किए रहते थे। चारों ओर उल्लास छाया रहता था।

बसंत को कामदेव का पुत्र माना जाता है। इसीलिए इस समय मनाए जाने वाले उत्सव को मदनोत्सव भी कहते हैं। मदन का अर्थ होता है काम। जो मनुष्य जीवन का अभिन्न अंग है। हिंदु धर्म-शास्त्रों में मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ अनिवार्य बताए गये हैं,   "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।"  
इसीसे स्पष्ट है कि प्राचीन काल में काम के प्रति कितना स्वस्थ एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। जिसका उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में जगह-जगह उल्लेखित हुआ भी है।

पर पता नहीं धीरे-धीरे कैसे सब बदलता चला गया। कहते हैं बसंत का आगमन शहरों में नहीं होता। ऐसा नहीं है यह तो अबाध रूप से सारे जग में संचरण करता है। यह दूसरी बात है कि इस की आहट प्रकृति-विहीन माहौल और संगदिलों को सुनाई नहीं पडती। इसीलिए लोग इसे भूल आयातित त्योहारों को गले लगाने लग गये हैं। उस सात्विक उन्मुक्त वातावरण और व्यवहार का स्थान व्यभिचार, यौनाचर और कुठाएं लेती चली गयीं। भाईचारे, प्रेम की जगह नफरत और बैर ने ले ली। मदनोत्सव तो काम-कुंठाओं से मुक्ति पाने का प्राचीन उत्सव है। इसे मर्यादित रह कर शालीनता के साथ बिना किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए, बिना किसी को कष्ट या दुख दिए मनाने में ही इसकी सार्थकता है। आज फिर जरूरत है लोगों को अपने त्योहारों, उनकी विशेषताओं,उनकी उपयोगिताओं को बताने की, समझाने की। जिससे इन उत्सवों की गरिमा वापस लौट सके।