गुरुवार, 19 जनवरी 2012

हम हार पचा नहीं पाते, पर क्यूँ?

इधर खेल की नकेल उसके अफरात आमदनी की गुंजाईश के कारण खेल का '' समझाने वालों के हाथ चली गयी है, जिन्हें सिर्फ और सिर्फ आमदनी से मतलब है खिलाड़ी बंधुआ मजदूर हो गए हैं और ऐसे मजदूरों से "क्वालिटी" की आशा करना कहाँ की बुद्धिमानी है

भारत की क्रिकेट में हार पर हार। लोग रोजमर्रा की अनगिनत मुसीबतों को भूल इसी का शोक मना रहे हैं।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि हम हार नहीं पचा पा रहे हों। पहले भी हारी हुई टीम की लानत-मलानत होती रही है, जीत की खुशी में बनवाए गए स्मारक तोड़े गए हैं, हार कर लौटते खिलाड़ियों का घर पहुँचना दूभर हुआ है। हमारी क्या मानव जाति की फितरत है कि चढ़ते सूरज को सलाम किया जाता है, जो जीतता है उसे ही सिकंदर समझा जाता है।

वैसे भी हम एक दो जीत मिलते ही इतने मुत्तमुईन हो जाते हैं कि किसी को अपने सामने कुछ नहीं समझते, भूल जाते हैं कि चोट खाया सर्प कितना खतरनाक हो जाता है। भूल जाते हैं कि जिसके घर खेलने जा रहे हैं, उसके अपने दर्शक हैं, अपनी जमीन है, खेल में उसने भी झंडे गाड़े हुए थे। वह थाली में जीत ले हमें सौंप देने के लिए नहीं खडा। फिर बाहर बैठे स्वंयभू आलोचक, जिन्हें पिच की लम्बाई या बाल का वजन मालूम न हो या कभी गलती से टीम में जिन्हें स्थान मिल गया हो वे खिलाड़ियों की ऐसी हवा बांधते हैं कि आम-जन को विश्वास हो जाता है कि दुनिया में इस खेल के सिरमौर हैं तो सिर्फ हम। उधर जब खिलाड़ी स्तरहीन प्रदर्शन कर हार जाते हैं तो वही महानुभाव टी.वी. पर आ कर अपना धर्म समझते हैं खिलाड़ियों और उनके खेल की छीछालेदर कर उन्हें खलनायक सिद्ध करने का। कुछ अति उत्साही लोग चुनाव कर्ताओं को ही निशाना बनाना शुरू कर देते हैं। कुछ अपने पसंदीदा खिलाड़ियों से सजी टीम का सुझाव बिन मांगे देना शुरू कर देते हैं। कुछ अपने पूर्वाग्रहों और शायद, कुछ-कुछ, पुराने खिलाड़ियों की सफलता की जलन के कारण उन्हें टीम से बाहर करने की आवाज बुलंद करने लगते हैं। उस समय शायद वे भूल जाते हैं कि टीम में ग्यारह सदस्य होते हैं और व्यस्क खिलाड़ी मात्र दो-तीन ही हैं। हार के बाद ही सब गुनी-जनों के सुझाव बरसते हैं। जीतती टीम के समय उन्हें कुछ याद नहीं रहता। हमारा शगल भी है परनिंदा इसमें अपार सुख छिपा होता है जो मौका मिलते ही उजागर हो अपने स्वामी के दिल को शान्ति प्रदान करता है।

अभी एक सज्जन शिमला, उटकमंड, पचमढी जैसे स्थानों में खेल करवाने का सुझाव देते मिले। उन्हें श्रीलंका और वेस्ट इंडीज की शानदार पारियों की याद नहीं रही। जहां प्रतिकूल स्थितियों में रहते हुए अभावग्रस्त जीवन जीते हुए भी दुनिया के श्रेष्ठ खिलाड़ी अपना और अपने देश का नाम रौशन कर गए। इन महाशय के अनुसार जड़ पर आक्रमण करना चाहिए, तो सारी खुराफातों की जड़ तो पैसा है जिसके लिए कोल्हू के बैल की तरह हमारे खिलाड़ी जुटे रहते हैं, अपनी थकान, चोट और बीमारी छिपाए। क्योंकि एक डर उन्हें और भी खाए जाता है कि कहीं ज्यादा दिन बाहर रह गए तो फिर टीम में स्थान पाना मुश्किल हो जाएगा। यह सब बातें भी उनके प्रदर्शन पर असर डालती हैं। पर पैसा कमाने का जुनून उन्हें चैन से बैठने भी तो नहीं देता, खेल से जरा सी फुर्सत मिलते ही जुट जाते हैं धन कमाने के अन्य स्रोतों में। अब शरीर तो शरीर है कोई मशीन तो नहीं, मौके पर वह भी जवाब दे जाता है।

इधर खेल की नकेल उसके अफरात आमदनी की गुंजाईश के कारण खेल का 'ख' न समझाने वालों के हाथ चली गयी है, जिन्हें सिर्फ और सिर्फ आमदनी से मतलब है। खिलाड़ी बंधुआ मजदूर हो गए हैं और ऐसे मजदूरों से "क्वालिटी" की आशा करना कहाँ की बुद्धिमानी है।

1 टिप्पणी:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कभी धूप तो कहीं छाँव..