मंगलवार, 17 जनवरी 2012

'रियेल्टी शोज' जो सबसे ज्यादा अनरियल होते हैं।

आज जिन्हें रियेल्टी शोज कहकर परोसा जा रहा है वास्तव में वही सब से ज्यादा अनरियल होते हैं। हालांकि शुरुआत कुछ अच्छे, सार्थक, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक सीरियलों से हुई थी, जैसे बोर्नविटा क्विज या अंताक्षरी जैसे शोज। पर फिर टी.वी. पट गया निर्रथक नकली घरेलू कलह-क्लेश वाले सीरियलों से और वैसे सार्थक प्रयास नेपथ्य में ढकेल दिए गये।

कालीदासजी ने कहा है "उत्सव प्रिय: मानवा:" जो आज के सन्दर्भ कुछ बदल कर "सदा नवीन प्रिय: मानवा:" हो गया है। कुछ साल पीछे चलें तो साठ के दशक में जब टी.वी. का दखल भारत में नहीं हुआ था, तब मेले-ठेलों में तरह-तरह के अजूबे प्रदर्शित किए जाते थे, जो अवास्तविक होने के बावजूद वास्तविक लगते थे। उन्हीं दिनों 'फ़्री-स्टाइल' नाम से होने वाली कुश्तियों में, जिनमें अपने दारा सिंह मुख्य नायक हुआ करते थे, बडी भीड उमडा करती थी। वह सब भी एक तरह से रियेल्टी शो ही हुआ करता था, मंच पर तरह-तरह की घोषणाएं कर दर्शकों में उत्सुकता बढाई जाती थी, कुश्ती के दौरान भी दर्शकों को रोमांचित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते थे। पर होता था सब सोचे-समझे मुताबिक। अभी कुछ समय पहले भी W.W.F. की नकली मुठभेडों का बच्चों और युवाओं पर जुनून सवार रहता था। जिन्होंने अपने हंगामेदार आयोजन, आक्रामक प्रचार, अजीबोगरीब भेषभूषा तथा भाषा से लोगों को अपना दिवाना बना लिया था। धीरे-धीरे उसका ‘क्रेज’ भी उतार पर है।

अब दुनिया में बाजार कहीं का भी हो, उसकी राक्षसी भूख मिटती नहीं है, उसके नियामकों को उसके पेट को भरने के लिए सतत प्रयास करते रहना पडता है। इन्हीं प्रयासों का फल हैं ये आधुनिक रियेल्टी शोज। योरोप में ये काफी पहले आ गये थे हमारे यहां बिना ज्यादा मेहनत किए उन्हीं को जरा सा रद्दोबदल कर परोस दिया गया। तरह-तरह की अवास्तविकताएं वास्तविकता के नाम से परोसी जाने लगीं। एक दो टेढे-बांके सीरियल सफल क्या हुए, भेडिया धसान शुरु हो गया। पर मानव तो सदा बदलाव चाहता है। कुछ दिन तो चटोरे दिमागों को उनका स्वाद भाया पर फिर उनका असर कम होना शुरु हो गया। तथाकथित टी.आर.पी. गिरते देख दर्शकों को रोके रखने के लिए नयी-नयी तिकडमें आजमाई जाने लगीं। भावनाओं को उभाडने के लिए इनमें नौटंकी का समावेश कर दिया गया। हारते, बाहर होते प्रतियोगी के मां-बाप की आंखों से आंसू निकलवा कर उनका क्लोज-अप लिया जाने लगा, प्रतियोगी से उल्टे-सीधे प्रवचन बुलवाए जाने लगे, तालियां प्रायोजित की जाने लगीं, दर्शक दीर्घा से कुछ एक भाडे के ट्टूओं का नाचना-झूमना दिखाया जाने लगा, अपनी-अपनी पसंद के प्रतिभागी के लिए ‘जजों’ में रंजिश, मनमुटाव, बहस दिखा दर्शक को भरमाने की कोशिशें होने लगीं। कुछ दिनों बाद जब दर्शक असलियत समझयहां से मुंह फेरने लगे तो उन्हें फिर बांधे रखने के लिए निर्माता भदेशपन पर उतर आए। सबसे पूरानी ‘मानवीय कमजोरी’ का फायदा उठाने के लिए बी, सी ग्रेड की “कलाकारों की कलाकारी" को हथियार बना लिया गया। नग्नता, द्विअर्थी संवादों का खुल कर प्रयोग शुरु हो गया। ऐसे ही किसी एक 'कुप्रयास' के सफल होते ही वैसे ही चार और बाजार में उतार दिए गये। फिर तो किसी की सगाई होने लगी, किसी का स्वयंबर तो कोई तो शादी तक करवाने को उतारू हो गया। जीवन की सच्चाईयों से दूर, नैतिकता को ताक पर रख, बच्चों, परिवारों की फिक्र के बगैर विज्ञापनों से मोटी कमाई करते ये बिना सिर-पैर के, मीठा जहर परोसते जलवे जारी हैं और रहेंगे जब तक दर्शक जागरूक हो इन्हें सिरे से नकार ना दें।

4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

ऊँची दुकान, फीका पकवान!

zoya rubina usmani ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पूर्णतया सहमत..

Chetan ने कहा…

Bilkul sahi bat hai