गुरुवार, 5 जनवरी 2012

प्रभू श्री राम की एक बहन भी थी

श्रीराम जिनका नाम बच्चा-बच्चा जानता है। उनके भाईयों के साथ-साथ उनकी पत्नियों के बारे में सारी जानकारी उपलब्ध है। उनके परिवार की बात छोड़िये उनके संगी साथियों, यहां तक की उनके दुश्मनों के परिवार वालों के नाम तक लोगों की जुबान पर हैं। उन्हीं श्रीराम की एक सगी बहन भी थी। यह बात शायद बहुत से लोगों की जानकारी में नहीं है।

भागवत के अनुसार राजा दशरथ और कौशल्या की एक पुत्री भी थी। जिसे उन्होंने अपने मित्र रोमपाद को गोद दे दिया था। उग्र स्वभाव के रोमपाद अंग देश के राजा थे। एक बार उनके द्वारा राज्य के ब्राह्मणों का अपमान कर दिये जाने के कारण सारे ब्राह्मण कुपित हो राज्य छोड़ कर अन्यत्र चले गये। इस कारण राज्य में अकाल पड़ गया। राजा को अपनी भूल मालुम पड़ी उन्होंने द्विजगणों से माफी मांगी और दुर्भिक्ष निवारण का उपाय पूछा। उन्हें बताया गया कि यदि ऋषि ऋष्यश्रृंग अंगदेश आ जायें तो वर्षा हो सकती है। राजा रोमपाद के अथक प्रयास से ऋषि ऋष्यश्रृंग अंगदेश आए। उनके आते ही आकाश में मेघ छा गये और भरपूर वर्षा होने लगी। इस पर खुश हो राजा रोमपाद ने अपनी गोद ली हुई कन्या का विवाह ऋषि के साथ कर दिया। बेचारी राजकन्या की नियति में वनवास था वह पति के साथ वन में रहने चली गयी।
शांता का उल्लेख अपने यहां तो जगह-जगह मिलता ही है, लाओस और मलेशिया की कथाओं में भी उसका विवरण मिलता है। पर आश्चर्य इस बात का है कि रामायण या अन्य राम कथाओं में उसका उल्लेख क्यूं नहीं है? क्यूं नहीं असमान उम्र तथा जाति में ब्याह दी गयी कन्या का अपने समाज तथा देश के लिये चुपचाप किये गये त्याग का कहीं उल्लेख किया गया? क्या सिर्फ गोद दे दिये जाने की वजह से ?

9 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

अच्छी ऐतिहासिक जानकारी दी है आपने!

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

मुझे लगता है यह प्रक्षेप है जो कालांतर में सच जैसा लगने लगा।

निरामिष ने कहा…

इस तथ्य की सच्चाई जान पाना अब दुष्कर है, गोद दिया जाना कोई अपमानजनक नहीं था, और ब्राह्मण कुल में ब्याहना तो उलटा सम्मान का द्योतक था। सम्भवतः यह था ही प्रक्षेप हो।

निरामिष शाकाहार प्रहेलिका 2012

vidha ने कहा…

ऐतिहासिक जानकारी या प्रक्षेप?

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पता नहीं पर कभी सुना भी नहीं।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अब सच्चाई तो पता चल नहीं सकती। सब कुछ अनुमान पर ही है। वैसे सोचने की बात है कि यदि सचमुच ऐसा कुछ था तो उसकी उपेक्षा क्यों की गयी और यदि नहीं था तो फिर ऐसी कल्पना ने कैसे जन्म लिया।

Chetan ने कहा…

Adbhut ! ! !

surendar singh bhati tejmalta ने कहा…

बकवास की बातें है ऐसे हि लिख देते है अगर रामायण में कहीं लिखा है तो बताओ मान जायेंगे

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

surendar singh bhati tejmalta ji
हिमाचल के कुल्लू जिले से करीब पचास की. मी. के फासले पर बंजार नामक इलाके में ऋष्यश्रृंग ऋषि का मंदिर है जिसमें देवी शांता की मूर्ति भी स्थापित है। कर्नाटक में भी श्रृंगेरी नगर इन्हींके नाम पर बसा हुआ है। इनके वंशज सेंगर राजपूत कहलाते हैं जो अकेली ऋषिवंशी राजपूत कौम है।