गुरुवार, 28 जुलाई 2011

नाम, जो अपने धारक से भी लम्बा है।


कल की पोस्ट में न्यूजीलैंड की एक पहाड़ी का जिक्र किया था, जिसका नाम दुनिया के किसी भी स्थान के सबसे लम्बे नाम के रूप में दर्ज है। आज उसी के बारे में कुछ         
तफसील से -
न्युजीलैंड के  दक्षिणी हिस्से    में एक   305 मी.   ऊंची पहाड़ी    को दुनिया  के किसी भी स्थान के सबसे लम्बे नाम वाली जगह होने का गौरव प्राप्त है। न्यूजीलैंड की Maori भाषा में    बोला जाने वाला   यह नाम कुछ इस प्रकार है -

“Taumatawhakatangihangakoauauotamateahaumaitawhitiurehaeaturipukakapikimaungahoronukupokaiwhenuakitanatahu”

पूरे 105 शब्दों वाले नाम को  बोलने की   आसानी के लिए संक्षिप्त कर पहले 57 शब्दों का बनाया  गया पर फिर                                                                                            

और छोटा कर उसे Taumata कर दिया गया। ऐसा माना जाता है कि इस जगह की खोज वर्षों पहले किसी "तामाटी" नाम के व्यक्ति ने की थी।

अब नाम है तो जाहिर है उसका कुछ अर्थ भी होगा। तो इस लम्बे से शब्द समूह का अर्थ है :- वह पहाड़ी जहां बैठ कर या परिक्रमा करते हुए तामाटी नामक बड़े घुटनों वाला, घुमक्कड पर्वतारोही अपनी प्रेयसी के लिए नाक से बजाई जाने वाली बांसुरी बजाता था। कैसा लगा, अंतरजाल की सहायता से मिला यह लम्बा सा बांसुरी वादन :-)

बुधवार, 27 जुलाई 2011

अजीब जरूर हैं, पर गरीब बिल्कुल नहीं हैं।

कुछ बातें ऐसी होती हैं जो हमारे आस-पास होती रहती हैं, हम उपयोग में भी लाते हैं पर उनकी "अजीबोगरीबियत" का हमें अंदाजा भी नहीं लग पाता। ऐसे ही कुछ नमूने पेश हैं :-

1, बताईये यह क्या लिखा गया है -
Taumatawhakatangihangakoauauotamateapokaiwhenuakitanatahu
यह न्यूजीलैंड की एक पहाड़ी का नाम है, जो संसार के किसी भी स्थान का सबसे लम्बा नाम है।

2, अंग्रेजी का 15 अक्षरों का अकेला शब्द uncopyrightable है जिसमें कोई भी अक्षर दोहराया नहीं जाता।

3, धन-दौलत-पैसा, जैसे शब्द सुनने में मधुर तथा कर्ण प्रिय लगते हैं। पर कर्ण प्रियता यानि संगीत का बाजार विश्व भर में करीब 40 खरब डालर का है।

4, आजकल नोट सिर्फ कागज के ही नहीं बनते बल्कि उनमें सूती और लिनेन जैसे कपडों की कतरने भी मिलाई जाती हैं।

5, अंग्रेजी भाषा के "set' शब्द के सबसे ज्यादा अर्थ मिलते हैं।

6, अमेरिकन और यूरोपियन लोग हर साल अपने पालतुओं पर करीब 17 बिलियन डालर खर्च कर डालते हैं।

7, " i " शब्द के ऊपर की बिंदी tittle कहलाती है।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

"महामृत्युंजय मंत्र" में खरबूजे की महिमा का गुणगान

आज सावन मास का दूसरा सोमवार है। भगवान शिव का प्रिय दिन। "महामृत्युंजय मंत्र" उन्हीं देवों के देव श्री शंकर भगवान का अत्यंत शक्तिशाली मंत्र है

हमारे मंत्र और श्लोक इत्यादि अपने में गुढार्थ लिए होते हैं। इनका उपयोग करने की शर्त होती है कि इनका उच्चारण शुद्ध और साफ होना चाहिए। बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो मंत्रों या श्लोंकों को पढने या जाप करने के साथ-साथ उसका अर्थ भी पूरी तरह जानते हों, नहीं तो मेरे जैसों को जैसा रटवा दिया गया या पढ-सीख लिया उसका वैसे ही परायण कर लेते हैं। मंत्रों में सबसे शक्तिशाली मंत्र शिवजी का "महामृत्युंजय मंत्र" है। आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है।

"ओ3म् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात्।।"

भावार्थ :- हम लोग, जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा, बल को बढाने वाला रुद्र्रूप जगदीश्वर है, उसी की स्तुति करें। उसकी कृपा से जैसे खरबूजा पकने के बाद लता बंधन से छूटकर अमृत तुल्य होता है, वैसे ही हम लोग भी प्राण और शरीर के वियोग से छूट जाएं। लेकिन अमृतरूपी मोक्ष सुख से कभी भी अलग ना होवें। हे प्रभो! उत्तम गंधयुक्त, रक्षक स्वामी, सबके अध्यक्ष हम आपका निरंतर ध्यान करें, ताकि लता के बंधन से छूटे पके अमृतस्वरूप खरबूजे के तुल्य इस शरीर से तो छूट जाएं, परंतु मोक्ष सुख, सत्य धर्म के फल से कभी ना छूटें।

देखने की बात यह है कि इतने प्रकार के फलों के होने के बावजूद मंत्र में खरबूजे का ही चयन क्यों किया गया। इसके बारे में यजुर्वेद में विस्तार से बताया गया है कि खरबूजे के विशिष्ट गुणों के कारण उसे यह सम्मान प्राप्त हुआ है। खरबूजा जब तक कच्चा रहता है तब तक बेल से अलग नहीं होता। जब वह पक जाता है तो उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है। उसकी मधुरता का जवाब नहीं होता। इसका चौथा गुण यह है कि वह दूसरे खरबूजे को देख रंग बदल लेता है। पक जाने पर जब वह बेल से अलग होता है तो बेल का कोई भी रेशा उसके साथ नहीं रहता। पक जाने पर वह अपने अंदर के बीजों को भी खुद से अलग कर देता है।

ठीक उसी तरह भक्त परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे देव, मुझे अकाल मृत्यु से दूर रखना, मेरे गुणों की सुगंध भी दूर-दूर तक फैले, मुझमें भी सदा औरों के लिए मधुरता यानि प्रेम बना रहे, मेरे गुणों से और लोग भी गुणी बनें, मेरे अंदर कभी दुर्गुण घर ना करें और जब मैं इस संसार को छोड़ कर जाऊं तो इसका मोह मुझे ना व्यापे और हे प्रभू आप से विनती है कि अपने से मुझे कभी दूर ना करें या रखें।

ॐ नम: शिवाय।

लेख में या लिखने में कोई त्रुटि रह गयी हो तो क्षमा करेंगे।

शनिवार, 23 जुलाई 2011

न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। ऐसा क्यों?

एक मुहावरा हैना नौ मन तेल होगा ना राधा नाचेगी काफी दिनों के बाद भी यह कोई नहीं बता पाया है कि नाच और तेल का आपस का क्या सम्बंध है। फिर यह राधा कौन है जो नाचने के लिए ऐसी ऊट-पटांग शर्त रख रही है। सोचने की बात यह भी है कि वह नाचेगी ही क्यूं ? बिना मतलब के तो कोई नाचता नहीं। हो सकता है कि कोई खास आयोजन होगा, पर यदि ऐसा है तो नौ मन तेल की शर्त क्यूं रखी गयी है ?

नौ मन तेल तो नहीं पर दिमाग का तेल निकालने के बाद ऐसा लगता है कि ये राधाजी कोई बड़ी जानी-मानी डांसिंग स्टार होंगी और किसी अप्रख्यात जगह से उन्हें बुलावा आया होगा। हो सकता है कि उस जगह अभी तक बिजली नहीं पहुंची हो और वहां सारा कार्यक्रम मशाल वगैरह की रोशनी में संम्पन्न होना हो। इस बात का पता राधा एण्ड़ पार्टी को वेन्यू पहुंच कर लगा होगा और अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल हर चीज ना पा कर आर्टिस्टों का मूड उखड़ गया होगा और उन्होंने ऐसी शर्त रख दी होगी जिसको पूरा करना गांव वालों के बस की बात नहीं होगी। पर फिर यह सवाल उठता है कि नौ मन तेल ही क्यूं ? राउंड फिगर में दस या पन्द्रह मन क्यूं नहीं ? तो हो सकता है कि यह आंकड़ा काफी दर-मोलाई के बाद फिक्स हुआ हो।

ऐसा भी हो सकता है कि पेमेन्ट को ले कर मामला फंस गया हो। वहां ग्रामिण भाई कुछ नगद और कुछ राशन वगैरह दे कर आयोजन करवाना चाहते हों पर राधा के सचिव वगैरह ने पूरा कैश लेना चाहा हो। बात बनते ना देख उसने इतने तेल की ड़िमांड रख दी हो जो पूरे गांव के भी बस की बात ना हो।

तो मुहावरे का लब्बो-लुआब यही निकलता है कि एक ख्यातनाम ड़ांसिंग स्टार अपने आरकेस्ट्रा के साथ किसी छोटे से गांव में अपना प्रोग्राम देने पहुंचीं। उन दिनों मैनेजमेंट गुरु जैसी कोई चीज तो होती नहीं थी सो गांव वालों ने अपने हिसाब से प्रबंध कर लिया होगा और यह व्यवस्था "राधा एण्ड कंपनी" को रास नहीं आयी होगी। पर उन लोगों ने गांव वालों को डायरेक्ट मना करने की बजाय अपनी एण्ड़-बैण्ड़ शर्त रख दी होगी। जो उस हालात और वहां के लोगों के लिये पूरा करना नामुमकिन होगा। इस तरह वे जनता के आक्रोश और अपनी बदनामी दोनों से बचने में सफल हो गये होंगे।

इसके बाद इस तरह के समारोह करवाने वाले अन्य व्यवस्थाओं के साथ-साथ नौ-दस मन तेल का भी इंतजाम कर रखने लग गये होंगे। वैसे किस तेल की फर्माईश की जाती रही है यह भी पता नहीं चल पाया है, क्योंकि फिर कभी राधाजी और तेल के नये आंकड़ों की खबर नहीं आयी है।

इस बारे में नयी जानकारियों का स्वागत है।

बुधवार, 20 जुलाई 2011

किसी लेखक ने अपनी कलम को कभी कोई नाम नहीं दिया, ऐसा क्यों?

सृष्टि के आरंभ में आदि-मानव को अपनी सुरक्षा और जानवरों को मारने के लिए अपने बाहुबल के अलावा भी किसी अन्य साधन की जरूरत महसूस हुई होगी। क्योंकि प्रकृति ने अन्य जीव-जंतुओं की तरह उसे आत्मरक्षा हेतु कोई अतिरिक्त प्राकृतिक सुविधा नहीं दे रखी थी। उल्टा वह ताकत में उनसे कमजोर ही साबित होता था। शुरु में अपने बचाव और भोजन प्राप्ति के लिए उसने अनघड़ पत्थरों या किसी पेड़ की ड़ाली का उपयोग हथियार के रूप में किया होगा। धीरे-धीरे उन्हीं चीजों को तीक्ष्ण आकार दे और घातक बनाया होगा और जब उसे समझ में आया होगा कि दूर से फेंक कर मारने में खुद की ज्यादा सुरक्षा है तो तीर और धनुष का आविष्कार हुआ होगा। शास्त्रों में भी तीर-धनुष का विशेष उल्लेख मिलता है। यहां तक कि देवताओं द्वारा धारण किए गये इस अस्त्र के बाकायदा नाम भी हैं। जैसे शंकरजी का "पिनाक", विष्णुजी का "श्रृंग", इंद्र का "विजय", अर्जुन का "गांडिव" जो अत्यधिक प्रसिद्ध रहा है। धनुषों का निर्माण बांस या किसी लचीली धातु से किया जाता था। धनुर्धर इसे तरह-तरह से सजा कर रखते थे। इसकी मार करीब 300 फुट तक होती थी।

ऐसा माना जाता है कि तीर-धनुष के बाद तलवार अस्तित्व में आई। जिसका आविष्कार ब्रह्माजी ने असुरों के संहार के लिए देवताओं के लिए किया था। भारत में भी इसके होने के प्रमाण 2000 ईसा पूर्व से मिलते हैं। इसके कयी रूप-रंग होते थे तथा इसका निर्माण लोहे से किया जाता था। तलवार योद्धाओं का प्रिय शस्त्र रहा है। इसे वे अपने शरीर का ही एक अंग मानते थे। यह कितनी महत्वपूर्ण थी इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि युद्ध में रत योद्धा अपनी तलवार पर अपना नाम लिख अपने विवाह मंडप में भेज देता था और उसी के साथ फेरे ले विवाह सम्पन्न मान लिया जाता था। कुछ इतिहास प्रसिद्ध तलवारें हैं, रावण की "चंद्हास", शिवाजी महारज की "भवानी", शाहजहां की "पारादल", अकबर की "लक्खी"। मुगल काल में शमशीर का बोलबाला रहा।
इसी तलवार या शमशीर से बहुत बार किसी राजकुमारी का हाथ पाने के लिए प्रतियोगिताएं जीती गयीं। यूरोप में तो इस तरह के आयोजन होते ही रहते थे।

ये तो हुई प्राण लेने वाले हथियारों की बात जो योद्धाओं में इतने प्रिय थे कि उन्होंने बाकायदा इन्हें नाम दे रखा था।
यह सब देख-सुन एक सवाल उठता है मन में कि योद्धाओं की तरह लेखक का प्रिय हथियार तो कलम ही होती है। उस से किसी का खून तो नहीं बहता पर उसकी ताकत से बहुत बार साम्राज्यों की चूलें हिल गयीं, समाज का रवैय्या बदल गया, लोगों की सोच में आमूल-चूल परिवर्तन आ गये, पर आज तक किसी लेखक ने अपनी लेखनी को कोई नाम दिया हो यह बात सुनने में नहीं आई। जब कि कहावत है कि कलम तलवार से ज्यादा ताकतवर होती है।

ऐसा क्यूं ?

रविवार, 17 जुलाई 2011

क्या देवी-देवताओं को वाहनों की जरूरत पड़ती है?

वर्षों से यह धारणा चली आ रही है कि हमारे देवी-देवताओं के पशु या पक्षी के ऊप में अपने-अपने वाहन होते हैं। जैसे माँ दुर्गा का सिंह, शिवजी का नंदी बैल, विष्णुजी का गरुड़, गणेशजी का चूहा, कार्तिकेयजी का मोर, लक्ष्मीजी का उल्लू इत्यादि-इत्यादि।
शायद इसीलिए इन देवी-देवतओं के साथ यह पशु-पक्षी चित्रित किए जाते रहे हैं। पर सोचने की बात यह है कि जैसी मान्यता है, हमारे देवी-देवता तो कहीं भी कभी भी क्षणांश में आने-जाने में सक्षम हैं। फिर यह भी धारणा है कि देव जाति दया, वात्सल्य तथा ममता से सराबोर है तो वे क्यों निरीह प्राणियों को ऐसे काम में ला उन्हें कष्ट देंगे।

क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इन मूक, निरीह, प्रकृति की सुंदर रचनाओं को मनुष्य के हाथों बचाने के लिए उनके प्राणों की रक्षा हेतु उनका सम्बंध देवी देवताओं से इस रूप में जोड़ दिया गया हो। क्योंकि हो सकता है कि प्राचीन समय में किसी कारणवश भूमि से शाकाहार उतना प्राप्त ना किया जा सक रहा हो या मनुष्य उतनी मेहनत ना कर आसानी से उपलब्ध मांसाहार पर ज्यादा निर्भर होता जा रहा रहने लगा हो और यही सब देख कर हमारे भविष्यदृष्टा ऋषि-मुनियों ने, आगत को ध्यान में रख, निर्दोष जीव-जंतुओं का जितना भी सभव हो बचाव हो सके, यह बात आम जन के मन में वैसे ही बैठाने की कोशिश की हो जैसे पेड़-पौधों में देवताओं का वास बता उनके अंधाधुंध विनाश पर रोक लगाने के लिए की गयी थी।

कभी ध्यान से श्री कृष्णजी के पास खड़ी उनकी पांव की तरफ मुग्ध भाव से झुकी गाय को देखा है। कितने कोमल भाव हैं कितनी ममता है। भगवान दत्तात्रेयजी के साथ सदा मुग्धा गाय, काले कुत्ते या कबूतर को देख किसके मन में हिंसा उपज सकती है। ईसा की बाहों में मेमना, घायल हंस को अश्रुपूरित आंखों से तकते सिद्धार्थ, माँ सरस्वतीजी का हंस, शिवजी के पूरे परिवार का विभिन्न पसु-पक्षियों के साथ सानिध्य, गुरु गोविंद सिंहजी का बाज यह सभी तो एक ही संदेश दे रहे हैं। दया का, ममता का, धरा के सारे प्राणियों के साथ प्रेम-भाव का।

शनिवार, 16 जुलाई 2011

आक्रोश

देश की दुर्दशा और उसके तथाकथित कर्णधारों की हरकतों से यहां की जनता ही नहीं विदेशों में रह रहे भारतीय भी विक्षुब्ध हैं। ऐसे ही एक भाई ने अपना आक्रोश शब्दों में ढाल कर इ-मेल से भेजा है।

आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं
झांकी घपलिस्तान की
इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है बेईमान की

बंदों में है दम,
राडिया-विनायकम्
बंदों में है दम, राडिया-विनायकम्

उत्तर में घोटाले करती
मायावती महान है
दक्षिण में राजा-कनिमोझी
करुणा की संतान हैं
जमुना जी के तट को देखो
कलमाडी की शान है
घाट-घाट का पानी पीते
चावला की मुस्कान है.

देखो ये जागीर बनी है
बरखा-वीर महान की
इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है बेईमान की

बन्दों में है दम...राडिया-विनायकम्.

ये है अपना जयचंदाना
नाज़ इसे गद्दारी पे
इसने केवल मूंग दला है
मजलूमों की छाती पे
ये समाज का कोढ़ पल रहा
साम्यवाद के नारों पे
बदल गए हैं सभी
अधर्मी भाडे के हत्यारे में
हिंसा-मक्कारी ही अब
पहचान है हिन्दुस्तान की

इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है हैवान की
बन्दों में है दम...राडिया-विनायकम्.

देखो मुल्क दलालों का,
ईमान जहां पे डोला था.
सत्ता की ताकत को
चांदी के जूतों से तोला था.
हर विभाग बाज़ार बना था,
हर वजीर इक प्यादा था.
बोली लगी यहाँ
सारे मंत्री और अफसरान की.
इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है शैतान की.
बन्दों में है दम... नंगे-बेशरम....!

बुधवार, 13 जुलाई 2011

फिर एक बार मौत का तांड़व

मुंबाई में फिर तीन जगह सीरियल धमाके हुए। झवेरी बाजार, मुंबादेवी मंदिर और दादर स्टेशन का इलाका चपेट में आया।
समय भी ऐसा चुना गया था जब लोग दफ्तर के बाद घर जाने को निकल रहे थे या शाम के समय बाजारों में खरीददारी के लिए। तीनों धमाकों के लिए रेलवे स्टेशन या बस अड़्ड़े को ही चुना गया था।

अभी सैंकड़ों लोगों के घायल होने की खबर है। मृतकों की भी एक बड़ी संख्या की आशंका है। इस तरह के हमले की आशंका काफी दिनों से अखबारों में आरही थी। अभी दो दिन पहले ही असम के पास रेल दुर्घटना में आतंकवादियों का हाथ नज़र आने के बावजूद पूरे सुरक्षा इंतजाम नहीं हो पाए थे। हर बार की तरह आम निरीह जनता ही दरिंदों का शिकार बनी है।

पता नहीं कब दुनिया से यह खून-खराबा खत्म होगा और लोग निश्चिंत हो कर जी सकेंगे।

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

क्या बच्चों को शिष्टाचार सिखाने के लिए घर में किसी पुरुष का होना जरूरी है?

इस बारे में दो राय जरूर होंगी। बहुत से लोग असहमत भी होंगे, क्योंकि हजारों ऐसे उदाहरण हैं जब एक अकेली महिला ने अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठा उसे उज्जवल भविष्य दिया हो। पर मेरा हाल का ही एक अनुभव कहता है कि घर-परिवार में एक उम्रदराज पुरुष के होने से कुछ तो फर्क पड़ता ही है।

मेरा एक परिचित परिवार है। सक्सेनाजी का। सक्सेनाजी, उनकी पत्नी, दो लड़कियां जया और विजया तथा एक लड़का जय, जो मेरा जिगरी दोस्त है, बिल्कुल भाइयों जैसा। सक्सेनाजी ने नौकरी में रहते हुए ही सारी जिम्मेदारियां पूरी कर ली थीं। घर बन गया था। बड़ी लड़की का अच्छे परिवार में विवाह हो गया था और वह कनाडा जा बसी थी। छोटे जय की भी शादी हो गयी थी, प्रभू की कृपा से बिल्कुल सहज स्वभाव की घरेलू लड़की मिली थी जिसने सदा सास को माँ और ननद को बहन ही माना। जय भी अच्छे भविष्य की चाहत में सपत्निक विदेश चला गया। रही विजया जिसने कुछ पढने की ललक, कुछ परिस्थितियों, कुछ मनोदशा और शायद कुछ कुंठा की वजह से जो एक बार शादी से मना किया तो फिर उसे कोई मना नहीं पाया। पर अपनी मेहनत, लगन और काबिलियत के चलते वह सरकारी मुहकमें में आला अफसर के पद तक जा पहुंची।

सक्सेनाजी का घर में काफी दबदबा था। खुले दिलो-दिमाग के होने के बावजूद उन्हें अपनी संस्कृति, सभ्यता तथा संस्कारों से बहुत लगाव था। बेहद अनुशासन प्रिय भी थे। पर इधर बिमार रहने लग गये थे। पहले तो विजया किसी तरह घर, दफ्तर, अस्पताल में तारतम्य बनाए रखती थी पर बिमारी ज्यादा बढने पर जय ने बहन की कठिनाइयों को समझते हुए अपनी पत्नी और दोनों बच्चियों को भारत भेज दिया, खुद की और पत्नी की भावनओं, सुख-सुविधा की बली दे कर। जिससे विजया को कुछ राहत मिल जाए। इससे घर में थोड़ी रौनक लौट आई। बच्चियां सब को साथ बांधने का जरिया बन गयीं। घर भर की प्यारी। पर विजया को उनसे कुछ ज्यादा ही लगाव था। जान छिड़कती थी उन दोनों पर। उनके मुंह से शब्द निकलते बाद में थे उनकी मांग पहले पूरी हो जाती थी। विजया की जिंदगी की धुरी बन कर रह गयीं थी दोनों।

पर सब सदा एक जैसा नहीं रहता, चाहे बाकि कुछ थम भी जाए पर समय अपनी मंथर पर निश्चित गति से सदा चलायमान रहता है। लम्बी बिमारी और काफी कष्ट सहने के बाद सक्सेनाजी का स्वर्गवास हो गया। बच्चियां भी बड़ी हो कालेज जाने लग गयीं। यहीं से आधुनिक सभ्यता ने टीवी और मोबाइल का रूप ले उनकी मासूमियत छीननी शुरु कर दी। कुछ अधिक आजादी लेने में अब कोई बाधा भी नहीं थी। दादी तो पहले भी कुछ नहीं कहती थी। अब तो मां और बुआ भी पुराने ख्यालातों की लगने लगीं। वही बुआ जो अपनी हथेली में दोनों को किसी नन्हें शावक सा संरक्षण देती रहती थी, अब उसी की बातें रास नहीं आने लगीं। बात-बात में तेज आवाज में विरोध करना, हर बात को काटने की कोशिश करना, हर हिदायत को हवा में उड़ाने को तत्पर रहना, आदतों में शुमार हो गया था। मां-बुआ के समझाने का असर ज्यादा देर टिकता नहीं था। आने-जाने, मिलने-जुलने वालों, दोस्त-रिश्तेदारों को इस बदलाव के साथ-साथ अपनी उपेक्षा साफ नजर आने लगी थी। सामने तो कोई कुछ नहीं कहता था पर पीठ पीछे बातें उठने लग गयीं थीं। लोगों का आना-जाना कम होने लगा था।

मेरे कानों में भी ऐसी बातें पड़ती रहती थीं। पर मुझे विश्वास नहीं होता था क्योंकि लोगों की आदत ही ऐसी होती है, बातें बनाने की। मेरा उनसे लगाव कुछ ज्यादा ही था, यह भी कारण था बातों पर विश्वास ना करने का। गोद में खेलते-खेलते बड़ी जो हूईं थीं। जब भी जाना होता तो पीठ से उतारना मुश्किल हो जाता था।

बड़े दिनों बाद इस बार जाना हुआ था। पर जाते ही धक्का लगा। उनका आचरण ऐसा था जैसे पेपर वाला या केबल वाला बिल ले कर आया हो। फिर भी मैंने बुलाने की कोशिश की, विजया ने भी कहा तब बिना टीवी से मुंह घुमाए एक नमस्ते उछाल दी। ऐसा नहीं था कि मैं उसी शहर में रहता हूं या अक्सर जाता रहता हूं। मन और भी खट्टा तब हो गया जब उनकी बिमार मां और थकी-हारी विजया ही मना करने के बावजूद पानी-वानी की व्यवस्था करती रहीं। पर दोनों टीवी छोड़ अपनी जगह से हिलीं तक नहीं। कुछ देर बैठ कर मैं चलने लगा तब भी कोई खास प्रतिक्रिया दिखाई नहीं दी, यह जानते हुए कि दूसरे दिन मैं वापस लौट रहा हूं। पता नहीं फिर कब आना हो पाता है।

सोचता हूं ऐसा क्यों? क्या यह विजया के अति प्यार-दुलार का नतीजा है? क्या सक्सेनाजी या जय का यहां ना होना इस धृष्टता की वजह है? या फिर तथाकथित आधुनिकता सारे रिश्तों को खा जाने पर तुल गयी है?

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

भगवान के साथ ये सब आजकल खबरों में हैं।

एक हैं दया के सागर। बहुत बड़े नेता हैं। जैसा नाम वैसा ही गुण। आपादमस्तक दया भावना से लिथड़े हुए। सदा अपने आस-पास के लोगों की गरीबी हटा उन्हें सम्पन्न बनाने के लिए कृतसंकल्प। जो भी उनके पास रहा, बेटा-बेटी, भाई-बहन, बहू-जवांई याने "जहां तक उनकी दृष्टि काम करती है" वहां तक सबका भला करने में ही उम्र गुजार दी। सुना है जिंदगी भर भगवान को नकारने वाले अब मंदिरों में गुहार लगा रहे हैं। भगवान भली करे।

एक हैं सफल आयोजक। आजकल जेल में हैं। पर वहां की दिवारें भी उनके ख्यालों या मनसूबों को रोकने में सफल नहीं हो पा रही हैं। उनकी मंशा है देश को खेलों में, माफ करिएगा खेलों के आयोजन में देश का नाम सर्वोपरि करना। इसमें वे तन-मन से लगे रहते थे। धन तो खैर 'आनी-आनी' चीज है। इस बारे में इतने समर्पित हैं कि जेल में रह कर भी ध्यान खेलों के आयोजन पर ही है। सुनने में आया है कि माहौल के अनुसार अभी-अभी उन्हें तिहाड़ ओलिम्पिक करवाने का सपना बार-बार आ रहा है।
भगवान तिहाड़ की रक्षा करें।

एक हैं अपनी तरह के आप, फिल्म निर्माता। जो अपने पासंग किसी को नहीं समझते। पिछले वर्षों तक महानायक का गुणगान करते ही सोते-जागते, खाते-पीते थे। उनके बिना अपनी किसी फिल्म की कल्पना भी नहीं कर पाते थे। पर समय बदला, मान्यताएं बदलीं। इन दिनों आमिर की विवादास्पद नयी फिल्म और आमिर के कसीदे काढने से ही फुरसत नहीं मिल पा रही है। आमिर में उन्हें फिल्मों का भगवान नजर आने लगा है जबकि उनके खुद के अनुसार वे किसी भगवान को नहीं मानते। ये भी क्या करें बाजार की छत पर फिल्म टांगने के लिए एक खंबा तो चाहिए ही ना। स्तुति गान शुरु हो ही चुका है। आमिर की शायद निकृष्टतम कृति रूपी शिट् को भी प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा रहा है। मेरा विश्वास है कि आने वाले दिनों में वे आमिर को लेकर कुछ जरूर "बोएंगे"। जमीन तैयार की जा रही है। भगवान सहायक हों।

इसी संदर्भ मे याद आ रहे हैं, जयप्रकाश चौकसे। दैनिक भास्कर की सफलता में उनका फिल्मों से सम्बंधित कालम "परदे के पीछे" का भी हाथ है। एक बहुत बड़ा वर्ग है उनके प्रशंसकों का जो उनके निष्पक्ष तथा फिल्मों से सम्बंधित ज्ञान का कायल है। पर पिछले दिनों उन्होंने भी 'डेली बेल्ही' में हर चीज को जायज ठहरा कर पाठकों को बहुत ही निराश किया।
हो सकता है भूतकाल में जीवन के किसी मोड़ पर किसी प्रकार का सहयोग, सहायता की याद अब संकोचवश सच्चाई बयान करने से रोक रही हो। हे भगवान! ऐसी कैसी मजबूरी?

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कहां हमारे गुरुघंटाल, कहां उनके नमकहराम

"ग्लोबल फाइनैंशल इंटीग्रिटी" की सूचना के अनुसार हमारे देश का करीब 210 अरब रुपया स्विस बैंकों में जमा है। यह रिपोर्ट 2008 की है। यह बेकार पड़ा जमा धन हमारी जीड़ीपी के पचास प्रतिशत के बराबर है। ये बैंक ही वहां की अर्थ व्यवस्था को संभालते हैं हमारे पेट को काट कर। चूंकी वहां के लोगों की रोजी-रोटी ही ऐसा धन जुगाड़ करवाता है सो वहां खाता खोलने में भी आपको ढेरों सहूलियतें मुहय्या करवाई जाती हैं। बस आपके पास "माया" होनी चाहिए। बिना ज्यादा झंझटों और दस्तावेजों के सिर्फ पासपोर्ट से ही 15-20 मिनट में आपका खाता खोल आपके हाथ में डेबिट कार्ड़ थमा दिया जाता है। भविष्य में भी एक ई-मेल से आप अपना धन उनके सदा खुले मुख में उडेल सकते हैं।

हम-आप अंदाज भी नहीं लगा पाएंगे कि स्विस बैंकों में पड़ी सडती रकम यदि वापस अपने देश आ जाए तो क्या कुछ हो सकता है। इससे पैंतालिस करोड़ गरीब करोड़पति बन सकते हैं। हमारे सर पर लदा अरबों का विदेशी कर्ज चुकता कर देने के बावजूद बहुतेरे आधे-अधूरे प्रोजेक्ट पूरे किए जा सकते हैं। इतनी रकम को किसी ढंग की जगह लगा दिया जाए तो उसके ब्याज से ही सालाना बजट पूरा हो सकता है।

ऐसे धन का ढेर बनाने में वे लेन-देन सहायक होते हैं जो हवाला के जरिए किए जाते हैं। बड़े रक्षा और बहुतेरे सौदों का कमीशन ले बाहर ही छुपा दिया जाता है। आयात-निर्यात के उल्टे-सीधे बिल बना, उससे प्राप्त पैसे को बाहर बैंकों के अंधेरे लाकरों में गर्त कर दिया जाता है। बिना किसी रिकार्ड़ के देश से पैसा बाहर भेज दिया जाता है। ये सारा काम क्या आम इंसान के वश का है? सब जानते हैं कि कैसे लोग ऐसे तरीके से वैसा धन इकट्ठा कर सकते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ हमारे यहां से ही वहां धन पहुंच रहा हो। दुनिया के दूसरे देशों में भी नमकहराम बैठे हुए हैं। कम्यूनिज्म के पैरोकार रूस का इस मामले में दूसरा स्थान है, पर वह क्या खा कर हमारे चंटों का मुकाबला करेगा, दूसरा स्थान होने के बावजूद उसके धन की मात्रा हमारे से एक चौथाई भी नहीं है। जबकि हर जगह अपने को सर्वोच्च मानने वाला, धन कुबेर अमेरिका पहले के पांच स्थानों में भी जगह नहीं बना पाया है। हम उसकी ऐसी नकल क्यों नहीं करते?

बुधवार, 6 जुलाई 2011

शर्म, हया, मर्यादा, सामाजिक सरोकार को रखने के लिए तो अब "ताक" पर भी जगह नहीं बची है।

देखा या महसूस तो आप सब ने भी किया ही होगा। विषय-वस्तु ही ऐसी है कि ध्यान जाने-अनजाने जरूर चला ही जाता है कि जितने भी दृश् माध्यम हैं उनमें जैसे होड़ लगी हुई है मानव देहों को उनके प्राकृतिक रूप में पेश करने की। जबसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वतंत्रता मिली है तब से मानसिक अभिव्यक्ति की जगह दैहिक अभिव्यक्ति का चलन कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ता जा रहा है। कहीं गलती से किसी ने इसे अश्लील करार दे दिया तो उसे ही अश्लीलता की परिभाषाएं समझाई जाने लगती हैं। उसे ही बताया जाने लगेगा कि देखने वाले की आंखों और दिमाग में ही फितूर होता है जो कला को ऐसी दृष्टि से देखता है। अभी एक जिद्दी चित्रकार को लोग भूले नहीं होंगे, जिसकी कला को कुछेक चीजें छोड़ प्रकृति में और कुछ नजर ही नहीं आता था।

ऐसे समय में फिल्मों की तो क्या ही बात करें जहां भट्टों जैसों की बिरादरी ने पहले से ही भट्ठा बैठा कर रखा हुआ था। अब तो अपने आप को बुद्धिजीवी और आम फिल्म निर्माता से दो सीढी ऊपर समझने वाले निर्माता-निर्देशकों को भी विवादास्पद कहानियों या घटनाओं को फिल्माने के अलावा कुछ और नहीं सूझता। जब कि इनकी ऐसी “कलाकृतियां” दो दिनों में औंधे मुंह गिरती रहती हैं। ऐसा नहीं है कि इस सब का विरोध नहीं होता हो पर कुछ लोग इतने मगरूर होते हैं कि वे अपने सामने किसी को कुछ समझते ही नहीं। यहां तक कि उन्हें भी नहीं जिन्होंने उनके लिए आसमान के सितारे तक जमीन पर ला दिए हों। ऐसे महानुभाव मुट्ठी भर चापलूसों को पूरा भारत समझ ऐसा आभास देते हैं जैसे उनकी कृति ना भूतो ना भविष्यते हो। इनके स्वभाव में इतना गरूर आ जाता है कि यह कहने से भी नहीं चूकते कि जिसको देखना है वह देखे जिसे पसंद नहीं हो वह ना देखे। हम तो ऐसी ही बनाएंगे। ऐसे लोगों की किस्मत से यदि एक बार कीचड़ में कमल खिल जाए तो ये कीचड़ को ही सदा के लिए अपनी कर्म भूमि बना लेते हैं और फिर उसी गंदगी का हिस्सा बन वैसी ही गंदगी फैलाना शुरु कर देते हैं। ऐसा करते हुए ना तो परिवारों का ख्याल आता है ना ही समाज का, देश की बात तो छोड़ ही दें।

ऐसे लोगों की कुछ लचर सदाबहार दलीलें होती हैं, जैसे भाई हम तो वही बनाते हैं जिसे जनता देखना पसंद करती है। या हम लीक से हट कर फिल्म बनाते हैं जिसमें समाज की सच्चाई को पेश किया जाता है या हम वही दिखाते सुनाते हैं जैसा रोज व्यवहार होता है या जैसी भाषा रोज काम में लाई जाती है। सबसे ज्यादा छूट लेने के लिए जो दलील दी जाती है वह है कहानी की मांग। इसके अंतरगत आप कुछ भी दिखा सुना सकते हैं ऐसा इन तथाकथित कलाकारों का कहना है। ख़ास कर उन युवतियों का जो इस "शो- बिजनेस" की चकाचौंध से पूरी और बुरी तरह प्रभावित होती हैं। पर्दे पर दिखने, रातों-रात अमीर और चर्चित होने के लिए वे अच्छे-बुरे में फर्क ही नहीं करना चाहतीं। उनके अनुसार यदि वे निर्देशक का कहा ना माने तो कहानी की आत्मा (जो कहीं होती ही नहीं) का नर्कवास होने का खतरा पैदा हो जाता है।

आजकल फिल्मोँ की देखादेखी अदूरदर्शन भी उसी राह चलवा दिया गया है। फिल्मों के लिए तो, चाहे कहने के लिए ही, एक कमजोर सी बाधा सेंसर के रूप में है तो सही और फिर उसे देखने के लिए कुछ जतन भी करने पड़ते हैं, पर टीवी तो पूरी तरह से उच्श्रृंखल है। ना कोई ड़र ना भय नाही कोई सामाजिक सरोकार और सबसे बड़ा खतरा कि उसकी सीधी पैठ घर के अंदरुनी कमरे तक है। उसके उल्टे-सीधे विज्ञापन, बिना सिर पैर के सीरीयल यहां तक कि उसकी खबरों ने भी एक अदृश्य हौवे "टी आर पी" क चक्कर में कोई कसर नहीं छोड़ी है बंटाधार करने में।

अब आप अखबारों को ही उठा लें। ऐसी-ऐसी खबरें, ऐसी-वैसी तस्वीरें कि भले घर-परिवारों को सोचना पड़ रहा है कि इसे लेना बंद ही कर दें तो घर के सदस्य एक दूसरे के सामने शर्मिंदगी से तो बचें। मिसाल के तौर पर आप "टाइम्स आफ इंडिया" का किसी भी दिन का अखबार उठा कर देख लें मेरे बात समझ में आ जाएगी।

इस घोर धन-युग में हर चीज पैसे को मद्देनज़र रख कर, की, चलाई या बनाई जा रही है। शर्म, हया, मर्यादा, सामाजिक सरोकार को रखने के लिए तो अब ‘ताक’ पर भी जगह नहीं बची है।

सोमवार, 4 जुलाई 2011

इसमे आश्चर्य की क्या बात है?

इंसान रोज जानवरों की तरह की हरकतें करता है तो किसी को आश्चर्य नहीं होता। पर जब कभी जानवर इंसान की तरह "कुछ" करता है तो ?
तो, क्या खुद ही देखिए और बताईये ..............
















रविवार, 3 जुलाई 2011

ज्योतिष के अनुसार तो द्रविड़ और तेंदुलकर को 2009 में संन्यास ले लेना था।

आज एक पुरानी कतरन हाथ लगी जिसमें और बहुत सी बातों के साथ एक भविष्यवाणी भी थी। जिसमें दावा किया गया था कि 2009 तक क्रिकेट के खेल से राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर संन्यास ले लेंगे।
बात तब की है जब क्रिकेट के पांच दिग्गजों में से दो गांगुली और कुंबले को खेल से अलविदा कहलवा दिया गया था। धोनी की गुड़्ड़ी आकाश में लहरा रही थी और इन दोनों की लय कुछ बिगड़ी हुई थी तथा भविष्य ड़ावां-ड़ोल लग रहा था साथ ही चारों ओर से नकारात्मक प्रचार भी किया जा रहा था। पर किसी को भी इनके दृढ निश्चय की थाह नहीं थी।

तीन साल पुरानी इस कतरन में बिहार के पटना शहर के न्यू पुनाईचक इलाके के भविष्यवक्ता श्री समीर उपाध्याय ने अपनी तरह-तरह की गणना के आधार पर यह भविष्यवाणी की हुई है कि द्रविड नवंबर, 2008 से मार्च 2009 या फिर जुलाई से सितंबर 2009 में अंतराष्ट्रिय क्रिकेट से संन्यास ले लेंगे।
सचिन के बारे में उनका आकलन था कि वे या तो अगस्त, 2009 से नवंबर, 2009 तक खेल से अलग हो जाएंगे नहीं तो विश्वकप के दौरान जनवरी से मार्च, 2011 में वे क्रिकेट को अलविदा कह देंगे।

शनिवार, 2 जुलाई 2011

एक मकबरा जिसकी नक़ल पर "ताजमहल" बना है.


हिंदुस्तान में मुगलों का वह प्रारंभिक दौर था। बाबर के बाद हुमायुं ने शासन की बागडोर संभाली तो थी पर शेरशाह से हार कर उसे भागते-छुपते रहना पड़ रहा था। तमाम मुश्किलातों को झेलने, दर-दर की ठोकरें खाने के बाद फिर उस पर एक बार
किस्मत मुस्कुराई और सन 1555 में वह फिर एक बार बादशाह बना पर सिर्फ साल भर के लिए। 1556 में एक दुर्घटना में उसकी मौत हो गयी। उसकी पत्नी हाजी बेगम ने नौ साल बाद 1565 में उसका मकबरा बनवाना शुरु किया। इसका सारा खाका फारस के मशहूर वास्तुकार तथा भवन निर्माता 'मिरक मिर्जा गियात' द्वारा तैयार किया गया था।


उस समय मुगलों के खजाने की माली हालत उतनी सुदृढ नहीं थी सो किफायत को मद्देनजर रख इसका निर्माण लाल बलुआ पत्थरों से करवाया गया जिन्हें आगरा के पास के तंतपुर नामक स्थान से लाया जाता था। वैसे सुंदरता को बनाए रखने के लिए सफेद और काले संगमरमर का भी कुछ मात्रा में प्रयोग किया गया है जो राजस्थान के मकराना से आता था। इसकी बनावट फारसी वास्तुकला से प्रेरित है। यह दुमंजिला चौकोर ४२.5 मीटर ऊंचा मकबरा एक सुंदर बगीचे के बीच ऊंचे चबु
तरे पर बना हुआ है। पूरे बगीचे को पानी की नालियों द्वारा फूलों से सजे चार सुंदर भागों में बांटा गया है। इसके अष्टभुजाकार मध्य कक्ष में स्मारक कब्र है। उसी के नीचे असली कब्र है जहां हिंदुस्तान का शहंशाह वर्षों से सोया हुआ है। इस मकबरे की सबसे बड़ी खासियत इसका दुहरा गुम्बद है। जिसके चारों ओर स्तंभयुक्त छतरियां बनी हुई हैं। यद्यपि सिकंदर लोदी का मकबरा पहला ऐसा था जो किसी बगीचे के बीच बनाया गया हो पर हुमायुं के मकबरे से यह प
रंपरा चलन में आयी जिसका सबसे विशिष्ट उदाहरण ताजमहल है। जो पूर्णतया हुमायुं के मकबरे की तर्ज पर बनाया गया है। जो आज दुनिया भर में मशहूर तथा एक तरह से भारत की पहचान बन गया है। इन दोनों मकबरों में एक और समानता है। दोनों ही प्रेम में समर्पण की अमर निशानियां हैं। जहां हुमायुं के मकबरे को, उसके प्रति पूर्ण रूप प्रति पूर्ण रूप से समर्पित उसकी बेगम ने पैसों की कमी के बावजूद, पूरा करवाया। वहीं अपनी बेगम की याद को अमर करने के लिए शाहजहां ने ताजमहल के रूप में अपने प्रेम को मूर्त रूप दिया।


हुमायुं का मकबरा दिल्ली में निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास मथुरा रोड़ और लोदी रोड़ के चौराहे के नजदीक स्थित है। इसके अंदर जाने के लिए दो ऊंचे प्रवेश द्वार हैं जो इसकी दक्षिण और पश्चिम दिशा में स्थित हैं। वैसे आजकल पश्चिम वाला द्वार ही काम में लाया जाता है। इसके निर्माण में उस जमाने में पन्द्रह लाख रुपये का खर्च आया था।
अभी तक इस खूबसूरत स्मारक का प्रचार उतना नहीं हो पाया था। इसकी तकदीर भी हुमायुं की तरह ही रही थी।
कुछ उपेक्षित, कुछ अनजानी। यहां तक की अधिकांश दिल्ली निवासी भी इसके दीदार को नहीं आते थे। इसकी किस्मत ने अभी पिछले दिनों तब पलटा खाया जब अमेरिका के राष्ट्पति ओबामा ने अपनी भारत यात्रा पर अपना कुछ समय यहां बिताया (साथ के विडीयो में उनकी झलक देखी जा सकती है ) . उसके बाद रातों-रात इसकी ख्याति देश-विदेश में ऐसी फैली कि अब यहां लोगों का तांता लगा रहता है।


अभी इसकी सारी देख-रेख श्री राकेश झींगन जी के कुशल निर्देशन में है। उन्हीं की मेहनत और अपने काम के प्रति समर्पण का नतीजा है कि इसके सुंदर बगीचों के रख-रखाव के कारण यह स्मारक एकाधिक बार सर्वश्रेष्ठता का पुरस्कार प्राप्त कर चुका है।
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