मंगलवार, 31 मई 2011

पंजाब यात्रा के दौरान लिए गए कुछ चित्र


वाघा बार्डर

हरमंदिर साहब परिसर में जूते रखने का विशाल स्थान
सरोवर में क्रीडा करती भाग्यशाली मछलियाँ

सरोवर का एक विहंगम दृश्य

हरमंदिर साहब
वह एकमात्र बाहर जाने की संकरी गली जिसे घेर कर डायर ने गोलियां चलवाई थीं.
जलियाँवाला स्मारक
वह कुआं जिसमे गोलियों से बचने के लिए लोग कूद गए
दुर्ग्याना मंदिर का मुख्य द्वार दुर्ग्याना मंदिर, बिलकुल हरमंदर साहब का प्रतिरूप।


सोमवार, 30 मई 2011

यात्रा अमृतसर की। समय था कंजूस के धन की तरह।

जालंधर तक आना हो और बहुत ही मजबूरी ना हो तो शायद ही कोई अमृतसर जाए बिना लौटना चाहेगा। समय कम था फिर भी बिना वहां गये वापस नहीं आना चाहते थे सब। पता नहीं फिर कभी और कब आना होता है। इसीलिए शादी की थकान को तीन-चार घंटे की नींद से कुछ कम कर हम करीब एक बजे अमृतसर के लिए रवाना हो गये।

तीन बजे गाड़ी स्टैंड़ में खड़ी की। गर्मी बहुत थी। छुट्टियों के समय के कारण भीड़ भी उतनी ही थी। देश के हर इलाके के लोग वहां पहुंचे हुए थे। जिनमें बंगाली, मराठी, यू।पी या बिहार वालों को तुरंत पहचान लिया था। गर्मी से सभी त्रस्त थे पर उत्साह की किसी में भी कमी नहीं थी।

सबसे पहले 'जलियां वाला बाग' गये, अनाम शहीदों को याद कर श्रद्धाजंली दी। कैसा होगा वह काला दिन जब निहत्थे, निर्दोष शांति के साथ बैठे लोगों पर गोलियां बरसी होंगी। कहीं छुपने की जगह नहीं। कहीं निकलने का रास्ता नही। जंगली जानवर भी जनरल डायर से कम वहशी होंगे। शहीदों को नमन कर भारी मन से बाहर आ हरमंदिर साहब का रुख किया। दोपहर बाद का समय फिर भी लोगों के ठट्ठ के ठट्ठ, बेशुमार भीड़। मंदिर परिसर में जूते रखने का इतना विशाल स्थान मैंने आज तक और कहीं नहीं देखा था। पर सब कुछ व्यवस्थित कोई अफरा-तफरी नहीं। भीड़ के बावजूद समर्पित कार्यकर्ता बिना किसी को ज्यादा इंतजार करवाए अपने काम को अंजाम दे रहे थे। पवित्र सरोवर से आचमन करते समय देखा कि पानी में रंग-बिरंगी बड़ी-बड़ी मछलियां ऐसे मजे से तैर रही थीं जैसे प्रभू के आशिर्वाद से वे सब जीवन-मरण के दुखों से मुक्त हो गयीं हों। उधर दर्शनों के लिए पता नहीं हजार लोग लाईन में खड़े थे कि दो हजार। कम से कम ढाई-तीन घंटे का समय अंदर जाने में लगना मामूली बात थी। सो मंदिर की परिक्रमा की। एक जगह बैठ कर शांत मन से प्रार्थना की दर्शन ना कर पाने के लिए क्षमा मांगी और सिर नवा कर बाहर आ गये। चार बज रहे थे वहां से सीधे 'दुर्गयाना मंदिर' गये। इस 86 साल पुराने मंदिर की बनावट पूरी तौर से हरमंदिर साहब जैसी ही है। वैसे ही विशाल सरोवर में स्वर्ण जड़ित कलश के साथ यह वैसा ही आभास देता है। मंदिर के पट ठीक चार बजे खुलते हैं अपेक्षाकृत यहां भीड़ कम थी। बिना किसी हड़बड़ी के दर्शन किए। वहीं के 'गार्ड़' ने पास ही 700 साल पुराने मां और बड़े हनुमान जी के मंदिर तक जाने की सलाह दी। वहां भी हाजिरी लगा पुजारीजी से आशिर्वाद ले, मंदिरों की भव्यता को आंखों में संजोए स्टैंड की ओर चल पड़े।

समय को हम कंजूस के धन की तरह इस्तेमाल कर रहे थे। वर्षों से अमृतसर के कुलचो-छोलों, कुल्फियों तथा "केसर के ढाबे" का नाम सुन रखा था पर जब मौका आया तो सब "इल्ले"। फिर भी दौड़ते-भागते किसी तरह कुल्फियों का मजा तो ले ही लिया गया। बाकि सबेरे किए गये कलेवे ने दिन भर आसरा दिए रखा।
हमारी आगे की मंजिल थी भारत-पाक सीमा, वाघा बार्ड़र। इस बार्ड़र को एशिया की "वाल आफ बर्लिन" कहा जाता है। यह जी।टी। रोड़ पर अमृतसर और लाहौर शहरों के बीच स्थित है, तथा दोनों देशों को सड़क मार्ग से जोड़ने वाला अकेला बार्ड़र है। जिससे दोनों देशों के बीच जरूरत के सामानों का आवागमन होता है। रोज शाम को अपने-अपने देशों के झंडे उतारते समय उनके सम्मानार्थ दोनों देश परेड़ का आयोजन करते हैं। जिसे देखने दूर-दूर से लोग उमड़े चले आते हैं। यहं किसी भी तरह के सामान को ले जाने की इजाजत नहीं है इसीलिए बिना किसी बैग, बोतल के ही आगे जाना होता था। कैमरा ले जाने की इजाजत थी पर हड़बड़ी में उसे हम गाड़ी में ही छोड़ आए। भीड़ इतनी कि एक दूसरे का हाथ पकड़े रहने के बावजूद साथ रहना चलना मुश्किल लग रहा था। घुड़सवार जवान लोगों को नियंत्रित करने में अपना पसीना बहा रहे थे। स्त्री-पुरुषों की अलग-अलग तलाशी के बाद ही आगे बढने की इजाजत थी, जिसमें अच्छी खासी देर लग रही थी। धक्का-मुक्की अपने पूरे शवाब पर थी। किसी तरह बढते-बढाते जब गंतव्य तक पहुंचे तो पाया कि कुछ भी कर लें इस मानव सागर को पार कर परेड़ देख पाना बिल्कुल असंभव है। तो यही तय पाया गया कि इसके पहले इस जन-सागर का ज्वार उल्टा शुरु हो उसके पहले ही हम वापस हो लेते है। सो देश भक्ती के गीतों को सुनते हुए खरामा-खरामा हम अपना इंतजार करती प्यारी सी "वैगन-आर" में आ बैठे जो हमें फिर वापसी के रास्ते पर ले उड़ी।

एक बात का जिक्र करना बहुत जरूरी है। यदि आप वाघा जाएं तो गाड़ी खड़ी करते समय ही पानी वगैरह जरूर पी लें। वहां तरह-तरह की बातें बना पानी की बोतलें बेचते लड़कों से पानी ना खरीदें। कुछ दूर चलते ही आपको वे बोतलें फेंक देनी पड़ेंगीं क्योंकि आगे अपने साथ कुछ भी ले जाना सख्त मना है। यह सब जानते हुए भी आपको पानी की बोतल थमाई जाती है सिर्फ कुछ पैसों के लालच में।
यह तो तय है कि हम सुधरेंगे नहीं चाहे कोई भी जगह हो या कैसा भी समय हो।

जय हिंद।



जालंधर जय

शनिवार, 28 मई 2011

शरीक होना पंजाब के एक सुदूर गांव की शादी मे। एक यात्रा विवरण।


मे महीने की तपती गर्मी. इस महीने की 22 तारीख को होने वाली एक शादी में शिरकत करने पंजाब जाना बहुत जरुरी था। कहने को तो मेरे मौसेरे भाई की कन्या की शादी थी पर वह मेरी बेटी के समान ही है। मौसीजी का स्नेह इतना ज्यादा रहा है हमारे साथ कि कभी लगा ही नहीं कि हमारे दो अलग परिवार हैं। इसीलिए मेरी माताजी, जिनकी उम्र 80 को छू रही है अपने को वहां जाने से नहीं रोक पाईं। हालांकि दोनों रिहाईशों में 2000 कीमी का फासला है। वैसे तो मेरे भाई जीवनजी परिवार समेत कुल्लू मे रहते हैं पर लड़के वालों के कहने पर शादी जालंधर जिले के जमशेर कस्बे के पास एक गांव चननपुर, जो शहर से करीब 25-26 कीमी दूर है, के पुश्तैनी घर में होनी थी और "विवाह उपरांत भोज" हिमाचल के कुल्लू इलाके में।

महीनों से मुझे दसेक दिन पहले आने को कहा जा रहा था पर मौका आने पर एक दिन पहले ही चलना हो पाया। फिर भी छोटे भाई प्रशांत को परिवार समेत पहले ही भेज दिया था। जिसने बखूबी वहां सब का हाथ बटाया। उस परिवार मे इस पीढी की यह पहली शादी थी। इसलिए शिरकत बहुत जरूरी थी।

तो 21 की शाम चार बजे के आस-पास निकलना संभव हुआ जो कुछ देर से ही कहा जाएगा। इसी देरी के निवारण हेतु दिल्ली से बाहर निकलते ही गाडी की गति 100-120 के आस-पास बनी रहने लगी। इधर राजधानी की सीमा खत्म हुई कि एक बोर्ड दिखलाई पड़ा जिस पर लिखा था ‘हरियाणा पुलिस द्वारा आपका स्वागत है।' इसका प्रमाण भी कुछ ही आगे जाने पर मिल गया जब पानीपत के ‘उड़न पुल’ पर गाड़ी को रोकने का इशारा हुआ। बड़ी नम्रता से गाड़ी की रफ्तार 90 के उपर होना बताया गया, जोकि सरकार द्वारा निर्धारित गति सीमा है। प्रेम पूर्वक 400/- का चूना लगा मीठी भाषा में विदाई दी गयी। गलती थी तो भुगतना तो था ही।

खैर आगे बढे पर अब सरकारों की सरकार के तीखे तेवरों का सामना करने की बारी थी। जो मौसम के तेवरों से साफ पता चल रही थी। अंबाला पहुंचते-पहुंचते जो बारिश शुरु हुई, अपने साथियों आंधी और तूफान के साथ, तो गाड़ी का आगे बढना मुश्किल हो गया। गति बमुश्किल बीस के आस-पास सिमट कर रह गयी। पंजाब से लगातार फोन आ रहे थे "Whereabouts" के। घर पर सभी ऐसे मौसम के कारण चिंताग्रस्त थे। उधर जालंधर के ‘रामा मँड़ी’ चौक पर दो जने तैनात थे, मेन रोड़ छोड़, हमें आगे ले जाने के लिए। पर लगातार बढते इंतजार के चलते वे भी उस भीषण रात में परेशान हो रहे थे। पर कोई चारा भी नहीं था क्योंकि यह भाई पहली बार उधर आ रहा था तथा जिसका इस अंजान रास्ते, अंधेरी रात, सुनसान सड़क से घर तक पहुंचना बिल्कुल नामुमकिन था। किसी तरह संभलते-संभालते, साथ रखे राशन से गुजारा करते करीब रात के पौने एक बजे रामा मंड़ी चौक पहुंचे तो दसियों लोगों ने ठंड़ी सांस ली। वहां से भी घर तक पहुंचने में करीब आधा घंटा और लग गया। घर पहुंचने पर पता चला कि अंधड़-पानी के गैर जिम्मेदराना रवैये से नाखुश हो बिजली रानी रूठ कर चली गयी हैं। मोमबत्तियों की रोशनी में ही पैरों का छूना, छुआना, गले मिलना सब निपटा। उसी “कैंडल लाइट” में पेट में कुछ हल्का-फुल्का डालते, बिस्तर तक जाते-जाते तीन तो बज ही गये थे।

रविवार का दिन खुशनुमा था। मान-मन्नौवल के बाद बिजली रानी भी करीब नौ बजे के आस-पास लौट आईं थीं। कुछ बच्चे तो पहली बार खेत और टयूब-वेल देख अपने को नहीं रोक पाए और वहीं नहाने का स्वर्गिक आनंद ले कर ही माने। वर्षों बाद बहुत से लोगों से मिलना हुआ था। मिलते-मिलाते, खाते-पीते, गपियाते कब शाम हो गयी पता ही नहीं चला। वैसे इस जगह पहली बार आना हुआ था पर वहां के लोगों के भाईचारे, आत्मीयता, स्नेह देख एक क्षण को भी ऐसा नहीं लगा कि किसी अनजान जगह में अपरिचित लोगों के बीच हैं। पता ही नहीं चलता था कि शादी वाला मकान कौन सा है। क्योंकि आस-पास के आठ-दस घरों में बाहर से आए लोगों की ठहरने की व्यवस्था थी, तो कोई कहीं भी बैठ रहा है, कहीं बतिया रहा है, कहीं भी आ-जा रहा है, सब “ऐट होम” जैसा। कोई अफरा-तफरी नहीं, कोई अव्यवस्था नहीं, किसी को कोई परेशानी नहीं। ऐसा लगता था जैसे बहुत ही कुशल हाथों में सारा प्रबंधन हो। बहुत से लोग ऐसे थे जो पहली बार शहर से बाहर आए थे वे इस ठेठ गांव का ठाठ देख कर विस्मित थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था ऐसी सुविधाओं के वहां होने का। जो अच्छे खासे शहरों को मात दे रही थीं। वहां का “मनीला पैलेस”, जहां शादी के सारे कार्यक्रम होने थे, सारी सुविधाओं से सुसज्जित था। साफ-सुथरे कमरे, करीने से कटी घास वाला लान, अत्याधुनिक टायलेट्स, सुंदर तरीके से सजे स्टाल जहां ट्रेंड़ बेयरे बड़े सलीके से अपने काम को अंजाम दे रहे थे। शहर से दूर शांत वातावरण में हल्के मधुर संगीत ने माहौल को खुशगवार बनाए रखा था। हां ध्वनीरोधक हाल में जरूर तेज, शोर भरा "डी.जे." अपना जलवा बिखेर रहा था, पर उसकी आवाज बाहर नहीं आ रही थी।

सबसे बड़ी बात खाने की हर चीज लजीज और सुस्वादु थी। सब कुछ था पर मेरे मन में एक कसक भी जगह बनाए जा रही थी। साफ दिख रहा था कि गांव के भोलेपन पर शहर अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ हावी होते जा रहा है। सुदूर गांवों की ओर भी उसके निर्मम कदमों की बढती चापें सुनाई देने लग गयी हैं। इस पर तो अब किसी का वश भी नहीं रहा। वहां के रहने वाले भी शहर की चकाचौंध से अभीभूत हैं। वे सब भी शहरी जिंदगी जीना चाहते हैं। वैसे यह भी तो कोई बात नहीं हुई ना कि हम तो शहर छोड़ना ना चाहें और गांव में रहने वालों को “म्यूजियम” की तरह रखना चाहें जिससे हमारे बच्चे गांव क्या होता है इसकी जानकारी लेते रह सकें। समय के साथ-साथ बदलाव तो होना ही है।

खैर प्रभू की दया से बिना किसी अड़चन के सारे शुभ कार्य पूर्ण हो गये। मुंह-अंधेरे बिटिया की विदाई भी हो गयी उसके नये घर, परिवार के लिए जहां से उसके जीवन की एक नयी शुरुआत होनी है।

अब कोई जालंधर तक आ कर अमृतसर ना जाए यह तो हो ही नहीं सकता जब तक कि कोई मजबूरी ही ना हो। सो हम भी एक नींद ले तरोताजा होने के लिए बिस्तर पर जा गिरे जिससे दोपहर में हरमंदिर साहब के दर्शनों के लिए अपनी यात्रा को आगे बढा सकें।







































गुरुवार, 26 मई 2011

इस आग पर रोटियां नहीं सिकतीं !!!

मे के लम्बे दिनों का महीना साक्षी रहा दसियो घरों में छाने वाले अंधेरे का। इस महीने भर में माओवादियों से हुई झड़पों में छत्तीसगढ और उससे लगे आस-पास के इलाकों में पचास से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गवांई।
अब मीड़िया में भी एक-दो मौतों का जिक्र उपेक्षित ही रहता है। एक साथ हुई बीस-पच्चीस शहादतें ही कुछ हलचल पैदा कर पाती हैं। वे भी देश के प्रमुख दैंनिकों के मुख्य पृष्ठों पर कभी-कभार ही जगह बना पाती हैं।

तथाकथित मानवाधिकार के स्वयंभू पैरोकार भी पुलिस या सेना के जवानों की मौत पर नजर नहीं आते ना ही उनकी ओर से कोई बयान जारी किया जाता है। उनकी रोटियां तो सिकती हैं उग्रवादियों के हताहत होने पर। तब फोटो खिंचवाई जाती हैं, हवाई उड़ाने भरी जाती हैं, बयान जारी किए जाते हैं। देश भर की खबरों में छाने का कोई मौका हाथ से तो क्या आस-पास से भी गुजरने नहीं दिया जाता।

सवाल यह उठता है कि ये जवान या पुलिस वाले क्या इंसान नहीं होते? क्या इनका परिवार नहीं होता? क्या इनके बूढे लाचार माँ-बाप को उनकी उम्र के इस पड़ाव पर देख-रेख या भरण-पोषण की आवश्यकता नहीं होती? क्या इनके बच्चों को अपने पिता के प्यार, स्नेह की जरूरत नहीं होती? क्या इनकी पत्नियों के शरीर में दिल नहीं होता? क्या इनकी कोई जाति दुश्मनी होती है उग्रवादियों से? क्या अपना फर्ज निभाना कोई गुनाह है? यदि जवाब नहीं है तो क्यों नहीं अग्निवेशों, अरुंधतियों की हमदर्दी इनके साथ भी होती? क्यों ऐसे मौकों पर उनकी इंसानियत, मानवता की दुहाई दोमुंही हो जाती है?

पता नहीं कैसे उनका दिल गवारा करता है इंसान-इंसान में फर्क करने का। ऐसे लोग अपनी टुच्ची राजनीति के तहत कौन सी मानवता का भला करते हैं? किसका हित साधते हैं? कैसा फर्ज पूरा करते हैं? कभी-कभी तो लगता है कि ये सब कठपुतलियां हैं जिनकी ड़ोर किसी और के हाथों में है। जो भी हो रहा है वह सब सोची समझी साजिश के तहत हो रहा है। अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए, विरोधियों को नीचा दिखाने या हटाने के लिए घिनौना रक्तरंजित आयोजन किया जा रहा है, बिना इस अंजाम को जाने कि ऐसी हरकतों से ही भस्मासुरों का जन्म होता है जिससे खुद को बचा पाना भी दूभर हो जाता है।

शुक्रवार, 20 मई 2011

क्या भगवा रंग शापित है बदनाम होने के लिए ?

फिर शर्मसार हुई इंसानियत, फिर धज्जियां उड़ीं विश्वास की, फिर आस्था पर से आस्था उठने लगी लोगों की। अभी कुछ ही दिन पहले एक ढोंगी बाबा ने अपने पहचान वालों की इज्जत सरे राह नीलाम कर दी थी। फिर एक पाखंडी गुरु ने ऐसे ही एक परिवार का सदस्य बन कर उस परिवार की अपनी बेटी के समान कन्या को भी नहीं बख्शा।

बार-बार अपनी आड़ में ऐसे कुकर्मो का साक्षी बन भगवा रंग खुद कलंकित होता जा रहा है। इस रंग की शुद्धता, पवित्रता सब शंका के दायरे में आ चुकी है। पाखंडियों ने लोगों की आस्था, विश्वास तथा धार्मिक भावनाओं को अपनी हवस को पूरा करने का जरिया बना ड़ाला है। धीरे-धीरे 'नेता' की तरह ही 'भगवाधारी' भी एक गाली का रूप अख्तियार करने लगा है। उसके प्रति भी लोगों के मन में शंका घर बनाने लगी है। लोग सच्चे महात्माओं पर भी विश्वास खोने लगे हैं। फिर भी आज आम इंसान अपने जीवन की विड़ंबनाओं से इतना त्रस्त है कि उसे अच्छे बुरे की पहचान ही नहीं रह गयी है। रोजमर्रा के कष्ट, अनिश्चित भविष्य, पूरी ना होती जरुरतों से परेशान वह किसी चमत्कार की आशा में इन पाखंडियों की चमक-दमक से भरी दुकानों पर जा खड़ा होता है। जहां शुरु हो जाता है उसका भावनात्मक शोषण। वहां ढोंगी, जालसाज, पाखंडी बाबा के वाग्जाल, सड़क छाप टोटकों, वहां के चेले-चमाटियों द्वारा गढी झूठी छवि, रहस्यात्मक वातावरण का मकड़जाल उस भोले-भाले इंसान को अपनी गिरफ्त में ऐसा फंसा लेता है कि उसे तभी होश आता है जब वह पूरी तरह से लुट-पिट चुका होता है।

आज सख्त जरूरत है शिक्षा की, जागरुकता की, लोगों को ऐसे धोखेबाजों के जाल में फसने से पहले चेताने की। उन्हें समझाने की कि भगवान से बड़ा कोई नहीं है और यदि ऐसा कोई भी कहता है तो वह विश्वास के लायक नहीं है। जब प्रभू की ईच्छा के बगैर एक पत्ता तक नहीं हिल सकता तो यह आबा-बाबा क्या कर लेगा। कोशिश शुरु हो चुकी है भले ही छोटे पैमाने मे है। जरूरत है सभी को आगे आने की उसके पहले कि यह घाव नासूर बन जाए।



बुधवार, 18 मई 2011

पर उपदेश कुशल बहुतेरे :-) :-(

गर्मी का जलवा अपने पूरे शवाब पर है। इसके साथ ही हर अखबार और पत्रिका हमारे स्वास्थ्य को लेकर वैसे ही चिंतित हैं जैसे कभी 'काजी जी परेशान रहते थे शहर के अंदेशे को लेकर'। हर किसी में होड़ लगी है हमें तंदुरुस्त बनाए रखने की। एक तरह-तरह के सुझाव देता है, भिन्न-भिन्न तरह की नसीहतें पेश करता है तो दूसरा भांति-भांति की हिदायतें ले हाजिर हो जाता है। भले ही खुद उस पर कभी भी अमल न किया हो.

बानगी देखिए :-


:-) सुबह सबेरे उठना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। जागिंग नहीं तो वागिंग जरूर करें। गहरी साँसे लें।


:-( आजकल पूरा वायुमंडल प्रदुषित है। सुबह-सुबह थोड़ा कम रहता है जिसकी कसर सड़क साफ करने वाला दस्ता कर देता है। भूल कर भी गहरी सांस लेने से बचें।



:-) पानी अमृत जैसा है इसका भरपूर उपयोग करें। कम से कम १०-१५ गिलास पानी पीने से शरीर के दूषित पदार्थ बाहर निकल जाते हैं।


:-( ज्यादा पानी पीना ठीक नहीं होता, इससे शरीर के लिए आवश्यक लवणों के बाहर निकलने से नुक्सान होता है ।



:-) सुबह का नाश्ता भारी हो, दोपहर का भोजन हल्का तथा रात को अल्पाहार लेना चाहिए। एक साथ न खा कर दिन भर थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुछ न कुछ खाते रहना चाहिए।


:-( बार-बार खाना ठीक नहीं होता। इससे मुंह की पाचन में सहायक लार में कमी आ जाती है और पेट पर भी अनावश्यक दवाब बना रहता है। हफ्ते में एक या दो दिन का उपवास जरूर करें।



:-) दूध जरूर पीएं। इससे शरीर को कैल्शियम मिलता है जिससे हड्डियां मजबूत बनी रहती हैं।


:-( दूध हमारे शरीर के लिए उपयोगी नहीं होता। बल्कि यह कई बीमारियों को निमंत्रण देता है।


:-) कच्ची सब्जियों और फलों का भरपूर सेवन करें। इनके रेशों से पाचन शक्ति को बढ़ावा मिलता है.


:-( आजकल इतने कीटनाशक और दवाईयां पौधों में डाली जाती हैं कि वे फलों इत्यादि की ऊपरी सतह पर ही नहीं उनके अन्दर तक जगह बना लेती हैं। सो इनका प्रयोग सोच-समझ कर ही करना चाहिए।



:-) गर्मियों में तरबूज प्रकृति का दिया वरदान है। इसको वैसे ही या इसका रस निकाल कर दिन में दो बार पीने से गर्मी कोसों दूर रहती है।


:-( आजकल तरबूज खाना मौत को दावत देना है। इसके लाल रंग और मिठास को बनाए रखने के लिए इसमें खतरनाक केमिकल्स के इंजेक्शन लगा अपने थोड़े से फायदे के लिए इसे जहरीला बना आपकी सेहत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसे खाने से बचें।


इत्यादि-इत्यादि।


तो सारा लब्बो-लुआब यह है कि जैसे यात्रा के दौरान कहीं-कहीं लिखा होता है कि यात्री आपने सामान की हिफाजत खुद करें। ठीक वैसे ही आपने शरीर रूपी सामान की रक्षा भी हमें अपनी सोच-समझ से ही करनी है नाकि इन मुफ्त की समझाईशों से।





तो लब्बो-लुआब यह है कि जैसे यात्रा के दौरान कहीं - कहीं लिखा रहता है कि यात्री अपने सामान की हिफाजत खुद करें। ठीक वैसे ही अपने शरीर रूपी सामान की हिफाजत भी हमें अपनी सोच-समझ से ही करनी है नाकि इन मुफ्त की समझाईशों से।



















बुधवार, 11 मई 2011

लालफीताशाही से तंग आए एक आम आदमी का खतरनाक कदम

अभी कुछ दिनों पहले छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में एक “हादसा” हुआ। हादसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकी ऐसा पहली बार हुआ है कि एक आम आदमी ने लालफीताशाही से तंग आ कर ऐसा खतरनाक रवैया अपनाया हो। एक कमजोर बुजुर्ग इंसान द्वारा उठाया गया ऐसा कदम आने वाले अराजक समय का “ट्रेलर” भी हो सकता है।

हुआ यूं कि सेवानिवृत सब-इंजीनियर लोकेंद्र सिंह, जो 30 सितम्बर 2007 को रिटायर हो चुके थे, उन्हें चार साल से पेंशन के लिए भटकाया जा रहा था। इस दफ्तर से उस दफ्तर, उस टेबल से इस टेबल तक चक्कर काटते-काटते वह वृद्ध पुरुष परेशान हो चुका था। रायपुर से मीलों दूर बालाघाट में रहने वाले लोकेन्द्र सिंह इस उम्र में बार-बार इतनी दूर से आ हर बार नाउम्मीद होने, जीविकोपार्जन का कोई और साधन ना होने के बावजूद चार साल तक हाथ-पैर जोड़ने के बाद एक दिन अपना आपा खोकर चाकू से संबंधित अधिकारी पर हताशा में हमला कर बैठे। सोचने की बात है कि ऐसा आत्मघाती कदम उठाने वाले की मनोदशा कैसी कर दी गयी होगी पैसे के भूखे निर्मम बाबुओं के द्वारा। जबकि आमतौर पर सरकारी कर्मचारी के रिटायर होने के अंतिम साल में ही सारी कार्यवाही पूरी कर सेवा-निवृत होते ही अगले महीने से ही उसे पेंशन मिलनी शुरु हो जाती है।

हमले के बाद लोकेंद्र को तो थाने ले जाया जाना ही था। पर कलेक्टर महोदय ने इस सारे प्रसंग को गम्भीरता से लेते हुए जब पूरी छानबीन करवाई तो सारे संबंधित कार्यालयों की गल्तियां सामने आईं। यह बात भी पता चली कि इस दुधारू जगह में येन-केन-प्रकारेण सालों से पुराने कर्मचारी जमे बैठे हैं और पेंशन जारी करवाने के लिए मुवावजा लेकर अपना भविष्य सुधारते जा रहे हैं। सेवानिवृत होने वाला चाहे उनका पुराना साथी ही क्यों ना हो उन्हें सिर्फ माया से मतलब होता है।

कुछ महीनों पहले मैंने एक पोस्ट ड़ाली थी कि "सुधर जाओ नहीं तो जनता सुधार देगी।" भगवान ना करे कि वैसा समय आए जब हर कोई कानून अपने हाथ में लेने को मजबूर हो जाए। पर सोच कर देखिए कि कौन आपा ना खो बैठेगा जब उसके सामने ये तथाकथित जनता के नौकर घूस ले-ले कर हजारों नोट रोज अपने घर ले जाते दिखें पर एक इमानदार आम आदमी अपने दो समय की रोटी के लिए हताशा-निराशा से गुजरता रहे। मंत्री-संत्री तो अपना वेतन बढवाने के लिए बेशर्मी से एकजुट हो जाएं और मंहगाई की मार को झेलने के लिए बची रहे निरीह जनता। नेता-अभिनेता तो शादी-ब्याह जैसे उत्सवों पर एक रात में करोड़ों फूंक डालें और एक मध्यम वर्गीय अपने बच्चों को एक जोड़ी कपड़े ना दिला पाने के लिए झूठ का सहारा लेता रहे। एक खेल पर तो सरकार अरबों लुटाने को तैयार दिखे पर गरीब जनता की तकदीर सवांरने को उसकी झोली सदा खाली रहे। मालदार लक्ष्मी-पुत्रों के परिवार के हर सदस्य को हवा में अठखेलियां करने का शगल हो और धरती पुत्रों को चलने के लिए जमीन ना मिले तो अंजाम ??????????????

सोमवार, 9 मई 2011

काम पर आने के पहले ध्यान और दिमाग घर पर क्यों छोड़ आए मेरे भाई

इन्हें देखिए और बताइये कि जब यह सब बन रहा था तो बनाने वाले का ध्यान कहां था :-)








शनिवार, 7 मई 2011

भगत सिंह की बेबे।

भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव ने हर्ष ध्वनी के साथ अपनी फांसी की सजा सुनी थी।
अंग्रेज भी इनकी दिलेरी पर आश्चर्यचकित थे।

फांसी का दिन आ पहुंचा था। नियमानुसार जेलर ने भगतसिंह से उनकी अंतिम इच्छा जाननी चाही तो भगतसिंह ने कहा कि मैं अपनी बेबे के हाथ की रोटियां खाना चाहता हूं। पहले तो जेलर ने समझा कि भगत अपनी मां के हाथ की रोटी खाना चाहते हैं। पर भगतसिंह ने स्पष्ट किया कि वे जेल में कैदियों की गंदगी उठाने वाली भंगी महिला के हाथ का भोजन करना चाहते हैं । जेलर हैरान , उसने पूछा कि आप उस भंगी महिला को बेबे क्यों कहते हैं? तब भगत ने जवाब दिया कि मेरी जिंदगी में दो ही महिलाओं ने मेरी गंदगी साफ की है। छुटपन में मेरी माँ ने और अब इस महिला ने। इसीलिए मैं इन दोनो को ही अपनी बेबे कहता और मानता हूं।

जब जेल की उस महिला को भगतसिंह की इस बात का पता चला तो उसकी आंखों से अविरल अश्रु-धारा बह चली। इतना बड़ा सम्मान आज तक उसे किसी ने भी तो नहीं दिया था। उसने बड़े प्यार से रोटियां बनाईं और उतने ही प्रेम से भगतसिंह ने उन्हें खाया।

भगतसिंह देश की आजादी के साथ-साथ यहां फैली ऊंच-नीच की दिवार को भी गिरा देना चाहते थे। उनका कहना था कि समाज के ढांचे को बदले बिना मनुष्य-मनुष्य के बीच की असमानता को दूर नहीं किया जा सकता।

आज अपनी कुर्सी को बचा अपना उल्लू सीधा करने वाले तथाकथित नेताओं को इन सब प्रसंगों का पता भी नहीं होगा और होगा भी तो ??????????????????????

शुक्रवार, 6 मई 2011

अत्यंत दुखद खबर, श्रीमती पी. एन. सुब्रमनियन जी का स्वर्गवास हो गया है

अत्यंत दुख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि Paliakara और Mallar जैसे लोकप्रिय ब्लाग के श्री पी. एन. सुब्रमनियन जी की श्रीमतिजी का पिछली फरवरी में स्वर्गवास हो गया है।

बहुत दिनों से श्री सुब्रमनियनजी को नेट पर अनुपस्थित पा मैंने जब उनसे ना आने का कारण पूछा तब इस दुखद खबर की जानकारी मिली।

इस कठिन समय में सारा ब्लाग परिवार उनके दुख में शामिल है। प्रभू से प्रार्थना है कि ऐसे समय में उन्हें शक्ति प्रदान करे।

उनका इ-मेल - paliakara@gmail.com है।

बुधवार, 4 मई 2011

विश्वास ही तो है।

भारत में महिलाओं का बिंदी लगाना एक बहुत ही आम बात है। विवाहित महिलाओं के लिए यह सुहाग की निशानी मानी जाती है। वैसे भी इसे लगाने से ललाट की शोभा बढ जाती है। अब तो एशिया के बहुत सारे देशों में इस छोटी सी टिकुली ने महिलाओं को मोह लिया है।

पश्चिमी अफरीका की बात है। वहां बहुत से भारतीय परिवार रहते हैं। वहां की महिलाएं भारतीय महिलाओं से अक्सर बिंदी के बारे में पूछती रहती हैं तो इनका जवाब रहता है कि अपने पति के लिए लगाती हैं।

वहां बहुपत्नीत्व का चलन है। इस कारण वहां की स्त्रियों में असुरक्षा की भावना बनी रहती है। ऐसी ही एक महिला ने अपनी भारतीय सहेली की देखा-देखी बिंदी लगानी शुरु कर दी। कुछ दिनों बाद उसने अपनी भारतीय सहेली को बताया कि जबसे बिंदी लगाई है तब से उसके पति ने अन्य महिलाओं में रुचि लेना छोड़ दिया है। मेरे पास ही रहता है पर मैं उसकी नशा करने की आदत नहीं छुड़वा पाई हूं।

अब इसे क्या कहेंगे, काश ऐसा होता तो यहां भारत में पारिवारिक कलह का ग्राफ भू-लुंठित ना हो गया होता ? खैर अगली खुश रहे।

क्यों क्या कहते हैं आप ?