बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

ये तो इंतिहा है, है कि नहीं ?

खुद ही को कर लिया इतना "बुलंद" कि अब खुदा भी पूछ रहा है कि, अबे! उतरोगे कैसे ?
आप कोई सहायता कर सकते हों तो जरूर करें।

6 टिप्‍पणियां:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

ये बकरियाँ भी ऐसी-ऐसी जगह चढ जाती है जहाँ हम कल्पना भी नहीं कर सकते है।

आशा जोगळेकर ने कहा…

वाह खुदा को भी पूछना पड गया । बहुत सुंदर मजेदार प्रस्तुति ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जहाँ दुनिया डरी,
वहाँ पहुँची बकरी।

रविकर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति |
हमारी बधाई स्वीकारें ||

neemnimbouri.blogspot.com

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति!

anshumala ने कहा…

क्या बक-री है !