शुक्रवार, 20 मई 2011

क्या भगवा रंग शापित है बदनाम होने के लिए ?

फिर शर्मसार हुई इंसानियत, फिर धज्जियां उड़ीं विश्वास की, फिर आस्था पर से आस्था उठने लगी लोगों की। अभी कुछ ही दिन पहले एक ढोंगी बाबा ने अपने पहचान वालों की इज्जत सरे राह नीलाम कर दी थी। फिर एक पाखंडी गुरु ने ऐसे ही एक परिवार का सदस्य बन कर उस परिवार की अपनी बेटी के समान कन्या को भी नहीं बख्शा।

बार-बार अपनी आड़ में ऐसे कुकर्मो का साक्षी बन भगवा रंग खुद कलंकित होता जा रहा है। इस रंग की शुद्धता, पवित्रता सब शंका के दायरे में आ चुकी है। पाखंडियों ने लोगों की आस्था, विश्वास तथा धार्मिक भावनाओं को अपनी हवस को पूरा करने का जरिया बना ड़ाला है। धीरे-धीरे 'नेता' की तरह ही 'भगवाधारी' भी एक गाली का रूप अख्तियार करने लगा है। उसके प्रति भी लोगों के मन में शंका घर बनाने लगी है। लोग सच्चे महात्माओं पर भी विश्वास खोने लगे हैं। फिर भी आज आम इंसान अपने जीवन की विड़ंबनाओं से इतना त्रस्त है कि उसे अच्छे बुरे की पहचान ही नहीं रह गयी है। रोजमर्रा के कष्ट, अनिश्चित भविष्य, पूरी ना होती जरुरतों से परेशान वह किसी चमत्कार की आशा में इन पाखंडियों की चमक-दमक से भरी दुकानों पर जा खड़ा होता है। जहां शुरु हो जाता है उसका भावनात्मक शोषण। वहां ढोंगी, जालसाज, पाखंडी बाबा के वाग्जाल, सड़क छाप टोटकों, वहां के चेले-चमाटियों द्वारा गढी झूठी छवि, रहस्यात्मक वातावरण का मकड़जाल उस भोले-भाले इंसान को अपनी गिरफ्त में ऐसा फंसा लेता है कि उसे तभी होश आता है जब वह पूरी तरह से लुट-पिट चुका होता है।

आज सख्त जरूरत है शिक्षा की, जागरुकता की, लोगों को ऐसे धोखेबाजों के जाल में फसने से पहले चेताने की। उन्हें समझाने की कि भगवान से बड़ा कोई नहीं है और यदि ऐसा कोई भी कहता है तो वह विश्वास के लायक नहीं है। जब प्रभू की ईच्छा के बगैर एक पत्ता तक नहीं हिल सकता तो यह आबा-बाबा क्या कर लेगा। कोशिश शुरु हो चुकी है भले ही छोटे पैमाने मे है। जरूरत है सभी को आगे आने की उसके पहले कि यह घाव नासूर बन जाए।



5 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

ऐसे लोग किसी भी रंग में हो सकते हैं, और किसी भी रंग को बदरंग कर सकते हैं।

AlbelaKhatri.com ने कहा…

विश्वास और आस्था का क्रूर मजाक उड़ाया जा रहा है .............दुखद है

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

जिस तरह से खद्दर के वस्त्र पहन भर लेने से कोई व्यक्ति सच्चा-जनसेवी नहीं बन जाता है उसी तरह से साधुओं जैसा मेकअप कर लेने से व्यक्ति चरित्रवान नहीं बन जाता है। धर्म और राजनीति का रिस्ता चोली और दामन जैसा रहा है। धर्म और चरित्र दोनों की प्रकृति अलग-अलग है। यदि ध्रर्म व्यक्ति को चरित्रवान बनाता तो विभिन्न धर्मों में परस्पर संघर्ष न होते और न सांप्रदायिक इकाईयों के अलग-अलग धड़ों में परस्पर टकराव होते। कोई भी धर्म न ही अपने समस्त अनुयायियों के चारित्रिक शुद्धता का दावा कर सकता है।

संजीव ने कहा…

भगवा अब ग्‍लैमर का रूप अख्तियार कर लिया है, क्‍या कहें.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

गगन जी
'सफ़ेद पोश' के बाद 'भगवा पोश' ... अरे नहीं बदरंग नहीं होने देना इस रंग को. आप और हम इस केसरिया बाने की गाथाएँ आज की पीढी को सुनाएँ तो इस रंग से घटता मोह थम जाएगा.. वैसे जिसके मन कलुषता लिये हों उनपर किसी रंग का असर नहीं होता फिर भी रंग तो सभी बदनाम हो रहे हैं.... नील वर्ण के श्रीराम, कृष्ण और अब आपका नीलगगन ..... क्या मायावती के नीलिमामाय हो जाने से बदरंग कहलायेगा? .... नहीं ना!

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