गुरुवार, 11 जून 2015

देश के अहित में लिप्त लोगों की कार का दरवाजा खोलते समय उनके दिल पर क्या गुजरती होगी

ओसामा को तलाशने और मार गिराने में अमेरिका के सील कमांडो ने बिना किसी शारिरिक क्षति के अपने काम को निर्धारित समय में पूरा कर सारे संसार में अपनी धाक जमा दी। यह सब उस कठोर ट्रेनिंग के कारण संभव हो पाया था जिसे करने के दौरान करीब 80 प्रतिशत कैडेट बीच में ही मैदान छोड़ देते हैं। पर जो इसे पूरा कर लेते हैं वे इस्पात साबित होते हैं।

जिज्ञासा होना जरूरी है कि इनके मुकाबले हमारे कमांडो कहां ठहरते हैं। तो यह खुशी का विषय है कि हमारे ‘मरीन कमांडो’ जिन्हें मारकोस के नाम से जाना जाता है, किसी भी दृष्टि से सील से कम नहीं ठहरते हैं। उनकी ट्रेनिंग भी सील जितनी ही कठोर होती है, कई मायनों में तो उनसे भी ज्यादा कठिन होती है। तभी तो अपनी ट्रेनिंग के दौरान सील भारत आ अपने को और बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे हमारे कमांडो अमेरिका और ब्रिटेन जा कर करते हैं।

मारकोस की ट्रेनिंग अलसुबह शुरु हो जाती है जिसमें कसरत के साथ-साथ 18 किलो का वजन उठा कर 30 किमी की दौड़, मार्शल आर्ट्स, हर तरह के हथियारों का संचालन, पैराशूट और फ्री फाल जंप, उड़ते हेलीकाप्टर से रस्सी के सहारे उतरना, टार्च की रौशनी या अंधेरे में भी अचूक निशाना लगाना, साढे छह मिनट में 400 मीटर की दूरी पार करते हुए रास्ते में अचानक उभरते ‘टारगेट’ को निशाना बनाने जैसे दुष्कर कार्यों को पूरा करना पड़ता है। मारकोस का नारा ही है कि “जीतने के लिए ही हम लड़ते हैं।”

पर अपने देश में ढेरों विड़म्बनाओं की तरह ही यहां भी कुछ ऐसा ही है। जहां अमेरिका में सील का वेतन दो लाख रुपये माहवार है वहीं हमारे मारकोस को मिलते हैं अठ्ठाइस हजार रुपये। पैसे की बात ना भी करें पर देश के हित का सोच अपना खून-पसीना एक कर, इतने कठोर प्रशिक्षण और हाड़-तोड़ मेहनत के बल पर जो लियाकत और उपलब्धि हासिल की, समय आने पर बहुतेरे मारकोस उसका उपयोग देश की सेवा या सुरक्षा में कर ही नहीं पाते। पता नहीं उनके दिलों पर क्या बीतती होगी जब वे अपना समय देश का अहित करने वाले नेताओं की कार का दरवाजा खोलने और उनका सामान उठा उनके पीछे चलने में जाया होता देखते होंगे।

8 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बेहद सार्थक सवाल उठाया है आपने ... पर अफ़सोस इस का जवाब कोई नहीं देने वाला ! सुरक्षा बलों के इन ख़ास दस्तो को ख़ास मकसद के लिए बनाया गया था पर आज हमारे देश के नेता इन बलों का उपयोग समाज में अपनी साख और ताक़त दिखाने के लिए करते है ! और छोटी छोटी बातों पर लड़ने और मतभेद रखने वाले हमारे यह नेता बड़ी ही बेशर्मी से एकमत है अपनी निजी सुरक्षा के लिए इन बलों का उपयोग करने के मामले में !

एक सार्थक पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सही!

AlbelaKhatri.com ने कहा…

agar aisa hota hai to ye dukhad hai aur sharmnaak bhi......

ye to chuhiya ki doli sheron dwara uthaaye jane jaisi baat ho gayi.....

laahnat hai aise napunsak netaaon par jo khud to desh ke liye kuchh karte nahin, jo karne ke liye satat samarpit hain unhen bhi apne khaadim ke tour par istemaal karte hain

main ninda karta hoon..........

राज भाटिय़ा ने कहा…

पता नहीं उनके दिलों पर क्या बीतती होगी जब वे अपना समय देश का अहित करने वाले नेताओं की कार का दरवाजा खोलने और उनका सामान उठा उनके पीछे चलने में जाया होता देखते होंगे।

उन के दिलो से आवाज आती होगी कि यह कुत्ता कब मरे,कब यह हरामी को ओलाद को कीडे पडे, लेकिन यह बेचारे मजबुरी के कारण सब करते हे

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

कुछ नहीं गुजरती होगी... गुजरती होती तो ...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

कुछ नहीं गुजरती होगी... गुजरती होती तो ...

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

गुजरती तो बहुत कुछ होगी पर मज़बूरी ..................

बी एस पाबला ने कहा…

दिलों पर कुछ बीते और अगला कुछ कर गुजरे तो उसे मानसिक चिकित्सालय भेज दिया जाएगा या फिर विदेशी एजेंट कह फांसी पर लटका दिया जाएगा

अगले ही दिन कोई और कमांडो कार का दरवाज़ा खोलने के लिए हाज़िर होगा