शनिवार, 24 जुलाई 2010

सोने की चिड़िया होने में इसका भी हाथ था.

भारत यूं ही सोने की चिड़िया नहीं कहलाता था। उस समय राज्य की तरफ से कामगारों को पूरी सुरक्षा तथा उनकी मेहनत का पूरा मुआवजा दिया जाता था। खासकर किसानों को हारी-बिमारी या प्राकृतिक आपदा में भी राजा से पूरा संरक्षण प्राप्त होता था। आखिरकार भूख से लड़ने में वही तो अहम भुमिका अदा करते थे। पेट भरा हो तभी हर काम सुचारू रूप से हो पाता है।

मेगास्थनीज चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी नरेश सिल्यूकस का राज दूत था। उसने भारत भ्रमण कर यहां के बारे में बहुत सारी जानकारी को लिपिबद्ध किया था। उसने पाया था कि चंद्रगुप्त के समय में चोरियां ना के बराबर होती थीं। किसानों और पूरे खतिहर वर्ग को बहुत सम्मान प्राप्त था। एक तरह से इस काम को पवित्र और पूजनीय माना जाता था। उसने आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा है कि जहां दूसरे देशों में युद्ध के समय खड़ी फसलों को बर्बाद कर दिया जाता था, खलिहानों में आग लगा दी जाती थी जिससे सेना को रसद ना मिल पाए, वहीं भारत में किसानों को युद्ध से जैसे कोई मतलब ही नहीं होता था। युद्धभूमि से कुछ दूरी पर भी किसान अपना कार्य यथावत करते रहते थे। इसीसे रसद की अबाध उपलब्धि सेना और नागरिकों को प्राप्त होती रहती थी। जिससे आपात काल में भी कोई काम ठप नहीं हो पाता था।

मेगास्थनिज ने उस काल में यहां विदेशियों की सुरक्षा और उनकी देखभाल के लिये राजा और राज्य के निवासियों की भी बहुत तारीफ की है।

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

आप विराम चिन्ह भेज दें, उनमें शब्द हम खुद डाल दिया करेंगें !!!

विराम चिन्ह, पूर्ण, अर्द्ध या लघु जैसे भी हों यदि सही जगह ना लगे हों तो अर्थ का अनर्थ होना तय है। इनका भाषा को सुधारने या बिगाड़ने में बहुत बड़ा हाथ होता है। इसलिए बहुत सोच-समझ कर ही इनका उपयोग करना चाहिए।  इधर का उधर या उधर का इधर लग जाने पर विषय तो विष बन ही सकता है, प्रूफ पढने वालों के दांतों तले भी पसीना आ जाता है, कुछ का कुछ पढ कर, और उसे सही करने में !

एक बार क्या हुआ कि मेरे जैसे एक बंदे ने एक लंबा सा लेख एक पत्रिका को भेज दिया, साथ में एक पत्र भी था जिसमें लिखा था, संपादक महोदय रचना भेज रहा हूं। समयाभाव के कारण विराम चिन्हों का उपयोग नहीं कर पाया हूं, कृपया खुद लगा लें। तुरंत ई-मेल से उन्हें जवाब आया, आइंदा आप विराम चिन्ह ही भेज दिया करें उनके बीच शब्द हम खुद डाल दिया करेंगे।

मुझे लगता है कि कुछ ऐसी ही रचना रही होगी :-
एक गांव में पति पत्नी अपने परिवाए के साथ रहते थे। गांव में काम ना होने के कारण पति को दूसरे शहर जाना पड़ रहा था। जाने के पहले पति ने अपनी पत्नी को आजकल के साक्षर बनाने वाले स्कूल में दाखिल करवा दिया जिससे वह पत्र द्वारा घर की खबर वगैरह उसे भेज सके। एक दिन उसने अपने पति को चिट्ठी लिखी, जो कुछ यूं थी - "मेरे चरण दास मेरा प्रणाम आपके पैरों में। आपने अभी तक चिट्ठी नहीं लिखी मेरी सहेली को। नौकरी मिल गई है हमारी गाय ने। बछड़ा दिया है दादा जी ने। शराब शुरू कर दी है मैंने। तुमको बहुत खत लिखे पर तुम नहीं आए कुत्ते के बच्चे। भेडि़या खा गया दो महीने का राशन। छुट्टी पर आते हुए ले आना एक खूबसूरत औरत। इस वक्त वही गाना गा रही है हमारी बकरी। बेच दी गई है तुम्हारी मां। तुमको याद कर रही है एक पड़ोसन। हमें बहुत तंग करती है तुम्हारी बहन। सिरदर्द से लेटी है तुम्हारी प्राणों की प्यासी पत्नी।"

पत्र पा कर पति का क्या हाल हुआ होगा, जो समझा कर गया था कि पत्र लिखते समय ऊपर प्रिय प्राण नाथ लिख कर शुरू करते हैं तथा पत्र खत्म करते समय आपके चरणों की दासी लिखते हैं। अब बेचारी घर के काम के टंटों में सब गड़्ड़मड़्ड़ कर गयी तो उसका क्या कुसूर :-)

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

बडबोले धोनी को मुरली का करारा जवाब

श्रीलंका ने आज बड़े शालीन ढंग से बड़बोले धोनी को जवाब दिया जब उन्होंने टेस्ट क्रिकेट की रैंकिंग में पहली पायदान पर काबिज भारत की टीम को दस विकटों से कारारी हार का मजा चखाया।
क्रिकेट को, शालीनता जिसकी पहचान रही है, वैसे भी भद्र जनों का खेल माना जाता रहा है (पर आज कल इसमें ही सब से ज्यादा अभद्रता दिखती है) हार-जीत हर खेल का एक अंग है। पर जिस तरह मुरली के वर्ल्ड रेकार्ड़ को ना बनने देने की बात धोनी ने कही थी वह भारत के क्रिकेट प्रेमियों को भी अच्छी नहीं लगी होगी। किसी खेल में उत्कृष्ट कौशल दिखा सामने वाले को हराना गर्व का विषय होता है। पर ईर्ष्या वश सामने वाले के विरुद्ध टिप्पणी करना नीच मानसिकता का द्योतक है। यही फर्क है सचिन और धोनी में। सचिन ने अपनी कटु से कटु आलोचना का जवाब अपने मैदान में अपने खेल से दिया है। जबकि इस दो सौ करोड़ी कप्तान की मानसिकता और जबान दो कौड़ी का मोल भी नहीं रख पाती।

बुधवार, 21 जुलाई 2010

हाइड पार्क, अपनी तरह का एक ही

हाइड़ पार्क लंदन का प्राचीन और ऐतिहासिक पार्क है। यहां पहले घना जंगल हुआ करता था। जिसमें जंगली जानवरों का बसेरा था। कालांतर में यह शाही परिवार का शिकारगाह बन गया। हेनरी अष्टम के समय से ही इसका रख-रखाव होने लग गया था। फिर चार्ल्स प्रथम ने यहां साफ-सफाई करवा कर इसका उपयोग राजपरिवार के सदस्यों को घुड़सवारी सिखाने मे करना आरम्भ करवा दिया। धीरे-धीरे जंगल को एक सुंदर उद्यान में बदल दिया गया। जहां उच्च कुल के लोग अपनी शामें बिताने आने लगे।

सन 1730 में इस पार्क मे एक झील बनायी गयी जिसका नाम अपने आकार के अनुसार सर्पेंटाइन रखा गया। जो आज भी अपनी सुंदरता से लोगों को खिंचे चले आने पर मजबूर कर देती है।
पर हर चीज बदलायमान है। 18वीं सदी में एक समय ऐसा भी आया जब यह पार्क आतंक का पर्याय बन गया। अंधेरा होते ही यहां डकैतों तथा अपराधियों का जमावड़ा होने लगा। शाम होने के बाद कोई भी व्यक्ति इधर आने की हिम्मत नहीं करता था। धीरे-धीरे कानून व्यवस्था मे सुधार आया और महारानी विक्टोरिया के समय में यह वक्ताओं को अपने भावों को प्रगट करने का भाषण स्थल बन गया जो आज तक चला आ रहा है।
इस पार्क के एक कोने को इस काम के लिए निश्चित कर दिया गया तथा इसे "स्पीकर्स कार्नर" के नाम से जाना जाने लगा। इसकी विशेषता यह है कि यहां होने वाले भाषणों को सूचित या प्रसारित नहीं किया जाता। वक्ता अपने आप आता है और श्रोता भी। मजेदार बात यह है कि एक ही समय पर भिन्न-भिन्न विषयों पर सभाएं होती हैं, जिस की जैसी रुचि होती है वह वैसी ही सभा का सदस्य बन जाता है। जैसा कि आज के मल्टिपलेक्सों में विभिन्न स्क्रिनों पर दिखायी जाने वाली विभिन्न फिल्मों के साथ है। हां यहां पैसे खर्चने पड़ते हैं, हाइड पार्क में सब कुछ मुफ्त होता है।

करीब छह सौ एकड़ के इस पार्क में आज हर तरह के मनोरंजन का सामान मौजूद है। नौका विहार, घुड़सवारी, फूलों का उद्यान, तैरने तथा नौका विहार की सुविधा, रात में युवाओं की विलासिता का अड्डा और भी ना जाने क्या-क्या समेटे यह पार्क मशहूर है पूरी दुनिया में।
अपनी तरह का अकेला और अनोखा पार्क है यह दुनिया का ।

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

पापी मरता नहीं, खँडहर ढहता नहीं. आम इंसान चुप है भगवान कि माया मान

अरसा पहले समय ही कुछ और था। कैसे-कैसे नेता थे। अपने कर्म के प्रति समर्पित, देश के प्रति न्योछावर, आम आदमी से अपनत्व की हद तक जुड़े हुए।

समय बदला। नेता की परिभाषा बदली। मैं ही मैं हूं। बाकि सब कीड़े-मकौड़े। घर भर लो जैसे भी हो। देश, जनता यह सब ढकोसला हम से नहीं होता। जो करेंगें अपनी मर्जी से। हमसे देश है देश से हम नहीं।

फिर ढेर सा पानी बह गया गंगा में। नेताई दृष्टिकोण भी फैशन की तरह बदल गया। खुद कुछ भी करो। तुक्के से सही हो गया तो चमचों से पीठ थपकवालो, बिना शर्म मुंह मियां मिट्ठू बनते रहो। गलत हो जाए तो बिना देर किए दुसरों पर इल्जाम थोपते रहो। खुद पाक-साफ।

एक उदाहरण :
वर्षों पहले एक ट्रेन दुर्घटना हुई थी। तत्कालीन रेल मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने इस्तीफा दे दिया था। सारी जिम्मेदारी खुद लेते हुए। क्या पड़ी थी? ना कोई विरोध हुआ था ना कोई शिकायत। पर अगले की अंतरात्मा ने पद पर बने रहना स्वीकार नहीं किया था।

फिर दुर्घटना घटी। इस बार श्रीमान लालू प्रसाद यादव विराजमान थे रेल मंत्री के पद पर। उन्होंने तो जो कहा सो कहा उनकी धर्मपत्नी उनके आड़े वक्त सामने आ बोलीं, इतना बड़ा देश में इतना ठो गाड़ी चलता है, साहब हर गाड़ी मे थोड़े ही बैठ कर सब कुछ देखेंगे।

समय चलता गया। मौका मिला बंगाल की बहन को जिसने इस पद पर कब्जा जमा इसे अपनी महत्वकांक्षा का जरिया बना ड़ाला। रेल हमारे यहां अभिशप्त है। फिर दुर्घटनाएं घटीं और हर बार सीधी सरल दीदी ने साफ साफ कह दिया कि यह सब विपक्ष करवा रहा है। यानि तुम्हारी आपस की लड़ाई में इंसान की कोई कीमत ही नहीं है। उन्हीं बेवकूफों की जिनके मतों को लेकर तुम इस झगड़े के लायक बने हो।

पता नहीं क्यूं हमारे इतने आस्थावान देश में पापी मरता नहीं खंड़हर ढहता नहीं। आम इंसान रो-धो कर सब भगवान की माया मान क्यों चुप हो जाता है?

सोमवार, 19 जुलाई 2010

एक छत्तीसगढ़ी लोक कथा, मार के आगे भूत भागा.

प्राचीन काल से ही हमारे पूरे देश में लोक कथाओं, गीतों, पहेलियों तथा लोकोक्तियों इत्यादि द्वारा गूढ से गूढ बातों को सरलता से समझाने की परंपरा रही है। खासकर कथा-कहानियां सदा से रोचक, भावप्रद तथा शिक्षापूर्ण होती हैं। ऐसी ही एक छत्तीसगढी लोक कथा हिंदी में प्रस्तुत है, जिसमें हास्यरस, आस्था, साहस, सूझबूझ और शिक्षा का समावेश है।

एक गांव के बाहर एक वट वृक्ष पर एक भूत रहा करता था। एक दिन कुछ गांव वालों ने पेड़ के आसपास गंदगी फैला दी। भूत इससे नाराज हो गया और उसने सारे गांव वालों को मार ड़ाला। इसी बीच गांव का एक लड़का जो अपने ननिहाल गया हुआ था, लौट कर आया तो उसने सारे गांव को सुनसान पाया। उसे कुछ समझ नहीं आया पर रात हो रही थी सो वह अपने घर के अंदर चला गया। थोड़ी देर बाद भूत घूमता-फिरता वहां आया और लड़के को देख बोला, तू कौन है जो यहां घुस आया है? मैने सारे गांव वालों को मार दिया है। तुम्हें भी मार ड़ालूंगा। मुसीबत सामने देख कर भी लड़का घबराया नहीं अपनी बुद्धी से काम लेते हुए उसने भूत से कहा, मामा मैं बहुत दिनों बाद घर लौटा हूं। थक भी बहुत गया हूं, अपने घर में मुझे थोड़ी सी जगह दे दो। मेरी मां कहा करती थी कि मामा का दिल बहुत बड़ा होता है। मुझ पर दया करो। भूत को लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे घर में रहने की अनुमति दे दी।

इधर भूत को रोज ब्रह्माजी के यहां हाजिरी देने जाना पड़ता था। एक दिन लड़के ने उससे पूछा, मामा तुम रोज-रोज कहां जाते हो ?
मुझे रोज हाजिरी देने ब्रह्माजी के दरबार में जाना पड़ता है। भूत ने जवाब दिया।
अच्छा इस बार जाओ तो ब्रह्माजी से कह कर मेरी उम्र बढवा देना। भूत मान गया। पर दूसरे दिन उसने बताया कि वहां कहा गया है कि जिसकी जितनी उम्र होती है वह ना तो कम की जा सकती है नाहीं बढाई जा सकती है। लड़के ने सोचा कि जब दुनिया को बनाने वाले ब्रह्माजी भी किसी की उम्र कम ज्यादा नहीं कर सकते तो यह भूत मुझे कैसे मार सकता है। यह सोच एक दिन जब भूत ऊपर गया हुआ था तो लड़के ने एक मजबूत लाठी ली और भूत का इंतजार करने लगा। भूत के आते ही उसने लाठी से उसको मारना शुरु कर दिया। भूत इस अचानक आक्रमण से ड़र कर जो भागा तो फिर कभी लौट कर नहीं आया।

जैसे उस लड़के के दिन फिरे, सबके फिरैं।

रविवार, 18 जुलाई 2010

कुछ ही.....ही, हा......हा, हो जाए

रविवार का दिन है, आईए कुछ ही..ही.., हा..हा.. हो जाए

@ भाषण चल रहा था। नेताजी बार-बार कह रहे थे कि हमें अपने पैरों पर खड़े होना है। तभी भीड़ के पीछे से कोई चिल्लाया, अरे साहब हम तो कब से कोशिश कर रहे हैं पर यह हवलदार हमें जबरदस्ती बैठा देता है।

@ एक आदमी अपना सर पकड़े डाक्टर के पास आ कर अपनी नकली टांग की तरफ इशारा कर बोला, डाक्टर साहब, इस लकड़ी की टांग के कारण मेरे सर में दर्द हो रहा है।
नकली टांग से सर में कैसे दर्द हो सकता है? डाक्टर ने आश्चर्य से पूछा।
असल में आज मेरी बीवी ने इसे उठा कर मेरे सर पर दे मारा है।

@ दादाजी ने अपने पोते का साधारण ज्ञान परखने के लिए पूछा, बताओ बगुला तालाब में एक टांग पर क्यों खड़ा होकर मछलियां पकड़ता है?
आप भी दादाजी!!!, अरे दोनों पैर उठा लेगा तो गिर नहीं पड़ेगा क्या ?

@ श्रीमतीजी ने पूछा, ए जी, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर में क्या अंतर होता है? वही जो तुम्हारे मुझसे मांग कर पैसे लेने और चुपचाप निकाल लेने में होता है।
श्रीमानजी ने जवाब दिया।

शनिवार, 17 जुलाई 2010

"आई सन" ने जो काम कर दिया है वह "माई सन" कभी भी नहीं कर सकता था

मुखर्जी बाबू के रिटायरमेंट का समय नजदीक आ गया था। उनका एक ही लड़का था। अभी-अभी ग्रैजुएशन पूरी की थी। किसी ढंग की नौकरी की तलाश हो रही थी। उन दिनों नौकरी के लिए इतनी मारामारी नहीं होती थी। लियाकत और सिफारिश से काम चल जाता था। यह बात अलग थी कि सिफारिश सिर्फ नौकरी दिलवा सकती थी, बाद में उसे संभालने और तरक्की पाने में लियाकत ही काम आती थी।

सो इधर-उधर घूमने में और समय जाया करने के बजाय मुखर्जी बाबू ने लड़के को खूद जहां मुलाजिम थे वहीं काम दिलाने का फैसला किया। अंग्रेज मैनेजर उनकी लगन और काम पर पकड़ के कारण उन्हें मानता भी बहुत था, पर झिझक तथा संकोच वश उन्होंने अभी तक अपने बेटे के लिए बात नहीं की थी। हो सकता है इसे उन्होंने अंतिम विकल्प के रूप मेँ भी रख छोड़ा हो। जो भी हो एक दिन मुखर्जी बाबू अपने बेटे को ले मैनेजर के सामने जा खड़े हुए।

मैनेजर ने उन्हें देख उनके आने का कारण पूछा। मुखर्जी बाबू ने अपने बेटे की ओर इशारा कर कहा, सर आई सन, नो वर्क। वी पूअर। वांट सर्विस। प्लीज हेल्प।
बेटे ने बाप की तरफ अजीब निगाहों से ताका और सिर झुका लिया।
मैनेजर ने एक नजर लड़के की तरफ देखा जो जमीन की ओर नजरें झुकाए खड़ा था और बोला, वेल, टेल हिम टु ज्वाइन आन मंड़े।
मुखर्जी बाबू ने मैनेजर का शुक्रिया अदा किया और बेटे को ले घर वापस आ गये।

घर आते ही लड़के ने मां से शिकायत की कि आज बाबा ने पूरी बेइज्जती करवा ली है। मां ने पूछा, अरे, हुआ क्या? बता तो सही यूं ही बड़बड़ाए जा रहा है। बेटा बोला कि बाबा को इतनी अच्छी अंग्रेजी आती है पर वहां आफिस में कैसी गलत-सलत, आई सन, आई सन कर के बात कर रहे थे. माई सन नहीं बोल सकते थे, और क्या बताऊं।

लड़के की बात खत्म होते-होते मुखर्जी बाबू ने अपनी पत्नी से बंगला में कहा, ओ के बुजीए दाओ। ओ चाकरी पेये गैचे। आमार आई सन जा कोरे दीएचे ओ माई सन कोक्खोनो कोरते पात्तो ना (उसे समझा दो। उसे नौकरी मिल गयी है। मेरे आई सन ने जो काम किया है वो माई सन कभी भी नहीं कर पाता)

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

बेटा, तुम्हारे पिता ने इसे इतनी बार धोया है कि ........

ललित जी की उम्दा कविता पढी तो अपनी यह पुरानी पोस्ट याद आ गयी

एक गांव के बाहर एक घना वट वृक्ष था। जिसकी जड़ों में एक दो फुटिया पत्थर खड़ा था। उसी पत्थर और पेड़ की जड़ के बीच एक श्वान परिवार मजे से रहता आ रहा था।

एक दिन महिलाओं का सामान बेचने वाले एक व्यापारी ने थकान के कारण दोपहर को उस पेड़ के नीचे शरण ली और अपनी गठरी उसी पत्थर के सहारे टिका दी। सुस्ताने के बाद उसने अपना सामान उठाया और अपनी राह चला गया। उसकी गठरी शायद ढीली थी सो उसमें रखे सिंदूर की पुडिया में से थोड़ा सिंदुर उस पत्थर पर गिर गया। सबेरे कुछ गांव वालों ने पत्थर पर गिरे रंग को देखा तो उस पर कुछ फूल चढा दिये। इस तरह अब रोज उस पत्थर का जलाभिषेक होने लगा, फूल मालायें चढने लगीं, दिया-बत्ती होने लग गयी । लोग आ-आकर मिन्नतें मांगने लगे। दो चार की कामनायें समयानुसार प्राकृतिक रूप से पूरी हो गयीं तो उन्होंने इसे पत्थर का चमत्कार समझ उस जगह को और प्रसिद्ध कर दिया। अब लोग दूर-दूर से वहां अपनी कामना पूर्ती के लिये आने लग गये। एक दिन एक परिवार अपने बच्चे की बिमारी के ठीक हो जाने के बाद वहां चढावा चढा धूम-धाम से पूजा कर गया।

यह सब कर्म-कांड श्वान परिवार का सबसे छोटा सदस्य भी देखा करता था। दैव योग से एक दिन वह बिमार हो गया। तकलीफ जब ज्यादा बढ गयी तो उसने उस पत्थर को इंगित कर अपनी मां से कहा, मां तुम भी इन से मेरे ठीक होने की प्रार्थना करो। ये तो सब को ठीक कर देते हैं। मां ने बात अनसुनी कर दी। पर जब श्वान पुत्र बार-बार जिद करने लगा तो मजबूर हो कर मां को कहना पड़ा कि बेटा ये हमारी बात नहीं सुनेंगें। पुत्र चकित हो बोला कि जब ये इंसान के बच्चे को ठीक कर सकते हैं तो मुझे क्यों नहीं ?

हार कर मां को सच बताना पड़ा, बेटा जब यहाँ यह सब कुछ नहीं होता था तब तुम्हारे पिता जी ने इसे अपनी "प्रकृति की पुकार" से इतनी बार धोया है कि अब तो मुझे यहाँ रहते हुए भी डर लगता है।

श्वान पुत्र कुछ समझा कुछ नहीं समझा, पर चुप हो गया।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

श्वान पुत्र ने लिया नए एयरपोर्ट का जायजा :-)

खुशी का मौका, हमारे इंदिरा गांधी एयरपोर्ट का नया टर्मिनल खुल गया। दुनिया के सबसे बड़े दस एयरपोर्टों में शुमारी दर्ज की गयी। साफ सुथरा, हर नयी तकनिकी से लैस, दुनिया भर में हवाई अड्डों पर मिलने वाली सुविधाओं से भरपूर, चाक चौबंद सुरक्षा व्यवस्था ऐसी की चिड़िया भी पर ना मार सके इंसान की तो बात ही क्या।

अरे!!!! पर कुत्ते का तो सोचा ही नहीं था, ये कहां से आ घुसा।

* सबसे पहले कुत्ते ने जायजा लिया भव्य हवाई अड्डे का।

जय हो श्वान महाराज।

प्रणय निवेदन पक्षियों का

इंसान ही नहीं पक्षी भी प्रणय निवेदन करते हैं। उनको भी अपनी प्रेमिका को रिझाने के लिए हाड़ तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। हालांकि ज्यादातर पक्षियों में नर ही खूबसूरत होता है फिर भी उसे मादा को मनाने के लिए दिन रात एक करना पड़ता है।

सबसे सुंदर पक्षी मोर की बात करें तो जब जोड़ा बनाने का समय आता है तो इतने खूबसूरत नर को भी कुछ-कुछ बदसूरत (नर के मुकाबले) मोरनी के सामने अपने सुंदर पंखों को फैलाए घंटों नाचते इठलाते रहना पड़ता है। तब कहीं जा कर मैड़म का मन पसीजता है।

बया एक कलाकार पक्षी है। उसके बनाए घोंसले को देख इंसान के दांतों तले ऊंगली अपने आप चली जाती है। वर्षा ऋतु के समय वह घोंसला बनाता है। इस कलात्मक काम में वह पूरी तरह ड़ूब जाता है। इतना प्यारा साफ सुथरा और सुरक्षित घर बनाने के बावजूद नखरीली मादा को घर जल्दी पसंद नहीं आता। वह जब तक क्लीयरिंग लायसेंस नहीं दे देती तब तक नर घर को और बेहतर करने में जुटा रहता है। इस घोंसले में अलग-अलग कक्ष होते हैं तथा कभी-कभी रोशनी के लिए जुगनूओं को भी काम में लाया जाता है।

नीलकंठ इतना खूबसूरत पक्षी। इनमें नर और मादा करीब-करीब एक जैसे ही होते हैं। नर अपनी सहेली को खुश करने के लिए हवा में उड़ कर तरह-तरह के करतब दिखाता है। कयी बार तो वह ऊपर से ऐसे पत्थर की तरह नीचे गिरता है जैसे उसकी जान ही निकल गयी हो पर जमीन के पास आते ही फिर वह ऊपर उड़ जाता है। ऐसा कब तक? जब तक अगली मान ना जाए।

कबूतर, सबसे प्रेमिल जीव। अपनी मादा को रिझाने के लिए वह अपने पंख फैलाए उसके चारों ओर गुटरगूं करता चक्कर लगाता रहता है। यह प्राणी एक बार जिससे जोड़ा बना लेता है उसका साथ जीवन भर नहीं छोड़ता। इसीलिए कबूतर सदा जोड़े मे ही दिखाई पड़ता है।

प्रेमी हो तो सारस जैसा। यह अपने प्रेम के लिए जगत प्रसिद्ध है। नर और मादा एक दूसरे के लिए सदा समर्पित रहते हैं। यदि इनमें से किसी एक की भी मृत्यू हो जाए तो दूसरा भी अन्न-जल त्याग कर अपनी जान दे देता है।

सारस के ठीक विपरीत जीवन शैली है हंस की। यह निड़र पर नाजुक पक्षी बहुपत्नी प्रथा को मानने वाला होता है। अपने सौंदर्य और मनलुभावनी चाल के कारण लोकप्रिय हंस की बहुत सारी पत्नियां होती हैं।

पक्षी अनेक पक्षी कथा अनंता। सैंकड़ों जातियों के इन जीव-जंतुओं की अनेकों विचित्रताएं हैं। शुरु करो तो समय खत्म हो जाए।

कुछ फिर कभी।

बुधवार, 14 जुलाई 2010

कल फसल जरूर कटेगी

वर्षों से हमारे यहां बच्चों में अच्छे संस्कार ड़ालने के लिए कहानियों का सहारा लिया जाता रहा है। पाठ्य पुस्तकों में भी ऐसी कथाओं को समाहित किया जाता था जिससे बच्चों में प्रेम, करुणा, आदर, क्षमा, निड़रता, स्वाबलंबन जैसे गुण कूट-कूट कर भरे जा सकें।
समय बदल चुका है, विषय बदल गये हैं पर उन कथाओं में सरल भाषा में निहित शिक्षा इस हाई-फाई जमाने मे भी अपना वैसा ही असर बरकरार रख पाने में सक्षम है। ऐसी ही एक कहानी प्रस्तुत है जो अपना काम खुद करने का संदेश देती है।

एक खेत में एक चिड़िया ने घोंसला बना कर उसमें अंड़े दिए। समय के साथ अंडों से बच्चे निकले जो धीरे-धीरे बड़े होने लगे। चिड़िया रोज उन्हें घोंसले में ही रहने की हिदायत दे चुग्गे की तलाश में निकलती थी। ऐसे ही एक दिन जब वह शाम को लौटी तो बच्चे सहमे से बैठे थे। चिड़िया ने उनके ड़रे होने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि आज खेत का मालिक किसान आया था और कह रहा था कि फसल पक गयी है कल गांव वालों के साथ आ कर काट ले जाऊंगा।
अब हमारा क्या होगा? ड़रे हुए बच्चों ने अपनी माँ से पूछा।
चिड़िया ने शांत स्वर में जवाब दिया, घबड़ाओ नहीं, वह अभी नहीं आएगा।
इस तरह कुछ दिन बीत गये। एक दिन फिर बच्चों ने परेशान हो कर अपनी माँ को बताया कि, आज फिर किसान आया था, कह रहा था गांव वाले तो नहीं आ सके, कल अपने मित्रों-बांधवों को साथ ला फसल काट कर घर ले जाऊंगा।
चिड़िया ने अपने बच्चों को दिलासा दिया कि अभी ऐसा कुछ नहीं होगा चिंता ना करो।
फिर कुछ दिन निकल गये। एक दिन चिड़िया के बच्चों ने उसके आने पर हंसते हुए उसे बताया कि आज वैसे ही फिर किसान आया था उसने कुछ करना-वरना तो है नही, पहले जैसा ही बोल रहा था कि मैं कल खुद अपने लड़कों को लेकर आऊंगा और फसल काटूंगा।
चिड़िया ने तुरंत कहा, बच्चो अब जाने का समय आ गया है, कल सबेरे ही हम उड़ चलेंगे। बच्चों ने आश्चर्य से पूछा कि माँ आज ऐसी क्या बात हो गयी? वह तो पहले भी ऐसा बोल कर जाता था पर फिर फसल काटने कहां आया था? इस बार भी नहीं आएगा।
इस पर चिड़िया ने उनको फर्क समझाया कि पहले दोनों बार वह किसी और के भरोसे काम करने की सोच रहा था। पर इस बार वह अपना काम खुद करने वाला है। इसलिए कल फसल जरूर कटेगी।

कहानीकार ने कितने सरल तरीके से समझाने की कोशिश की है कि जब इंसान दूसरों का भरोसा छोड़ अपना काम खुद करने की ठानता है तो फिर कोई अड़चन उसकी राह में बाधा नहीं बनती।

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

सावधान, जरूरी नहीं कि जैसा पहले हुआ था वैसा ही अब भी हो

पहली कहानी काफी पुरानी है। सबने पढी-सुनी होगी।
एक राजकुमारी को उसकी सौतेली माँ बहुत तंग करती थी। एक दिन हैरान परेशान राजकुमारी अपने बागीचे में घूम रही थी कि उसे वहां एक मेढक दिखाए पड़ा। मेढक ने राजकुमारी से कहा कि यदि तुम मुझे चूम लो तो मैं इस योनी से मुक्ति पा जाऊंगा। राजकुमारी को उस पर दया आ जाती है और उसके चूमते ही मेढक एक सुंदर युवक का रूप ले लेता है जो एक राज्य का राजकुमार होता है। दोनों की शादी हो जाती है और वे सुख से रहने लगते हैं।

गंगा में बहुत सा पानी बह गया। वर्षों बीत गये। घटना ने फिर अपने आप को दोहराया और दूसरी कहानी को जन्म दिया, लेकिन !!!!!!!

एक लड़की कालेज से बंक मार एक पार्क में अपने साथी का इंतजार कर रही थी। तभी उसे एक बड़े से आकार का भद्दा सा चूहा दिखाई दिया। कुछ देर लड़की के आस-पास घूमने के बाद चूहा उस लड़की के पास आ खड़ा हुआ और आश्चर्यजनक रूप से हिंदी में उस लड़की से बोला कि मैं एक मंत्री का बेटा हूं पर जलनखोरों के टोने-टोटके की वजह से चूहा बन गया हूं। क्या तुम मुझसे प्यार करोगी? पहले तो लड़की हड़बड़ा गयी पर फिर उसे पुरानी कहानी याद आयी। उसने सारे “इफ्स और बट्स” को सोचा और भविष्य का ख्याल रखते हुए मन ही मन मान गयी। फिर भी सारी बात साफ करने के लिए उसने चूहे से पूछा कि ऐसा करने से मुझे क्या मिलेगा? चूहे ने जवाब दिया मैं तुमसे शादी कर लूंगा। यह सुन लड़की ने चूहे को गोद में उठा कर उसे जैसे ही प्यार पूर्वक सहलाया, वह चूहिया बन गयी।
पर चूहे ने अपना वचन निभाया। उसने चूहिया बनी लड़की से शादी कर ली।

जय श्री राम। जैसे उसके दिन (किसके) बदले सबके बदलें।

सोमवार, 12 जुलाई 2010

मौका देख चौका मारने की फिराक में मौकापरस्तों के तुक्के

फुटबाल की आंधी में भी जब आक्टोपस पाल की तूती बोलने लगी तो इस पेशे से जुड़े बाकी मौकापरस्त लोगों को भी होश आया। तब तक काम भी बहुत आसान हो चुका था। दो ही टीमें मैदान में रह गयीं थीं। एक तरफ सिंगापुर का तोता दाने की लालच में नीदरलैंड़ के झंडे वाला कार्ड़ उठाने लगा तो सुदूर आस्ट्रेलिया में पानी में पड़े मगरमच्छ को स्पेन की बीन सुहानी लगने लगी। इन सब का नाम रोज अखबारों में छपता देख अपने देश के भोपाली नंदी बैल को भी होश आया उसने सोचा कि इस तरह के तुक्के लगाने में तो हम मशहूर हैं ये विदेशी कहां फुटबाल पर लात मारने कि बजाय हमारे पेट को लतियाने लगे। बस उसे भी जोश आ गया। हर बात का जायजा लिया तो रिस्क नहीं के बराबर और फायदे की असीम संभावनाएं देख वो भी अपनी थूथन उठाए पोज देने लगा। सही मौका था। दो ही टीमें थीं। एक को ही जीतना था। एक भी मैच ना हार कर होड़ में सबसे आगे "पाल बाबा" थे, अपनी पसंद की टीम स्पेन के साथ। इधर नंदी स्वामी ने सोचा कि विपक्षी टीम का पक्ष ले लेते हैं, खुदा-न खास्ता जीत गयी तो दुनिया भर में नाम हो जाएगा और नहीं जीती तो भी अपनी दुकान तो चल ही रही है। भोलेनाथ की कृपा हो गयी तो सारी दुनिया में बल्ले-बल्ले हो जाएगी।

ऐसा ही कुछ खेल एक चैनल ने अपने दफ्तर में भी आयोजित कर ड़ाला। अब क्या करें 24घंटे क्या परोसें, सुरसा के मुंह रूपी टीवी के पर्दे पर। दुनिया में ऐसा वैसा कुछ हो जाता है तो ये चैनल वाले भी एक-दो दिन राहत की सांस ले पाते हैं। बैठा लेते हैं चार जनों को टाइम पास करने के लिए, हालांकि मेहमानों से ज्यादा खुद पर कैमरे का फोकस कर कुछ भी अनाप-सनाप बोलते रहते हैं, आने वाला तो मुंह बाए इनका थोबड़ा ही देखता रहता है। कहीं गलती से कुछ बोलने का मौका मिलता भी है तो बहुत छोटा सा लंबा "ब्रेक" आ जाता है। खैर मैच के पहले चार ज्योतिषविदों को बुलाया गया था। इधर-उधर की बातें कर उनका पानी उतारने के बाद उनसे भावी विजेता का नाम बताने को कहा गया। तीन ने स्पेन का नाम लिया तो एक महाशय नीदरलैंड़ के पक्ष में हो लिए, ठीक नंदी बाबा के तौर पर।

अब जो होना था वही हुआ। खेल खत्म पैसा हजम। सब अपनी-अपनी राह लग गये अपने अपने मतलबों को पूरा करते हुए। पर एक बात समझ में नहीं आती कि चैनलों पर आ कर जब हर बार फजीहत होती है तो फिर क्यों बार-बार इसका रुख कर लेते हैं लोग?

शनिवार, 10 जुलाई 2010

पचीस किलो का आदमी भी मोटे होने के गुर बताने लगता है.

उपदेश या नसीहत देना बहुत आसान होता है। जरा सा कुछ अप्रिय घटा नहीं, कुछ उल्टा-सीधा हुआ नहीं कि बरसाती मेढकों की टर्राहट की तरह चारों ओर से नसीहतें बरसने लगती हैं। पचीस किलो का आदमी भी मोटे होने के गुर बताने लगेगा और पूरे परिवार के लिए हर महीने दवा खरीदने वाला भी निरोग रहने के नुस्खे लिए चला आएगा।
अब मुझे ही ले लीजिए गुस्सा नाक पर बैठा रहता है, जरा सी बात पर पारा 180 की हद छूने लगता है पर आज मौका मिलते ही मैं आप को गुस्से से होने वाले नुक्सान गिनाने जा रहा हूं। चाहे आप इससे कितना भी गुस्सा हो जाएं।

गुस्से का तात्कालिक असर शरीर पर तुरंत दिखने लगता है। चेहरा विरूप हो जाता है। भूख मर जाती है। अपने पर संयम नहीं रह जाता। आप को पता भी नहीं चलता कि आप कैसे किसी पर अपना क्रोध उतारने लगते हैं। हाथ में आई चीज पटक दी जाती है। कभी-कभी हाथ भी चल जाता है। पैर पटकना आम बात होती है। मुंह से अनाप-शनाप शब्द निकलने लगते हैं। छोटे-बड़े का लिहाज नहीं रह जाता। बाद में भले ही कितना भी पछतावा हो, उससे क्या फायदा।

गुस्सा आता क्यूं है? वैज्ञानिक कहते हैं कि गुस्सा आता है, चला जाता है। उसे गले लगा कर मत रखिए। कारण खोजिए कि क्रोध आता क्यूं है।

आपको लगता है कि सामने वाला आप का अनादर कर रहा है। व्यक्तिगत रूप से आपको परेशान किया जा रहा है। रास्ता चलते लोग सड़क के नियमों का पालन नहीं कर रहे। पड़ोसी के कारण आपकी सफाई प्रभावित हो रही है। ऐसा ही कुछ भी या बहुत कुछ भी क्रोध भड़काने के कारण हो सकते हैं।

पर सोचिए, इससे मिलता क्या है? अशांति, उच्च रक्तचाप, दिल की तेज धड़कन, बढा हुआ कोलोस्ट्रोल, कम होती रोग प्रतिरोधक क्षमता और ना जाने क्या क्या।

थोड़ा सा अपने को बदलें। पड़ोसी से बात कर हल निकालने की कोशिश करें। सड़क पर शांत रहें। कोई लापरवाही कर रहा है तो खुद रुक जाएं। आप सब को नहीं ना सुधार सकते। पूरानी बातों, रंजिशों को भूलने की कोशिश करें। छोटी-छोटी बातों को दिल पर ना लें। जिन बातों से गुस्सा आता हो उनसे बचने की कोशिश करें। क्योंकि गुस्से से कुछ हासिल नहीं होता उल्टे खोना बहुत कुछ पड़ जाता है।

X @ % & $ XX %

यह बार-बार नेट, डिस्कनेक्ट हो रहा है। मन तो करता है कि उठा कर पटक दूं ..... :-)

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

यह "जबुलानी बाल" का दोष है या हमारे दृष्टि तंत्र की कमजोरी ?

इस बार का विश्वकप फुटबाल जितना अपने सफल आयोजन, उल्टफेर, आक्टोपस को लेकर चर्चा में रहा वहीं खेल में प्रयुक्त बाल के कारण भी खबरों में छाया रहा।
इस बार उपयोग में लाई गयी जबुलानी बाल के खांचों की वजह से अच्छे से अच्छे खिलाड़ी को भी उसकी चाल समझने में नाकामयाबी हासिल हुई। इसी वजह से बाल की काफी आलोचना भी होती रही है।
पर वैज्ञानिकों का कुछ और ही कहना है। यू. के. के क्वीन्स विश्व्विद्यालय की कैथी क्रैग का कहना है कि हमारा दृष्टि तंत्र साइड में घूमती चीजों का आकलन करने में असमर्थ होता है। प्रयोग क तौर पर उन्होंने बहुतेरे अनुभवी खिलाड़ियों को ऐसे शाट का अवलोकन करने को कहा जिसमें गेंद करीब 600 चक्कर प्रति मिनट घूम रही थी। खिलाड़ियों को यह अंदाज लगाना था कि गेंद कहां गिरेगी पर निष्णात खिलाड़ी भी सही अनुमान नहीं लगा सके।
क्रैग ने अपने इन प्रयोगों का विवरण "नेचर विसेनशाफ्टेन" नामक पत्रिका में प्रकाशित करवाया था। उनके अनुसार गेंद के स्पिन से एक बल पैदा होता है, जिसे मैग्नस बल कहते हैं। इस बल से गैंद कौन सी दिशा अख्तियार करेगी यह जानना हमारी दृष्टि तंत्र के लिए बहुत मुश्किल होता है। उनका कहना है कि हमें अपने चारों ओर चलती, गिरती चीजं का अनुभव तो मिलता रहता है पर प्रकृति में घूमती वस्तुओं का अभाव होने के कारण कुदरत ने हमें उनके विश्लेषण करने की शक्ति भी नहीं दी है। इसीलिए हम तेजी से घूमती चीजों का सही आकलन नहीं कर पाते हैं। इसी कारण फुटबाल में गोलकीपर घूमती गेदों से गच्चा खा जाते हैं, बेस बाल और क्रिकेट में भी स्पिन होती गेंद का अंदाज बल्लेबाज ठीक से नहीं लगा पाते।

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

आक्टोपस, हमारे भविष्यवक्ताओं के लिए खतरे की घंटी

जय हो पाल बाबा की।

सारे संसार में फ़ुटबाल का जादू जितना सर चढ का बोल रहा है उससे इस पाल बाबा की चर्चा कम नहीं है। जिन्हें इस खेल से कोई मतलब नहीं है उनके कानों में भी इससे जुड़ी खबरें "गोल" बनाती जा रही हैं। अब तो गली-गली इस भविष्यकर्ता की चर्चा है। फिर भी एक बार इस आक्टोपसानंद के बारे में बता देना सामयिक रहेगा।

जर्मनी के चिड़ियाघर में रह रहे एक आक्टोपस "पाल" से यह सब कैसे शुरु हुआ उसकी मेरे को जानकारी नहीं है। इसके द्वारा भविष्य जानने की कैसे और किसे उत्सुकता हुई या मजाक-मजाक में कुछ शुरु हुआ और सच होता गया कह नहीं सकता। पर यह पाल बाबा अब जो भी बताते हैं वह आश्चर्यजनक रूप से सही होता चला जा रहा है।
जर्मनी-स्पेन के मैच के पहले इन महाशय ने स्पेन की जीत की भविष्यवाणी कर दी थी तो बहुतों को लगा था कि इस बार यह गलत साबित हो जाएगी पर नतीजा सबके सामने है।

भविष्य जानने के लिए इसके जार में जिनका मैच होने वाला होता है उन देशों के झंड़े लगे दो ड़िब्बे उतार दिए जाते हैं यह योगी बाबा जिस डिब्बे पर बैठ जाते हैं उसी टीम को इनका आशीर्वाद मिल गया समझा जाता है।

शुरू-शुरू में जर्मनी और सर्बिया के मैच में जब इसने सर्बिया की जीत की भविष्यवाणी की थी तो सभी ने इसे बहुत हल्के से लिया था। पर सर्बिया से जर्मनी की हार ने इसके प्रति लोगों की उत्सुकता बढा दी और पाया कि इसका कहना शत-प्रतिशत सही हो रहा है। फिर भी खिताब के प्रबल दावेदार अर्जेंटिना की जर्मनी के हाथों हार की इसकी भविष्यवाणी पर औरों को तो छोड़ें खुद जर्मनी के प्रशंसकों को भी विश्वास नहीं हो पा रहा था पर सब सच होता चला गया।
तो क्या कहेंगे आप इस पालास्वामी के तुक्कों के बारे में :-)

यह जो हो रहा है, वह जो कुछ भी है पर एक आश्चर्य की बात और है कि अपने यहां बात-बात को अंधविश्वास कहने और आस्था का मजाक उड़ाने वालों की कोई प्रतिक्रया योरोप वासियों के इस कृत्य पर, जिस पर सट्टा भी लगना शुरू हो गया है, सामने नहीं आ रही है।

चलिए छोड़िए सब, आगे क्या होता है फायनल में देखते हैं।

बुधवार, 7 जुलाई 2010

भृंगराज, एक छोटा सा पक्षी जिससे बाघ परेशान रहता है.

भृंगराज और बाघ का जंगल में छत्तीस का आंकड़ा है। पता नहीं बाघ के शिकार पर इसे इतना एतराज क्यों होता है,  जिसके कारण  कई बार बाघ को अपनी भूख मिटाना  दुश्वार हो जाता है !  


कहां जंगल का अधिपति बाघ और कहां एक छोटा सा पक्षी। किसी भी तरह का कोई मेल नहीं। पर यह सच है कि जंगल में बाघ को एक चिड़िया सदा परेशान करती रहती है। इसका नाम है भृंगराज। इससे बाघ ही नहीं शेर, चीते, तेंदुए वगैरह मांसभक्षी जानवर बहुत परेशान रहते हैं। परेशानी की तो बात ही है जब भी ये भाईलोग अपने शिकार पर निकलते हैं तभी यह महाशय उनके साथ-साथ या आगे-आगे शोर मचाते चलने लगते हैं, जिससे हिरण, नीलगाय वगैरह समझ जाते हैं कि उनका शिकारी आसपास है और वे चौकन्ने हो जाते हैं। इसकी इसी खूबी के कारण देश के कई हिस्सों में इसे कोतवाल, यानि पहरेदार,  कह कर भी जाना जाता है। 


भृंगराज गहरे नीले-काले रंग का एक कलगी धारी सुंदर पक्षी है। इसकी आवाज भी बहुत मधुर होती है। पता नहीं इसे बाघ से इतनी चिढ क्यूं है।  बेचारा बाघ जब भी अपने भोजन की तलाश में शिकार करने निकलता है भृंगराज उसके आने की सूचना प्रसारित कर उसके शिकारों को भगा देता है, और बाघ जैसा शक्तिशाली जानवर भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता क्योंकि वह सदा सुरक्षित दूरी पर रह कर ही अपने काम को अंजाम देता है।

प्रकृति का अजब खेल है कि जंगल में जहां बहुतेरे पशू-पक्षी एक दूसरे पर निर्भर करते हैं या एक दूसरे के काम आते हैं वहीं बाघ और भृंगराज का आपस में छत्तीस का आंकड़ा है।

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

यहाँ गाय मछली खाती है

राजधानी दिल्ली के पास तेजी से महानगर का रूप लेता हरियाणा का शहर गुड़गांव। उसके पास 15 की मी के करीब है सुंदर मनोहर सुल्तानपुर नेशनल पार्क। जहां वर्षों से देश-विदेश के पक्षी आ कर बसेरा बनाते रहे हैं। इसी पार्क के बीच है (थी) एक खूबसूरत झील जो कभी 195 एकड़ में फैली हुई थी और उसमें सदा 5-6 फिट पानी भरा रहता था। आज यह सरकारी कर्मचारियों की अदूरदर्शिता के कारण बिल्कुल सूख कर हजारों हजार मछलियों के कब्रिस्तान में बदल गयी है। यहां, वहां, जहां, तहां सब जगह मरी हुई मछलियां बिखरी पड़ी हैं। जो गर्मी के कारण सड़ कर चारों ओर दुर्गंध फैला रही हैं। नाक पर रुमाल रखे बिना दो मिनट खड़े रहना दूभर हो गया है।

अफसरों का कहना है कि इस बार जाड़े में पानी कम बरसने के कारण झील सूखी है। पर वे यह नहीं बताते कि पहले ऐसा क्यूं नहीं हुआ। जब हर साल गर्मियों में गुड़गांव नहर से इसमें पानी की आपूर्ती की जाती रही है तो इस बार ऐसा क्यूं नहीं किया गया?
सच्चाई तो यह है कि इस झील में पाई जाने वाली "मागुर" मछली, जिसे काली अफ्रिकी मछली के नाम से भी जाना जाता है, को खत्म करने के लिए इसमें जानबूझ कर पानी नहीं छोड़ा गया। तर्क है कि मागुर बाकि छोटी-छोटी मछलियों को खा जाती थी जिससे बाहर से आने वाले पक्षियों को उनकी खुराक नहीं मिल पाती थी। पर कोई उनसे पूछेगा कि मागुर के साथ और हजारों मछलियों, मेढकों, घोंघो तथा और पानी में रहने वाले सैंकड़ों जीवों की क्यूं अकारण हत्या की गयी। इतना ही नहीं झील पर आश्रित बहुतेरे चौपाए भी मौत की कगार पर पहुंच गये हैं। और फिर मागुर को पालते वक्त ये "बुद्धिमान" लोग कहां थे? क्या इन्हें इस मछली के स्वभाव का पता नहीं था?

अब सुनिये इस जबरदस्त मानवी भूल का सबसे हौलनाक मंजर जिसे कहते बताते रौंगटे खड़े हो जाते हैं।
पूरे नेशनल पार्क में जगह-जगह मरी मछलियां बिखरी पड़ी हैं। जो धूप में सूख-सूख कर पत्तों जैसी हो गयी हैं। जिनको वहां घूमती गायों ने चारा समझ कर खाना शुरु कर दिया है।
मेरे पास फोटो नहीं है पर दिल्ली के टाइम्स आफ इंडिया पेपर में मछली खाती गाय का चित्र छपा है।

क्या उल्टे-सीधे निर्णय लेने वाले सफेदपोशों की आत्मा उन्हें धिक्कारेगी कभी ?

सोमवार, 5 जुलाई 2010

शाकाहारी, सब पर भारी

शाकाहार या मांसाहार, क्या ठीक है क्या नहीं इस बहस में पड़े बिना यदि ऐसी धारणा है कि मांसाहार से ताकत, बल या शरीर सौष्ठव बढता है तो क्या इस सत्य को नकारा जा सकता है -

1, हाथी :- स्थल का सबसे भारी जीव।
वजन करीब 6 टन।
ऊंचाई 15-16 फुट।
आहार - घास, पत्तीयां, फल इत्यादि।

2, गैंड़ा :- स्थल का सबसे ताकतवर जानवर। जिससे भिड़ने में शेर भी घबड़ाता है। जिसकी चमड़ी को बबदूक की गोली भी नहीं भेद सकती।
वजन करीब तीन टन।
आहार - पत्तीयां और हरी घास।

3, घोड़ा :- सबसे फुर्तीले जानवरों में से एक। वजन करीब 800 से 1000 किलो। मेहनती, ताकतवर आकर्षक।
आहार - घास, अनाज वगैरह।

4, जिराफ :- स्थल का सबसे ऊंचा जानवर।वजन करीब 1000 किलो। आहार - घास, पत्तियां और फल।

शनिवार, 3 जुलाई 2010

तलाक है कि मजाक है :-)

बैंकाक में एक किसान ने अदालत में अपनी बीवी को तलाक देने के लिए अर्जी दी। जानते हैं कब, अपनी शादी की 73वीं सालगिरह पर। और कारण बताया कि हम दोनों का स्वभाव मेल नहीं खाता।

जापान के एक पति महोदय अपनी पत्नी से तलाक लेकर इतने खुश थे कि इस दिन को हर साल मुक्ति दिवस के रूप में मनाया करते थे। वर्षों बाद ऐसे ही एक मुक्ति दिवस समारोह में उनकी मुलाकात अपनी उसी भूतपूर्व पत्नी से हो गयी।
फिर? फिर क्या, वे दोनो फिर पति-पत्नी बन गये।

सुप्रसिद्ध हालिवुड़ अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर और अभिनेता रिचर्ड़ बर्टन एक दूसरे से तीन-तीन बार तलाक लेने के बाद फिर-फिर आपस में शादी के बंधन में बंधते रहे थे।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

कुल्लू-मनाली जाएं तो "मलाणा" का चक्कर भी लगाएं

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। अनोखे लोग, अनोखे रीति-रिवाज, अनोखे स्थल। ऐसी ही एक अनोखी जगह है, हिमाचल की पार्वती घाटी या रूपी घाटी मे 2770मी की ऊंचाई पर बसा गावं "मलाणा"।

विद्वानों के अनुसार यह विश्व का लोकतांत्रिक प्रणाली से चलने वाला सबसे पुराना गावं है। यहां पहुंचने के दो रास्ते हैं, पहला कुल्लू जिले के नग्गर इलाके का एक दुर्गम चढ़ाई और तीक्ष्ण उतराई वाला, जिसका बरसातों मे बहुत बुरा हाल हो जाता है, पर्यटकों के लिये तो खास कर ना जाने लायक। दूसरा अपेक्षाकृत सरल, जो जरी नामक स्थान से होकर जाता है। यहां मलाणा हाइडल प्रोजेक्ट बन जाने से जरी से बराज तक सुंदर सडक बन गयी है, जिससे गाडियां बराज तक पहुंचने लग गयीं हैं। यहां से पार्वती नदी के साथ-साथ करीब 2किमी चलने के बाद शुरू होती है 3किमी की सीधी चढ़ाई, पगडंडी के रूप मे। घने जंगल का सुरम्य माहौल थकान महसूस नहीं होने देता पर रास्ता बेहद बीहड तथा दुर्गम है। कहीं-कहीं तो पगडंडी सिर्फ़ दो फ़ुट की रह जाती है सो बहुत संभल के चलना पड़ता है। पहाडों पर रहने वालों के लिए तो ऐसी चढ़ाईयां आम बात है पर मैदानों से जाने वालों को तीखी चढ़ाई और विरल हवा का सामना करते हुए मलाणा गांव तक पहुंचने में चारेक घंटे लग जाते हैं।

हिमाचल के सुरम्य पर दुर्गम पहाड़ों की उचाईयों पर बसे इस गांव, जिसका सर्दियों में देश के बाकि हिस्सों से नाता कटा रहता है, के ऊपर और कोई आबादी नहीं है। आत्म केन्द्रित से यहां के लोगों के अपने रीति रिवाज हैं, जिनका पूरी निष्ठा तथा कड़ाई से पालन किया जाता है, और इसका श्रेय जाता है इनके ग्राम देवता जमलू को जिसके प्रति इनकी श्रद्धा, खौफ़ की हद छूती सी लगती है। अपने देवता के सिवा ये लोग और किसी देवी-देवता को नहीं मानते। यहां का सबसे बडा त्योहार फागली है जो सावन के महिने मे चार दिनों के लिये मनाया जाता है। इन्ही दिनों इनके देवता की सवारी भी निकलती है, तथा साथ मे साल मे एक बार बादशाह अकबर की स्वर्ण प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। कहते हैं एक बार अकबर ने अपनी सत्ता मनवाने के लिये जमलू देवता की परीक्षा लेनी चाही थी तो उसने अनहोनी करते हुए दिल्ली मे बर्फ़ गिरवा दी थी तो बादशाह ने कर माफी के साथ-साथ अपनी सोने की मूर्ती भिजवाई थी। इस मे चाहे कुछ भी अतिश्योक्ति हो पर लगता है उस समय गांव का मुखिया जमलू रहा होगा जिसने समय के साथ-साथ देवता का स्थान व सम्मान पा लिया होगा। सारे कार्य उसी को साक्षी मान कर होते हैं। शादी-ब्याह भी यहां, मामा व चाचा के रिश्तों को छोड, आपस मे ही किए जाते हैं।

कुछ साल पहले तक यहां किसी बाहरी व्यक्ती का आना लगभग प्रतिबंधित था। चमडे की बनी बाहर की कोई भी वस्तु को गावं मे लाना सख्त मना था। पर अब कुछ-कुछ जागरण हो रहा है। लोगों की आवाजाही बढ़ी है। पर अभी भी बाहर वालों को दोयम नजर से ही देखा जाता है। इनके मंदिर के प्रांगण में किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है।

यहां करीब डेढ सौ घर हैं तथा कुल आबादी करीब पांच-छह सौ के लगभग है जिसे चार भागों मे बांटा गया है। यहां के अपने रीति-रिवाज हैं जिनका पूरी निष्ठा तथा सख्ती के साथ पालन होता है। अपने किसी भी विवाद को निबटाने के लिये यहां दो सदन हैं, ऊपरी तथा निचला। यही सदन यहां के हर विवाद का फ़ैसला करते हैं। यहां के निवासियों ने कोर्ट कचहरी का नाम भी नहीं सुना है।
वैसे तो यहां आठवीं तक स्कूल,डाक खाना तथा डिस्पेंसरी भी है पर साक्षरता की दर नहीं के बराबर होने के कारण इलाज वगैरह मे झाड-फ़ूंक का ही सहारा लिया जाता है। भेड पालन यहां का मुख्य कार्य है। वैसे नाम मात्र को चावल, गेहूं, मक्का इत्यादि की फसलें भी उगाई जाती हैं पर आमदनी का मुख्य जरिया है भांग की खेती। यहां की भांग जिसको मलाणा-क्रीम के नाम से दुनिया भर मे जाना जाता है, उससे बहुत परिष्कृत तथा उम्दा दरजे की हिरोइन बनाई जाती है तथा विदेश मे इसकी मांग हद से ज्यादा होने के कारण तमाम निषेद्धों व रुकावटों के बावजूद यह बदस्तूर देश के बाहर कैसे जाती है वह अलग विषय है।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

यह ब्लागवाणी को क्या हो गया है भाई ?

यह ब्लागवाणी को क्या हो गया है?
बीस-पच्चीस दिन दूर रहने के बाद अब जब भी इसे खोलता हूं तो वही 14जून का ही प्रवचन सुनने (देखने) को मिल रहा है। वहीं पर अटकी हुई मिलती है। कुछ ज्यादा ही गड़बड़ है या कोई और कारण है समझ नहीं आ रहा है?
कृपया बताएंगे क्या?

कैटल क्लास और लगेज क्लास हमारी नियति

जब भी कभी हवाई यात्रा करनी हो तो मनाएं कि "पैसेज" की तरफ की सीट मिले। रेल यात्रा में चाहे ए सी 3टियर हो या स्लीपर भूल कर भी साईड वाली दो बर्थों का ना सोचें। ऐसा ना हो कि सफर, Suffer बन कर रह जाए।

शशि थुरूर की राजनीति से विदाई उनकी धूमकेतु रूपी चमक से संगी-साथियों की ईर्ष्या के कारण हुई या अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण यह बहस का विषय हो सकता है। पर वह इंसान ऐसा कड़वा सच बोलने पर क्यों मजबूर हुआ उस पर भी ध्यान देना उचित होगा। जिस-जिस ने आज की ललचाती दरों पर हवाई यात्रा की होगी वे भुग्तभोगी जानते ही होंगे कि घरेलू यात्रा के दौरान दो-तीन घंटे किस परिस्थिति में कटते हैं। बंधा हुआ सा बैठा रहता है यात्री। हिलने, ड़ुलने, यात्रा के दौरान एक बार उठने में भी हिचकिचाता हुआ चाहे प्रकृति की पुकार कितनी भी तीव्र हो।

बहुत पहले दूरदर्शन पर एक धारावाहिक आता था "राग दरबारी" उसमें एक बार एक सरकारी आदमी लोगों से परिवार को दो या तीन बच्चों तक सीमित रखने की पैरवी करता है। कथा का नायक उससे पूछता है कि इससे क्या होगा? तो पैरवी करने वाला उसे समझाता है कि मान लो तुमने घर में खीर बनाई, ज्यादा बच्चे होंगे तो खीर की कम मात्रा हिस्से मे आएगी, यदि कम बच्चे होंगे तो वे भरपेट खा सकेंगे। तो नायक पलट कर पूछता है कि खीर ज्यादा बनाने की जुगत क्यों नहीं करते? बच्चों के पीछे क्यों लट्ठ लिए पड़े हो?

अब एक उदाहरण ट्रेन का। पिछले दिनों अपने कार्यकाल मे श्रीमान लालूजी ने स्लीपर और वातानुकूलित डिब्बों में किनारे वाली शायिकाओं की संख्या बढवा कर दो से तीन करवा दी थीं। ना करवाने वाले ने उसमे कभी बैठना था ना करने वालों ने। अपने बेवकूफी भरे निर्णय पर कोई झांकने भी नहीं गया होगा। झूठी प्रशंसा पाने के चक्कर में जो गलत कदम उठाया गया था उस पर विरोध प्रगट करने की किसी की हिम्मत नहीं हुई थी। कोई यह ना समझा सका था उस भले आदमी को कि ऐसा करने पर यात्रा करने वाले को कितना "सफर" करना पड़ेगा। उस बेढंगे बदलाव के बाद वहां सिर्फ इतनी सी जगह बनती है कि आप अपना बड़ा अटैची रख सकें, ऊंचाई के हिसाब से। खुद तो वहां बैठना तो दूर आप ढंग से लेट कर करवट भी नहीं बदल सकते। भला हो भारत के दक्षिण में रहने वाले लोगों का जिन्होंने सबसे पहले इस फैसले के विरुद्ध आवाज उठाई थी। विरोध का फायदा सिर्फ इतना हुआ कि तीन के बीच से एक शायिका हटवा दी गयी। पर ऊपर वाली अपनी जगह पर कायम है, जिस पर चढने उतरने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। बुजुर्गों और महिलाओं के तो बिल्कुल भी वश की बात नहीं है कि उस पर चढने की सोचें भी। उस शायिका को अपनी जगह ना लाने का कारण उस पर जरूरत से ज्यादा होने वाला खर्च बता रेलवे ने पल्ला झाड़ लिया है। उसका कहना है कि यह "सिस्टम" जिनमें ऐसी शायिकाएं बची हैं उन डिब्बों के कबाड़ होने पर अपने आप खत्म हो जाएगा।

धन्य है हमारी सहनशीलता। पैसा खर्च करने के बाद भी हम जैसे तैसे यात्रा पूरी कर संतुष्ट हो जाते हैं। यह तो गनीमत है कि थरूर ने रेल में यात्रा नहीं की नहीं तो इन डिब्बों में आने-जाने वालों को "लगेज क्लास" कहलाने में देर नहीं लगती।