सोमवार, 31 मई 2010

मेरी खिचडी और अटलबिहारी बाजपेयी जी के गुलाबजामुन

ललित जी तो निकल लिए चुपचाप दिल्ली क लिए । अपन रह गये वहीं के वहीं वह भी महज एक जिद के कारण। अच्छी भली 6x2 की चलायमान सरकारी जगह भी आरक्षित थी, दिन भी निश्चित था, कार्यक्रम भी बना पड़ा था बस जबान धोखा दे गयी। खुद तो कह कर भीतर घुस गयी मुसीबत झेलनी पड़ी सारे शरीर को।

क्या है कि किसी ग्रह चक्कर के झांसे में आ मुंह से निकल गया कि आफिस में बहुत काम है मेरा जाना नहीं हो सकेगा। बस! फिर लाख मनुहारें हुईं, समझाइशें दी गयीं, पर इधर जो कह दिया सो कह दिया की तर्ज पर अपनी बीन बजाते रहे। बाद में जाने के समय "ईनो" के विज्ञापन की तरह हमने लाख हाथ हिलाए पर उधर यही समझा जाता रहा कि "बाय-बाय" हो रही है, और सब जने 1 2 3 ।

अब किस्सा कोताह यह कि एक जिद के कारण नहीं गये तो संसार की हर शह पिल पड़ी हमारे ऊपर। शरीर का कोई पुर्जा टेढा हुआ और पूरा का पूरा सिस्टम ऐंड़-बैंड़ हो कर रह गया।

अब शुरू होता है "खुदा का सेंस आफ ह्युमर।"
घर पर पदार्पण होता है मेरे मित्र त्यागराजन जी का।
"अरे!! शर्मा जी, क्या हाल बना रखा है? क्या हो गया? शुक्रवार तक तो ठीक थे।" जब उन्हें सारी बात बताई तो बोले " चिंता की कोई बात नहीं है। इधर-उधर का खाना बंद करें। दोनो समय मेरे यहां से खाना पहुंच जाएगा। वैसे क्या खायेंगे" फिर खुद ही बोले "तबियत ठीक नहीं है तो एक समय तो खिचड़ी ठीक रहेगी। सब्जी कौन सी खाते हैं?" मैंने कहा ऐसी कोई बात नहीं है मैं हर सब्जी खा लेता हूं। वे बोले नहीं नहीं फिर भी? क्या बोलूं ना बोलूं, मुंह से लौकी निकल गया। सारा मामला फिट।

अब जो मंगलवार से खिचड़ी और लौकी शुरु हुई तो रवीवार आ गया। मैं संकोच के मारे कुछ बोल नहीं पा रहा था। आप सब मेरी हालत का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं। आखिर भगवान को ही मेरे हाल पर दया आई। रवीवार मेरे पास आते ही उन्होंने कहा कि गीता (उनकी श्रीमती जी) कह रही थीं कि भाई साहब एक ही चीज रोज-रोज कैसे खाते हैं, उनको बदलने को पूछो। यह सुन मैंने कहा भाई मेरे आप जो प्रेम से ला रहे हो, खिला रहे हो, मैं खा रहा हूं। आप बदल देंगे तो मेहरबानी।
वे बोले, चलिए कल से आयटम बदलेंगे।

मैंने भी राहत की सांस ली और संकल्प किया कि धोनी जैसे कल के लड़के चाहे विज्ञापनों में कितना भी चिल्लायें, जिद करो, जिद करो। अपन ने फिर कभी जिद नहीं करनी।

इसी संदर्भ में श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के साथ घटी एक घटना याद आ गयी, जो उन्होंने ही कभी अपने अनुभव बांटते समय बताई थी।
एक बार वे महाराष्ट्र के दौरे पर थे। पहले दिन उन्हें नाश्ते में, दोपहर के भोजन में तथा रात्रि के समय भी खाने के साथ गुलाबजामुन परोसे गये। उन्हें कुछ अजीब तो लगा पर सौजन्यवश कुछ बोले नहीं। दूसरे दिन दूसरी जगह भी बार-बार वही गुलाबजामुन की मिठाई मिली फिर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। लेकिन जब तीसरे दिन भी वही गुलाबजामुनी हादसा पेश आने लगा तो उनसे नहीं रहा गया। यथासंभव प्रेम से उन्होंने पूछा कि क्या महाराष्ट्र में गुलाबजामुन ही अत्यधिक प्रिय मिठाई है? तो जो जवाब उन्होंने पाया उसे सुन वह हंसते-हंसते लोट-पोट हो गये। उन्हें बताया गया कि केंद्रीय कार्यालय से आपकी पसंद के बारे में एक पत्रक आया था जिसमें लिखा था कि आपको गुलाबजामुन बहुत प्रिय हैं, सो.............
बाजपेयी जी ने हंसते हुए बताया कि मैंने लौट कर पहला काम यही किया कि मेरी पसंद नापसंद को कार्यालय से भेजने की मनाही कर दी।

रविवार, 30 मई 2010

यकीन नहीं होता कि नूरा जैसे लोग होते हैं ?

आज रवीवार है। आज आपको एक प्यारे से भोले से बंदे के बारे में बताता हूं। इनका नाम है नूरा। ये बड़े पिंड के रहने वाले हैं। इनकी खासीयत है कि ये जो भी काम हाथ में लेते हैं उसे पूरा करते हैं। चाहे कुछ भी हो जाए। चाहे लोग मजाक बनाएं या हसीं उड़ाएं ये मस्त रहते हैं।

आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि इनके भोलेपन से एक ऐसा चुटकुला बन गया जिसको भाई लोगों ने जगह और किरदार बदल-बदल कर सैंकड़ों बार सैंकड़ों जगह फिट कर दिया है। पर असल में हुआ यह था कि ये जहां रहते हैं वहां अभी भी यात्री बस दिन में चार बार ही गुजरती है तो लोग उनके नंबर वगैरह से नहीं उनके क्रम से ही उन्हें अपनी सुविधानुसार काम में लेते हैं। पहली, दूसरी, तीसरी ईत्यादि के रूप में।

तो जनाब एक बार नूराजी के कोई संबंधी दिल्ली के मूलचंद अस्पताल में भर्ती थे। इन्हें आना पड़ा था। ये नई दिल्ली स्टेशन से पूछते पूछाते क्नाट प्लेस आए और वहां से एक आफिस जाते इंसान ने इन्हें बताया कि 342 नं की बस मूलचंद अस्पताल जाएगी। शाम को उसी आदमी ने अपने दफ्तर से लौटते हुए इनकी खास भेषभूषा की वजह से इन्हें पहचान और वहीं खड़े देख पूछा कि आप अभी तक यहीं खड़े हो तो तो इन्होंने खुश हो कहा कि बस 340 बसें निकल गयी हैं मेरी वाली भी आती होगी।

और यह पहली बार नहीं हुआ था। युवावस्था का सूर्य उदय होते-होते इन्हें एक कन्या अच्छी लगने लगी थी। पर वह इन्हें टरकाती रहती थी। इनके भोलेपन का फायदा उठा अपनी जरूरतें पूरी करती रहती थी। पर जब इनके प्रस्ताव बढने लगे तो उसने एक फरमाइश रख दी कि मुझे "क्रोकोडाइल बूट" ला कर दो तब मैं तुम्हारी बात सुनुंगी। अब क्या था नूराजी चल दिए जंगल के दलदल की ओर। एक दिन, दो दिन हफ्ता बीत गया। घर में हड़कंप मच गया कि लड़का गया तो कहां गया। खोज खबर हुई तो बात का पता चला। सब लोग जंगल पहुंचे तो देखते क्या हैं कि आठ-दस मगरमच्छ मरे पड़े हैं और नूरा एक और पर निशाना साधे बैठा है। लोगों ने कहा अरे तू कर क्या रहा है ? तो पता है इन्होंने क्या जवाब दिया, अरे मुझे इनके बूट चाहिये थे और ये सारे के सारे नंगे पैर ही घूम रहे हैं।
अब बताइये इतना भोला इतना लगन का पक्का इंसान आपने देखा है कभी। क्या ! देखा नहीं सिर्फ सुना है। ऐसा, तो चलिए इस बार चलते हैं बड़े पिंड।

शनिवार, 29 मई 2010

संवेदना ख़त्म हो चुकी है हमारे में !!!

कभी बेंगलूर, कभी दिल्ली, कभी हवाई जहाज, कभी बस, कभी रेल !
वही वहशत, वही दरिंदगी, वही हैवानियत, वही बेगुनाहों की लाशें, वही मौत का नंगा नाच। वही आंकड़ों का जमा -खर्च । वही नेताओं के रटे-रटाए जुमले। वही दी जाने वाली धन राशि का ऐलान।
जो मरे और जो सैकडों की तादाद मे घायल हुये, क्या कसूर था उनका। कभी पलट कर कोई उनकी सुध नहीं लेता। कोई नहीं पूछता कि किस खता की सजा उन्हें दी गयी। हां अपनी दुकान चमकाने बरसाती मेढकों की तरह कुछ जाने कुछ अनजाने चेहरे जरूर इर्द-गिर् मंड़राने लग जाते हैं कैमरों के सामने। जिन्होने यह सब किया वे तो जो हैं वो तो दुनिया जानती है। पर दुनिया जो शायद नहीं जानती वो यह है कि हम संवेदनहीन हो गये हैं। कोई व्याधि हमें नहीं व्याप्ति। हमारा विरोध सिर्फ़ चैनल बदल-बदल कर और ज्यादा रोमांचक दृश्य देखने तथा मुंह से अफ़सोसजनक शब्द निकालने तक ही रह गया है। हम सब दो मिनट देख अफसोस के दो शब्द बोल, सरकार के सिर जिम्मेदारी मढ किसी और चैनल की तरफ बढ जाते हैं।
क्योंकि संवेदना खत्म हो चुकी है हमारे दिलों में !!

शुक्रवार, 28 मई 2010

आप के यहाँ भी बी.एस. एन. एल. है, भाई आप भी हिम्मती हैं.

कुछ दिनों पहले सरकारी फोन 45 दिन तक कोमा में रहा था। डेस्क-डेस्क, केबिन-केबिन के यंत्रं पर पुकार लगायी पर वे भी तो अपने आकाओं से कम कहां है, सब मशीनी आवाज लिए बैठे होते हैं। सब को हिलाया, डुलाया, झिंझोड़ा पर सरकारी कछुआ अपनी चाल चलता रहा। हां इतना बदलाव जरूर आया है कि भाषा बदल गयी है। काम अपने समय पर ही करना है पर सांत्वना उड़ेल के रख दी जाने लगी है।

किसी और कंपनी का होता तो वहां हड़कंप मच गया होता। पर यहां किसे परवाह ग्राहक जाता है तो जाए ना जाए तो अपनी बला से।पर एक बात है फोन काम करे ना करे बिल जरूर दो दिन पहले टपका दिया जाता है। अब बिल की भी सुन लीजिए। हम जिसे सुविधा समझ सरकार के अहसानमंद होते हैं कि उसने जगह-जगह पैसे जमा कराने की सहूलियत दे रखी है, वह भी बार-बार चलावा ही नजर आता है। ऐसी ही एक जगह है पोस्ट आफिस जहां आप फोन का बिल जमा करवा सकते हैं। पर इस आफिस और उस आफिस का 36 का आंकड़ा है। दोनों का तालमेल ही नहीं बैठ पाता। पहले भी ऐसा तीन-चार बार हो चुका है कि पोस्ट आफिस में निर्धारित समय के पहले पैसे जमा कराने के बावजूद पता चलता है कि आपका बिल जमा नहीं हुआ है। पोस्ट आफिस वाले कहते हैं कि हम अंतिम तारीख के दो दिन पहले ही पैसा भेज देते हैं। उधर वाले इल्जाम लगाते हैं कि पैसा पहुंचा ही नहीं। आप दौड़ते रहिए इस से उस तक। भले ही आपने समय पर अपना काम कर दिया हो पर सरकार की नजर में आप अपराधी हैं और उसका फल होता है फोन की आक्सीजन बंद हो जाना। इस महीने फिर वही लंका कांड़ दोहराया गया। पैसे जमा होने के बावजूद दोषी ठहराना उनका फर्ज बनता था, उन्होंने अपना काम किया। अब अपने को सिद्ध करना अप्प का काम था तो करते रहिये। उसके लिए आप बिमार हों, काम-काज का बोझ हो या कोई भी कारण हो उससे किसी को कोई मतलब नहीं। और ऐसा भी नहीं है कि जहां आपने पैसा जमा करवाया है वहीं आपका काम हो जाएगा नहीं अपने को दोष मुक्त कराने एक स्पेशल आफिस में एक स्पेशल आफिसर के सामने अपने स्पेशल समय पर हाजिर हो विनम् स्वर में प्रार्थना करनी होगी कि गलती मेरी नहीं है।

अरे भाई जब आप लोगों में ताल-मेल नहीं है तो क्यों जगह-जगह पैसे बटोरने की दुकान लगाए बैठे हो एक ही जगह रखो ताकि आदमी एक ही बार सूली चढे। और या फिर अपनी भूल, गलती, लापरवाही जो भी है उसका हरजाना दो। ऐसे ही कोई सिरफिरे पहाड़ के नीचे ऊंट आगया तो फिर जै राम जी की हो जाएगी।

पर ऐसे एक दो किस्सों से किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है?

गुरुवार, 27 मई 2010

मेरे नीचे शेरों का शाह सोया हुआ है.

मैं शेरशाह सूरी का मकबरा हूं।

वही शेरशाह जिसके बचपन का नाम फरीद था पर जिसने युवावस्था में ही एक आदम खोर शेर को मार यह नाम हासिल किया था। वैसे भी वह शेरों का शेर था।   यह वही   शेरशाह था जिसने मुगल सल्तनत को झकझोर
कर रख दिया था। यह वही शेरशाह था जिसके ड़र के मारे हुमायूं को फारस भागना पड़ा था। सिर्फ पांच साल के शासन काल में ही उसने ऐसा कुछ कर दिया कि चाह कर भी इतिहासकार उसे नजरंदाज नहीं कर पाते हैं। पर मेरा यह मानना है कि उसे इतिहास के पन्नों में वह जगह नहीं मिली जिसका वह हकदार था।

अपने छोटे से शासन काल में उसने हिंदू-मुस्लिमों में कभी भेदभाव नहीं बरता। उसकी नजर में सच्चे मुसलमान का अर्थ था जिसमें ईमान कूट-कूट कर भरा हो। यही कारण था कि हुमायूं को हराने वाला कट्टर शत्रु होते हुए भी अकबर ने उसके सुझाए मार्ग पर  चल  कर  ही   भारत  में  मुगल साम्राज्य की नींव 
पुख्ता की. शेरशाह सदा अपने प्रजा जनों के हित में सोचा करता था।         तभी तो संभवत दुनिया में पहली बार करीब ढाई हजार मील लंबी सड़क का निर्माण उसके शासन काल में हुआ। सिर्फ सड़क ही नहीं बनाई उसके रख-रखाव का भी पुख्ता इंतजाम करवाया। सड़क के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाए, प्याऊ बनवाए तथा विश्राम के लिए सरायों का भी इंतजाम किया।

अब मैं अपने बारे में बताता हूं। मैं बिहार के सासाराम शहर के पश्चिमी भाग में एक झील के मध्य में स्थित हूं। मेरा निर्माण शेरशाह की मृत्यु के तीन महीने बाद उसके पुत्र इस्लाम शाह ने करवाया था। पर कहते हैं कि मेरा नक्शा खुद अपने जीवनकाल में शेरशाह ने तैयार कर लिया था। उसका प्रमाण भी है इस झील का निर्माण जो हिंदुओं के मंदिरों की परिकल्पना है और भवन मुस्लिम स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। शेरशाह वीर तो था ही कलाप्रेमी भी था। इसकी गवाह हैं मेरी बड़ी-बड़ी खिड़कियों में बनी नक्काशीदार जालियां जो विबिन्न आकारों और रूपों में बनाई गयी हैं। कभी पधार कर देखें कि उन्होंने मेरी शोभा में कैसे चार चांद लगा रखे हैं। मेरे अंदर शेरशाह की कब्र के अलावा चौबीस और कब्रें भी हैं जो उसके मित्रों और अधिकारियों की हैं। सभी पर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं।

मेरा गोलाकार स्तूप, जो पांच सौ सालों से प्रकृति की मार झेलते हुए भी सर उठाए खड़ा है, ढाई सौ फुट चौड़ा और डेढ़ सौ फुट ऊंचा है। झील से मकबरे तक आने के लिए एक पुल बना हुआ है जिस पर पैर रखते ही आपके और मेरे बीच की दूरी खत्म हो जाती है। मकबरे में ऊपर जाने के लिए सीढियां बनी हुई हैं। मेरे आसपास का दृष्य भी बहुत मनमोहक है, हरियाली की भरमार है। मेरी देखरेख करने के लिए जो रक्षक है वही यहां सदा एक शमा जलाए रखता है और समय-समय पर नमाज अता करता है। वैसे आजकल मेरी पूरी जिम्मेदारी भारत सरकार ने संभाल रखी है।

कभी भी बिहार आने का मौका मिले तो शेरों के शाह को याद करने और उसकी निशानी के तौर पर मुझे देखने जरूर आईयेगा।

खुदा हाफिज।

सोमवार, 24 मई 2010

उनके जीते-जी मरने की खबर छप गयी

बात उन सांध्य पर्चों की नहीं हो रही है, जो बिक्री बढाने के लिए दो पन्नों के पर्चे में हेड़िंग दे देते थे "हेमा मर गयी" और नीचे छोटे-छोटे अक्षरों में लिखा रहता था कि फलाने सर्कस की हथिनी हेमा का इंतकाल हो गया। बात हो रही है बड़े अखबारों की, जिनमें पता नहीं कैसे कभी-कभी बड़े नामवर लोगों के मरने की खबरें छप जाती हैं जिससे अजिबोगरीब स्थितियां बन जाती रही हैं।

ऐसे ही एक दिन जब जार्ज बनार्ड़ शा ने सबेरे वेस्ट अफ्रीकन पाइलोट अखबार उठाया तो उसमें अपने मरने की खबर पढी। उन्होंने उसी समय संपादक को फोन किया कि महाशय आपके पत्र में मेरे मरने की खबर है पर मैं आपको यह बता दूं कि मैं अभी मरा नहीं अधमरा हूं।

एक बार रूड़यार्ड़ किपलिंग की मृत्यु का शोक समाचार एक अखबार में छप गया। पहले तो किपलिंग आश्चर्चकित रह गये, फिर उन्होंने अखबार के संपादक को एक पत्र लिखा कि आपका पत्र सदा सच का पक्षपाती रहा है तो जो मेरे मरने की खबर छपी है वह सत्य ही होगी। अब जब मैं रहा ही नहीं तो अपने अखबार से मेरी सदस्यता खत्म कर दें। संपादक की हालत का अंदाज लगाया जा सकता है।

आस्कर वाइल्ड़ को भी ऐसी खबर से दो-चार होना पड़ा था। खबर पढते ही उन्होंने संबंधित अखबार के संपादक को फोन किया कि यार कैसी-कैसी खबरें छाप देते हो?सपादक जो उनका मित्र था उसने मजाक में तुरंत पूछा, वाइल्ड़ पहले यह बताओ तुम बोल कहां से रहे हो, स्वर्ग से या जमीन से ?

रविवार, 23 मई 2010

काक्रोच या तिलचट्टा, तिल-तिल कर सब चट कर जानेवाला

काक्रोच या तिलचट्टा। दुनिया के आदिम जीवों में से एक। नाम भी कैसा है तिल-तिल कर हर चीज को चट कर जाने वाला। अपनी इसी लियाकत और हर हाल में "एडजस्ट' कर लेने के गुण के कारण ही यह बड़े-बड़े दिग्गजों के सफाए के बावजूद अपना अस्तित्व बचाए रखने में सफल रहा है। इसका एक ही मूल मंत्र है, कैसे भी हो जिंदा रहना है।

घरों में पाए जाने वाले काक्रोच सब कुछ हजम कर जाते हैं, चाहे वह खाद्य हो चाहे अखाद्य उनके लिये सब भगवान का प्रसाद है। जंगलों में रहने वालों के लिए तो और भी "वैराइटियां" उपलब्ध होती हैं।

इनकी बहुत सारी प्रजातियां पायी जाती हैं पर लाखों वर्षों के बाद भी इनकी आदतों या रूप-रंग में बदलाव नहीं आया है। इनकी त्वचा पर प्राकृतिक तेलों और मोम की परत लगी रहती है इसलिए पानी का इन पर कोई असर नहीं होता। प्रकृति ने इनके मुंह के सामने का भाग बहुत संवेदनशील बनाया है वहां एंटेना की तरह के दो बाल दिये हैं जिनकी सहायता से यह अपना वातावरण पहचानता है। इन्हीं से यहवायु के तापमान को पहचान कर अपने लिए सुरक्षित जगह ढूंढ लेता है। इसके साथ-साथ इसके पैरों में भी एक अनोखी शक्ति होती है जिससे यह सुक्ष्म से सुक्ष्म कंपन को महसूस कर लेता है। जरा सा खतरा भांपते ही यह अपनी ग्रंथियों से एक गंध फैलाता है, आवाज करता है जिससे इसके अन्य साथी चेतावनी पा सुरक्षित जगहों में चले जाते हैं।

इसने भले ही अपने आप को कितना भी सुरक्षित कर रखा हो पर यह मनुष्य जाति को असुरक्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। सब कुछ खाने और हर जगह रहने के कारण यह घरों के खाद्य पदार्थों में किटाणु फैलाने का अहम जरिया है। इसके कारण दुषित खाने या पानी को ग्रहण कार हर साल हजारों लोग कालकल्वित हो जाते हैं। तो भले ही यह अपने आप में अजूबा हो इससे बच कर रहने में ही भलाई है।

शनिवार, 22 मई 2010

अंडे, अजीब पर गरीब नहीं

पहले मुर्गी आई कि अंड़ा यह सवाल वर्षों से लोगों को सर खुजलाने पर मजबूर करता रहा है। अपन इस पचड़े में ना पड़ आज सिर्फ अंड़ों की बात करते हैं जो अपने-आप में बहुत सारे अजूबे समेटे रहते हैं।

कुछ सालों पहले एक वैज्ञानिक ने कौतुहलवश एक अंडे के चार टुकड़े कर फिर उसे जोड़ कर रख दिया। कुछ दिनों बाद उसे सुखद आश्चर्य का सामना करना पड़ा, जब उसने उस अंड़े से एक चूजे को बाहर निकलते देखा।

एक अंड़े में तकरीबन 1500 छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जो उसे (चूजे) आवश्यक आक्सीजन लेने में सहायता करते हैं।

सहारा के रेगिस्तान में एक मक्खी पायी जाती है जो उड़ते-उड़ते ही अंड़े देती है। इन अंड़ों के जमीन पर गिरते ही मक्खियां जन्म ले लेती हैं।

चिली में एक ऐसी मुर्गी की प्रजाति पाई जाती है जो चितकबरे अंड़े देती है।
आस्ट्रेलिया में एक लुप्तप्राय शतुर्मुर्ग का अंड़ा 40 साधारण मुर्गियों के अंड़ों के बराबर होता है, जिसे उबालने में ढाई से तीन घंटे लग जाते हैं तथा इतना मजबूत होता है कि 150 कि.ग्रा. का वजन आसानी से सह लेता है।

अंड़े सिर्फ गोलाई लिए ही नहीं होते। केलिफोर्निया की "हार्नशार्क" नामक मछली के अंडे स्क्रू की तरह के होते हैं।

@ अंड़ों से जुड़ी एक सोलह आने सच्ची घटना :-)
चार सौ मुर्गियों के पौल्ट्री फार्म में रोज अंड़ों की कम होती संख्या से गुस्साए रिटायर्ड़ मेजर ने एलान कर दिया कि कल से किसी भी मुर्गी ने दो अंड़ों से कम दिए तो उसे ही काट कर बेच दिया जाएगा। दूसरे दिन मेजर ने अपने सामने अंड़े गिनवाए तो आठ सौ एक अंड़े मिले। उसने नौकरों से पूछा किस मुर्गी ने एक अंड़ा कम दिया उसे बाहर निकालो। एक नौकर ने जवाब दिया, मालिक सभी मुर्गियों ने दो-दो ही अंड़े दिये हैं यह आठसौ एकवां तो अपने एकलौते मुर्गे ने आपके ड़र के मारे दे दिया है।

गुरुवार, 20 मई 2010

"महामृत्युंजय मंत्र" का भावार्थ

हमारे मंत्र और श्लोक इत्यादि अपने में गुढार्थ लिए होते हैं। इनका उपयोग करने की शर्त होती है कि इनका उच्चारण शुद्ध और साफ होना साहिए। बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो उन्हें पढने या जाप करने के साथ-साथ उसका अर्थ भी पूरी तरह जानते हों, नहीं तो मेरे जैसे जैसा रटवा दिया गया या पढ-सीख लिया उसका वैसे ही परायण कर लेते हैं। मंत्रों में सबसे शक्तिशाली मंत्र शिवजी का "महामृत्युंजय मंत्र" है। आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है।

कहीं पढा था कि अभिनेता पृथ्वीराज कपूर, जिन्हें फिल्मी दुनिया मे पापाजी के नाम से भी जाना जाता था, जीवन के अंतिम क्षणों मे बिस्तर पर लेटे हुए थे, अंत निश्चित था पर सांसों की लड़ी टूट ही नहीं रही थी। उन्हें काफी कष्ट भी हो रहा था। जब काफी देर हो गयी तो जैसे उन्हें कुछ ध्यान आया और उन्होंने पूछा कि प्रेमनाथ (उनके बेटे राज कपूर की पत्नी के बड़े भाई, जिनका लगाव पृथ्वीराज जी से बहुत था) कहां है। खोज की गयी तो पता चला कि वह पापाजी के लिए महामृत्युंजय का पाठ कर रहे हैं। खबर मिलते ही पृथ्वीराज जी ने कहा कि उससे कहो कि मेरा समय पूरा हो चुका है वह अब मंत्र पाठ बंद कर दे। इधर प्रेमनाथ ने परायण बंद किया उधर पृथ्वी जी की आत्मा का परमात्मा में विलय हो गया।

इस बार की कादम्बिनी पत्रिका मे डा.एस.के.आर्य जी द्वारा इस मंत्र का भावार्थ दिया गया है। सबके हित के लिए उसे यहां दे रहा हूं।


"ओ3म् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात्।।"

भावार्थ :- हम लोग, जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा, बल को बढाने वाला रुद्र्रूप जगदीश्वर है, उसी की स्तुति करें। उसकी कृपा से जैसे खरबूजा पकने के बाद लता बंधन से छूटकर अमृत तुल्य होता है, वैसे ही हम लोग भी प्राण और शरीर के वियोग से छूट जाएं, लेकिन अमृत्रूपी मोक्ष सुख से कभी भी अलग ना होवें। हे प्रभो! उत्तम गंधयुक्त, रक्षक स्वामी, सबके अध्यक्ष हम आपका निरंतर ध्यान करें, ताकि लता के बंधन से छूटे पके अमृतस्वरूप खरबूजे के तुल्य इस शरीर से तो छूट जाएं, परंतु मोक्ष सुख, सत्य धर्म के फल से कभी ना छूटें।

कल देखेंगे कि मंत्र में दुनिया में इतने सारे फलों के बावजूद खरबूजे का ही चयन उसके किन खास गुणों के कारण किया गया है।

बुधवार, 19 मई 2010

क्या पान खाना स्वास्थ्यप्रद है?

पान का सेवन हमारे यहां सैकड़ों वर्षों से होने के प्रमाण मिलते हैं। खास-खास अवसरों पर या आदर-सत्कार में तो इसका चलन तो है ही। किसी बड़े या कठिन काम के लिए भी इसका बीड़ा दिया जाता रहा है। पर कहीं-कहीं यह व्यसन की सीमा तक भी जा पहुंचा है।

आयुर्वेद में भी इसके उपयोग का जिक्र मिलता है जहां इसे "तांबूल या नागरबेल" का नाम दिया गया है। इसके अनुसार इसके खाने से मुख की स्वच्छता, खाने में रुचि तथा मुंह दुर्गंध रहित रहता है।

आजकल तो पान में तरह-तरह के मसाले, तंबाकू, किमाम और ना जाने किन-किन चिजों का इस्तेमाल होने लगा है जिनका दीर्घकाल तक सेवन स्वास्थ्य पर विपरीत असर डालता है। पान का सेवन बिना किसी नशीले पदार्थ के होना चाहिए। इसमें चूने, कत्थे की उचित मात्रा के साथ-साथ जायफल, सुपारी, इलायची और लौंग का उपयोग किया जा सकता है। इसे मुंह में रख धीरे-धीरे चबाना चाहिए तथा इससे जो रस बने उसे निगलते रहना चाहिए। सुपारी का भी ज्यादा उपयोग ना ही हो तो बेहतर है।

पान का सेवन बेस्वाद मुख को ठीक करता है, जीभ साफ रखता है, दांतों व जबड़ों के लिए फायदेमंद रहता है तथा गले के लिए भी उपयोगी है। इसका उपयोग सुबह मुंह साफ करने के बाद भोजनोपरांत तथा रात के खाने के बाद किया जाना चाहिए।
पर कुछ परिस्थितियों में पान खाना निषिद्ध कहा गया है -
जब नाक, मुंह, कान, गुदा से खून आता हो।
अत्यधिक थकान में।
गश आते हों तो।
गले में या शरीर में सूजन हो तो।
आंखें आयी हुई हों तो।
तथा गरम प्रकृति के व बहुत कृशकाय व्यक्ति को इसके सेवन से बचना चाहिए।

तो चलिए एक पान हो जाए.....

मंगलवार, 18 मई 2010

कृत्य है जिनका दानव सा, कहते तुम उनको मानव हो?

यह कोई कविता नहीं है, क्योंकि मुझे कविता लिखनी आती ही नहीं, नाही उसकी समझ है। जब दिलो-दिमाग आक्रोशित हों, बेकाबू होती परिस्थितियों से, कुछ ना कर पाने की कशमकश हो, जो कुछ कर पा सकते हैं वे भी आग में आहूती देते दिखें तो ऐसे में उपजे उद्वेग से निकला यह शब्द समुह है। जो सवाल कर रहा है उन सभी से जो इस रोज होते नर संहार के घिनौने प्रकरण को खत्म ना कर अपनी-अपनी पुरियां तले जा रहे हैं। एक शांत प्रदेश को ज्वालामुखी बना कर धर दिया है।

उनका खून, खून है, इनकी जिंदगी बे-मानी है?
इनकी जान की कोई कीमत नहीं, उनकी मौत कुर्बानी है?
कृत्य है उनका दानव सा, कहते तुम उनको मानव हो?
किसके किस अधिकार की बातें तुम करते हो?
ममता, स्वामी, दिग, यश, अरुन्धती,
आंखें खोलो ना बनो गांधारी,
निष्पक्ष हो बात करो छोड़ो फैलाना बिमारी।
पूछो अपने जमीर से हो रहा क्या सब ठीक है?
उजड़ रहे हैं घर, साया छिन रहा बच्चों का, बेसहारा हो गये मां-बाप, क्या कसूर था इन बेवाओं का?
त्यागो अपनी हठधर्मिता, जाओ जाकर उनसे पूछो, कहां से आए, क्या चाहते हैं? बहाते क्यों खून निर्दोषों का? बात करते किस न्याय की, वैर निभाते किस बैरी का?
आग है इतनी सीने में, धधक रही है ऐसी ज्वाला,
तो जा रक्षा करें सरहद की उस मिट्टी की जिसने है इनको पाला।
पर देश की रक्षा करना है इतना आसान नहीं। यह काम है वीर जवानों का।
वहां दाल ना गलती बुजदिलों की। ना बचाने खड़े होते हैं मौका परस्त।
वहां खेल होता है फर्रुखाबादी, धरे रह जाते हैं सारे बंदोबस्त।

रविवार, 16 मई 2010

आज तोता नहीं, कौवा है :-)

# संता और संतानी गोवा घूमने गये। वहां संता ने एक मोटर सायकिल किराए पर ली और दोनों घूमने निकल पड़े। अब संता तो संता ऊपर से पीछे बैठी बीवी उसने बीवी पर रौब ड़ालने के लिये उल्टी-सीधी बिना नियम कानून देखे गाड़ी चलाई फलस्वरूप एक चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस ने रोक कर चालान कर दिया। संता बोला सरजी आगे तो कोई और नहीं रोकेगा? पुलिसवाले ने कहा कोई रोके तो कह देना "तोता"।
संता के हाथ चिराग लग गया। दिन भर बेतहाशा गाड़ी दौड़ाता रहा। दूसरे दिन भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। नतीजतन एक जगह यातायात नियमों को तोड़ते फिर रोका गया। जैसे ही पुलिस वाला पास आया उसने अकड़ कर कहा "तोता"।
पुलिस वाले ने कहा पांच सौ रुपये निकालो, आज "कौवा" है।

# संतानी बंतानी से, तुम तो अपने कुत्ते की बहुत बड़ाई कर रही थी कि यह बहुत चतुर है, कैसे भला?जब भी मेरे पति आल्मारी खोलने लगते हैं, यह जोर-जोर से भौंकने लगता है।
बंतानी ने बात साफ की।

संता रात पी कर लौटा। पत्नी की नाराजगी से ड़र चुपचाप अपने कमरे मे जा एक बड़ी सी किताब उठा पढने लगा। पत्नी ने कमरे मे आते ही पूछा, आज फिर पी कर आए हो?
संता बोला नहीं तो।
तो फिर यह ब्रीफकेस मुंह के सामने रख क्या कर रहे हो? पत्नी ने पूछा।

शनिवार, 15 मई 2010

तोला, माशा, रत्ती

पुरानी चीजों की तरह पुराने नाप-तौल भी चलन के बाहर होते चले गए। कभी-कभी मुहावरों में या किसी ख़ास खरीद फरोक्त वगैरह में उन्हें भले ही याद कर लिया जाता हो नहीं तो आज की पीढी को तो वे अजूबा ही लगते होंगे। चलिए एक बार उन्हें याद ही कर लेते हैं :-

पुराने भारतीय नाप-तौल :-
8 खसखस = 1 चावल,
8 चावल = 1 रत्ती,
8 रत्ती = 1 माशा,
4 माशा =1 टंक, 12 माशा = 1 तोला,
5 तोला = 1 छटांक,
4 छटांक = 20 तोला या 1 पाव,
8 छटांक या 40 तोला = 1 अधसेरा,
16 छटांक या 80 तोला = 1 सेर,
5 सेर = 1 पसेरी,
8 पसेरी = 40 सेर या 1 मन,

1 केजी = 86 तोला या 1 सेर 6/5 छटांक,
100 केजी = 1 क्विंटल या 2 मन 27 5/2 सेर।

विभिन्न प्रदेशों के जमीन के नाप :-
उत्तर प्रदेश -
1 लाठा = 99 इंच या 8 फुट 3 इंच।
20 अनवांसी = 1 कचवांसी,
20 कचवांसी = 1 बिस्वांसी,
20 बिस्वांसी = 1 बिस्वा,
20 बिस्वा = 1 बीघा या 3025 वर्गगज,
8 बीघा = 5 एकड़ या 24200 वर्गगज।

बंगाल -
1 वर्ग हाथ = 1 गण्ड़ा,
20 गण्ड़ा = 1 छटांक,
16 छटांक = 1 काठा = 80 वर्गगज,
20 काठा = 1 बीघा,
121 बीघा = 40 एकड़ ( 1 एकड़ = 3 बीघा 8 छटांक)
1936 बीघा = 1 वर्गमील,

पंजाब -
1 करम = 3 हाथ,
9 वर्ग करम या सरसांई = 1 मरला,
20 मरला = 1 कनाल,
4 कनाल = 1 बीघा,
2 बीघा = 1 घूमा या 3240 वर्गगज।

बुधवार, 12 मई 2010

कभी न कभी आप के साथ भी ऐसा जरूर हुआ होगा

कभी-कभी कुछ अजीब सी स्थिति बन जाती है हमारी। उस समय तो कोफ्त ही होती है। पर ऐसा क्यों होता है कि :-

* जब आप घर में अकेले हों और नहा रहे हों तभी फ़ोन की घंटी बजती है।

* जब आपके दोनों हाथ तेल आदि से सने हों तभी आपके नाक में जोर की खुजली होती है।

* जब भी कोई छोटी चीज आपके हाथ से गिरती है तो वहाँ तक लुढ़क जाती है जहाँ से उसे उठाना कठिन होता है।

* जब भी आप गर्म चाय या काफ़ी पीने लगते हैं तो कोई ऐसा काम आ जाता है जिसे आप चाय के ठंडा होने केपहले पूरा नहीं कर पाते।

* जब आप देर से आने पर टायर पंचर का बहाना बनाते हैं तो दूसरे दिन सचमुच टायर पंचर हो जाता है।

* जब आप यह सोच कर कतार बदलते हैं कि यह कतार जल्दी आगे बढेगी तो जो कतार आपने छोडी होती हैवही जल्दी बढ़ने लगती है।

मर्फी के "ला" को छोडिये। यह बताईये ऐसा होता है क्या ? :-)

सोमवार, 10 मई 2010

धृतराष्ट्र हर युग में होते हैं।

कुछ दिनों पहले एक सामने घट रहे वाकये का जिक्र किया था "आज का धृतराष्ट्र जो खुद ही बैल को उकसा रहा है" के नाम से। जिसमें पुत्र मोह में पड़ा एक बाप अपने 32साला लड़के की इस बात को, कि उसका पहली पत्नि से तलाक हो चुका है और एक बच्चा भी है, छिपा कर फिर उसकी शादी करने जा रहा था। वह इंसान अपने लड़के के भविष्य(?) के लिए इतना अंधा हो चुका था कि उसे उस लड़की का जरा भी ख्याल नहीं आ रहा था, जिसे वह धोखे से अपनी बहू बना घर लाने जा रहा था। बहुत से लोगों ने बहुत तरह से उसे समझाने की कोशिश की। उसे समझाया कि लड़की वालों को सब साफ-साफ बता कर ही बात आगे बढाना नहीं तो शादी के बाद मुसीबत में फंस जाओगे। हर ऊंच-नीच समझाई कि यह कोई व्यसायिक गठबंधन नहीं होने जा रहा या यह रिश्ता दोस्ती-मैत्री का नहीं है कि पसंद नहीं आया या पटी नहीं आपस में तो अलग-अलग रास्ता अख्तियार कर लिया जाएगा। पर उसने किसी की बात पर भी ध्यान नहीं दिया। उसे यहां तक कहा गया कि यदि तुम्हारी बेटी के साथ कोई ऐसा करता तो तुम पर क्या बीतती? इसका कोई जवाब नहीं था उसके पास, उसे ऐसी नसीहत देने वाले अपने दुश्मन लग रहे थे। उसकी बस एक ही रट थी कि शादी हो जाएगी फिर सब ठीक हो जाएगा, क्या ठीक हो जाएगा इसका उसे भी पता नहीं था।

अगला 10-12 लोगों को ले सगाई कर आया तथा इसी आने वाली अक्षय तृतिया पर शादी का होना तय हो गया।
पर कहीं ना कहीं कोई न्याय व्यवस्था है शायद। लड़की के कर्म अच्छे थे या उसके परिवार ने कुछ पुण्य कार्य किया होगा, उनको भनक लग गयी लड़के के इतिहास की। पूछ-ताछ हुई, सच सामने आ गया और उन्होंने साफ मना कर दिया इस रिश्ते से।

अब ये कहता फिर रहा है, भगवान मेरे साथ था, कहीं शादी के बाद पता चलता तो मेरे को मार ही दिए होते।

वैसे पीछे अभी भी नहीं हटा है पर अब ऐसी लड़की खोज रहा है जो परित्यक्ता हो या तलाक शुदा।

रविवार, 9 मई 2010

आप ब्लॉग किस मुद्रा या माहौल में लिखते हैं ?

बड़े-बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी सनकें। कोई सो कर लिखता था तो कोई खड़े हो कर। कोई सोने से पहले तो कोई जागने के बाद। कोई शराब पी कर तो कोई चाय। किसी को शोर-शराबा पसंद था तो किसी को संगीत, कोई अपने पालतू के बिना कुछ सोच भी नहीं सकता था तो किसी को किसी की भी उपस्थिति नागवार गुजरती थी। इसे सनक कहिए या उनका विश्वास कि यदि ऐसा नहीं होगा तो कुछ लिखा ही नहीं जाएगा और लिखा भी गया तो वह वैसा नहीं होगा। और फिर "मूड़", जिसके बिना लेखक अधुरा होता है। इसको बनाने के लिए भी लेखकों को कितनी कसरतें करनी पड़ती थीं। सो हरि कथा की भांति इनका संसार भी तरह-तरह के अजूबों से भरा पड़ा है। यही कहा जा सकता है कि, "लेखक अनन्त लेखक कथा अनन्ता।"

अब ताल्स्ताय की बात करें तो वे सुबह सबेरे ही लिखते थे। उनके अनुसार सुबह-सुबह उनका मन रूपी आलोचक हर लेख पर नजर रखता था जो कि रात को संभव नहीं हो पाता था।

एमिल जोला बिना थके लिखने की सोच भी नहीं सकते थे। इसके लिए वे घूमने निकल जाते थे और इसी दौरान रास्ते में पड़ने वाले लैम्प पोस्ट गिनते रहते थे, गिनती गलत होने पर दोबारा गिनना शुरु करते थे। इस काम में जब बेहद थक जाते थे तो लौट कर लिखना शुरु करते थे।

फ्रांसीसी उपन्यासकार बालजाक रात के सन्नाटे में अपना लेखन कार्य पूरा किया करते थे। लिखते समय उनके कमरे में सिर्फ उनके नौकर को जाने की ईजाजत थी जो थोड़ी-थोड़ी देर में उनके लिए काफी बना कर लाता रहता था।

अलेक्जेंड़र ड़यूमा का विश्वास था कि अच्छा उपन्यास नीले रंग के कागज पर, कविता पीले रंग के कागज पर तथा बाकी की रचनाएं गुलाबी रंग के कागज पर ही लिखी जानी चाहियें।

विक्टर ह्यूगो खड़े हो कर ही लिख पाते थे। इसके लिए उन्होंने अपने कंधे की ऊंचाई के बराबर मेज बनवा रखी थी। लिखते-लिखते वे लिखे हुए कागज जमीन पर बिखराते रहते थे।

मार्क ट्वेन पेट के बल लेट कर लिखते थे , बैठ कर लिखने पर उन्हें आलस्य घेर लेता था।

हमारे शरत बाबू आराम कुर्सी पर अधलेटी अवस्था में अपनी रचनाओं को मूर्त रूप दिया करते थे।

प्रेमचंद जैसे खुद सीधे साधे थे वैसे ही उनका लिखने को लेकर कोई खास सनक भी नहीं थी। वे किसी भी समय, किसी भी जगह, किसी भी हालत में लिख लेते थे। उनके अनुसार लिखने के लिए साफ अनलिखा कागज तथा बिना रुके चलने वाली कलम का होना ही जरूरी होता है।

शुक्रवार, 7 मई 2010

गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर अभी जिंदा हैं, दैनिक भास्कर के अनुसार।

छोड़ो यार सब चलता है, क्या जरा सी बात का बतंगड़ बनाना, गल्तियां हो जाती हैं, जैसी नजर से देखें तो यह कोई बड़ी बात नहीं है। पर यदि एक इतने बड़े अखबार को, जो अपने क्षेत्र में अग्रणी होने का दम भरता हो, मद्दे नजर रख देखें तो यह "ब्लंड़र" है।

आज शुक्रवार 7 तारीख के दैनिक भास्कर के पेज 8 पर अभिव्यक्ति शिर्षक के अंतर्गत स्व। श्री रवींद्रनाथ टैगोर का एक लेख छापा गया है जिसमें लेखक के परिचय में लिखा गया है :-

"लेखक नोबेल विजेता, भारतीय कवि, लेखक और चित्रकार हैं।"

भास्कर अपने जन्म से ही हमारे घर का सदस्य बन गया था। सारे परिवार को इसकी आदत पड़ गयी है। बहुतेरी बार तरह-तरह की स्कीमें ले कर और भी अखबारों ने दस्तकें दीं पर अपनी अच्छाईयों- बुराईयों, तिकड़मों, घोर व्यवसायिकता के रहते भी यह परिवार का अंग बना रहा है। पर कभी-कभी बहुत कोफ्त होती है जब लगता है कि इसे चलाने वालों का नजरिया सिर्फ लाभ और लाभ का है, लगता ही नहीं कि गल्तियों को सुधारने की कोशिश की जा रही है। वाक्यों में गल्तियां, व्याकरण में गल्तियां, कालम का कहीं भी आधी अधूरी बात कह खत्म हो जाना ( इसी अंक के खेल पृष्ठ में अंग्रेजों ने लांघी…...... देख लें), जबर्दस्ती ठूंसे गये अंग्रेजी शब्द चिड़चिड़ाहट तो पैदा कर देते हैं पर जैसे घर के बच्चे की उद्ड़ंता को नजरंदाज कर दिया जाता है वैसे ही आगे ठीक हो जाएगा सोच चुप बैठे रहते हैं।

पर रोज-रोज यदि ऐसा ही चलता रहा तो कभी ना कभी तो इसका खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा।

गुरुवार, 6 मई 2010

आखें, आप इन्हें पंद्रह मिनट दें ये आपका उम्र भर साथ देंगी.

किताबें, कंप्यूटर, लैपटाप, सेलफोन, धूल-मिट्टी, तनाव और भी ना जाने क्या-क्या, यह सब धीरे-धीरे हमारी आंखों के दुश्मन बनते जा रहे हैं। पहले जरा से साफ पानी के छीटों से ही ये अपने आप को दुरुस्त रख लेती थीं। पर लगातार इनकी अनदेखी अब इन पर भारी पड़ने लगी है। काम में मशगूल हो, "जंक फूड़" खा, विपरीत परिस्थितियों में देर तक काम कर लोग अंधत्व को न्यौता देने लग गये हैं। लगातार कंप्यूटर आदि पर काम करने से आंखों के गोलकों पर भारी दवाब पड़ता है जिससे छोटी-छोटी नाजुक शिरायें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं इससे खून का दौरा बाधित हो नुक्सान पहुंचाता है और मजे की बात यह कि इतना सब घट रहा होता है पर पता नहीं चलता। डाक्टरों का कहना है कि लोग काम में ड़ूब कर पलकें झपकाना ही भूल जाते हैं जो की आंखों की बिमारी का एक बड़ा कारण है। उनकी सलाह है कि रोज कम से कम 15 मिनट का आंखों का व्यायाम और थोड़ी सी देख-भाल कर इन्हें स्वस्थ रखा जा सकता है।

देख-भाल :- कंप्यूटर पर काम करते समय 15-20 मिनटों के बाद कुछ देर के लिए विश्राम जरूर लें। शुगर की बिमारी हो तो बकायदाजा चेक-अप करवाना जरूरी है। इस बिमारी का आंखों से "ईंट कुत्ते" का बैर है।
आंखों की नियमित जांच करवाते रहना चाहिये।

व्यायाम :- रोज 15 मिनट का आंखों का व्यायाम काफी है इन्हें सुरक्षित रखने के लिए।एक बड़ी सी घड़ी की कल्पना करें। फिर आंखें बंद कर उसके हर अंक पर नजर ड़ालें, तीन सेकेंड़ रुकें फिर घड़ी के मध्य में आ जाएं। इस तरह सारा चक्कर पूरा कर आंखों पर बिना जरा सा भी दवाब ड़ाले हथेलियां रख पांच बार घड़ी की दिशा में और पांच बार विपरीत दिशा में आंखें घुमाएं। फिर हाथ हटा जल्दी-जल्दी बीस बार पलकें झपकाएं।

हाथ में एक पेंसिल ले बांह पूरी खोल लें, सांस खीचें पेंसिल पर नज़र जमा उसे धीरे-धीरे अपनी ओर ला नाक से छुआएं, सांस छोड़ते हुए फिर पेंसिल को दूर ले जाएं। ऐसा पांच बार करें।

आंखों के गढ्ढों के ऊपर सावधानी से उंगलियों से दवाब डालें, पांच सेकेंड रूकें फिर दवाब हटा लें ऐसा पांच मिनट तक करें।

जब भी बाहर से आएं या घर पर भी हों तो साफ पानी से दिन में चार-पांच बार आंखों पर छीटें मारें। ठंड़े पानी की पट्टी रखने से भी बहुत आराम मिलता है।

बुधवार, 5 मई 2010

ये महिलाएं हैं या कीड़े-मकोड़े

अब तो लगता है कि उल्टे-सीधे विज्ञापनों में बेतुके, अतिश्योक्तिपरक व अभद्रता लांघने वाले विषयों की आदत पड़ गयी है सबको। क्योंकि कहीं से भी विरोध का स्वर उठता या सुनाई नहीं देता। इसी से शह पा कर विज्ञापन देने और बनाने वालों में होड़ सी लग गयी है अश्लीलता परोसने की। और यह भी तब जब इस क्षेत्र को संभालने वाली सत्ता की बागडोर एक महिला के हाथ में है।

एक बानगी पेश है :-

1, क्रिकेट का मैदान, एक खिलाड़ी के कैच लेने की भंगिमा के अंतिम क्षणों में अजीबो गरीब कपड़े पहने महिलाओं का झुंड उसे घेर कर गिरा देता है। फिर………………।
ऐसा क्यूँ ? क्योंकि उसने एक खास किस्म की खुशबू लगा रखी थी।

2, फिर एक क्रिकेट का मैदान, बल्लेबाज, क्षेत्र-रक्षक, अंपायर सब तैयार। बालर बाल फेंकने के लिए दौड़ना शुरू करता है और दौड़ता ही चला जाता है मैदान की दूसरी ओर। क्योंकि उसके पीछे महिलाओं का हुजुम पड़ा हुआ था आधे-अधूरे वस्त्रों में। ।
कारण उसने भी एक खास कंपनी की सुगंध लगा रखी थी।

3, एक घर, शादी का माहौल है। मेहमान आए हुए हैं। उन्हीं में एक युवक एक खास परफ्यूम लगा एक शादी-शुदा महिला के पास से गुजरता है और वह “भद्र” महिला अपना “आपा” खो बैठती है।

4, एक युवक ऐसी ही कोई जादुई सुगंध लगा अपने कमरे की खिड़की खोलता है। उसकी सुगंध से सामने के घर में आई नवविवाहिता अपनी शर्म-लाज खो बैठती है।

ये तो कुछ ही उदाहरण हैं जो अपरिपक्व मष्तिष्कों को भटकाने की पुरजोर कोशिश में लगै हैं। क्या जताते हैं ये कि महिलाओं और उन कीड़े मकोड़ों में कोई फर्क नहीं है जो एक खास समय अपने साथी को आकर्षित करने के लिए एक खास गंध छोड़ते हैं।
अरे वे तो फिर भी संयमी होते हैं। उनका दिन-काल सब निश्चित होता है। पर यह विज्ञापनी महिलाएं क्या उनसे भी गयी बीती हैं? क्यों नहीं इस तरह की अश्लीलता पर अंकुश लगता। उन सब संस्थाओं के आँख कान क्यों बंद रहते हैं इन सब बेहूदा विषयों पर, जो महिला हितों की बातें करते दूसरों की नाक में दम किए रहते हैं, उनका ध्यान किस मजबूरी में इस ओर नहीं जाता ?

रविवार, 2 मई 2010

स्वामी विवेकानंदजी की प्रत्युत्पन्नमति

स्वामी विवेकानंद हिंदू धर्म को लेकर फैली भ्रातिंयों और भारतीय संस्कृति के प्रचार के लिए योरोप यात्रा पर थे। वहां उन्हें बहुत बार विषम परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ता था। खासकर अंग्रेज उन्हें अपमानित करने के मौके खोजते रहते थे।

एक बार उन्हें एक गिरजा घर में भाषण देने के लिए बुलाया गया। जब वे वहां गये तो एक सिरफिरे अंग्रेज ने, कुटिल मुस्कान के साथ, ईसा मसीह के चित्र के नीचे रखे बहुत सारे धर्म ग्रंथों की ओर इशारा कर कहा, ए स्वामी देखो तुम्हारी गीता का क्या स्थान है।स्वामी विवेकानंद ने उस तरफ देखा, वहां सबसे उपर बाइबिल फिर उसके बाद और बहुत से धर्मग्रंथों के बाद सबसे नीचे "गीता" को रखा गया था। यह देखते ही बड़े सहज भाव से स्वामीजी ने तुरंत कहा, "गुड़ फाउंड़ेशन"।

यह सुनते ही उस अंग्रेज की बोलती बंद हो गयी।