गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

बहनजी, अपने पति को पहचान अन्दर ले लीजिए :)

होली फिर आ गयी। चलिए एक छोटा सा निश्चय करें, खुश रहने और खुश रखने का...
सभी अनदेखे अपनों को होली की ढेरों शुभकामनाएं।

1, होली का दिन। जो सुबह से हुडदंग शुरु हुआ तो दोपहर ढलने पे आ गयी। कालोनी के सभी पुरुष भंग पी काले पीले पुते हुए हर घर पर जा आवाज लगाने लगे," ब ह ह न जी, दरवाजा खोल अपने पति को पहचान अंदर ले लिजिए......

2, एक मरीज का आप्रेशन होने वाला था। शल्य चिकित्सक ने अपने छात्रों को भी बुलवा लिया। आप्रेशन के पहले उसने सबसे पूछा कि आपकी राय में इस स्थिति में आप्रेशन जरूरी है कि नहीं। सबने असहमति जताई। इस पर चिकित्सक ने बताया कि नहीं ऐसी स्थिति में आप्रेशन हो जाना चाहिये। और जैसे ही उसने अपना काम करना चाहा वैसे ही मरीज जो इन सब की बातें सुन रहा था, उठ कर बैठ गया और बोला, मुझे नहीं करवाना आप्रेशन, अरे जब इतने लोग मना कर रहे हैं तो मैं तुम्हारी बात ही क्यूं मानूं?

3, गाइड पर्यटक को दिल्ली के एतिहासिक भवन के बारे में बता रहा था। तभी पर्यटक ने पूछ लिया कि इसे बने कितना समय हुआ है?तीन सौ दो साल चार महीने। गाइड ने जवाब दिया।पर तुम इतना सही-सही समय कैसे बता रहे हो?ऐसा है कि जब मैंने यहां काम करना शुरु किया तो मुछे बताया गया था कि इसे बने तीन सौ साल हुए हैं और मुझे यहां काम करते दो साल चार महीने हो गये हैं। गाइड ने जवाब दिया।

4, छगन जी अपने दोस्त को अपने बच्चों के बारे में बता रहे थे। बड़ा तो एम।ए। कर लेखक बन गया है। मंझला भी पढाई पूरी कर कविताएं लिखने लगा है। बड़े-बड़े समारोहों में जाता है, खूब नाम कमाया है। पर छोटा सब्जी का ठेला लगाता है।
"अरे! उसे नहीं पढवाया"?
"नहीं, उसी की कमाई से ही तो घर चलता है, शुरु से"। छगन जी ने जवाब दिया।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

क्या धोनी के मन में कुछ और था ?

जिन्हें भी क्रिकेट से लगाव होगा वह सचिन की पारी देख निहाल हो गये होंगे। विश्व किर्तीमान पर सीना चौड़ा हो गया होगा। पर इस उतेजना मे धोनी के खेल की तरफ ध्यान नहीं गया होगा ।
48वें ओवर तक सचिन 199 रन बना चुके थे। पर अगला पूरा ओवर धोनी ने खेला। पचासवें ओवर की भी शुरुआत धोनी ने करनी थी। उसने पहली बाल सीमा रेखा के पार भेजी. दूसरी का भी वही हश्र होता यदि सीमा रेखा पर पकड़ ना ली जाती। धोनी ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यदि ऐसा होता और तीसरी बाल पर रन ना बन पाता तो? या एक-दो बाल की हड़-बड़ी में सचिन से एक रन ना बन पाता तो? पूरी आठ बाल धोनी ने अपने पास रखीं, क्या यह ठीक नहीं होता कि पहले दूसरा शतक पूरा करवा लिया जाता?
कुछ भी हो सकता था। जो किर्तीमान बनने वाला था वह अकेले सचिन का नहीं था, उसमें देश का भी नाम जुड़ा हुआ था। तो धोनी महाशय को नहीं चाहिये था कि पहले सचिन को मौका दे किर्तीमान पूरा कर लिया जाए। ऐसा भी नहीं था कि रनों का अकाल पड़ा हुआ था तो उसे प्रमुखता दी जाती।

चलिए अंत भला तो सब भला, पर धोनी के मन में शायद कुछ और ही था।
























गर्व करें कि सचिन भारतीय है.

आज एक और कीर्तिमान बना सचिन ने देश का मान बढाया।
पचास ओवरों के खेल में दो सौ का जादुई आंकड़ा छूने वाला पहला खिलाड़ी
चाहे आपको क्रिकेट अच्छा लगता हो या नहीं, चाहे आप इस खेल के धूर विरोधी हों, चाहे आप इसे कुछ देशों का खेल बता हेय दृष्टि से देखते हों, चाहे आपको लगे कि इस बरगद की छाया में बाकि खेल नहीं पनप पा रहे। चाहे आप सोचते हों कि इतना पैसा किसी और खेल को क्यों नहीं दिया जाता, चाहे किसी भी बात से आप इस खेल से दूर रहते हों, पर आप एक बात तो मानेंगे ही कि इस खेल के बेताज बादशाह "सचिन" ने सदा देश के लिए खेल कर उसका सर ऊंचा किया है। इस समर्पित इंसान ने अपने दम-खम पर हम भारतियों को भी गर्व करने के अवसर प्रदान किए हैं। चाहे दुनिया भर से व्यंग बाणों की बौछार होती रहे पर इसने सदा अडिग रह बिना एक शब्द भी प्रतिरोध में बोले, अपने खेल से अपने आलोचकों का मुंह बंद किया है।

आज पचास ओवर के मैच में संसार में पहली बार दो सौ का जादुई आंकड़ा पार कर फिर उसने बिना कुछ कहे अपने धैर्य, अपनी कला, अपने समर्पण, अपनी लगन का एक और नमूना दुनिया के सामने पेश कर यह बता दिया कि उसे भारत ही नहीं दुनिया में क्यूं क्रिकेट के खेल का भगवान कहा जाता है।

गर्व करें कि सचिन भारतीय है।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

क्या होलिका किसी षडयंत्र का शिकार थी. होली पर विशेष.

वर्षों से यह धारणा चली आ रही है कि, होलिका ने अपने भतीजे प्रह्लाद को मारने की नाकाम चेष्टा की थी। ऐसा उसने क्यूं किया? क्या मजबूरी थी जो एक निर्दोष बालक के अहित में उसने अन्याय का साथ दिया? क्या वह किसी षड़यंत्र की शिकार थी ?

असुर राज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका और पडोसी राज्य के राजकुमार इलोजी एक दूसरे को दिलोजान से चाहते थे। इलोजी के रूप-रंग के सामने देवता भी शर्माते थे। सुंदर, स्वस्थ, सर्वगुण संपन्न साक्षात कामदेव का प्रतिरूप थे वे। इधर होलिका भी अत्यंत सुंदर रूपवती युवती थी। लोग इनकी जोडी की बलाएं लिया करते थे। । उभय पक्ष की सहमति से दोनों का विवाह होना भी तय हो चुका था। परन्तु विधाता को कुछ और ही मंजूर था। हिरण्यकश्यप अपने पुत्र के प्रभू प्रेम से व्यथित रहा करता था। उसके लाख समझाने-मनाने पर भी प्रह्लाद की भक्ती मे कोई कमी नहीं आ पा रही थी। धीरे-धीरे हिरण्यकश्यप की नाराजगी क्रोध मे बदलती चली गयी और फिर एक समय ऐसा भी आ गया कि उसने अपने पुत्र को सदा के लिये अपने रास्ते से हटाने का दृढसंकल्प कर लिया। परन्तु लाख कोशिशों के बावजूद वह प्रह्लाद का बाल भी बांका नही कर पा रहा था। राजकुमार का प्रभाव जनमानस पर बहुत गहरा था। राज्य की जनता हिरण्यकश्यप के अत्याचारों से तंग आ चुकी थी। प्रह्लाद के साधू स्वभाव के कारण सारे लोगों की आशाएं उससे जुडी हुई थीं। हिरणयकश्यप ये बात जानता था। इसीलिये वह प्रह्लाद के वध को एक दुर्घटना का रूप देना चाहता था और यही हो नहीं पा रहा था। इसी बीच उसे अपनी बहन होलिका को मिले वरदान की याद हो आई। जिसके अनुसार होलिका पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पडता था। उसने होलिका को अपनी योजना बताई कि उसे प्रह्लाद को अपनी गोद मे लेकर अग्नि प्रवेश करना होगा। यह सुन होलिका पर तो मानो वज्रपात हो गया। वह अपने भतीजे को अपने प्राणों से भी ज्यादा चाहती थी। बचपन से ही प्रह्लाद अपनी बुआ के करीब रहा था। बुआ ने ही उसे पाल-पोस कर बडा किया था। जिसकी जरा सी चोट से होलिका परेशान हो जाती थी, उसीकी हत्या की तो वह कल्पना भी नही कर सकती थी। उसने भाई के षडयन्त्र मे भागीदार होने से साफ़ मना कर दिया। पर हिरण्यकश्यप भी होलिका की कमजोरी जानता था। उसने भी होलिका को धमकी दी कि यदि उसने उसका कहा नही माना तो वह भी उसका विवाह इलोजी से नहीं होने देगा। होलिका गंभीर धर्मसंकट मे पड गयी थी वह अपना खाना-पीना-सोना सब भूल गयी। एक तरफ़ दिल का टुकडा, मासूम भतीजा था तो दूसरी तरफ प्यार, जिसके बिना जिंदा रहने की वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी। आखिरकार उसने एक अत्यन्त कठिन फ़ैसला कर लिया और भाई की बात मान ली, क्योंकि उसे डर था कि कहीं हिरण्यकश्यप इलोजी को कोई नुक्सान ना पहुंचा दे। निश्चित दिन, उसने अपने वरदान का सहारा प्रह्लाद को दे, उसे अपनी गोद मे लेकर, अग्नि प्रवेश कर अपना बलिदान दे दिया, पर उसके इस त्याग का किसी को भी पता नहीं चल पाया।

यही दिन होलिका और इलोजी के विवाह के लिए भी तय किया गया था।
इलोजी इन सब बातों से अंजान अपनी बारात ले नियत समय पर राजमहल आ पहुंचे। वहां आने पर जब उन्हें सारी बातें पता चलीं तो उन पर तो मानो पहाड टूट पडा, दिमाग कुछ सोचने समझने के काबिल न रहा। पागलपन का एक तूफ़ान उठ खडा हुआ और इसी झंझावात मे उन्होंने अपने कपडे फाड डाले और होलिका-होलिका की मर्म भेदी पुकार से धरती-आकाश को गुंजायमान करते हुए होलिका की चिता पर लोटने लगे। गर्म चिता पर निढाल पडे अपने आंसुओं से ही जैसे चिता को ठंडा कर अपनी प्रेयसी को ढूंढ रहे हों। उसके बाद उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। वन-प्रातों मे भटकते-भटकते सारी जिंदगी गुजार दी।

पर इतिहास ने दोनों को भुला दिया। इलोजी की बात करें तो उनका नाम सिर्फ राजस्थान तक सिमट कर रह गया और रही होलिका, तो उसके साथ तो घोर अन्याय हुआ, उसके बलिदान को भुला कर उसे प्रह्लाद की हत्या के षड़यंत्र में शामिल एक अपराधी मान कर बदनाम कर दिया गया।

पर सोचने की बात है कि यदि होलिका अपराधिनी थी तो इस मंगलमय त्यौहार का नाम उसके नाम पर क्यूं रखा गया?

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

"होली" होले उसके पहले.

होली का त्यौहार कबसे शुरू हुआ यह कहना बहुत ही मुश्किल है। वेदों-पुराणों में इससे सम्बंधित अनेक कथाएं मिलती हैं।

महाभारत मं उल्लेख है कि ढोढा नामक एक राक्षसी ने अपने कठोर तप से महादेवजी को प्रसन्न कर अमर होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। अंधेरे में रहने के कारण उसे रंगों से बहुत चिढ थी। उसने अपने स्वभावानुसार चारों ओर अराजकता फैलानी शुरू कर दी। तंग आकर लोग गुरु वशिष्ठजी की शरण में गये तब उन्होंने उसे मारने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि सिर्फ निष्पाप बच्चे ही उसका नाश कर सकते हैं। इसलिये यदि बच्चे आग जला कर उसके चारों ओर खूब हंसें, नाचें, गाएं, शोर मचाएं तो उससे छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा ही किया गया और ढोढा का अंत होने पर उसके आतंक से मुक्ति पाने की खुशी में रंग बिखेरे गये। तब से दुष्ट शक्तियों के नाश के लिये इसे मनाया जाने लगा।

दूसरी कथा ज्यादा प्रामाणिक लगती है। कहते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने देवताओं, सूर्य, इंद्र, वायू, की कृपा से प्राप्त नये अन्न को पहले, धन्यवाद स्वरूप, देवताओं को अर्पित कर फिर ग्रहण करने का विधान बनाया था। जाहिर है नया अन्न अपने साथ सुख, स्मृद्धि, उल्लास, खुशी लेकर आता है। सो इस पर्व का स्वरूप भी वैसा ही हो गया। इस दिन यज्ञ कर अग्नि के माध्यम से नया अन्न देवताओं को समर्पित करते थे इसलिये इसका नाम ”होलका यज्ञ” पड़ गया था। जो बदलते-बदलते होलिका और फिर होली हो गया लगता है।

इस पर्व का नाम होलका से होलिका होना भक्त प्रह्लाद की अमर कथा से भी संबंधित है। जिसमें प्रभु भक्त प्रह्लाद को उसके पिता हिरण्यकश्यप के जोर देने पर उसकी बुआ होलिका उसे गोद में ले अग्नि प्रवेश करती है पर प्रह्लाद बच जाता है।

इसी दिन राक्षसी पूतना का वध कर व्रजवासियों को श्री कृष्ण जी ने भयमुक्त किया था। जो त्यौहार मनाने का सबब बना।

पर इतने उल्लास, खुशी, उमंग, वैमन्सय निवारक त्यौहार का स्वरूप आज विकृत होता या किया जा रहा है। हंसी-मजाक की जगह अश्लील गाने, फूहड़ नाच, कुत्सित विचार, द्विअर्थी संवाद, गंदी गालियों की भरमार, काले-नीले ना छूटने वाले रंगों के साथ-साथ वैर भुनाने के अवसर के रूप में इसका उपयोग कर इस त्यौहार की पावनता को नष्ट करने की जैसे साजिश चल पड़ी है। समय रहते कुछ नहीं हुआ तो धीरे-धीरे लोग इससे विमुख होते चले जायेंगे।

क्या सच में होलिका अपने प्रिय भतीजे, प्रह्लाद, मारना चाहती थी या वह खुद किसी षडयंत्र का शिकार बन गयी थी?
होली पर विशेष। कल

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

छत्तीसगढ़ की अनोखी और अनूठी पहल

इस दशक की शुरुआत के साथ जब तीन नये राज्यों का गठन हुआ तो इनमें से एक छत्तीसगढ को भी हर जगह पिछड़े और अविकसित राज्य के रूप में ही ज्यादा प्रचारित किया गया था। यहां के वाशिंदों की शांतिप्रियता, सादगी और भोलेपन पर किसी ने भी दो शब्द नहीं लिखे पर पिछड़ेपन, असाक्षरता, टोने-टोटके और बस्तर को लेकर उल्टी-सीधी बातों पर कालम पे कालम रंग डाले थे।

उन दिनों मैं हिमाचल में था। जिस दिन यहां "हरेली" होती है, उस दिन वहां के एक प्रतिष्ठित पत्र ने लिखा था - "छत्तीसगढ में आज भी जादू-टोने पर लोगों में अटूट विश्वास है। आज के दिन वहां हरेली नामक त्यौहार वहां के बैगा लोगों, जो टोना-टोटका करते हैं, द्वारा मनाया जाता है। छत्तीसगढ के रायपुर में भी, जो कि वहां का सबसे बड़ा शहर है, कोई भी व्यक्ति घर से बाहर नहीं निकलता है ना ही अपने बच्चों को बाहर जाने देता है। स्कूल दुकानें सब बंद रहती हैं। लोग जादू-टोने के ड़र से दरवाजे बंद कर घरों में दुबके रहते हैं। अघोषित कर्फ्यू लग जाता है।"
यह पढ कर मैने एक पत्र उस अखबार के संपादक महोदय को वस्तुस्थिति बताते हुए लिखा था। पर उसका कोई जवाब नहीं पा सका हूं अभी तक। बिना किसी प्रमाण के, बिना सच्चाई जाने, बिना पूरी तहकीकात कर सिर्फ चटकारेदार खबरें 'बना' कर यह तथाकथित पत्रकार क्या सिद्ध करना चाहते हैं, समझ के बाहर की बात है। स्कूल-कालेज के समय में रोज अखबार पढने पर जोर दिया जाता था, जिससे भाषा और सामान्य ज्ञान पर पकड़ बन सके। आज अखबारों में ना ही शुद्ध भाषा मिलती है नाहीं सही जानकारी, फिल्म जगत के फूहड़ किस्सों वगैरह की तफसील को छोड़।

दिल्ली में भी ऊंचे-ऊंचे सरकारी ओहदों पर बैठे लोगों को भी यहां के भूगोल को बताने के लिये भिलाई का वास्ता देना पड़ता था। पर बस्तर के बारे में मिर्च-मसाला लगी बातों का उनके पास भंडार होता था। इसीलिये मेरा जब भी बाहर जाना होता है तो यहां की छोटी-छोटी "अच्छाईयां" मैं जरूर अपने साथ ले जाता हूं।

आज भी अखबार में एक खबर पढी तो इसे यहां से बाहर रहने वालों के लिये पोस्ट करने से अपने को रोक नहीं पाया।

वर्षों पहले व्ही. शांतारामजी की अमर क्लासिक फिल्म "दो आंखें बारह हाथ" की कल्पना को कुछ-कुछ साकार किया है, रायपुर सेंट्रल जेल प्रशासन ने। यहां आजीवन कारावास की सजा पाए चार कैदियों को आम जनता के लिये हल्का -फुल्का नाश्ता बनाने के लिये जेल परिसर में ही बाहर की ओर एक दुकान खोल कर दी गयी है। बावजूद इस जोखिम के कि सजायाफ्ता मुजरिमों को बाहर भेजना पड़ रहा था। पर इन चारों के अब तक के व्यवहार को देखते हुए यह जोखिम उठाया गया। आज इनके हुनर का यह कमाल है कि उस दुकान से रोज की बिक्री दस हजार रुपये का आंकड़ा छू रही है। यहां की बनी चीजों की गुणवता, सफाई और स्वाद का जादू लोगों के सर चढ कर बोल रहा है। अब तो बड़े-बड़े होटलों और रेस्त्रां से भी इन्हें आर्ड़र मिलने लग गये हैं। इन चारों के हुनर और मेहनत करने के जज्बे ने इनकी जिंदगी को एक मकसद दे दिया है।

तथाकथित विकसित राज्य क्या इस पिछड़े प्रदेश से सबक लेंगे?

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

जनता तमाशबीन जरूर है, पर बुडबक नहीं.

हम भारतवासी मेले, त्योहारों, नाटक, नौटंकियों, तमाशे वगैरह के बहुत शौकीन हैं। शौकीन भी इस हद तक कि तमाशा करने-दिखाने वालों के मुरीद बन जाते हैं। जो दिख रहा है, दिखा रहा है उसी को सच मान उसके बारे में वैसी ही धारणा बना उसे पूजनीय तक बना ड़ालते हैं। उधर सामने वाला बेवकूफ समझ तरह-तरह के स्वांग भर हमारा ध्यान रोज-रोज के दुख, दर्द, मंहगाई, कठिनाई, नून, तेल लकड़ी{गैस}से हटा अपने तरीके से प्रभावित करने के लिये ही तमाशा करता रहता है।

अभी मेरे शहर(जगह बदल जाती है, पात्र बदल जाते हैं पर 'थीम वही रहती है आजकल} में शहर का बंदोबस्त करने वाली इकाई के चुनावों का नतीजा कुछ एंड़-बैंड आया। तो जिनको सबका प्रमुख बनने का मौका हाथ लगा, वह शुरुआती तीन-चार दिन खुद हाथ में झाड़ू-डंडा ले सड़क-नालियों की सफाई करते फोटो खिंचवाते रहे। अब कैसे समझाया जाता कि यह काम आपका नहीं है। जिनका यह काम है उनकी नकेल कसी जाए। हर कर्मचारी यदि अपने दिन भर का काम साठ-सत्तर प्रतिशत भी कर ले तो शहर की जून सुधर जाए। पर फोटो में कैद हो अखबारों के पहले पन्नों में छपने का सुख कैसा होता है, यह छपने वाले से पूछ देखो।

एक ओर तमाशा हुआ, जो अक्सर देश के अलग-अलग शहरों में मौके-बेमौके होता रहता है। प्रदेश की सरकार ने "मंहगाई कम करने के लिये एक दिन" अपने-अपने घरों से अपने दफ्तर सायकिलों से जाने की ठानी।
हुआ क्या, रोज एक-दो कि.मी. भी पैदल शायद ही चलने वाला आठ-दस कि.मी. सायकिल कैसे चला पाता। आधी-अधुरी-चौथाई दूरी भी कोई जवान पार नहीं कर पाया। सब दो चक्कों से उतर कर चार चक्कों की शरण में जा लगे। उपर से हमारी तमाशबीनी फितरत उन्हें देखने, जय-जयकार करने, माला पहनाने जो इकठ्ठी हुई, तो रास्ते घाट सब जाम हो आम जनता के लिये मुसीबत बन खड़ी हो गयी।

पता नहीं ऐसा कौन है जो यह सब समझाता है ? यह सब किसके दिमाग की उपज होती है? और कैसे पढे-लिखे, समझदार, देश-प्रदेश के कर्णधार इन पिटी हुई कहानियों पर लिखी कथा पर काम कर अभिनय करने को तैयार हो जाते हैं।
पक्ष-विपक्ष एक साथ बैठ हल ढूँढने के बजाए एक दूसरे की कमियाँ निकालने में ही वक्त जाया करते रहते हैं।

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

वेलेंटाइन ऐसा होता है।

पहली बार बचपन में सर के ऊपर से गुजर गयी "उसने कहा था" को पढा और देखा था तो ना कुछ महसूस हुआ था नाहीं होना था। फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये। लगता नहीं कि आज के अधिकांश युवा इससे परीचित होंगे। पहले तो कोर्स वगैरह में भी यह होती थी। पर धीरे-धीरे सब कुछ बदल ही तो रहा है। इस अमर कहानी का सार देने की कोशिश करता हूं।

अमृतसर में अपने मामा के घर आए दस-ग्यारह साल के लहनासिंह का बाज़ार में अक्सर एक सात-आठ साल की लडकी से सामना हो जाता है। ऐसे ही बाल-सुलभ छेड़-छाड़ के चलते लहना उससे पूछता रहता है "तेरी कुड़माई (सगाई)हो गयी" और लड़की "धत्" कह कर भाग जाती है। पर एक दिन वह बालसुलभ खुशी से जवाब देती है "हां, हो गयी। देखता नहीं मेरा यह रेशमी सालू"।
वह तो चली जाती है, पर लहना पर निराशा छा जाती है। दुख और क्रोध एक साथ हावी हो बहुतों से लड़वा, भिड़वा, गाली खिलवा कर घर पहुंचवाते हैं।

पच्चीस साल बीत जाते हैं। फौज में लहना सिंह जमादार हो जाता है। अपनी बटालियन के सूबेदार हज़ारा सिंह के साथ अच्छा दोस्ताना है। एक ही तरफ के रहनेवाले हैं। हज़ारा सिंह का बेटा बोधा सिंह भी इनके साथ उसी मोर्चे पर तैनात है। कुछ दिनों पहले छुट्टियों में ये घर गये थे। तभी पहला विश्वयुद्ध शुरु हो जाता है। सबकी छुट्टियां रद्द हो जाती हैं। हज़ारा सिंह खबर भेजता है, लहना सिंह को कि मेरे घर आ जाना, साथ ही चलेंगे। लहना वहां पहुंचता है तो सूबेदार कहता है कि सूबेदारनी से मिल ले, वह तुझे जानती है। लहना पहले कभी यहां आया नहीं था, चकित रह जाता है कि वह मुझे कैसे जानती होगी। दरवाजे पर जा मत्था टेकता है। आशीष मिलती है। फिर सूबेदारनी पूछती है "पहचाना नहीं? मैं तो देखते ही पहचान गयी थी। ...तेरी कुड़माई हो गयी....धत्....अमृतसर....."
सब याद आ जाता है लहना को। सूबेदारनी रोने लगती है। बताती है कि चार बच्चों में अकेला बोधा बचा है। अब दोनों लाम पर जा रहे हैं। जैसे तुमने एक बार मुझे तांगे के नीचे आने सा बचाया था, वैसे ही इन दोनों की रक्षा करना। तुमसे विनती है।

मोर्चे पर बर्फबारी के बीच बोधा सिंह बिमार पड़ जाता है। खंदक में भी पानी भरने लगता है। लहना किसी तरह बोधे को सूखे में सुलाने की कोशिश करता रहता है। अपने गर्म कपड़े भी बहाने से उसे पहना खुद किसी तरह गुजारा करता है। इसी बीच जर्मन धोखे से हज़ारा सिंह को दूसरी जगह भेज खंदक पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं पर लहना सिंह की चतुराई से हज़ारा सिंह की जान और खंदक दोनों बच जाते हैं। पर खुद बुरी तरह घायल होने पर भी चिकित्सा के लिये बाप-बेटे को पहले भेज देता है, हज़ारा सिंह से यह कहते हुए कि घर चिठ्ठी लिखो तो सूबेदारनी से कह देना उसने जो कहा था मैने पूरा कर दिया है।
उनके जाने के बाद अपने प्राण त्याग देता है।

यह तो कहानी का सार है। पर बिना पढे इसकी मार्मिकता नहीं समझी जा सकती। गुलेरीजी के शब्दों मे ही, अमृतसर के तांगेवालों की चाकू से भी तेज धार की जबान, दोनों बच्चों की चुहल, खंदक की असलियत, लड़ाई की विभीषिका, सूबेदारनी की याचिका, लहना की तुरंत-बुद्धि और फिर धीरे-धीरे करीब आती मौत के साये में स्मृति के उभरते चित्र, वह सब बिना पढे महसूस करना मुश्किल है।
यदि कभी मौका मिले तो इसी नाम पर बनी पूरानी फिल्म देखने का मौका चूकें नहीं। जिसमें स्व. सुनील दत्त और नंदा ने काम किया था।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

कल जिन्हें हिज्जे ना आते थे, वे ही हमें पढाने चले हैं। खुदा की कुदरत है।

फिर एक बार संत वेलेंटाइन का संदेश ले फरवरी का माह आ खड़ा हुआ। बाजारों में, अखबारों में युवाओं में काफी उत्साह उछाल मार रहा है। हमारे सदियों से चले आ रहे पर्व "वसंतोत्सव" का भी तो यही संदेश है। प्रेम का, भाईचारे का, सौहार्द का। पर इसे कभी भुनाया नहीं गया। लेकिन यही संदेश जब "बाजार" ने वेलेंटाइन का नाम रख 'वाया' पश्चिम से भेजा तो हमारी आंखें चौंधिया गयीं हमें चारों ओर प्यार ही प्यार नज़र आने लगा।
हालांकि शुरु-शुरु में इस नाम को कोई जानता भी नहीं था। यहां तक कि एक स्थानीय अखबार में भी कुछ का कुछ छपा था। फिर धीरे-धीरे खोज खबर ली गयी और कहानियां प्रचारित, प्रसारित की जाने लगीं। युवाओं को इसमें मौज-मस्ती का सामान दिखा और वे बाजार के शिकंजे में आते चले गये। जबकि सदियों से हमारी प्रथा रही है, अपने-पराए-गैर-दुश्मन सभी को गले लगाने की। क्षमा करने की। प्रेम बरसाने की। इंसान की तो छोड़ें इस देश में तो पशु-पक्षियों से भी नाता जोड़ लिया जाता है। उन्हें भी परिवार का सदस्य माना जाता है। खुद भूखे रह कर उनकी सेवा की जाती है। जीवंत की बात भी ना करें यहां तो पत्थरों और पेड़ों में भी प्राण होना मान उनकी पूजा होती रही है। सारे संसार को ज्ञान-विज्ञान देने वाले को आज प्रेम सीखना पड़ रहा है पश्चिम से।
गोया "कल जिन्हें हिज्जे ना आते थे, आज वे हमें पढाने चले हैं। खुदा की कुदरत है।"
प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं है। पर ये जो व्यवसायिकता है। अंधी दौड़ है या इसी बहाने शक्ति प्रदर्शन है उसे किसी भी हालत में ठीक नहीं कहा जा सकता।

प्रेम सदा देने में विश्वास रखता है। त्याग में अपना वजूद खोजता है। पर आज इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। सिर्फ पाना और हर हाल में पाना ही इसका उद्देश्य हो गया है। आज भोग की संस्कृति ने सब को पीछे छोड़ रखा है। जिस तरह के हालात हैं, मानसिक विकृतियां हैं, दिमागी फितूर है उसके चलते युवाओं को काफी सोच समझ कर अपने कदम उठाने चाहिए। खास कर युवतियों को। इस उम्र में अपना हर कदम, हर निर्णय सही लगता है। पर आपसी मेल-जोल के पश्चात किसी युवक व युवती का प्रेम परवान ना चढ सके और युवती का रिश्ता उसके घरवाले कहीं और कर दें, इस घटना से युवक अपना आपा खो अपने पास के पत्र या फोटो वगैरह गलत समय में गलत जगह जाहिर कर दे तो अंजाम स्वरूप कितनी जिंदगियां बर्बाद होंगी, कल्पना की जा सकती है। ऐसा होता भी रहा है कि नाकामी में युवकों ने गलत रास्ता अख्तियार कर अपना और दूसरे का जीवन नष्ट कर दिया हो।
किसी की अच्छाई लेना कोई बुरी बात नहीं है। वह चाहे किसी भी देश, समाज या धर्म से मिलती हो। ठीक है। अच्छा लगता है। दिन हंसी-खुशी में गुजरता है। मन प्रफुल्लित रहता है तो त्यौहार जरूर मनाएं। पर एक सीमा में, बिना भावुकता में बहे। उचित-अनुचित का ख्याल रखते हुए।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

:) हसाईयाँ (:

* बाज़ार पहुंचने पर एक मित्र ने दूसरे से कहा, यार सामान लेना था पर पर्स घर ही भूल आया हूं। अब तुम ही कुछ मदद करो।
अरे, वह मित्र ही क्या जो समय पर काम ना आए। यह लो दस रुपये घर जा कर अपना पर्स ले आओ।

* संता हांफते-हांफते घर पहुंचा और पत्नी से बोला, भागवान, आज मैने पांच रुपये बचा लिये।
वो कैसे? बीवी ने पूछा।
मैं बस स्टाप पर खड़ा था, बस आयी पर रुकी नहीं। मैं उसके पीछे दौड़ते-दौड़ते घर आ गया।
रहे ना वही के वही। अरे किसी टैक्सी के पीछे दौड़ते तो पचास रुपये ना बच जाते। बीवी ने उलाहना दिया।

* परदेसीजी की की पत्नी बहुत तेज स्वभाव की थी। रोज घर में महाभारत होता था। एक दिन उसका देहांत हो गया। परदेसीजी उसका क्रिया-करम कर लौट रहे थे, तभी तेज हवाएं चलने लगीं, काले-काले बादल घिर आए, बिजली कौंधने लगी, मेघ गरजने लगे।
लगता है पहुंच गयी। परदेसीजी ने ऊपर देखते हुए कहा।

* बास के साथ पहली बार सेक्रेटरी बाहर टूर पर गयी थी। होटल में एक ही कमरा मिल पाया था। सोते समय बास ने कहा, तुम्हें नहीं लगता कि हमारा रिश्ता आत्मिय होना चाहिये। एकदम परिवार की तरह?
जी, बिल्कुल। कुछ और ही सोच सेक्रेटरी ने तुरंत जवाब दिया।
तो ठीक है, उठ कर खिड़की बंद कर दो। ठंड़ी हवा आ रही है।
दूसरी तरफ करवट बदलते हुए बास ने कहा।

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

श्रीरामजी को भी श्राप का सामना करना पडा था.

देवताओं ने सदा अपना हित साधा है। श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री में सुग्रीव का सूर्य पुत्र होना एक बड़ा कारण था।

किस कारण या किस परिस्थितिवश प्रभू श्रीराम को किष्किंधा नरेश बाली का वध कर सुग्रीव को साथी बनाना पड़ा इसका न्यायोचित उत्तर नहीं मिलता।

बाली भी राम भक्त था पर उससे मिलने से पहले ही एक तरफा पक्ष रख, सुग्रीव के प्रति सहानुभुति का माहौल बना, उसे दीन-हीन दिखा श्री राम की उदारता का फायदा उठा लिया गया। जबकी सुग्रीव का निष्काषन उसके भीरूपन और समय पर उचित निर्णय ना ले सकने की क्षमता के कारण किया गया था। वह हर हाल में, चाहे युद्ध कला हो, चाहे चारित्रिक विशेषता, बाली से कमतर था।

तो ऐसा तो नहीं कि यह सब सोची समझी योजना के तहत किया गया हो। कुछ पहले की कथाओं को याद करें। हनुमानजी के बाल्यावस्था की घटना जब उन्होंने सूर्य देव से शिक्षा ग्रहण की थी। तब "सूर्यदेव ने गुरुदक्षिणा के रूप में अपने पुत्र सुग्रीव की रक्षा का वचन" उनसे लिया था। देवताओं ने सदा अपना स्वार्थ साधा है। यहां भी वही स्वार्थ श्रीराम और बाली के बैर का कारण बना लगता है।

स्वंय श्रीराम भी बाली के वध से व्यथित थे तभी तो उन्होंने उसे फिर जीवन दान की बात कही थी। जिसे बाली ने विनय पूर्वक अस्वीकार कर सिर्फ अपने पुत्र अंगद के भविष्य को सुरक्षित करने के लिये प्रभू से वचन लिया था।
सुग्रीव से मैत्री तथा बाली के वध का खमियाजा श्री राम को बाली की पत्नी के श्राप के रूप में उठाना पड़ा था। अपने पति की असमय और अकारण मृत्यु पर रोती-बिलखती तारा ने प्रभू से अपने जीवन का भी अंत मांगा था। पराए पुरुष के साथ रहने के बजाय उसने मर जाना बेहतर समझ कर बार-बार प्रभू से अपना भी वध कर देने की प्रार्थना की थी। पर श्रीराम के ऐसा ना करने पर उस साध्वी पतिव्रता नारी ने दुखित और कुपित हो श्रीराम को भी भीषण श्राप दे डाला कि मैं तुम्हें भी पत्नी वियोग का शाप देती हूं।
श्री राम की लीला तो श्री राम ही जाने, पर यह तो उनकी महानता ही थी कि इस जहर को भी उन्होंने सहज स्वभाव से स्वीकार कर लिया था। यदि बाली और श्रीराम का साथ हो गया होता तो महाकाव्य रामायण का अंत किसी और तरह से लिखा जाता।

इतना ही नहीं श्रीराम की दया से राज मिल जाने के बाद सुग्रीव की भोग लोलुपता भी सामने आ जाती है। जब वह रास-रंग में लिप्त हो सीताजी को खोजने के अभियान को ही भुला बैठता है। बाली वध का दुख तब और उग्र हो सामने आता है जब प्रभू उसके लिये कठोर शब्दों का प्रयोग कर उसको भी दंड़ित करने का संकल्प करते हैं। तब उसे अपने कर्तव्य की याद आती है।

युद्ध के समय समरांगण में भी उसका रण कौशल किसी अन्य वानर योद्धा के समान ही नजर आता है, बढ कर नहीं।
ऐसा लगता है कि यदि हनुमानजी की कृपा और अनुराग उस पर ना होता तो वह कभी भी राजा बनने की योग्यता ना पा सकता था।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

एक सैम्नार ऐसा भी

रायपुर के मोतीबाग से आयकर भवन जाने वाली सड़क पर कुछ आगे जा कर घने इमली के पेड़ हैं। जिनकी शाखाओं पर ढेरों तरह-तरह के परिंदे वास करते हैं। शाम होते ही जब पक्षी अपने-अपने घोंसलों की ओर लौटते हैं तो अक्सर शरारती लडके उन्हें अपनी गुलेलों का निशाना बनाते रहते हैं। इसी को देख यह ख्याल आया था :-

पर्यावरणविदों और पशू-पक्षी संरक्षण करने वाली संस्थाओं ने मेरे सोते हुए कस्बाई शहर को ही क्यूं चुना अपने वार्षिक सैम्नार के लिए, पता नहीं। इससे शहरवासियों को कोई फ़ायदा हुआ हो या ना हुआ हो पर शहर जरूर धुल पुछ गया। सड़कें साफ़-सुथरी हो गयीं। रोशनी वगैरह की थोड़ी ठीक-ठाक व्यवस्था कर दी गयी। गहमागहमी काफ़ी बढ़ गयी। बड़े-बड़े प्राणीशास्त्री, पर्यावरणविद, डाक्टर, वैज्ञानिक, नेता, अभिनेता और भी ना जाने कौन-कौन बड़ी-बड़ी गाड़ियों मे धूल उड़ाते आने लगे। नियत दिन, नियत समय पर, नियत विषयों पर बहस शुरू हुई। नष्ट होते पर्यावरण और खास कर लुप्त होते प्राणियों को बचाने-सम्भालने की अब तक की नाकामियों और अपने-अपने प्रस्तावों की अहमियत को साबित करने के लिए घमासान मच गया। लम्बी-लम्बी तकरीरें की गयीं। बड़े-बड़े प्रस्ताव पास हुए। यानि कि काफी सफल आयोजन रहा।

दिन भर की बहस बाजी, उठापटक, मेहनत-मसर्रत के बाद जाहिर है, जठराग्नि तो भड़कनी ही थी। सो खानसामे को हुक्म हुआ, लज़िज़, बढिया, उम्दा किस्म के व्यंजन बनाने का। खानसामा अपना झोला उठा बाजार की तरफ चल पड़ा। शाम का समय था। पेड़ों की झुरमुट मे अपने घोंसलों की ओर लौट रहे परिंदों पर कुछ शरारती बच्चे अपनी गुलेलों से निशाना साध रहे थे। पास आने पर खानसामे ने तीन-चार घायल बटेरों को बच्चों के कब्जे में देखा। अचानक उसके दिमाग की बत्ती जल उठी और चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। उसने बच्चों को डरा धमका कर भगा दिया। फिर बटेरों को अपने झोले में ड़ाला और गुनगुनाता हुआ वापस गेस्ट हाउस की तरफ चल दिया।

खाना खाने के बाद, आयोजक से ले कर खानसामे तक, सारे लोग बेहद खुश थे। अपनी-अपनी जगह, अपने-अपने तरीके से।
सैम्नार की अपार सफलता पर।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

ताश के बादशाह, बेगम तथा गुलाम सब का अपना-अपना चरित्र होता है.

ताश, अच्छी है या बुरी यह बहस का विषय हो सकता है। पर सैंकड़ों वर्षों से यह आदमी का मनोरंजन करती आ रही है इसमें दो राय नहीं है। इसके आज के स्वरुप के चार वर्गों के बावन पत्तों में से भी सिर्फ फोटो वाले बारह पत्तों के तीन पात्रों, बादशाह, बेगम और गुलाम को तो सभी जानते हैं पर अपने-अपने वर्ग के अनुसार उनकी खासियत और उनके अलग-अलग स्वभाव तथा चरित्र के बारे में कम ही जानकारी प्रचलित है। अच्छी ताशों की गड्डी बनाते समय इनके स्वरूप का पूरा ध्यान रखा जाता है।
"हुकुम"
बादशाह :- यह क़ानून का पालक, सख्त मिजाज, काले रंग को पसंद करने वाला और तलवार से न्याय करने वाला राजा है, जो इसकी तनी हुई तलवार बताती है। इसकी मूंछें इसके स्वभाव को प्रगट करती हैं।

बेगम :- अपने राजा के कृत्यों से यह दुखी रहती है, जो इसके चेहरे और काले कपड़ों से साफ झलकता है। इसके साथ जलती हुई शमा होती है जो बताती है कि यह रानी भी उसी की तरह घुल-घुल कर मिट जाएगी। इसके साथ एक फूल जरूर है पर वह भी मुर्झाया हुआ और पीछे की तरफ जो इसके दुख को ही प्रगट करता है।

गुलाम :- हुकुम का गुलाम। जैसा मालिक वैसा गुलाम। अपने मालिक के हुक्म का ताबेदार काले कपड़े और हाथ में हंटर धारण करने वाला। सख्त चेहरे वाला, किसी के बहकावे में ना आने वाला और सारे काम अक्ल से नहीं हंटर से करने वाला होता है। इसे कोई फुसला नहीं सकता।

"पान"
बादशाह :- पान यानि दिल यानि कोमल ह्रदय का स्वामी। इसीलिये यह मूंछे भी नहीं रखता। यह मानवता का पूजारी, अहिंसक, धार्मिक और शांतिप्रिय स्वभाव का होता है। ऐसा होने पर भी बहुत सतर्क और कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाला है। यह तलवार से नहीं बुद्धि से काम करता है। इसीलिये इसकी तलवार पीछे की ओर रहती है।

बेगम :- यह बहुत सुंदर, संतोषी स्वभाव, विद्वान पर कोमल ह्रदय तथा शांत स्वभाव वाली रानी है। इसके चेहरे से इसकी गंभीरता साफ झलकती है। हाथ का फूल भी इस बात की गवाही देता है। कोमल स्वभाव के बावजूद यह विदुषि है।
गुलाम :- पान का गुलाम भी अपने मालिकों की तरह शांत और नम्र स्वभाव वाला होता है। सादा जीवन बिताने वाला और प्रकृति प्रेमी है जो इसके हाथ में पकड़ी गयी पत्ती से स्पष्ट है। अनुशासन बनाए रखने के लिये छोटी-छोटी मूंछें रखता है।

"चिडी"
बादशाह :- यह तीन पत्तियों वाला, समझदार और अपने अधिकारों की रक्षा करने वाला राजा है। यह अपने को राजा नहीं सेवक मानता है। रौबदार मूंछों वाले इस राजा का भेद कोई नहीं जान पाता है।

बेगम :- यह एक चतुर, चालाक तथा तीव्र बुद्धिवाली रानी है। तड़क-भड़क से दूर फूलों की शौकीन यह समस्याओं को साम, दाम, दंड़, भेद किसी भी तरह सुलझाने में विश्वास रखती है।

गुलाम :- चिड़ी का गुलाम यह सबसे चर्चित गुलाम है। गंवारों सा दिखने वाला, पगड़ी में पत्ती लटकाए सदा अपने बादशाह की चापलूसी करने में लगा रहता है। साधारण से कपड़े और गोलमटोल मूंछों को धारण करने वाला एक घटिया इंसान है।

"ईंट"
बादशाह :- यह राजा के साथ-साथ हीरों का व्यापारी भी है। हर समय धन कमाने की फिराक में रहता है। जिसके लिये कुछ भी कर सकता है। हाथ जोड़ कर ईमानदारी का दिखावा करता है, पर मन से साफ नहीं है। इसे हिंसा पसंद नहीं है पर एशो-आराम से रहना पसंद करता है।

बेगम :- यह भी अपने राजा की तरह धन-दौलत से प्रेम करने वाली, किसी के बहकावे में ना आनेवाली, कीमती कपड़े और गहनों से लगाव रखने वाली सदा पैसा कमाने की धुन में रहने वाली बेगम है।

गुलाम :- रोनी सूरतवाला तथा बिना मूछों वाला यह गुलाम सदा इसी गम में घुलता रहता है कि कहीं राजा से कोई और पुरस्कार या दान ना ले जाए। अमीर राजा का गुलाम है सो इसके कपड़े भी कीमती होते हैं। यह अपना काम बड़ी चतुराई से करता है।

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

:) हंसिकाएं (:

# बाहर से आए पर्यटक को गाइड ने बताया कि जब अकबर सिर्फ चौदह साल का था तभी उसने बादशाह बन देश पर राज करना शुरु कर दिया था। पर्यटक बोला तुम्हारा देश भी अजीब है, यहां चौदह साल में देश संम्भालने दिया जाता है पर शादी अठ्ठारह साल के पहले नहीं करने दी जाती।
अब तुम्हें क्या बताएं साहब कि घर चलाना देश चलाने से कितना मुश्किल है। गाइड ने जवाब दिया।

# आज सरे आम भरी ट्रेन में एक आदमी एक युवती को चाकू दिखाने लगा।
अरे किसी ने विरोध नहीं किया? इतनी भीड़ में कोई कुछ भी नहीं बोला?
नहीं, सब तमाशा देखते रहे।
तब तो बेचारी ने मजबूरी में अपना पर्स उसके हवाले कर दिया होगा?
नहीं, उसमे से कुछ पैसे निकाल कर चाकू खरीद लिया।

# हां तो बेटा, तुम्हारा खर्च कैसे चलता है?
जी, मेरा तो ऊपर की आमदनी से गुजर-बसर होता है।
क्या कहते हो तुम्हें पता नहीं ऊपर की कमाई कानूनन जुर्म है?
अरे वैसी नहीं, मेरा काम तो पोल पर चढ कर बिजली ठीक करना है।

# अरे! यह क्या कर रहा है?
बटन टांकना सीख रहा हूं।
इसकी क्या जरूरत पड़ गयी, तेरी तो शादी हो गयी है ना?
तभी तो............

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

महाकवि कालिदास की समाधि श्रीलंका में है.

महाकवि कालिदास। उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के राजकवि।
अभिज्ञान शकुंतलम, मेघदूत, मालविकाग्निमित्र, ज्ञतुसंहार, कुमारसंभव आदि महान ग्रन्थों के रचयिता। इतना प्रसिद्ध व्यक्ति पर जिसका जन्मकाल, जन्मभूमि के साथ-साथ मृत्युकाल सब विवादित। पर जो भी जानकारी उपलब्ध होती है, उसके अनुसार उनकी जीवन यात्रा श्रीलंका में जा कर समाप्त हुई थी।

लंका में प्राप्त जानकारी के अनुसार, कालिदास वहां के राजकुमार कुमारदास द्वारा रचित "जानकी हर राम" नामक काव्य को पढ इतने अभिभूत हो गये कि पता लगा कर उसके प्रतिभाशाली रचनाकार से मिलने लंका पहुंच गये। वहां उनका भव्य स्वागत किया गया। कुमारदास पहले से ही कालिदास का भक्त था। दोनों जल्दि ही एक दूसरे के अभिन्न मित्र बन गये। फिर कुमारदास के अतिशय अनुरोध पर कालिदास ने वहीं स्थायी रूप से रह कर अपनी काव्य साधना करने का आग्रह स्वीकार कर लिया।

समय बीतता गया, राजा के निधन के पश्चात कुमारदास राजा बना और यहीं से उसका पतन शुरु हो गया। उसका अधिकांश समय विभिन्न वेश्यालयों में बीतने लगा। इन सब समाचारों का पता कालिदास को भी लगता रहता था। अंत में उन्होंने भी इस सब की पुष्टि के लिये वेश्यालयों में जा कर सच्चाई का पता लगाना शुरु कर दिया। कुमारदास को भी खबर मिली कि कोई रोज उसके बारे में पता करने के लिये वेश्यालयों का चक्कर लगा रहा है। उसे लगा कि कहीं यह मेरा मित्र कालिदास ही तो नहीं। इस सच्चाई को जानने के लिये उसने एक दिन एक वेश्यालय से निकलते वक्त उसके द्वार पर एक अधुरा श्लोक लिख दिया, साथ ही यह सूचना भी लगा दी कि इस श्लोक को पूरा करने वाले को मुंहमाँगी स्वर्ण मुद्राएं दी जाएंगी। कुछ देर बाद वहां कालिदास आए और सूचना पढ श्लोक पूरा कर दिया। यह सारा मंजर वहां की वेश्या देख रही थी। उसके मन में पाप आ गया। उसने पुरस्कार की राशि प्राप्त करने के लिये कालिदास की हत्या कर उनकी लाश को अपने घर में गड़वा दिया और श्लोक को अपना
बता इनाम लेने राजदरबार जा पहुंची। पर वह मूढ संस्कृत भाषा से पूर्णतया अंजान थी। उसके अशुद्ध उच्चारण से भेद तुरंत खुल गया। कुमारदास ने सच्चाई उगलवा ली।अपने प्रिय मित्र का ऐसा हश्र देख उसका कलेजा मुंह को आ गया। उसने पूरे विधि विधान से अपने मित्र के पार्थिव शरीर को अग्नि के हवाले कर दिया। पर इस सारी घटना के लिये वह अपने को माफ नहीं कर पा रहा था। जैसे ही चिता धू-धू कर जलने लगी कुमारदास अपने को रोक नहीं पाया और उसी चिता में कूद अपनी जान दे दी। उसे ऐसा करते देख उसकी पाचों रानियों ने भी उसी चिता में कूद अपने प्राण त्याग दिये।

यह समाधि श्रीलंका की नील बालका नदी के किनारे मातर नामक स्थान पर अवस्थित है। इसे सप्त बोधि के
नाम से जाना जाता है। अप्रैल के तीसरे सप्ताह में यहां हर साल महाकवि कालिदास का पुण्य पर्व मनाया जाता है।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

अरे, मेरी आय बढ गयी और मुझे ही पता नहीं चला !!!!

वातानुकूलित कमरे में एक बोर्ड पर एक लकीर होती है, जिसके आगे एक तीर बना होता है। उसी को ऊपर नीचे कर प्रतिशत और आंकड़ों में सब पता चल जाता है कि कितनी मंहगाई कम हुई या किसी की आमदनी कितनी बढी। समझे?

आज ठंड़ कुछ ज्यादा ही थी। चाय की दुकान पर गुरु शिष्य मिल गये। सुविधा के लिये उनका नाम ज्ञानी और अज्ञानी रख लेते हैं। आदत के अनुसार जन्मजात अज्ञानी शिष्य फिर शुरु हो गया।

अज्ञानी : गुरु, ये सरकार समिति, कमेटी वगैरह क्यूं बनाती है? सरकार में तो ऐसे ही काम करने वालों की भरमार होती है।

ज्ञानी : अरे पगले, कभी किसी मामले को वर्षों लटकाने के लिये, कभी विवादास्पद मुद्दे से अपना सर बचाने के लिये और कभी जनता का ध्यान बंटाने के लिये यह सब करना पड़ता है।

अज्ञानी : गुरु पर इसके लिये ज्यादातर लोग अवकाश प्राप्त ही क्यों चुने जाते हैं?

ज्ञानी : मुर्खता की बातें ही करेगा जब करेगा। सब नहीं पर बहुतों को सरकार को भी उपकृत करना पड़ता है। जिंदगी भर वफादार रह कर भी जो ढंग का कुछ नही पा सका उसे ऐसे काम दे दिये जाते हैं। लोगों की भी धारणा रहती है कि सारी उम्र सरकारी काम में रहने से तजुर्बेदार तो होगा ही। अब यह मत कहना कि सरकारी काम तो..............

अज्ञानी : पर गुरु अबकी तो पेट्रोल, गैस दाम बढाऊ समिति के अध्यक्ष महोदय ने कहा है कि देशवासियों की आय बढ गयी है, तो मेरी तो वहीं की वहीं है। यह कैसी बात हुई कि मेरी आय बढी और मुझे ही पता नहीं चला।

ज्ञानी : अरे मुर्ख, यह समझना इतना आसान नहीं है। देख एक वातानुकुलित कमरा होता है। उसमें एक बोर्ड़ लगा रहता है। उस पर एक लकीर बनाते हैं, जिसके आगे एक तीर बना होता है। उसे ही ऊपर-नीचे कर यह लोग पता लगा लेते हैं कि, कितनी आमदनी बढी, कितनी मंहगाई कम हो गयी, स्वास्थ्य सेवाओं में कितनी बढोत्तरी हुई, मृत्यु दर में कितनी कमी आयी, बेरोजगारी कम हो गयी, शिक्षित लोगों का ईजाफा हो गया, भ्रष्टाचार कम हो गया, ईमानदारी बढ गयी, अपराध कम हो गये, सुख-शांति बढ गयी, आदि-आदि। यह सब बैठे-बैठे यह लकीर प्रतिशत और आंकड़ों में बता देती है।

अज्ञानी : पर गुरु उनकी मान भी लें। मेरी ना भी सही औरों की तो आमदनी बढी होगी, पर उसके साथ-साथ मंहगाई भी तो पिछले वर्षों की तुलना में आसमान छू रही है। अब 100 रुपये गैस और करीब 300-400 रुपये पेट्रोल के मासिक खर्च के अलावा जो ट्रकों की ढूलाई से कीमतें बढेंगी उसकी तुलना में कितनी आय बढी होगी आम आदमी की। कोई दुगनी या तिगुनी तो बढ नही गयी होगी?

ज्ञानी : नहीं!! यानि कि!!! अब!!!! अरे तुम्हारा भी तो कोई फर्ज बनता है देश के प्रति। यह मत सोचो कि देश ने तुम्हें क्या दिया, यह देखो कि तुम देश को क्या दे रहे हो।

अज्ञानी : गुरु मुंह मत खुलवाओ। पुरानी बातें मैं नहीं जानता, पर अब तो यह हाल है कि लोगों की जान जा रही है और बदले में जो मिल रहा है उसे मैं भी जानता हूं, तुम भी जानते हो और देश का हर भुग्तभोगी जानता है।
चलता हूं, नहीं तो एक दिन की पगार कट जायेगी, मंदी के नाम पर।
राम, राम।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

मणिकर्ण शिवजी की रमण भूमि है.

मणिकर्ण में मंदिर और गुरुद्वारे के लंगर में बनने वाले चावल गर्म पानी के सोतों में पकाए जाते हैं।

"मणिकर्ण", हिमाचल मे पार्वती नदी की घाटी मे बसा एक पवित्र धर्म-स्थल है। हिन्दु तथा सिक्ख समुदाय का पावन तीर्थ। जो कुल्लू से 35किमी दूर समुंद्र तट से 1650 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां आराम से बस या टैक्सी से जाया जा सकता है।

पौराणिक कथा है कि विवाह के पश्चात एक बार शिवजी तथा पार्वतीजी घूमते-घूमते इस जगह आ पहुंचे। उन्हें यह जगह इतनी अच्छी लगी कि वे यहां ग्यारह हजार वर्ष तक निवास करते रहे। इस जगह के लगाव के कारण ही उन्होंने जब काशी की स्थापना की तो वहां भी नदी के घाट का नाम मणिकर्णिका घाट रक्खा। इस क्षेत्र को अर्द्धनारीश्वर क्षेत्र भी कहते हैं,तथा यह समस्त सिद्धीयों का देने वाला स्थान है। इस जगह का" मणिकर्ण" नाम पड़ने की भी एक पौराणिक कथा है।

यहां प्रवास के दौरान एक बार स्नान करते हुए माँ पार्वती के कान की मणि पानी मे गिर तीव्र धार के साथ पाताल पहुंच गयी। मणि ना मिलने से परेशान माँ ने शिवजी से कहा। शिवजी को नैना देवी से पता चला कि मणि नागलोक के देवता शेषनाग के पास है। इससे शिवजी क्रोधित हो गये जिससे ड़र कर शेषनाग ने जोर की फुंकार मार कर मणियों को माँ के पास भिजवा दिया। इन कान की मणियों के कारण ही इस जगह का नाम मणिकर्ण पडा। शेषनाग की फुंकार इतनी तीव्र थी कि उससे यहां गर्म पानी का स्रोत उत्पन्न हो गया। यह एक अजूबा ही है कि कुछ फ़िट की दूरी पर दो अलग तासीरों के जल की उपस्थिति है। एक इतना गर्म है कि यहां मंदिर - गुरुद्वारे के लंगरों का चावल कुछ ही मिनटों मे पका कर धर देता है तो दूसरी ओर इतना ठंडा की हाथ डालो तो हाथ सुन्न हो जाता है।

यही वह जगह है जहां महाभारत काल मे शिवजी ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए किरात के रूप मे उससे युद्ध किया था। यहीं पर सिक्ख समुदाय का भव्य गुरुद्वारा भी है जहां देश विदेश से लोग आ पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। इसकी स्थापना कैमलपुर, अब पाकिस्तान मे, के निवासी श्री नारायण हरी द्वारा 1940 के आसपास की गयी थी।

थोडी सी हिम्मत, जरा सा जज्बा, नयी जगह देखने-जानने की ललक हो तो एक बार यहां जरूर जाएं।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

हिमाचल के मणिकर्ण का श्रीराम मंदिर

हिमाचल का मणिकर्ण वह दिव्य स्थान है जो भगवान शंकर को अत्यधिक प्रिय है। पुराणों के अनुसार शिवजी तथा माता पार्वती ने अपने विवाह के पश्चात 11000 वर्षों तक यहां रमण किया था। भोले भंडारी को तो यह अलौकिक स्थान इतना प्रिय रहा कि उन्होंने काशी में भी अपने स्थान का नाम "मणिकर्णिका" घाट रखा।

इसी मणिकर्ण में श्रीरामजी का एक प्राचीन और अद्भुत मंदिर है। जहां दूर-दूर से लोग आ अपनी मनोकामनायें पूर्ण करते हैं। इस मंदिर के निर्माण की भी एक रोचक कथा है।

सोलहवीं शताब्दी की बात है। हिमाचल के मणिकर्ण इलाके में एक गरीब ब्राह्मण रहा करता था। उस समय कुल्लू प्रदेश के राजा जगत सिंह के कान किसी ने उस ब्राह्मण के खिलाफ यह कह कर भर दिये कि उसके पास अनमोल मोती हैं, जो कि राजकोष में होने चाहिये। ब्राह्मण ने राजा को समझाने की लाख कोशिश की कि उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं है, पर राजा ने उसकी एक ना सुनी और तीन दिन के अंदर मोती पेश करने का हुक्म सुना दिया।
लाचार ब्राह्मण ने राजकोप से ड़र कर परिवार समेत आत्महत्या कर ली। तब राजा की आंख खुली। ब्रह्महत्या के कारण उसकी रातों की नींद हराम हो गयी। उसे अपने भोजन में कीड़े नजर आने लगे। यहां तक की वह असाध्य रोग का शिका हो गया। जब कोई हल नहीं निकला तब राजा एक महत्माजी की शरण में गया। उन्होंने उसे अयोध्या से श्रीरामजी की मुर्ती ला वहां स्थापित कर अपना सारा राज-पाट रघुनाथजी को अर्पण कर खुद उनका प्रतिनिधि बन राज करने को कहा। राजा ने वैसा ही किया और अपने जीवन के शेष दिन श्रीरामजी के चरणों में काट वहीं अपने प्राण त्यागे।

वह मंदिर आज भी मणिकर्ण में है। जहां दूर-दूर से लोग यहां दर्शन करने आते हैं। राजा जगत सिंह के वशंज अब भी अपनी परंपरा निभाते हुए रघुनाथजी की चाकर बन सेवा करते हैं। 1981 में एक मंदिर कमेटी का गठन किया गया जो दुनिया भर के श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर का रख-रखाव तथा यहां आने वाले भक्तों के रहने, खाने की पूरी सुविधा प्रदान करती है।

कभी भी मणिकर्ण जाने का सौभाग्य मिले तो वहां श्रीराम मंदिर और वहीं स्थित गुरुद्वारे का लंगर खाना ना भूलें।