रविवार, 31 जनवरी 2010

इंसानियत की कोई जाति नहीं होती. एक सत्य घटना.

चाहे कोई बंगाली हो, पंजाबी हो, गुजराती हो। उसका प्रदेश चाहे छत्तीसगढ़ हो, उड़ीसा हो या आसाम हो। मानवता या इंसानियत को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपसी प्रेम के लिए यह कोई बंधन नहीं है।

शर्मा परिवार पर प्रभू की कृपा थी। दोनों बच्चे बड़े हो गये थे। घर की जिम्मेदारियां कुछ कम हुईं तो श्रीमति कदम शर्मा ने बचे समय के सदुपयोग के लिये घर के पास के ही एक स्कूल में शिक्षिका का पद ग्रहण कर लिया। छोटा सा स्कूल था। छोटी-छोटी तनख्वाह थी। पर घर के नजदीक था और कोई मजबूरी नहीं थी। अच्छा था लोगों से मिलना जुलना हो जाता था और प्रकृति प्रदत्त लियाकत का उपयोग भी हो जाता था। तब कहां किसी को पता था कि आने वाले समय के लिये भगवान ने एक द्वार खोल दिया है।

समय अपनी रफ्तार से चलता जा रहा था। बड़ा बेटा कर्मक्षेत्र में उतर चुका था। छोटे ने एम।बी.ए. की तैयारी कर ली थी। तभी परिवार को जबरदस्त आर्थिक नुक्सान ने आ घेरा। सारी जमा-पूंजी पूरक के रूप में निकल गयी। उसी समय पूना के एक संस्थान से छोटे पुत्र को कोर्स के लिये बुलावा आ गया। दौड़-धूप शुरु हो गयी। जिन बैंकों के लुभावने वादों पर विश्वास कर पैसों के लिये निश्चिंत थे, वे सारे खोखले साबित हुए। इस बात को वे लोग अच्छी तरह समझ सकते हैं जिन्होंने कभी मजबूरी में इन बैंकों का रुख किया होगा।

दिन पर दिन निकलते जा रहे थे। कुछ इंतजाम नहीं हो पा रहा था। ठीक ही कहा गया है कि जब समय विपरीत होता है तो अपना खुद का साया भी साथ नहीं देता। किसी तरह सिर्फ आधी रकम का इंतजाम हो पाया था।

कदमजी अपने स्टाफ रूम में सर झुकाये बैठीं थीं। आंखें आसुंओं से भरी हुई थीं। कल फीस जमा करने का अंतिम दिन था। एक लायक बेटे का भविष्य जोखिम में पड़ता जा रहा था। कुछ भी सूझ नहीं रहा था। सदा हंसता मुस्कुराता हुआ चेहरा कुम्हलाया हुआ था। तभी एक सहकर्मी ने कक्ष में प्रवेश किया। इनकी हालत देख जैसे ही कारण पूछा वैसे ही इनके सब्र का बांध टूट गया। आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी। आनन-फानन में सारे साथियों में बात फैल गयी। बात का पता सबको था पर समस्या इतनी विकट होगी किसी को अंदाजा नहीं था।

फिर पता नहीं क्या हुआ। एक घंटे के अंदर कमरे की मेज पर ढाई लाख रुपये पड़े थे। नगद और चेक के रूप में। उस छोटे से स्कूल में काम करने वाले कोई धन्ना सेठ तो थे नहीं, पर दिलों में इंसानियत थी, सहयोग की भावना थी, आपसी प्यार का जज्बा था। सबने अपनी क्षमता के अनुसार जितना भी बन पड़ा सहयोग किया था। कदमजी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। मुंह से बोल नहीं निकल पा रहे थे।

फिर किसी तरह तटस्थ हो सारे जने हरकत में आए। दौड़-धूप कर ड्राफ्ट वगैरह बनवाया गया और दूसरे दिन पैसे भेज दिये गये। साथ ही कालेज के प्रिंसीपल साहब को फोन पर इसकी जानकारी दे दी गयी जिससे देर होने पर कोई और अड़चन ना खड़ी हो जाये। सब ठीक हो गया। दाखिला मिल गया।

समय चक्र चलता रहा, वर्षों बीत गये। आज बेटा अपने कर्म क्षेत्र में कार्यरत है। कदमजी के बड़े पुत्र का विवाह भी हो चुका है। सुख-शांति स्थापित है। पर उस समय की याद आते ही उनकी आंखें नम हो जाती हैं, विवशता से नहीं कृतज्ञता से।

मन तो मेरा भी भीग जाता है यह सब सुनाते लिखते, क्योंकि कदमजी मेरी पत्नि हैं।

शनिवार, 30 जनवरी 2010

हँसी के मोती :) :) :) :)

बार में बंते के साथ बैठा संता उचाट सा था। बंता के बहुत पूछने पर बोला कि यार तेरी भाभी से तंग आ गया हूं, रोज-रोज के क्लेश से जीना मुश्किल हो गया है। जी तो करता है कि उठा कर खिड़की से बाहर फेंक दूं।
तो फेंक दो ना, एक बार में झंझट खत्म होगा। दो पेग चढा चुके बंता ने सलाह दी।
अरे यार, फेंक तो दूं, पर मेरा फ्लैट ग्राउण्ड़ फ्लोर पर है, जब वह फेंकने के बाद अंदर आयेगी तो तुझे तो क्या मुझे भी नहीं पता मेरा क्या होगा।
संता ने सिहरते हुए खुलासा किया।

बाऊजी बार से पूरी तरह टुन्न हो कर बाहर निकले तो गेटकीपर ने सलाम ठोका। बाऊजी ने खुश हो पूछा, आज तक तुम्हें सबसे ज्यादा कितनी टिप मिली है?
हुजुर, सौ रुपये।
अच्छा, यह लो दो सौ रुपये, खुश?
जी साहब। एक जोरदार सलाम के साथ गेटकीपर ने जवाब दिया।
तभी बाऊ जी को कुछ याद आया। उन्होंने पलट कर फिर पूछा, ये सौ रुपये तुम्हें किस कंजूस ने दिये थे?
आपने ही कल दिये थे हुजूर।

प्रवचन करने के बाद पंड़ितजी शराब की बुराईयां बताते हुए बोले कि यह ऐसी चीज है कि यदि पैर से भी छू जाए तो आदमी नरक में जाता है। इतना कह कर उन्होंने संता को इंगित कर पूछा कि हां भाई क्या समझे?
संता ने खड़े हो कर जवाब दिया, पंड़ितजी ऐसी चीज को कोई लात मारेगा तो वह नरक में ही तो जाएगा।

सबेरे-सबेरे पत्नि ने अखबार ला कर पति को दिखाया, लो देखो शराब की कितनी बुराईयां छपी हैं।
अच्छा! कल से बंद। पति ने कहा।
सचमुच शराब बंद? पत्नि ने खुश हो पूछा।
अरे शराब नहीं यह अखबार।
पति ने बुरा सा मुंह बना कर जवाब दिया।

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

मुझे भी "पद्मश्री" मिल सकता है.

पिछले दिनों पद्म-पुरस्कारों की घोषणा हुई। उसमें कुछ "हस्तियां" ऐसी भी थीं जिनके चयन पर यह सारा आयोजन प्रश्नाकिंत हो जाता है। मुझे आशा थी कि इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप दिग्गज ब्लागरों की कलम से कुछ निकलेगा पर कहीं सुगबुगाहट हुई भी होगी तो मुझे पता नहीं चला।

अब तो ऐसा ही लगता है कि समय के साथ-साथ इन अलंकारों की गरिमा, साख, इज्जत, जो भी है, सब खत्म होता जा रहा है। एक समय था जब इन्हें पाने वाले को आदर की दृष्टि से देखा जाता था, पर अब तो लोग शायद इस ओर ध्यान ही नहीं देते। यह आयोजन भी महज खाना पूर्ती के लिये रह गया लगता है। बांटना है सो बंट रहा है। किसे देना है, यह पाने वाले की पहुंच या फूहड़ चैनलों में उसके मर्यादाहीन कार्यकलापों से लगातार दर्शकों में उपस्थिति उसकी लोकप्रियता का मापदंड़ बन गया है। बदनाम होंगे तो क्या नाम तो होगा कि तर्ज पर। ना किसी के अपने कार्यक्षेत्र में योगदान की कीमत रह गयी है नाही किसी की वरियता का कोई मोल बचा है।

सबसे ज्यादा मिट्टी पलीद हुई है "पद्मश्री" उपाधी की। किस बिना पर यह “बांटे” जाते हैं, इसका पैमाना किसी को भी नहीं पता, देने वालों को भी नहीं। बिना किसी का नाम लिये आप इस बार के “पद्मश्रीयों” की लिस्ट पर नज़र ड़ालें और उनके अपने क्षेत्रों में किये गये “एहसानों” का अवलोकन करें तो आप भी मेरी बात से सहमत हो जायेंगे।

पर इन सब क्रियाकलापों से एक जोरदार बात धीरे से झटका दे रही है कि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में कुछ "जुगाड़" वगैरह कर अपने नाम के आगे भी "पद्मश्री" जुड़वाया जा सकता है। पर साथ ही फिर दिल में यह ख्याल भी आता है कि कहीं लोग यह ना कहने लगे, हुंह लो एक और आ गया।

बुधवार, 27 जनवरी 2010

जज और अभियुक्त

जज ने चोर से पूछा कि तुमने इतनी चोरियां कीं, बिना किसी साथी के?
" साहब आप तो जानते ही हैं कि आजकल ईमानदार साथी मिलते ही कहां हैं," चोर ने जवाब दिया।

जज : क्या तुमने कभी जेल काटी है?
चोर : दो बार प्रयास कर चुका हूं, पर सलाखें बहुत मोटी थीं। काट नहीं पाया।

जज : जानते हो दो-दो शादियां करने की सजा क्या है?
अभियुक्त : जी श्रीमान, दो-दो सासों को झेलना पड़ता है।

जज : सजा सुनने के पहले क्या तुम अदालत के सामने कुछ पेश करना चाहते हो?
अभियुक्त : अब क्या पेश करूंगा सरकार, जो था वह तो पहले ही वकील साहब को भेंट कर चुका हूं।

जज : तुमने पति के सिर पर कुर्सी मारी और वह टूट गयी।
अभियुक्ता : पर सर, मेरा ऐसा इरादा नहीं था।
जज : क्या मतलब है तुम्हारा? क्या तुम्हारी नीयत हमला करने की नहीं थी?अभियुक्ता : नहीं, मेरी नीयत कुर्सी तोड़ने की नहीं थी।

जज : तो तुम्हारा कहना है कि तुमने यह कार नहीं चुराई है?
चोर : वकील साहब की हफ्ते भर की जिरह से तो मुझे भी अब ऐसा ही लगने लगा है।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

रायपुर के ब्लॉगर भाईयों का सम्मेलन फूलों की खुशबू में संपन्न

यह संयोग था या शुभ संकेत आप ही बताईये......................

दिन रविवार, तारीख 24 जनवरी, समय 3.30 अपरान्ह, जगह रायपुर। यादगार क्षण, जब अनिल पुसदकर जी ने छत्तीसगढ में सक्रिय ब्लागर्स की मीटिंग को प्रेस क्लब में संबोधित कर कार्यक्रम की शुरुआत की।

मुझ समेत बहुत सारे सदस्य वहां पहुंचे थे, जो ब्लागर परिवार से तो हैं पर आपस में एक दूसरे को नाम से नहीं काम से पहचानते थे। इन “अनदेखे अपनों” का आपसी परिचय अपने आप में एक ऐसा अनुभव था जिसका आभास वहां उपस्थित रह कर ही पाया जा सकता था।

इसे संयोग कहेंगे या शुभ संकेत कि रायपुर में एक ही समय तरह-तरह के सुंदर और विभिन्न जातियों के फूलों की प्रदर्शिनी और छत्तीसगढ के विभिन्न स्थानों से आए ब्लागर भाईयों का मिलन एक साथ हो रहा था। आशा है जिस तरह सुंदर-सुंदर फूलों ने अपने देखने और चाहने वालों के दिलों को सदा की भांति हर्षाया होगा उसी तरह देश में दूर-दराज बैठे इस मिटिंग पर नजर रखे ब्लाग परिवार के “कजिंस” के दिलों को भी इस आयोजन की सफलता से खुशी महसूस हुई होगी। (कुछ को नहीं भी होती है भाई)

सभा में हर सदस्य को अपनी बात रखने का सुयोग प्राप्त था। बातें खुल कर रखी भी गयीं, सुझाव सामने आए, अड़चनों का जिक्र किया गया। जिसका सार यह निकला कि, * हिंदी ब्लागिंग के बढावे के लिये जो कुछ भी किया जा सके वह किया जाए। * इस सशक्त माध्यम से अपने प्रदेश छत्तीसगढ के बारे में देश के अन्य हिस्सों में रहने वालों के मन में जमी गलत भ्रान्तियों, भावनाओं तथा अनभिज्ञता को दूर किया जाय। * प्रदेश की सही तस्वीर लोगों के सामने लायी जाए। * दुष्प्रचार फैलाने वालों को सही मार्ग दिखाया जाए। * इस परिवार को राजनीति से दूर रखा जाए। क्योंकि समय के साथ-साथ सशक्त होते इस माध्यम का कोई अपने हित के लिये दुरप्रयोग ना कर सके। * मेरी तरह बहुतेरे साथियों की तकनीकी समझ को स्कूल के स्तर से कम से कम महाविद्यालय के स्तर तक ले जाने के लिये कार्यशालाओं का आयोजन नियमित अंतराल पर किया जाए। * और इस तरह के प्रयासों में जो भी “स्पीड ब्रेकर” आएं उनसे मिल-जुल कर पार पाया जाए। यह सारी बातें बहुत ही सौहार्द पूर्ण वातावरण के बीच बहुत शांति और धैर्य से सुनी और कही गयीं।

करीब तीन घण्टे चले इस कार्यक्रम के बाद अनिल जी का मेजबान रूप सामने आया जब उन्होंने बड़े अपनत्व से सभी को अपने फार्म हाउस पर रात्रि भोज के लिये आमंत्रित किया। भोजन तो एक बहाना साबित हुआ, हालांकि दूर-दराज से आए अनेक सदस्य समय की मजबूरी से वहां नहीं जा पाए, पर जो वहं पहुंचे वे तब तक अपनी शुरुआती झिझक से पूर्णतया उबर चुके थे जिसका फायदा यह रहा कि खाने के साथ-साथ एक दूसरे से परिचय और गाढा हुआ, प्रेस क्लब में पीछे छूटी वार्ता फिर जिवंत हो उठी, खुल कर चर्चाएं हुईं, अपने अनुभव बांट कर संबंधों में मजबूती लाते-लाते कब घड़ी की सुईयां ग्यारह बजाने लगीं पता ही नहीं चला। समय देख ना चाहते हुए भी सोमवार के बुखार को याद कर मुझे वहां से उठना पड़ा।
मैं तहे दिल से राजकुमार ग्वालानी जी शुक्रगुजार हूं जिन्होंने वहां से लौटते वक्त मेरा साथ दिया।
आशा है यह शुरुआत एक कारवां की शक्ल जरूर इख्तियार करेगी।

शनिवार, 23 जनवरी 2010

हमीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते

कभी-कभी बातचीत के दौरान हम आधे-अधूरे शेर या मिसरे मसाले के रूप में जोड़ देते हैं। पर पूरा मिसरा या शेर याद नहीं होता या पता ही नहीं होता। ऐसी ही कुछ लोकप्रिय पंक्तियां हाज़िर हैं पर खेद है कि सब के रचनाकारों का नाम नहीं खोज पाया हूं।
जान है तो जहान है। यह मीर साहब की रचना इस प्रकार है :-
'मीर' अम्दन भी कोई मरता है,
"जान है तो जहान है प्यारे।"

चल साथ कि हसरत दिले-मरहूम से निकले,
"आशिक का जनाजा है जरा धूम से निकले"

गालिब साहब के तो ढेरों आधे-अधुरे मिसरे हमारी जबान पर वर्षों से चढे हुए हैं :-
इशरते कतरा है दरिया में फना हो जाना,
"दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना।"

हमको मालुम है जन्नत की हकीकत लेकिन
"दिल के खुश रखने को ख्याल अच्छा है।"

गमे हस्ती का असद जुज मर्ग इलाज,
"शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक"

उनको देखने से आ जाती है मुंह पर रौनक,
"वो समझते हैं कि बिमार का हाल अच्छा है"

बुलबुल के कारोबार पे हैं खंदाहाए गुल,
कहते हैं जिसको इश्क खलल है दिमाग का।
ऐसे और भी हैं :-
"हजरते 'दाग' जहां बैठ गये बैठ गये"
और होंगे तेरी महफिल से उभरनेवाले।

मरीजे इश्क पे रहमत खुदा की।
"मर्ज बढता गया ज्यूं-ज्यूं दवा की"

हम तालिबे शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम,
"बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम ना होगा"

रिंदे खराब हाल को जाहिद ना छेड़ तू,
तुझको पराई क्या पड़ी अपनी निबेड़ तू।
और
अब इत्र भी मलो तो मुहब्बत की बू नहीं,
"वो दिन हवा हुए कि जब पसीना गुलाब था" :)

जमाना बड़े शौक से सुन रहा था,
हमीं सो गये दास्तां कहते-कहते।

खुदा हाफिज़

बुधवार, 20 जनवरी 2010

व्यक्तिगत अहम् के टकराव से धूमिल होता देश का गौरव

कुछ ज्यादा समय नहीं हुआ है जब हर देशवासी प्रत्येक ओलिम्पिकोत्सव पर निश्चिंत रहता था कम से कम एक स्वर्ण पदक की आवक को लेकर। फिर उसे नज़र लग गयी जमाने की। रही सही कसर पूरी कर दी एक इंसान के अक्खड़पन ने। कैसे क्या हुआ था उसे सभी जानते हैं।
लगता है इतिहास अपने को फिर दोहरवा रहा है। इस बार निशाने पर वह पात्र है जिसने अपने बल-बूते पर स्वर्ण पदक हासिल किया है। जैसी की खबरें निकल कर आ रहीं हैं कि अहमों के टकराव से फिर एक खेल को नुक्सान होने जा रहा है। इस बार निशानेबाजी के खेल पर बुरी नज़र का निशाना है।
हर बार की तरह बहती गंगा में हाथ धोने वाले लोगों की मंशाओं पर ओलम्पिक स्वर्ण पदक विजेता बिंद्रा ने तब पानी फेर दिया जब अपने स्वागत समारोह में उसने नेशनल राइफल एसोसिएशन द्वारा क्रेडिट लेने की कोशिशों को यह कह कर नाकाम कर दिया कि इस सारी उपलब्धि का श्रेय सिर्फ उसके पिताजी को है जिनके द्वारा विदेशों में प्रशिक्षण पर करोंड़ों का खर्च किया गया। यह बात एसोसिएशन के अध्यक्ष और राजनेताओं को खल गयी। अखबारें बताती हैं कि बिंद्रा पर बहुत उल्टे-सीधे दवाब बनाने की कोशिश की गयी। इसी कारण दोनों पक्षों में कटुता बढती चली गयी। पर जब कुछ और ना हो सका तो अब मौका मिलते ही बिंद्रा को रास्ता दिखा दिया गया। अपने व्यक्तिगत अहम या टकराव पर देश के गौरव को क्यों दांव पर लगाया जाता है यह समझ के बाहर की चीज है।
यहां सवाल यह उठता है कि इस अहम के टकराव का फल किसे भुगतना पड़ेगा? क्यों नहीं उपर बैठे राजनेता देश हित में फैसला लेते? आज से नहीं वर्षों से खिलाड़ियों के साथ दुर्व्यवहार होता आया है। बहुतेरी बार सुना जाता रहा है कि खिलाड़ियों के साथ गये राजनयिक, जिनकी संख्या खिलाड़ियों से भी ज्यादा होती थी, अपना सामान साथ गये खिलाड़ियों से उठवाया करते थे। खिलाड़ियों का ध्यान या उनकी सुविधा को नकार अपने परिवार के साथ घूमने-फिरने में समय व्यतीत करते थे। पर आज तक नहीं सुना गया कि उन अधिकारियों से कोई सवाल जवाब किया गया हो, कोई सफाई मांगी गयी हो या दोषी पाये जाने पर उन पर कोई "एक्शन" लिया गया हो।
अब तो यही लगता है कि समय आ गया है कि जनता ही इस तरह के लोगों से जिनके कारण देश का नाम बदनाम होता हो, जिनके कारण समाज में तनाव पैदा होता हो, जिनके कारण घूसखोरों अपराधियों को संरक्षण मिलता हो, अपराध में पकड़े गये अपराधी को छुड़ाने की सिफारिश करने वाले ऐसे लोगों को कटघरे में खड़ा कर उनसे जवाब-तलब करे और उनकी असलियत समाज के सामने लाये और उनका दंड़ भी खुद ही निर्धारित करे।

सोमवार, 18 जनवरी 2010

पाक दामन, पर विवादों से घिरे ज्योति बसु

ज्योति बसु, एक ऐसा नाम जो बंगाल की राजनीति के कीचड़ में 23 साल तक सर्वोच्च पद पर रहने के बावजूद अपना दामन साफ रख सका। एक धनाढ्य घराने में जन्म लेने और हर तरह की सुख सुविधा वाली जिंदगी पा सकने के बावजूद जो वामपंथी विचारधारा से ऐसा जुड़ा कि जिंदगी भर उसी का हो कर रह गया। वाम पंथ और कम्युनिस्ट दल यही उसका घर-संसार था। पार्टी के प्रति उसका समर्पण ऐसा था कि पिता निशिकांतजी को यदि रुपया पैसा देना होता था तो वह अपनी पुत्रवधु को ही देते थे उन्हें लगता था कि ज्योति के पास पैसा गया तो वह पार्टी फंड में चला जायेगा। पर विड़म्बना को क्या कहें उसी पार्टी ने उससे प्रधान मंत्री बनने का सुयोग छीन लिया। पर ज्योति बाबू ने एक मिनट भी नहीं लगाया पार्टी के फैसले को मानने में। इसी समर्पण और आम जनता से जुड़ाव ही उन्हें सदा लोकप्रियता प्रदान करता रहा।क्या था ऐसा जिसने सम्पन्न पिता और सफल व्यवसायी पुत्र के बीच इन्हें सर्वहारा वर्ग से जोड़े रखा।
ऐसा नहीं था कि उनके साथ विवाद नहीं जुड़े थे। कभी-कभी तो ऐसा भी लगता था कि क्या देश से भी ज्यादा पार्टी की अहमियत उनके लिये ज्यादा तो नहीं। इस बात को तब बहुत हवा मिली जब 1962 में चीन के द्वारा धोखेबाजी से कड़वी तथा शर्मनाक हार पर सारा देश स्तब्ध, दुखी तथा शर्मसार था तब इनकी तरफ से चीन की अलोचना ना होने से पूरे बंगाल तथा देश में कड़वाहट फैल गयी थी। बातें तो बहुत सी हैं पर हमारी परम्परा रही है कि दिवंगत होने के बाद किसी की आलोचना नहीं करनी चाहिये। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

रविवार, 17 जनवरी 2010

यदि यह सच है तो .............................

क्रिस्टोफर मारलो, अपने जमाने का एक विख्यात नाटककार। लोग दिवाने थे उसकी रचनाओं के। उसके लिखे कथानकों में भेद करना मुश्किल था कि वे सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं या काल्पनिक कथाएं हैं।
1593 में उसकी एक सराय में रहस्यमय स्थितियों में हत्या कर दी गयी। शक की उंगली शेक्सपियर की ओर भी उठी क्योंकि बाद में मारलो के सारे नाटक शेक्सपियर के नाम से छपे थे।
अब इसमें कितनी सच्चाई है नहीं कहा जा सकता। क्या ऐसा सचमुच हुआ था या यह सिर्फ बदनाम करने की साजिश है।
आप में से किसी को इस बारे में और जानकारी हो तो अवश्य बतायें।

शनिवार, 16 जनवरी 2010

यह कैसे ज्योतिषी हैं

15 जनवरी, सूर्य ग्रहण का दिन। स्टार प्लस ने अपने सारे भविष्य वक्ताओं को इकट्ठा किया हुआ था। वैसे इस चैनल पर अवतरित होने वाले ऐसे पुरुष या महिलाओं के लटके-झटकों को देख आपको भविष्य नहीं फिल्म जगत की याद आने लगती है।
पता नहीं क्या सोच कर वहीं ज्योतिष की सार्थकता को सिद्ध करने का खेल शुरु हो गया। इस चैनल के एक प्रिय ज्योतिषी हैं, जिनको अपनी नुमाइश का बहुत शौक है। वह पर्दे पर किसी को राह दिखाने की बजाय अपनी असहनीय मुद्राओं और हाव भाव को प्रदर्शित करने में ही अपना सारा ध्यान लगाये रहते हैं। उन्होंने उनके सामने पेश किये गये पात्र के बारे में अपना लेखा जोखा पेश कर दिया। सच्चाई जानने के लिये पात्र की पत्नि को फोन द्वारा बात कर जब महाराज के "प्रिडिक्शन" के बारे में बता उनका जवाब जानना चाहा गया तो उस महिला ने सब कुछ सिरे से नकार दिया। हालांकि ज्योतिषि महाराज ने अपनी तरफ से काफी कोशिश की, महिला का उत्तर बदलवाने की पर उसका जवाब नकारात्मक ही रहा। महाराज का चेहरा अपनी हार कबूल ना कर पा रहा था। कुछ देर बाद शायद उन्हें कुछ सूझा और भारतीय नारी, संस्कृति और संस्कारों का सहारा ले बोले कि कोई भी महिला सरेआम अपने पति के साथ अपने अच्छे-बुरे रिश्तों का खूलासा नहीं करना चाहेगी इसीलिये वह मेरी बातों को गलत बता रहीं हैं, वैसे मेरी सारी बातें सही हैं। पर उनका चेहरा कुछ और ही ब्यान कर रहा था।
इसी बीच एक अन्य ज्योतिषि महाराज उस पात्र को उसके अगले महिने होने वाले हाथ, पैर आंखों, लीवर इत्यादि पर आने वाले खतरों का ब्यौरा देने में जुट गये, जैसे ड़रा धमका कर अपनी बात मनवाना चाहते हों।
फिर उसी चैनल की एक चहेती महिला भविष्य वक्ता उठीं और पात्र के अन्य स्त्री से संबंधों का विवरण देने लगीं।
कुल मिला कर ऐसी नौटंकी देख कर मन दुखी होता रहा जहां एक विद्या को सरे आम अपने अहम का विषय बना कर उसका मजाक बनाया जा रहा था। मुझे तो यह सब सोची समझी साजिश का हिस्सा नजर आता है।स्टार जैसे चैनल कहने को ही भारतीय हैं पर इनकी हिंदी भाषा, वह भी कैसी है बतलाने की आवश्यकता नहीं है, को छोड़ कुछ भी ऐसा नहीं है जो हमारी संस्कृति या हमारी परम्पराओं के अनुरूप कुछ कर रहा हो। उल्टे उनका मजाक बनाना या उन्हें गलत सिद्ध करना ही इनका मुख्य उद्देश्य लगता है। जिसका उदाहरण समय-समय पर मिलता व दिखता रहता है।

सोमवार, 11 जनवरी 2010

माँ

माँ संवेदना है, भावना है, अहसास है।
माँ जीवन के फूलों में खुशबू का वास है।

माँ रोते हुए बच्चे का खुशनुमा पलना है,
माँ सहारा में नदी या मीठे पानी का झरना है।

माँ लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है,
माँ पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है।

माँ आखों का सिसकता हुआ किनारा है,
माँ गालों पर दुलार, ममता की धारा है।

माँ गर्मी के झकोलों में कोयल की बोली है,
माँ मेंहदी है, कुमकुम है, सिंदुर है, रोली है।

माँ त्याग है, तपस्या है, सेवा है,
माँ प्यार से फूंक कर ठंड़ा किया हुआ कलेवा है।

माँ कलम है, दवात है, स्याही है,
माँ परमात्मा की साक्षात गवाही है।

माँ अनुष्ठान है, साधना है, हवन है,
माँ जीवन के नगर में आत्मा का भवन है।

माँ चूड़ीवाले हाथों के मजबूत बंधन का नाम है,
माँ ही काशी है, काबा है, चारों धाम है।

माँ चिंता है, याद है, हिचकी है,
माँ बच्चे की चोट पर निकली सिसकी है।

माँ चूल्हा, रोटी और हाथों का छाला है,
माँ जीवन की कड़वाहट में अमृत का प्याला है।

माँ धरा है, जगत है, धूरी है,
माँ के बिना यह सृष्टि अधूरी है।

माँ के बिना इस दुनिया में कुछ हो नहीं सकता,
माँ जैसा भी दुनिया में कुछ हो नहीं सकता।

यह सारा कुछ माँ के ही नाम है,
दुनिया की सारी माताओं को प्रणाम है।
स्व.ओंम व्यासजी की एक अद्भुत रचना.

रविवार, 3 जनवरी 2010

दादा से बेटा बनते अमिताभ

आज यह ई-मेल मिला जिसे पढ़ कर आप् जान जायेंगे कि क्यों अमिताभ, अमिताभ हैं।
साथ की फोटुओं के साथ पोस्ट बहुत लम्बीईईईईई हो रही थी सो ...............
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The most Herculean task about the latest release PAA was transforming a 67-year old Amitabh Bachchan into 13-year old child Auro, suffering from a rare disorder called progeria. So come let's take a short run-through over how Amitabh became Auro. The prosthetic makeup, as we know, has been done by Hollywood's Christien Tinsley (THE PASSION OF THE CHRIST, CATWOMAN) and Dominie Till (THE LORD OF THE RINGS TRILOGY).

According to the reports Bachchan's make-up cost 10 per cent of the total budget.

It is learnt that it used to take four to five hours daily for Amitabh Bachchan's makeup to be done for his film PAA.

Not only this, if it used to take four hours to put on the make-up then two hours to remove it.

There are eight different layers of clay which has been put in his make up in the film.

While applying the make up he cannot eat, drink and talk for four hours.

Most of the performance comes out because of the make up.

Big B wore specially designed dentures so as to effortlessly replicate the voice of a 13-year old child.

He gets a lisp and his speech pattern gets altered because of the extra teeth.

He wore the dentures throughout the film's shooting and also had them on while dubbing.

Infact he has also sung a song in his voice wearing these dentures, which sounds like a child.

But Big B never ever showed a sign of panic, on the contrary he was always co-operative, patient, cool and full of enthusiasm.

शनिवार, 2 जनवरी 2010

इनाम और सम्मान बिना मांगे मिले तभी उनकी अहमियत होती है.

इनाम और सम्मान बिना मांगे मिलें तभी उनकी अहमियत होती है। पर कुछ लोग इन्हें किसी भी तरह पाने के लिये कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। चाहे उनकी ऐसी हरकतों से वे उपहास का पात्र ही क्यों ना बन जायें। ऐसी ही घटना कुछ दिनों पहले घटी।

मेरे एक मित्र एक यात्रा से एक अनूठी जानकारी ले लौटे, जिसे उन्होंने एक पत्रिका में भेजने के लिये उसके ब्यौरे का प्रिंट आउट निकाल कर अपनी मेज पर रखा हुआ था। तभी उनके एक सहयोगी उस कमरे में आये, उस समय वहां कोई नहीं था, उन्होंने उस कागज को पढा और चुपचाप उसकी फोटोकापी कर अपने कक्ष में चले गये। पर उनकी बदकिस्मती से उनको ऐसा करते एक चपरासी ने देख लिया था पर उस समय वह कुछ समझ नहीं पाया था। लंच के समय जब सब इकट्ठा हुए तो उस यात्रा की बात चली, उसके अनूठेपन के कारण सभी को ज्यादा जानने की उत्सुकता थी। अभी मेरे मित्र ने विस्तार से अपनी बात कहनी शुरु की ही थी कि वही सज्जन वहां आ पहुंचे और बीच बीच में ऐसे बोलने लगे जैसे उन्हें उस जगह की सारी जानकारी हो। पर जब किसी ने पलट कर उस बारे में और कोई सवाल पूछ लिया तो उनकी नीम हकीमी काम ना आयी और वह फिर अपने कमरे की ओर लौट गये पर जल्दि ही अपना पेपर वर्क पूरा कर फिर वापस आ गये और फिर अपना ज्ञान बघारने लगे। पर अब तक उस चपरासी ने सब देख सुन समझ उनकी फोटो कापी की बात सब को बता दी थी। वैसे भी उनकी DEPTH भी सभी को पता थी तो सब मन ही मन मुस्कुराते हुए उन्हें तरह-तरह से कुरेदते रहे जिस पर उनकी नीम हकीमी भी उन्हें धोखा दे उपहास का पात्र बनाती रही।

लोग ऐसा क्यों करते हैं? शायद मन ही मन ऐसे लोग हीन ग्रंथियों से पीड़ित होते हैं और उन्हें लगता रहता है कि लोग उन्हें तरजीह नहीं देते। फिर यदि ये ऊपर वाले की मेहरबानी से किसी ठीक-ठाक सी कुर्सी को हथियाने में कामयाब हो जाते हैं तो रोज अपने लिये ही मुश्किलें पैदा करते रहते हैं। कभी कोई इन्हें देखे बगैर निकल जाये तो इनका मुंह फूल जाता है, कभी कोई इन्हें "विश" ना करे तो इनका रक्त चाप बढ जाता है। पर ऐसे लोग कभी आगे बढ कर दूसरों की इज्जत करने में अपनी हेठी समझते हैं भले ही मालिक इनकी रोज सब के सामने ऐसी की तैसी करते रहें। इनको शायद पता ही नहीं होता कि इज्जत-मान बाजार से खरीदने की वस्तुएं नहीं हैं, उन्हें अपने व्यवहार, अपने कर्म और अपनी लियाकत से अर्जित किया जाता है।

आपके आस-पास भी तो ऐसे लोग होंगे ही?

भगवान ऐसे लोगों को सदबुद्धि दे या अन्य लोगों को इनसे बचाये।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

साल भर में ही वृद्धावस्था को प्राप्त बच्चा जाते समय तो हमें दुआ दे !

वर्षों से परंपरा रही है हर साल के अंतिम दिन, आने वाले साल को बच्चे के रूप में तथा जाते हुए साल को वृद्ध के रूप में दिखाने की। हर बार इसे देख मन में यह बात उठती रही है कि कोई बच्चा एक साल में ही गज भर की दाढी और झुकी कमर वाला वृद्ध कैसे हो जाता है। हर बार बात आयी-गयी हो जाते थी।

पर इधर फिल्मों ने नयी-नयी बिमारियों को आम आदमी से परिचित करवाया तो अपने भी ज्ञान चक्षु खुले। गहन शोध के बाद यह बात सामने आयी कि यह बिमारी तो "पा" की बिमारी से भी खतरनाक है। "पा" वाली तो फिर भी अपने रोगी को कुछेक साल दे देती है और उससे ग्रसित एक दूसरे के बारे में देख सुन धीरज धरने वाले दस-पांच रोगी मिल भी जाते हैं। पर यह साल दर साल लगने वाली बिमारी एक बार में एक ही को लगती है और उसको समय भी देती है तो कुछ महिनों का। खोज से यह बात भी सामने आयी है कि इस रोग को बढाने में आस-पास के माहौल का भी बहुत बड़ा हाथ होता है। प्रदुषित वातावरण का प्रभाव इस पर जहर का असर करता है।

अब ऐसे माहौल में जहां इंसान ने भगवान को ही बेच खाया है, जहां बेटियां अपने बाप के आश्रय में ही सुरक्षित नहीं हैं, देश की तो दूर रही जहां औलादें अपने मां-बाप को नोच-खसोट कर सड़क पर धकेल देती हों, जहां किसी की भी बहु-बेटी की आबरू पर लोग गिद्ध दृष्टि लगाये रखते हों, जहां चोर, उच्चके, कातिल ही भगवान बनते, बनाये जाते हों, जहां इंसान की करतूतों के आगे शैतान भी पानी भरता हो उस वातावरण में उस माहौल में वह देवतुल्य अच्छा भला निर्दोष बच्चा कैसे साल भर गुजारता होगा वही जानता है। साल भर में ही अपनी ऐसी की तैसी करवा यहां से निजात पा वह भी सुख की सांस लेता होगा।

कुछ किया भी नहीं जा पा रहा है। अब तो यही कामना है कि आज आये इस शिशु को कम से कम पीड़ा का बोध हो। इस नामुराद बिमारी से तो निजात नहीं पा सकता। पर जाते-जाते इसके मुंह पर संतोष की छाया रहे। हमारे प्रति कृतज्ञ रहे कि इसको जितना भी समय मिला उसे हमने शांति और चैन से गुजारने दिया।