शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

यह "जबुलानी बाल" का दोष है या हमारे दृष्टि तंत्र की कमजोरी ?

इस बार का विश्वकप फुटबाल जितना अपने सफल आयोजन, उल्टफेर, आक्टोपस को लेकर चर्चा में रहा वहीं खेल में प्रयुक्त बाल के कारण भी खबरों में छाया रहा।
इस बार उपयोग में लाई गयी जबुलानी बाल के खांचों की वजह से अच्छे से अच्छे खिलाड़ी को भी उसकी चाल समझने में नाकामयाबी हासिल हुई। इसी वजह से बाल की काफी आलोचना भी होती रही है।
पर वैज्ञानिकों का कुछ और ही कहना है। यू. के. के क्वीन्स विश्व्विद्यालय की कैथी क्रैग का कहना है कि हमारा दृष्टि तंत्र साइड में घूमती चीजों का आकलन करने में असमर्थ होता है। प्रयोग क तौर पर उन्होंने बहुतेरे अनुभवी खिलाड़ियों को ऐसे शाट का अवलोकन करने को कहा जिसमें गेंद करीब 600 चक्कर प्रति मिनट घूम रही थी। खिलाड़ियों को यह अंदाज लगाना था कि गेंद कहां गिरेगी पर निष्णात खिलाड़ी भी सही अनुमान नहीं लगा सके।
क्रैग ने अपने इन प्रयोगों का विवरण "नेचर विसेनशाफ्टेन" नामक पत्रिका में प्रकाशित करवाया था। उनके अनुसार गेंद के स्पिन से एक बल पैदा होता है, जिसे मैग्नस बल कहते हैं। इस बल से गैंद कौन सी दिशा अख्तियार करेगी यह जानना हमारी दृष्टि तंत्र के लिए बहुत मुश्किल होता है। उनका कहना है कि हमें अपने चारों ओर चलती, गिरती चीजं का अनुभव तो मिलता रहता है पर प्रकृति में घूमती वस्तुओं का अभाव होने के कारण कुदरत ने हमें उनके विश्लेषण करने की शक्ति भी नहीं दी है। इसीलिए हम तेजी से घूमती चीजों का सही आकलन नहीं कर पाते हैं। इसी कारण फुटबाल में गोलकीपर घूमती गेदों से गच्चा खा जाते हैं, बेस बाल और क्रिकेट में भी स्पिन होती गेंद का अंदाज बल्लेबाज ठीक से नहीं लगा पाते।

4 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर जानकारी, लेकिन खिलाडी तो जब पास करते है बाल उन के पास ही पहुचती है जिसे पास दिया होता है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

उपयोगी पोस्ट!

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

भाटिया जी,
नमस्कार।
ऐसा कहना है कि साइड़ से तेजी से घूमती आती बाल की चाल का सही आकलन नहीं हो पाता। एक दो इंच का फर्क भी भारी पड़ जाता होगा।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच कह रहे हैं, कई मौकों पर गोलकीपर हवा में गच्चा खाये हैं ।

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