बुधवार, 21 अप्रैल 2010

भाग कैसा भी हो, छींका टूटना चाहिए

रेल यात्रा के दौरान मेरी यह कोशिश रहती है कि क्लास कोई भी हो, मौसम कैसा भी हो, यात्रा छोटी हो या बड़ी यदि अकेला हूं तो ऊपर की बर्थ होनी चाहिये। ऊपर वाले की कृपा से तीन-चौथाई यात्राएं ऊपर ही ऊपर की हैं। पर जब से सरकार मेहरबान हो गयी है तब से ऊपर की बर्थ परेशान करने लगी है। कम्प्यूटर भी निवेदन नहीं मानता है, नीचे की ही जबर्दस्ती थोप देता है। सही भी है, दोनों हाथों में लड़्ड़ू होने से रहे, या तो पैसे कम करवा लो या ऊपर की बर्थ ले लो। पर छींका तो कैसे भी टूटना चाहिए। अभी पांच दिनों की एक त्री-रात्रीय यात्रा से लौटा हूं। वही "बातें तीन रातों की" आपस में बांटना चाहता हूं।

यात्रा की पहली वाली रात बहुत आसान रही। एक भरी-पूरी फैमिली, छह सदस्यों की। उनके बीच मैं मूसरचंद। क्योंकि उनकी एक बर्थ साइड़ अपर थी। दांत सभी निपोर रहे थे पर उनके मन में कहीं न कहीं हूक थी कि काश छठवीं भी एक साथ होती। बीच बीच में हर सदस्य कनखियों से मुझे देख लेता था पर कुछ कह नहीं पा रहा था। इधर मैं माहौल को अपनी तरफ पा निश्चिंत था कि आज तकदीर पौ-बारह है। कुछ देर बाद जब खाना वगैरह निकलने लगा तो मैंने ही 'बर्फ तोड़ी' कहा, आपलोगों को परेशानी हो रही है तो मैं उधर की बर्थ ले लेता हूं। इतना सुनना था कि पूरे परिवार में जैसे हर्ष की लहर दौड़ गयी। सामने की बर्थ से फटाफट सामान हटाया गया सीट बाकायदा पोछी गयी, मेरे मना करने के बावजूद, जितना भी था, मेरा सामान वहां पहुंचा कर मुझसे विदा ले, पर्दा लगा एक कमरीय सुख को प्राप्त हो लिए।     

दूसरी वाली रात कुछ आड़ी टेढी रही पर मेरी रही। आठ बर्थ। मेरे सिवा दो परिवार, उनके चार से सात वर्षीय, पांच बच्चे वे भी बाप रे बाप। मार पीट, रोना धोना, धमा चौकड़ी, छीना झपटी, यानि बी पी बढाने का सारा सामान। मैं चुपचाप एक पत्रिका में सर घुसाए बैठा था कि सामने वाले ने कुछ पूछा मैं उनसे मुखातिब हुआ ही था कि बगल वाले सज्जन? ने मेरी गोद से पत्रिका झपट ली। होते हैं कुछ लोग जिन्हें किसी भी औपचारिकता पर विश्वास नहीं होता। बुरा लगा पर चुप रहा। कुछ देर बाद उन्होंने पत्रिका अपनी सहगामिनी की ओर बढा दी। पर जब वह वहां से बच्चों के हाथ चली गयी तो मुझसे नहीं रहा गया। मैंने कहा भाई साहब मैं किताब पढ रहा था आधा लेख पढा था पूरा पढ लूं फिर आप ले लिजीयेगा। मेरी बात शायद उन्हें खल गयी उन्होंने तेज आवाज में पत्रिका मंगाई और बोले लीजिए साहब। मैंने मन में सोचा, शर्मा जी आज की रात तो इसी माया जाल में काटनी होगी। पर ऊपर वाले को कुछ और ही मंजूर था। कुछ देर में शांति की स्थापना हुई। बच्चे लुढकने लगे नींद में । कोई इधर, कोई उधर, कोई नीचे तो कोई ऊपर। इसी बीच ऊपर की बर्थ पर गहरी नींद में सोया एक बच्चा गाड़ी के हिचकोलों से नीचे टपकने को हुआ पर इसके पहले की बाल सीमा रेखा पार करती मैंने उसे बीच में ही दबोच लिया। फिर क्या था अपनी बल्ले-बल्ले हो गयी। बहनापा, भाएनापा जितने नापे होते हैं जुड़ने लगे। पर अपनी निगाह तो चिडिया की आंख जैसी ऊपरी बर्थ पर थी जो मिल गयी और मैं फिर एक बार दुनिया जहान के झंझटों से मुक्त नीचे की रेलम-पेल से अलग अपनी दुनिया में मग्न हो गया।

यात्रा की तीसरी रात अपेक्षाकृत सबसे आसान रही। मेरे सामने तीन बुजुर्ग, मेरे से भी बड़े, विराजमान थे। कुछ देर बाद उनमें से एक ने अपने टिकट निकाले, कुछ देखा और बोले, मैं चौहतर का। फिर अपने बगल वाले से पूछा तुम कितने साल के हो? उन्होंने कहा, बहत्तर का। फिर तीसरे से पूछा गया, तुम? उन्होंने जवाब दिया अड़सठ का। पहले वाले सज्जन बोले ठीक है तुम हम मे सब से छोटे हो, ऊपर वाली बर्थ पर तुम जाना। अढसठिया सज्जन बोले, नहीं साठ के बाद सब एक जैसे होते हैं, मैं नहीं जाऊंगा। जिसके नाम की सीट है वही जाएगा। हालांकि बातें हंसी मजाक में ही हो रही थीं पर विवशता साफ झलक रही थी। मौके की नजाकत को भांप मैंने कहा कि यदि आप चाहें तो मैं ऊपर की बर्थ ले लेता हूं आप मेरी नीचे वाली सीट ले लीजिए। सामने वाले को जैसे दो आंखें मिल गयी हों उन्होंने तुरंत पूछा, आपको ऊपर चलेगा? मैंने मन ही मन कहा, अजी चलेगा क्या उड़ेगा। पर सामने चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान ला गर्दन हिला दी।
तो भाग अपने अपने, छींका फिर एक बार टूट चुका था।

4 टिप्‍पणियां:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

इस बार वाकई में nice..

ललित शर्मा ने कहा…

वाह! शर्मा जी
छींका आपके नाम का ही टूटा
बधाई हो।

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर जी,जब तक हम भारत मै थे, तब तक हमे नीचे की सीट ही अच्छी लगती थी... ओर सामने या आसपास कोई सुंदरी बेठी हो तो स्वर्ग ही मिल जाता है.... अब तो कोई माल गाडी मै भी बिठा दे चलता है

जितेन्द़ भगत ने कहा…

हमेशा की तरह मजेदार :)