मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

जनता तमाशबीन जरूर है, पर बुडबक नहीं.

हम भारतवासी मेले, त्योहारों, नाटक, नौटंकियों, तमाशे वगैरह के बहुत शौकीन हैं। शौकीन भी इस हद तक कि तमाशा करने-दिखाने वालों के मुरीद बन जाते हैं। जो दिख रहा है, दिखा रहा है उसी को सच मान उसके बारे में वैसी ही धारणा बना उसे पूजनीय तक बना ड़ालते हैं। उधर सामने वाला बेवकूफ समझ तरह-तरह के स्वांग भर हमारा ध्यान रोज-रोज के दुख, दर्द, मंहगाई, कठिनाई, नून, तेल लकड़ी{गैस}से हटा अपने तरीके से प्रभावित करने के लिये ही तमाशा करता रहता है।

अभी मेरे शहर(जगह बदल जाती है, पात्र बदल जाते हैं पर 'थीम वही रहती है आजकल} में शहर का बंदोबस्त करने वाली इकाई के चुनावों का नतीजा कुछ एंड़-बैंड आया। तो जिनको सबका प्रमुख बनने का मौका हाथ लगा, वह शुरुआती तीन-चार दिन खुद हाथ में झाड़ू-डंडा ले सड़क-नालियों की सफाई करते फोटो खिंचवाते रहे। अब कैसे समझाया जाता कि यह काम आपका नहीं है। जिनका यह काम है उनकी नकेल कसी जाए। हर कर्मचारी यदि अपने दिन भर का काम साठ-सत्तर प्रतिशत भी कर ले तो शहर की जून सुधर जाए। पर फोटो में कैद हो अखबारों के पहले पन्नों में छपने का सुख कैसा होता है, यह छपने वाले से पूछ देखो।

एक ओर तमाशा हुआ, जो अक्सर देश के अलग-अलग शहरों में मौके-बेमौके होता रहता है। प्रदेश की सरकार ने "मंहगाई कम करने के लिये एक दिन" अपने-अपने घरों से अपने दफ्तर सायकिलों से जाने की ठानी।
हुआ क्या, रोज एक-दो कि.मी. भी पैदल शायद ही चलने वाला आठ-दस कि.मी. सायकिल कैसे चला पाता। आधी-अधुरी-चौथाई दूरी भी कोई जवान पार नहीं कर पाया। सब दो चक्कों से उतर कर चार चक्कों की शरण में जा लगे। उपर से हमारी तमाशबीनी फितरत उन्हें देखने, जय-जयकार करने, माला पहनाने जो इकठ्ठी हुई, तो रास्ते घाट सब जाम हो आम जनता के लिये मुसीबत बन खड़ी हो गयी।

पता नहीं ऐसा कौन है जो यह सब समझाता है ? यह सब किसके दिमाग की उपज होती है? और कैसे पढे-लिखे, समझदार, देश-प्रदेश के कर्णधार इन पिटी हुई कहानियों पर लिखी कथा पर काम कर अभिनय करने को तैयार हो जाते हैं।
पक्ष-विपक्ष एक साथ बैठ हल ढूँढने के बजाए एक दूसरे की कमियाँ निकालने में ही वक्त जाया करते रहते हैं।

7 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

यही तो विडम्बना है जी!
जनता की स्मृति बहुत कमजोर है ना!

नेहा पाठक ने कहा…

hammaare loktantra mei paripakvta ki kami hai.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

जनता बहुत स्वार्थी है, भोली है और दूरंदेसी नहीं है.

राज भाटिय़ा ने कहा…

अगर यह जनता इन सब बातो पर ध्यान दे तो यह गुंडे मवाली हमारे ऊपर हुकम ना चलाये, जनता ??? है

Udan Tashtari ने कहा…

सही कहा!

Mithilesh dubey ने कहा…

सहमत हूँ आपसे ।

kshama ने कहा…

Bada sahi chitran kiya aapne!

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