सोमवार, 30 नवंबर 2009

आयोडीन नमक जरूरी है क्या ?

सवाल बहुत देर से उठ रहा है। पर है सोचने लायक। सदियों से साधारण नमक खाते-खाते, क्या सचमुच ही हमें अब आयोडीन की जरूरत आन पड़ी थी?
या यह सब एक सोची समझी साजिश के तहत ही हुआ था और रुपये का दो किलो मिलने वाला नमक आज दस रुपये किलो में लोग लेने को मजबूर कर दिए गए हैं। कुछ समय पहले आप सब को याद होगा, ऐसा ही एक षड्यंत्र सरसों के तेल को लेकर भी रचा गया था। उसी सरसों के तेल को जिसका उपयोग हमारे यहाँ पता नहीं कब से होता आया है और बहुत से परिवारों में तो बना इस तेल के भोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

मनुष्य के शरीर को आयोडीन चाहिए, पर कितना? आप सब के विचार जानना चाहता हूँ। असलियत कल।

रविवार, 29 नवंबर 2009

पढ़ कर देखिए आनन्द आयेगा

एक धर्मोपदेशक घूम-घूम कर लोगों को उपदेश दिया करते थे। ऐसे ही एक दिन वह एक गांव में जा पहुंचे। सारे गांव वाले अपने-अपने खेतों पर काम करने जा चुके थे। सिर्फ एक जना उनको मिला जो उन्हें गांव के पंचायत भवन में ले गया। उन्हें वहां ठहरा कर उस गांव वाले ने उनका परिचय और आने का कारण जाना। संत महोदय कुछ उलझन में थे, वह वहां ज्यादा रुक भी नहीं सकते थे और बिना उपदेश दिये आगे जाना भी उन्हें गवारा नहीं था। उन्हें सोच में पड़ा देख गांव वाले ने उनकी परेशानी का कारण जानना चाहा तो संतजी ने बताया कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप यहां अकेले हो तो मुझे प्रवचन देना चाहिये या नहीं। यह सुन गांव वाला बोला, महाराज मैं तो निपट गंवार आदमी हूं फिर भी इतना जानता हूं कि यदि मैं अपने तबेले में जा कर देखूं कि वहां सिर्फ एक जानवर के सिवा सारे पशु भाग गये हैं तो भी मैं उस जानवर को चारा जरूर दूंगा? संतजी की दुविधा दूर हो गयी और वे पूरे तीन घंटे तक अपना उपदेश देते रहे। फिर अपनी बात खत्म कर उन्होंने अपने एक मात्र श्रोता से पूछा, हां भाई कैसा रहा आज का प्रवचन?
गांव वाले ने तुरंत जवाब दिया, महाराज मैने तो पहले ही आप से कहा था कि मैं तो निपट गंवार इंसान हूं इतनी ज्ञान की बातें मुझे कहां पता। फिर भी इतना तो मुझे पता है कि अपने तबेले में जा कर देखूं कि वहां एक को छोड़ सारे जानवर भाग गये हैं तो उसे मैं उसी का चारा दूंगा, सारे जानवरों की घास उसी अकेले को ही नहीं खिला दूंगा।

शनिवार, 28 नवंबर 2009

सुमधुर ध्वनि बिखेरती अद्भुत चट्टाने

राजस्थान की सुप्रसिद्ध पर्वत माला अरावली।
बांसवाड़ा जिले से करीब बीस कि.मी. की दूरी पर इसी पर्वतमाला के उपर स्थित है माता नन्दिनी देवी का मंदिर। इसी मंदिर की पिछली तरफ हैं चार चट्टानें। जो प्रकृति का एक अद्भुत करिश्मा हैं।
पर्वत शिखर पर च्ट्टानें तो बहुत सारी बिखरी पड़ी हैं। पर यह चार शिलाखंड़ अपने आप में अद्भुत विलक्षणता समेटे हैं। इसे प्रकृति का अनोखा करिश्मा समझें या कुछ और क्योंकि ये चट्टाने अपने आस-पास की चट्टानों से बिल्कुल अलग हैं। इनकी खासियत है कि यदि इन पर किसी चीज से प्रहार किया जाय तो इनमें से अलग-अलग तरह की खनकने की ध्वनि निकलती है। ऐसा लगता है जैसे किसी धातु के बने पिंड़ पर चोट की जा रही हो। एक तरफ जहां इनमें से एक चट्टान के स्वरुप ने वर्षों से तरह-तरह के मौसमों के कारण एक गोलाकार शिवलिंग का आकार ले लिया है, जिस पर यहां आने वाले श्रद्धालुओं ने इसको दैविय प्रतीक मान पूजा-अर्चना करनी शुरु कर दी है, तो वहीं दूसरी तरफ यहां आने वाले लोगों को घंटों इन चट्टनों को वाद्य यंत्रों की तरह प्रयोग कर भजन, गीत गाते देखा सुना जा सकता है। इन चट्टानों को लेकर तरह-तरह के मत हैं। कुछ कहते हैं कि इनमें किसी धातु की अत्यधिक मात्रा मिली हुई है जिस कारण यह खनक भरी ध्वनि उत्पन्न करती हैं तो किसी की राय में इनका खोखला होना इस तरह की मधुर ध्वनि उत्पन्न करने का कारण है। कुछ इन्हें उल्का पिंड़ मानते हैं क्योंकि सिर्फ यह चार चट्टानों से ही मधुर ध्वनि नकलती है आसपास की बाकि चट्टानें आम शिलापिंडों जैसी ही हैं।

प्रकृति की इस अद्भुत देन के अनबूझे रहस्य से फिलहाल तो पर्दा नहीं उठा है पर प्रयास जारी हैं।

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

"ताजमहल" नाम है स्वाभिमान, गौरव तथा आस्था का. इसीलिए ठीक एक साल पहले......

"ताज महल" सिर्फ एक होटल ही नहीं है, अब वह स्वाभिमान, गौरव तथा आस्था का प्रतीक बन चुका है। शायद इसीलिए ठीक एक साल पहले...................................

बंबई , रात धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। ऐसे में दो भद्र पुरुष बातें करते करते रात के भोजन के लिये पर्क के अपोलो होटल की ओर बढ रहे थे। जब वे होटल के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो द्वारपाल ने उनमें से एक को इंगित करते हुए कहा, महोदय आपके मित्र का स्वागत है, पर मुझे खेद है कि आप अंदर नहीं जा सकते। जिसे मना किया गया था वह थे जमशेदजी टाटा और उन्हें रोकने का कारण था उस होटल में युरोपियन के सिवा और किसी को प्रवेश नहीं देने का प्रावधान।

उसी क्षण जमशेदजी ने निर्णय लिया कि वह अपने इसी शहर में एक ऐसा होटल बनायेंगे जो संसार के सर्वश्रेष्ठ होटलों में से एक होगा। जिसमें किसी तरह की रोक-टोक नहीं होगी। जिसमें आम इंसान भी बिना विदेश गये विदेशी भव्यता का अनुभव कर सकेगा। हालांकि उन्हें इस व्यवसाय का कोई अनुभव नहीं था। पर जो ठान लिया सो ठान लिया। उन्होंने अपोलो बंदर के पास जमीन खरीद कर होटल, जिसका नाम उन्होंने ताजमहल रखा था, का निर्माण शुरु करवा दिया। उन्होंने सोच रखा था कि इस इमारत की हर बात अनोखी होगी। अनोखा रंग, अनोखा ढंग, अनोखी साज-सज्जा, अनोखा कला संग्रह। शुरुआत भी हुई 40 फिट की नींव से, जो उस जमाने में हैरत की बात थी। अंतत: 1903 में सत्रह मेहमानों के साथ होटल "ताजमहल" का विधिवत उद्घाटन संम्पन्न हुआ।
जमशेद जी ने अपने इंजीनियरों को हिदायत दे रखी थी कि होटल का शिल्प ऐसा होना चाहिये कि उसके हर कमरे में समुद्री वायु आराम से परवाज कर सके। साथ ही हर कमरे में रहने वाले को समुद्र के बिल्कुल करीब होने का एहसास हो। सचमुच ताज की खिड़की में खड़े होने पर यही एहसास होता है जैसे हाथ बढा कर सागर को छुआ जा सकता हो। हर कमरे से समुद्र अपनी भव्यता के साथ नज़र आता है। जमशेदजी की दूरदर्शिता इसी से जानी जा सकती है कि उन्होंने भविष्य में सागर की ओर होने वाली भीड़-भाड़ को ध्यान में रख ताज का मुख्य द्वार पीछे की ओर बनवाया था। उनके लिये यह पैसा कमाने का जरिया ना होकर देश की धरोहर का ख्याल ज्यादा था। जहां हर देश वासी बेरोकटोक आ सके। वे जब भी विदेश जाते वहां ताज को ही ध्यान में रख खरीदारी करते। उन्होंने पैसे की परवाह किये बगैर ऐसी-ऐसी चीजें वहां से भारत भेजीं जिनका नाम भी यहां ना सुना गया था। जिनमें एक बिजली का जेनेरेटर भी था। उस समय बंबई में बिजली की रौशनी वाली यह पहली इमारत थी। इसको बाहर से देखने के लिये ही दूर-दूर से लोग आते थे। इसके बनने और शुरु होने के बाद भी बहुत सारी अड़चनों का सामना जमशेद जी को करना पड़ा था। बहुतेरी बार इसकी आमदनी बिल्कुल ना के बराबर हो गयी थी। और कोई होता तो वह इसे बेचने का फैसला कर चुका होता पर यह जमशेदजी ही थे जो इसे भारत का ताज बनाना चाहते थे इसे बेचने का ख्याल उन्हें सपने में भी नहीं आया। उस समय जब संचार व्यवस्था ना के बराबर थी उन्होंने विदेशों के यात्रा एजेंटों से संपर्क बनाये रखा, फिर एक समय ऐसा आया कि विदेश से आने वाले पर्यटक की लिस्ट में यहां ठहरने का कार्यक्रम वरीयता सूची में होने लगा।

विदेशों में आज भारत के दो ताजमहलों की अपनी पहचान है। एक नारी के सम्मान का प्रतीक है तो दूसरा शहर के गौरव का प्रतीक।

आज सौ से ज्यादा उपन्यासों, यात्रा विवरणों आदि में ताज का उल्लेख मिलता है। विश्व की जानी-मानी हस्तियां यहां आकर भारतीय सत्कार का आनंद ले चुकी हैं। सातवें दशक में इसी का एक और नया भाग ‘ताज इंटकांटिनेंटल’ भी बन कर तैयार हो गया था। अब तो ताज की श्रृंखला पूरे देश में फैलती जा रही है।
ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

बुधवार, 25 नवंबर 2009

ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

बंबई , रात धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। ऐसे में दो भद्र पुरुष बातें करते करते रात के भोजन के लिये पर्क के अपोलो होटल की ओर बढ रहे थे। जब वे होटल के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो द्वारपाल ने उनमें से एक को इंगित करते हुए कहा, महोदय आपके मित्र का स्वागत है, पर मुझे खेद है कि आप अंदर नहीं जा सकते। जिसे मना किया गया था वह थे जमशेदजी टाटा और उन्हें रोकने का कारण था उस होटल में युरोपियन के सिवा और किसी को प्रवेश नहीं देने का प्रावधान। उसी क्षण जमशेदजी ने निर्णय लिया कि वह अपने इसी शहर में एक ऐसा होटल बनायेंगे जो संसार के सर्वश्रेष्ठ होटलों में से एक होगा। जिसमें किसी तरह की रोक-टोक नहीं होगी। जिसमें आम इंसान भी बिना विदेश गये विदेशी भव्यता का अनुभव कर सकेगा। हालांकि उन्हें इस व्यवसाय का कोई अनुभव नहीं था। पर जो ठान लिया सो ठान लिया। उन्होंने अपोलो बंदर के पास जमीन खरीद कर होटल, जिसका नाम उन्होंने ताजमहल रखा था, का निर्माण शुरु करवा दिया। उन्होंने सोच रखा था कि इस इमारत की हर बात अनोखी होगी। अनोखा रंग, अनोखा ढंग, अनोखी साज-सज्जा, अनोखा कला संग्रह। शुरुआत भी हुई 40 फिट की नींव से, जो उस जमाने में हैरत की बात थी। अंतत: 1903 में सत्रह मेहमानों के साथ होटल "ताजमहल" का विधिवत उद्घाटन संम्पन्न हुआ।
जमशेद जी ने अपने इंजीनियरों को हिदायत दे रखी थी कि होटल का शिल्प ऐसा होना चाहिये कि उसके हर कमरे में समुद्री वायु आराम से परवाज कर सके। साथ ही हर कमरे में रहने वाले को समुद्र के बिल्कुल करीब होने का एहसास हो। सचमुच ताज की खिड़की में खड़े होने पर यही एहसास होता है जैसे हाथ बढा कर सागर को छुआ जा सकता हो। हर कमरे से समुद्र अपनी भव्यता के साथ नज़र आता है। जमशेदजी की दूरदर्शिता इसी से जानी जा सकती है कि उन्होंने भविष्य में सागर की ओर होने वाली भीड़-भाड़ को ध्यान में रख ताज का मुख्य द्वार पीछे की ओर बनवाया था। उनके लिये यह पैसा कमाने का जरिया ना होकर देश की धरोहर का ख्याल ज्यादा था। जहां हर देश वासी बेरोकटोक आ सके। वे जब भी विदेश जाते वहां ताज को ही ध्यान में रख खरीदारी करते। उन्होंने पैसे की परवाह किये बगैर ऐसी-ऐसी चीजें वहां से भारत भेजीं जिनका नाम भी यहां ना सुना गया था। जिनमें एक बिजली का जेनेरेटर भी था। उस समय बंबैइ में बिजली की रौशनी वाली यह पहली इमारत थी। इसको बाहर से देखने के लिये ही दूर-दूर से लोग आते थे। इसके बनने और शुरु होने के बाद भी बहुत सारी अड़चनों का सामना जमशेद जी को करना पड़ा था। बहुतेरी बार इसकी आमदनी बिल्कुल ना के बराबर हो गयी थी। और कोई होता तो वह इसे बेचने का फैसला कर चुका होता पर यह जमशेदजी ही थे जो इसे भारत का ताज बनाना चाहते थे इसे बेचने का ख्याल उन्हें सपने में भी नहीं आया। उस समय जब संचार व्यवस्था ना के बराबर थी उन्होंने विदेशों के यात्रा एजेंटों से संपर्क बनाये रखा, फिर एक समय ऐसा आया कि विदेश से आने वाले पर्यटक की लिस्ट में यहां ठहरने का कार्यक्रम वरीयता सूची में होने लगा। आज सौ से ज्यादा उपन्यासों, यात्रा विवरणों आदि में ताज का उल्लेख मिलता है। विश्व की जानी-मानी हस्तियां यहां आकर भारतीय सत्कार का आनंद ले चुकी हैं। सातवें दशक में इसी का एक और नया भाग ‘ताज इंटकांटिनेंटल’ भी बन कर तैयार हो गया था। अब तो ताज की श्रृंखला पूरे देश में फैलती जा रही है।
ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

ये भी खूब रही :) :) :)

एक कबीले के मुखिया के मर जाने पर उसके शहर से आये बेटे को मुखिया बना दिया गया। ठंड आने के पहले कबीले वाले उसके पास गये और पूछा कि इस बार कैसी ठंड पड़ेगी? कबीले के मुखियों को पीढी दर पीढी से चले आ रहे तजुर्बों से आने वाले मौसम इत्यादि की जानकारी होना आम बात थी। अब जवान मुखिया को इतना तजुर्बा तो था नहीं ना ही उसने इस तरह की बातें अपने बुजुर्गों से सीखी थीं। उसने ऐसे ही कह दिया कि ठीक-ठाक सर्दी पड़ेगी। आप लोग लकड़ियां इकठ्ठी कर लो। कह तो दिया पर फिर भी कुछ अंदाज लेने के लिये वह मौसम विभाग चला गया, वहां उसने पूछा कि इस बार सर्दी कैसी होगी? उन्होंने कहा ठीक-ठाक ही पड़ेगी। लौट कर उसने अपने लोगों से और लकड़यां एकत्र करने को कह दिया। हफ्ते दस दिन बाद फिर अपनी बात सुनिश्चित करने के लिये मुखिया मौसम विभाग गया और पूछा, क्या कहते हैं आप लोग ठंड पड़ेगी ना? वहां से जवाब मिला एकदम पक्की पड़ेगी। लड़के ने वापस आ अपने लोगों को और लकड़ियां एकत्र करने को कह दिया। पर मन ही मन वह अपनी अनभिज्ञता से घबड़ाया हुआ भी था कि कहीं मेरी बात गलत हो गयी तो लोग क्या कहेंगे। सो एक बार फिर वह मौसम विभाग पहुंच गया और बोला, आपकी खबर सर्दी के बारे में पक्की है ना? वहां के अफसर ने जवाब दिया, पक्की? अरे, इस बार रेकार्ड़ तोड़ सर्दी पड़ेगी। युवा मुखिया ने चकित हो पूछा, आप इतने विश्वास के साथ कैसे कह रहे हैं?क्योंकि कबीले वाले पागलों की तरह अंधाधुन लकड़ियां इकठ्ठी किये जा रहे हैं भाई, इससे बड़ा प्रमाण और क्या चाहिये।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

बिना इन्टरनेट के हिंदी लिखने में सहायता करें

आज मुझसे सुश्री नेहा जी, जो अपना ब्लाग शुरु करना चाहती हैं, ने ई मेल द्वारा, बिना इंनटरनेट हिंदी लिख सकने की जानकारी चाही है। मेरी आप सब से गुजारिश है कि ऐसा सबसे सरल तरीका बताने का कष्ट करें, जिसमें सारे के सारे हिंदी के शब्द (संयुक्ताक्षर वगैरह) आसानी से लिखे जा सकें। जिससे हिंदी ब्लाग परिवार में एक और नया सदस्य शामिल हो सके।

रविवार, 22 नवंबर 2009

इंसान की भूल की अनोखी सजा भुगतती एक कब्र

मध्य प्रदेश के इटावा-फ़र्रुखाबाद मार्ग पर जुगराम जी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। उसी के पास जरा सा आगे जाने पर एक मकबरा है जो अपने नाम और खुद से जुड़ी प्रथा के कारण खासा मशहूर है। इसे 'चुगलखोर के मकबरे' के नाम से जाना जाता है और प्रथा यह है कि यहां से गुजरने वाला हर शख्स इसकी कब्र पर कम से कम पांच जूते मारता है। क्योंकि यहां के लोगों में ऐसी धारणा है कि इसे जूते मार कर आरंभ की गयी यात्रा निर्विघ्न पूरी होती है।

ऐसा क्यों है इसकी कोई निश्चित प्रामाणिकता तो नहीं है पर जैसा यहां के लोग बताते हैं कि बहुत पहले इस विघ्नसंतोषी, सिरफिरे इंसान ने अपने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये दो राजाओं को आपस में गलत अफवाहें फैला कर लड़वा दिया था। वह तो युद्ध के दौरान ही सच्चाई का पता चल गया और व्यापक जनहानि होने से बच गयी। इसे पकड़ मंगवाया गया और मौत की सजा दे दी गयी। पर ऐसा नीच कृत्य करने वाले को मर कर भी चैन ना मिले इसलिये उसका मकबरा बनवा कर यह फर्मान जारी कर दिया गया कि इधर से हर गुजरने वाला इस कब्र पर पांच जूते मार कर ही आगे जायेगा। जिससे भविष्य में और कोई ऐसी घिनौनी हरकत ना करे।

है ना अनोखी सजा! जो ना जाने कब से दी जा रही है और ना जाने कब तक दी जाती रहेगी।

शनिवार, 21 नवंबर 2009

कोई भी देश भूगोल में बाद में टूटता है, पर पहले उसे दिमाग में तोड़ा जाता है

करीब बीस साल पहले श्री बालकवि बैरागीजी ने, जो उस समय संसद सदस्य थे, चेताया था कि भाषा के साथ-साथ बोलियों का एक दुराग्रह तैयार किया जा रहा है। इससे सावधान रहने की जरूरत है। यह एक बहुत लंबी मार करने वाली साजिश है, देश तोड़ने की। उन्होंने इस षड़यंत्र की कार्यप्रणाली का भी खुलासा किया था। उनके अनुसार, भारत विरोधी अभियान के तहत उन महानुभावों को, उनके जाने अनजाने, शामिल कर लिया जाता है जो भाषा शास्त्र पर शोध आदि कर रहे होते हैं। उन्हें विदेश भ्रमण करवा, फैलोशिप वगैरह दिलवा कर और उनके लेखों आदि को बड़े पैमाने पर छपवाने का प्रलोभन दिया जाता है। यह काम होता है भारत के विभिन्न अंचलों में बोली जाने वाली आंचलिक बोलियों पर शोध एवं अनुसंधान के नाम पर। हमारे यहां वैसे ही हजारों बोलियां तथा उपबोलियां हैं जिनको लेकर आये दिन आंदोलन खड़े किए जाते रहते हैं। बात बिगड़ती जाती है। इसी को लेकर विदेशी कूटकर्मियों ने भारत के नक्शे में बोलियों के आधार पर सैंकड़ों दरारें ड़ाल दी हैं। बोलियों के अंचलों को रेखांकित कर भारत के टुकड़े नक्शों में कर दिये हैं। पहले भाषा के नाम पर लड़ता झगड़ता देश अब बोलियों के लिये उलझने लगा है। इसके लिये कितना विदेशी पैसा बरसात की तरह बरसाया जा रहा है उसकी कल्पना भी आम आदमी नहीं कर सकता।
पता नहीं हमारी आंख कब खुलेगी। देश का एक बहुत बड़ा तथाकथित बुद्धिवादी वर्ग आंखें बंद किए बैठा है। बोलियों के दायरे बहुत छोटे पर अत्यंत संवेदनशील होते हैं। यह सब सोचा समझा षड़यंत्र है भारत को छोटा और छोटा कर कमजोर करने का। कोई भी देश भूगोल में बाद में टूटता है पर पहले दिमाग में टूटता या तोड़ा जाता है। एक बार दिमाग में टूटन आ जाये तो फिर वह बाहर भी आकार लेना शुरु कर देती है। पर बीस साल पहले चेताने के बावजूद क्या हम चेत पाये हैं।
अपने व्यक्तिगत बैर के बदले को लोग कैसे अलग रंग देते हैं, देखिये भास्कर के श्री राजकुमार केसवानीजी द्वारा दी गयी एक जानकारी के द्वारा :-
1916 में लहौर के एक फोकटिया तथाकथित पत्रकार, लालचंद, को जब एक नाटक का टिकट मुफ्त में ना देकर उपकृत नहीं किया गया तो उन महाशय ने पूरी नाटक मंडली के विरुद्ध विष वमन करना शुरु कर दिया और उसका मुख्य निशाना बनी नाटक की नायिका, मिस गौहर, जो कि नाटक में सीता का किरदार निभा रही थी। लालचंद ने लोगों की भावनाओं को उभाड़ने के लिये लिख मारा कि मुस्लिम औरत का सीता बनना कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। नतीजा लालचंद के मन मुताबिक ही हुआ, थियेटर पर हमला कर जबर्दस्त नुक्सान किया गया। कंपनी के मालिक कवास जी की सदमे से मौत हो गयी।

जब पैसा आता है, तो दिमाग कहाँ चला जाता है ?

पैसा, शोहरत या सत्ता के आते ही उससे मिली ताकत को लोग संभाल नहीं पाते। पता नहीं दिमाग में कैसा "लोचा" आ जाता है कि वह अजीबोगरीब हरकतें करवाने लग जाता है। इस तरह मिले मद को पचा नहीं पाता। शोहरतिये की तो छोड़िये उसके साथ के लगे-बंधे ही अपने आप को दूसरी दुनिया का समझने लगते हैं। उनके और उनके चाहने वालों के बारे में अखबारों में अक्सर कुछ ना कुछ छपता रहता है, वहीं से कुछ "नमूने" देखिये :-
एक मंत्रीजी हवाई दौरे पर थे। एक जगह नीचे उन्हें कुछ लोग नज़र आए तो उन्होंने वहीं अपना हेलीकाप्टर उतरवाने की जिद की। चालक के लाख समझाने पर भी उन पर कोई असर नहीं हुआ, तो सबकी जान जोखिम में डाल खेतों में काप्टर उतारना पड़ा। लदा हुआ इंसान जनता का सेवक जो था।

एक ऐसे ही सेवक के लिये उनके पिच्छलगू हाथी ही ले आये थे, हेलीपैड तक। पायलट पर क्या बीती होगी।

एक बार अपने आराध्य महोदय के लिये उनके चमचों ने हेलीपैड पर कालीन ही बिछा दिया था, कि कहीं प्रभू के पैर गंदे ना हो जायें (मन का क्या है) वह तो चालक ने दूर से देख लिया नहीं तो कालीन ने धरा का भार कुछ हल्का कर ही देना था।

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में ही धन मति फेर देता हो, दुनिया भर में ऐसे असंयमियों के किस्से सुने जा सकते हैं।
स्पेन में सागर के सामने खड़े एक भव्य होटल में एक भद्र पुरुष को समुंद्र की आवाज से इतनी परेशानी हुई कि उन्होंने वहां के स्टाफ को बुला उसकी आवाज बंद करवाने का आदेश दे डाला।

स्पेन में ही एक सज्जन को अपने होटल का बिस्तर कुछ ऊंचा लगा तो उन्होंने पलंग के पाये ही कटवाने का हुक्म दे दिया। यह अलग बात है कि प्रबंधन ने शालिनता से ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

एक पाव भर की रजाई, ठण्ड दूर रखने का हल्का-फुल्का साधन

सर्दी की दस्तक के साथ-साथ गर्म कपड़े, कंबल और रजाईयां भी आल्मारियों से बाहर आने को आतुर हो रहे हैं। रजाई का नाम सुनते ही एक रूई से भरे एक भारी-भरकम कपड़े का ख्याल आ जाता है, जो जाड़ों में ठंड रोकने का आम जरिया होता है। पहाड़ों में तो चार-चार किलो की रजाईयां आम हैं ज्यादा सर्दी या बर्फ पड़ने पर तो बजुर्गों या अशक्त लोगों को दो-दो रजाईयां भी लेनी पड़ती हैं। अब सोचिये इतना भार शरीर पर हो तो नींद में हिलना ड़ुलना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कोई पाव भर भार वाली रजाई से ठंड दूर करने की बात करे तो अजीब सा लगेगा। पर पुराने समय में राजा-महाराजाओं के वक्त में राज परिवार के लोग कैसे ठंड से बचाव करते होंगे। ठीक है सर्दी दूर करने के और भी उपाय हैं या थे, पर ओढने के लिये कभी न कभी, कुछ-न कुछ तो चाहिये ही होता होगा। अवध के नवाबों की नजाकत और नफासत तो जमाने भर में मशहूर रही है। उन्हीं के लिये हल्की-फुल्की रजाईयों की ईजाद की गयी। ये खास तरह की रजाईयां, खास तरीकों से, खास कारीगरों द्वारा सिर्फ खास लोगों के लिये बनाई जाती थी। जिनका वजन होता था, सिर्फ एक पाव या उससे भी कम। जी हां एक पाव की रजाई पर कारगर इतनी कि ठंड छू भी ना जाये। धीरे-धीरे इसके फनकारों को जयपुर में आश्रय मिला और आज राजस्थान की ये राजस्थानी रजाईयां दुनिया भर में मशहूर हैं।

इन हल्की रजाईयों को पहले हाथों से बनाया जाता था। जिसमें बहुत ज्यादा मेहनत, समय और लागत आती थी। समय के साथ-साथ बदलाव भी आया। अब इसको बनाने में मशीनों की सहायता ली जाती है। सबसे पहले रुई को बहुत बारीकी से अच्छी तरह साफ किया जाता है। फिर एक खास अंदाज से उसकी धुनाई की जाती है, जिससे रूई का एक-एक रेशा अलग हो जाता है। इसके बाद उन रेशों को व्यव्स्थित किया जाता है फिर उसको बराबर बिछा कर कपड़े में इस तरह भरा जाता है कि उसमें से हवा बिल्कुल भी ना गुजर सके। फिर उसकी सधे हुए हाथों से सिलाई कर दी जाती है। सारा कमाल रूई के रेशों को व्यवस्थित करने और कपड़े में भराई का है जो कुशल करीगरों के ही बस की बात है। रूई जितनी कम होगी रजाई बनाने में उतनी ही मेहनत, समय और लागत बढ जाती है। क्योंकि रूई के रेशों को जमाने में उतना ही वक्त बढ जाता है।
छपाई वाले सूती कपड़े की रजाई सबसे गर्म होती है क्योंकि मलमल के सूती कपड़े से रूई बिल्कुल चिपक जाती है। सिल्क वगैरह की रजाईयां देखने में सुंदर जरूर होती हैं पर उनमें उतनी गर्माहट नही होती। वैसे भी ये कपड़े थोड़े भारी होते हैं जिससे रजाई का भार बढ जाता है।

तो अब जब भी राजस्थान जाना हो तो पाव भर की रजाई की खोजखबर जरूर लिजिएगा।

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

दादा जी, अब भाग लो (:

बहुत बार ऐसा हुआ है कि अकेले बैठे यादों की जुगाली करते अचानक कोई बात याद आ जाती है और बरबस हंसी फूट पड़ती है। ऐसा ही एक वाक्या है जो याद आते ही हंसी ला देता है चेहरे पर। सारा खेल उसमें भाषा का है, हिंदी और बंगला का घालमेल। बहुत बार इच्छा हुई उसे आपस में बांटने की पर उसका मजा थोड़ी बहुत बंगला जानने वाले ले सकते हैं नहीं तो भाषा अमर्यादित सी लगती है। इसी से संकोचवश निर्मल हास्य से वंचित रह जाना पड़ता है। आज भी पूरा लिख ड़ाला था पर फिर आने वाले दिनों पर टाल दिया। उसके बदले यह खानापूर्ती सही -


एक छोटा सा बच्चा एक घर के दरवाजे की घंटी बजाने की काफी देर से कोशिश कर रहा था, पर उसका हाथ घंटी तक नहीं पहुंच पा रहा था। एक बुजुर्ग उधर से निकले और यह सोच कि शायद उसे अंदर जाना है, उसकी सहयता करने के लिये उन्होंने घंटी बजा दी, और बच्चे की तरफ देख बोले, अब ठीक है?
बच्चा बोला, हां, पर अब भाग लो !

सोमवार, 16 नवंबर 2009

कौन था वह? लार्ड कर्जन को मारना चाहता था या बचाना ?

दो-तीन दिन पहले अवधिया जी तथा भाटिया जी की पोस्टों को देख कर वायसराय लार्ड कर्जन के जीवन में घटी कुछ अजीबोगरीब घटनाओं के बारे मे पढा हुआ याद आ गया।


सन 1899 मे लार्ड कर्जन वायसराय बन कर भारत आए तो बीकानेर के महाराजा के निमंत्रंण पर वे राजस्थान के दौरे पर बीकानेर पहुंच गये। उन्हें वैसे भी राजस्थान से कुछ ज्यादा ही लगाव था। उनके वहां पहुंचने पर महाराजा ने उनके सम्मान में एक भव्य भोज का इंतजाम किया था। भोज का कार्यक्रम देर रात तक चलता रहा। उसके बाद कर्जन सीधे सोने चले गये। उस दिन पूर्णमासी की रात थी। अचानक किसी अजीबोगरीब हलचल या आवाज से उनकी नींद टूट गयी। वे खिड़की पर जा खड़े हुए तो उन्हें बागीचे में कुछ लोग नजर आये, जो सफेद कपड़े पहने एक ओर चले जा रहे थे। उन सब के पीछे कुछ दूरी पर एक आदमी अपने सिर पर एक बड़ा सा संदूक उठाए चल रहा था। किसी का भी चेहरा साफ नजर नहीं आ रहा था। सब जने तो बाग से निकल गये पर वह संदूक वाला आदमी पीछे रह गया। जब खिड़की के पास से वह गुजरने लगा तो कर्जन ने देखा कि उसके सर पर संदूक ना हो कर एक ताबूत था। आश्चर्यचकित हो उन्होंने आवाज लगाई कि ठहरो, कौन हो तुम ? इतना सुनते ही वह आदमी रुका और धीरे से अपने चेहरे से ताबूत को थोड़ा सा हटा ऊपर देखने लगा। पूरे चांद की रोशनी में सब कुछ साफ नजर आ रहा था। वायसराय ने जो देखा उससे उनका खून जम सा गया। उन्होंने अपनी जिंदगी में इतना खौफनाक चेहरा कभी नहीं देखा था। तभी उस आदमी के चेहरे पर एक अजीब सी डरावनी वीभत्स हंसी उभर आयी और वह हंसता हुआ एक कोने में जा गायब हो गया। कर्जन ने तुरंत द्वारपालों को दौड़ाया पर कहीं भी किसी के होने का कोई निशान नहीं था। महाराजा को भी इसकी खबर दी गयी। उस पूरी रात और दूसरे दिन सारे बीकानेर का चप्पा-चप्पा छान मारा गया, आस-पास के सभी इलाकों में भी वैसे चेहरे वाले की खोज की गयी पर सब बेकार।

हांलाकि कर्जन इस बात को धीरे-धीरे भूल गये थे। पर बात यहीं खत्म नहीं हुए थी। होनी अभी भी अपना खेल दिखाने को तैयार बैठी थी। कुछ सालों के बाद सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें पेरिस में आयोजित एक समारोह में भाग लेने जाना पड़ा था। “प्लेस ला दूर्त” में उस दिन बहुत ज्यादा गहमा-गहमी थी। महलों जैसे उस भवन की चौथी मंजिल पर सम्मेलन का आयोजन किया गया था। सरी लिफ्टों में लंबी-लंबी लाईनें लगी हुए थीं। खास लोगों की लिफ्ट के पस जब कर्जन पहुंचे तो वहां मौजूद लोगों ने सौजन्यवश उनसे आग्रह किया कि वह पहले जा कर सम्मेलन में शरीक हो जायें। कर्जन ने उनलोगों को धन्यवाद देते हुए लिफ्ट की ओर कदम बढये ही थे कि उन्हें अंदर सिर झुकाए कोई बैठा नजर आया। इनके पास पहुंचते ही उसने अपना सिर धीरे से उठाया तो कर्जन को तुरंत वह चेहरा याद आ गया जो सालों पहले उन्होंने बीकानेर के महल के उद्यान में ताबूत उठाये देखा था। यकीनन ही यही था वह इंसान, पर हज़ारों मील दूर यहां कैसे? उनके सारे शरीर में ठंडी लहर की झुनझुनी दौड़ गयी। तभी उस आदमी के चेहरे पर फिर वैसी ही एक शैतानी हंसी उभर आयी। कर्जन तुरंत वापस बाहर आ गये। लोगों के कारण पूछने पर उन्होंने जरूरी कागजात भुल आने की बात कही। वहां से वह तुरंत सुरक्षा अधिकारियों के पास गये और उस भयानक चेहरे वाले के बारे में पूछ-ताछ की। अधिकारियों ने ऐसे किसी भी आदमी के बारे में जानकारी होने से इंकार किया।

तभी इमारत में एक जोरदार धमाका हुआ। सभी लोग उस ओर दौड़ पड़े। वहां दिल दहला देने वाला दृष्य सामने था। लिफ्ट को संभालने वाले लोहे की रस्सियों के टूट जाने की वजह से लिफ्ट नीचे आ गिरी थी। बहुत से व्यक्ति काल के गाल में समा गये थे। पर उस भयानक चेहरे वाले इंसान का कहीं भी कोई अता-पता नहीं था।

कौन था वह, इंसान या कोई और? वह कर्जन को मारना चाहता था या बचाना? इसका जवाब ना तो कभी दुनिया को मिल पाया और नही लार्ड कर्जन को।

शनिवार, 14 नवंबर 2009

Aisee kyaa bhuul hui ki gaayab mujhko kiyaa?


पता नहीं ऐसी कौन सी खता हो गयी कि ब्लागवानी ने मेरी "पोस्ट" लेने से इंकार कर दिया। रोज नहाता हूं , पूजा-पाठ से भी गुरेज नहीं करता, सभी के लिये दोस्ताना, आदर का भाव रखता हूं फिर कौन सी बिल्ली छींक गयी कि ऐसा-वैसा-जैसा भी समझ में आता है बिना द्वेष भाव रखे लिखे हुए में ऐसे कौन से एलर्जी के जीवाणुं आ गये जो उसे बहिष्कृत कर दिया गया। हां अपनी फोटो जरूर बदलने की जुर्रत की थी। दो दिन से लग रहा था कि कुछ तो गड़बड़ है पर ध्यान नहीं दिया। वैसे भी इस ससुरे कमप्यूटर के बारे में इतनी ही जानकारी है जितनी सूट पहनने की। कपड़ा कैसा है या दर्जी कैसे सिलता है उस बारे में शून्य बटे सन्नाटा ही रहता है। परसों ऐसे ही ब्लागवाणी के नये ब्लागों पर नजर गयी तो वहां "अलग सा" टंगा दिखा। घंटियां बजने लगीं। क्लिक किया तो बकलम खुद को पाया। पर पिछले सारे आंकड़े गायब थे। उसी को फिर ले हुजूर के दरबार में दस्कत दी तो मेहरबानी से पिछली सीट पर जगह तो मिल गायी। पर ऐसा क्यूं हुआ समझ नहीं पा रहा हूं सो आप सब के सामने दुखड़ा ले कर हाजिर हूं।

 
यह सब इतना तुका-बेतुका इस लिये सफेद पर काला किया है कि आप की सहायता मिल सके, गलती समझने  में
 

अपने चारों ओर रहस्य का आवरण लपेटे "बिल्ली"

दुनिया के सैकड़ों-हजारों जीव- जंतुओं मे दो ऐसे प्राणी हैं जो अपने इर्द-गिर्द सदा रहस्य और ड़र का कोहरा लपेटे रहते हैं। पहला है बिल्ली और दूसरा सांप। वैसे इस मामले में बिल्ली सांप से कहीं आगे है। इसी की जाति के शेर, बाघ, तेंदुए आदि जानवर ड़र जरूर पैदा करते हैं पर रहस्यात्मक वातावरण नहीं बनाते। पर अफ्रीकी मूल के इस प्राणी, "बिल्ली" को लेकर विश्व भर के देशों में अनेकों किस्से, कहानियां और अंधविश्वास प्रचलित हैं। जहां जापान मे इसे सम्मान दिया जाता है क्योंकि किसी समय इसने वहां चूहों के आतंक को खत्म कर खाद्यान संकट का निवारण किया था। वहीं दूसरी ओर इसाई धर्म में इसे बुरी आत्माओं का साथी समझ नफ़रत की जाती रही है। फ्रांस मे तो इसे कभी जादूगरनी तक मान लिया गया था। हमारे यहां भी इसको लेकर तरह-तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। एक ओर तो इसके रोने की आवाज को अशुभ माना जाता है। आज के युग मे भी यदि यह रास्ता काट जाए तो अच्छे-अच्छे पढे-लिखे लोगों को ठिठकते देखा जा सकता है। रात के अंधेरे में आग के शोलों कि तरह दिप-दिप करती आंखों के साथ यदि काली बिल्ली मिल जाए तो देवता भी कूच करने मे देर नहीं लगाते। संयोग वश यदि किसी के हाथों इसकी मौत हो जाए तो सोने की बिल्ली बना दान करने से ही पाप मुक्ति मानी जाती है। दूसरी ओर दिवाली के दिन इसका घर में दिखाई देना शुभ माना जाता है।दुनिया भर की ड़रावनी फिल्मों मे रहस्य और ड़र के कोहरे को घना करने मे सदा इसकी सहायता ली जाती रही है।
यह हर तरह के खाद्य को खाने वाली है पर इसका चूहे और दूध के प्रति लगाव अप्रतिम है। इसे पालतू तो बनाया जा सकता है पर वफादारी की गारंटी शायद नहीं ली जा सकती।
सांपों को लेकर भी तरह-तरह की भ्रान्तियां मौकापरस्तों द्वारा फैलाई जाती रही हैं। जैसे इच्छाधारी नाग-नागिन की विचित्र कथाएं। जिन पर फिल्में बना-बना कर निर्माता अपनी इच्छायें पूरी कर चुके हैं। एक और विश्वास बहुत प्रचलित है, नाग की आंखों मे कैमरा होना, जिससे वह अपना अहित करने वाले को खोज कर बदला लेता है। चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने मे हो। सपेरों और तांत्रिकों द्वारा एक और बात फैलाई हुई है कि सांप आवश्यक अनुष्ठान करने पर अपने द्वारा काटे गये इंसान के पास आ अपना विष वापस चूस लेता है।
पर सच्चाई तो यह है कि दूध ना पीने वाला यह जीव दुनिया के सबसे खतरनाक प्राणी, इंसान, से ड़रता है। चोट करने या गलती से छेड़-छाड़ हो जाने पर ही यह पलट कर वार करता है। उल्टे यह चूहे जैसे जीव-जंतुओं को खा कर खेती की रक्षा ही करता है। जिससे इसे किसान मित्र भी कहा जाता है।
दुनिया के दूसरे प्रणियों की तरह ये भी प्रकृति की देन हैं। जरूरत है उल्टी सीधी अफवाहों से लोगों को अवगत करा अंधविश्वासों की दुनिया से बाहर लाने की।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

विश्वास तो करना ही पडेगा

कुछ ऐसे तथ्य जो अजीब तो हैं पर सच हैं :-
१, १८७३ में जब "कोलगेट" ने दांतों के लिए पेस्ट बनाया तो उसे जार में बाजार में पेश किया गया था।

२, टाइम पत्रिका ने १९८२ में "मैन आफ द ईयर " के लिए कंप्यूटर को चुना था। ऐसा पहली बार हुआ था की किसी वस्तु को यह खिताब दिया गया हो।

३, दुनिया में पहाडों की १०९ सबसे ऊंची चोटियां एशिया में हैं, जिनमे से ९६ हिमालय की हैं।

४, यदि सेव, आलू और प्याज को नाक बंद कर खाया जाय तो उनका स्वाद एक जैसा ही लगता है। आजमा कर देखिएगा। (:

५, एक छींक की गति 'सौ मील' घंटे की होती है।

६, 'शाप लिफ्टिंग' में सबसे पहला नाम बाईबिल का है।

बुधवार, 11 नवंबर 2009

प्रेम या स्नेह सिर्फ़ इंसान की ही बपौती नहीं है.

इटली का केंप्गलिया रेलवे स्टेशन। सुबह का समय, गाड़ियों की आने-जाने की आवाजों, यात्रियों की अफरा-तफरी के बीच "एल्वियो बारलेतानी" सर झुकाए अपने काम में मशगूल था। तभी उसे अपने पैरों के पास किसी चीज का एहसास हुआ। उसने चौंक कर नीचे देखा तो एक मरियल सा कुत्ता, जिसके शरीर तथा पंजों में जगह-जगह घाव हो गये थे, उसके पैरों में लोटने की कोशिश कर रहा था। तभी एल्वियो ने उसे पहचान लिया और वैसे ही उसे अपनी गोद में उठा लिया। उसके आंसू थम नहीं रहे थे। उसकी यह हालत देख उसके सहयोगी भी उसके इर्द-गिर्द इकट्ठा हो गये। फिर तो पूरा स्टेशन ही "लैंपो वापस आ गया" की आवाजों से गूंज उठा।

यह सत्य कथा है एक कुत्ते "लैंपो" की वफादारी और प्रेम की जो बत्तीस दिनों के बाद पूरे बारह सौ कि.मी. की यात्रा, पता नहीं कैसे, पूरी कर वापस अपने मालिक के पास आ पहुंचा था।

एल्वियो के बच्चे एक दिन कहीं से एक पिल्ला घर ले आये, जिसे घर में रखने की इजाजत उन्हें अपने अभिभावकों से भी मिल गयी। उसका नाम रखा गया "लैंपो"। अब बारलेतानी परिवार में एक और सदस्य की बढोतरी हो गयी थी। समय के साथ-साथ वह घर के बाहर भी सबका दुलारा बनता गया। एल्वियो को अपने कार्यालय आने के लिये अपने घर से ट्रेन पकड़नी पड़ती थी। एक दिन जब एल्वियो अपने बच्चों को स्कूल छोड़ स्टेशन आया तो लैंपो साथ ही था। ट्रेन के आते ही वह पहले ही अंदर जा एक सीट पर बैठ गया। अचभे से भरे एल्वियो को उसका भी टिकट लेना पड़ा। फिर तो यह रोजमर्रा की बात हो गयी। लैंपो रोज एल्वियो के साथ स्टेशन पर ट्रेन में चढ कर आने-जाने लगा। यहां भी अपनी खूबसूरती, चपलता और बुद्धीमानी के कारण एल्वियो के सहयोगियों की आंखों का तारा बन बैठा था।
पर एल्वियो के बास को यह सब पसंद नहीं था। उसे कुत्तों से चिढ थी। एक दिन उसने साफ-साफ कह दिया कि यदि लैंपो का स्टेशन आना नहीं रोका गया तो वह उसे म्युन्सपैलिटी के हवाले कर देगा। अधिकारी को मनाने की तथा लैंपो घर में ही रखने की बहुत कोशिशें की गयीं पर दोनों ही जैसे मानने को तैयार नहीं थे। दोनों ही अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे। तो एक दिन यह फैसला किया गया कि लैंपो को किसी दूर की गाड़ी में चढा दिया जाए, जिससे यह रोज-रोज की तकरार खत्म हो सके। । और एक दिन इटली की सबसे दूरगामी गाड़ी में लैंपो को भीगी आंखों और दुखी मन से चढा दिया गया। उस दिन एल्वियो के घर ना खाना बना ना किसी ने कुछ खाया। धीरे-धीरे दिन बीतते गये और लैंपो की याद धुंधली पड़ती गयी। एल्विनो परिवार भी आहिस्ता-आहिस्ता उसकी याद भुलाने की कोशिश में अपने काम से लग गया था कि अचानक लैंपो फिर उनकी जिंदगी में लौट आया और इस बार सुपर हीरो बन कर।
और अब तो वह बॉस का भी दुलारा था।

रविवार, 8 नवंबर 2009

रामदेव जी, सारी सृष्टि का जन्म ही "वैसी" जगह से होता है तो?

वैसे ऐसे लोगों के खिलाफ़ कुछ कहना नहीं चाहिए जो लोगों की भलाई में जुटे हुए हों। पर कभी-कभी कुछ ऐसी बात हो जाती है कि मजबूर हो कर कहना ही पड़ता है।
दो-एक दिन पहले श्रीमति जी, अपने हद से ज्यादा पसंदिदा चैनलों को छोड़ सर्च के चक्कर में पड़ी हुईं थीं (बहुत ज्यादा संभावाना थी कि उनके वालों पर विज्ञापन फेंके जा रहे हों) कि अचानक रामदेव बाबा सामने आ गये, और मेरे कानों में कुछ अंडे जैसे शब्द पड़े। सर्चिंग रोकी गयी।
रामदेव जी अंडे की बुराईयों को तरह-तरह के उदाहरण दे कर समझा रहे थे। इतना तो ठीक था पर अचानक उन्होंने उसे और बदतर दिखाने के लिये कहा कि जो चीज (क्षमा चाहता हूं इसमें एक शब्द भी मेरा नहीं है) पैखाने के रास्ते बाहर आती है वह कैसे अच्छी हो सकती है। इस बात को उन्होंने दो-तीन बार दोहराया। बोले कि उसकी सिर्फ पैकिंग ही अच्छी है बाकी उसमेँ ऐसा कुछ नहीं होता कि उसे खाया जाय। "ऐसी जगह से निकलने वाली कोई भी चीज अच्छी हो ही नहीं सकती। वह त्याज्य होती है।" यह बात ठीक है कि वे अपनी रौ में बोलते चले गये और उनका आशय लोगों को मांस भक्षण से दूर करना था, पर अतिरेक में उनका तर्क कुतर्क में बदल गया। इतने विद्वान आदमी के मुच से ऐसी बातें कुछ शोभा नहीं देतीं। आगे उन्होंने कुछ गंद खाने वाले पशुओं का भी जिक्र किया। वह अलग विषय है।
मैं और मेरा पूरा परिवार पुर्णतया शाकाहारी हैं। रामदेव जी की और उनके अभियान के भी हम सब प्रसंशक हैं। पर जो बात उन्होंने अंडे के उद्गम को ले कर कही वही खलने वाली है। उन्हें भी पता ही होगा कि सारी सृष्टि का सुत्रपात ही जन्नेद्रिंयों से होता है। बड़-बड़े ऋषि-मुनि, विद्वान, प्रभू भक्त, यहां तक कि हमारे आराध्यों को भी मां की कोख से ही जन्म लेना पड़ा है। तो ऐसे रास्ते से आने पर वह सब त्याज्य तो नहीं हो गये। मैं खाने-खिलाने की बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ उनका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि कुछ कर्मकांडों में गो-मुत्र पान करने का विधान है। ऐसी भी कथाएं मिलती हैं कि ऋषियों ने गाय के गोबर में अनपचे अन्न को ग्रहण किया था। फिर धरती का अमृत कहे जाने वाले शहद को क्या कहेंगे जो मक्खी के पेट से बाहर आया उसका लार रूपी भोजन होता है।
हर चीज का आज व्यवसायी करण होता जा रहा है। रामदेव जी भी उससे बच नहीं पा रहे हैं। बाज़ार में खुद को टिका पाना किसी के लिये भी टेढी खीर होता जा रहा है। पर जो भी हो अतिरेक से बचना भी बहुत जरूरी है।

शनिवार, 7 नवंबर 2009

किस्मत से ज्यादा क्या सचमुच नहीं मिलता ? (:

बात कुछ पूरानी जरूर है पर है बड़ी दिलचस्प। उस समय संचार व्यवस्था तो थी नहीं। लोग आने-जाने वालों, व्यापारियों, घुम्मकड़ों, सैलानियों से ही देश विदेश की खबरें, जानकारियां प्राप्त करते रहते थे।

ऐसे ही अपने आस-पास के व्यापारियों की माली हालत अचानक सुधरते देख छोटी-मोटी खेतीबाड़ी करने वाले जमुना दास ने अपने पड़ोसी की मिन्नत चिरौरी कर उसकी खुशहाली का राज जान ही लिया। पड़ोसी ने बताया कि दूर देश के राज में बहुत खुशहाली है। वहां इतना सोना है कि लोग रोज जरूरत की मामूली से मामूली आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी सोने का उपयोग करते हैं। वहां हर चीज सोने की है। सोना मिट्टी के मोल मिलता है।

ऐसी बातें सुन जमुना दास भी उस देश की जानकारी ले वहां जाने को उद्यत हो गया। पर उसके पास जमा-पूंजी तो थी नहीं। पर इस बार प्याज की फसल ठीक-ठाक हुई थी, उसी की बोरियां ले वह अपने गंत्व्य की ओर रवाना हो गया। उसकी तकदीर का खेल कि वहां के लोगों को मसाले वगैरह की जानकारी नहीं थी, प्याज को चखना तो दूर उसका नाम भी नहीं सुना था। जब जमुना दास ने उसका उपयोग बताया तो वहां के लोग उसे खा खूशी से पागल हो गये और जमुना का सारा प्याज मिनटों में खत्म हो गया। उसकी बोरियों को उन लोगों ने सोने से भर दिया। जमुना वापस अपने घर लौट आया। उसके तो वारे-न्यारे हो चुके थे। अब वह जमुना दास नहीं सेठ जमुना दास कहलाने लग गया था।

उसकी जिंदगी बदलते देख उसके पड़ोसी समर से भी नहीं रहा गया। एक दिन वह भी हाथ जोड़े जमुना दास के पास आया और एक ही यात्रा में करोड़पति होने का राज पूछने लगा। उस समय लोगों के दिलों में आज की तरह द्वेष-भाव ने जगह नहीं बनाई थी। पड़ोसी, रिश्तेदारों की बढोत्तरी से, किसी की भलाई कर लोग खुश ही हुआ करते थे। जमुना ने भी समर को सारी बातें तथा हिदायतें विस्तार से बता समझा दीं और उस देश जाने के लिये प्रोत्साहित किया। पर बात वही थी जमुना जैसी, समर की जमा-पूंजी भी उसकी खेती ही थी। संयोग से उसने इस बार लहसुन की अच्छी फसल ली थी सो वही ले कर वह विदेश रवाना हो गया।

ठीक-ठाक पहुंच कर उसने भी अपना सामान वहां के लोगों को दिखाया। भगवान की कृपा, लहसुन का स्वाद तो उन लोगों को इतना भाया कि वे सब प्याज को भी भूल गये, इतने दिव्य स्वाद से परिचित करवाने के कारण वे सब अपने को समर का ऋणी मानने लग गये। पर उन लोगों के सामने धर्मसंकट आ खड़ा हुआ। इतनी अच्छी चीज का मोल भी वे लोग कीमती वस्तु से चुकाना चाहते थे। उनके लिये सोने का कोई मोल नहीं था। तो क्या करें ? तभी वहां के मुखिया ने सब को सुझाया कि सोने से कीमती चीज तो अभी उनके पास कुछ दिनों पहले ही आई है। उसी को इस व्यापारी को दे देते हैं। क्योंकि इतनी स्वादिष्ट चीज के बदले किसी अनमोल वस्तु को दे कर ही इस व्यापारी का एहसान चुकाया जा सकता है। सभी को यह सलाह बहुत पसंद आयी और उन्होंने समर के थैलों को प्याज से भर अपने आप को ऋण मुक्त कर लिया।
बेचारा समर (: (: (: (:

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

क्या बाप या अभिभावक अक्लमंद नहीं हो सकते ?

आप कहेंगे कि बार-बार विज्ञापनों का रोना ले बैठता हूं। पर इन्हें आप की अदालत में लाना जरूरी लगता है। सरकारी विज्ञापन तो वैसे ही माशा-अल्लाह होते हैं। "जागो ग्राहक जागो" में एक नया नमूना आया है।
एक बाप अपने कम्प्यूटर पर विदेश से एक बड़ी रकम अपने नाम दर्ज देख खुशी से उछल पड़ता है तो उसका बेटा उसे समझाता है कि यह धोखा-धड़ी है, अपने बैंक इत्यादि के नम्बर किसी को ना दें। कोई मुफ्त में किसी को एक पैसा नहीं देता।
विज्ञापन में या उसे पेश करने वाले की नियत में कोई खराबी नहीं है। पर एक जिम्मेदार, अनुभवी, उम्रदराज इंसान को बेवकूफी करते ना दिखा उसे नयी पीढी, जो कम तजुर्बेकार है, को भी समझाते दिखाया जा सकता था। बाप की जगह बेटे और बेटे की जगह बाप को दे कर अनुभव की गरिमा और बुजुर्गियत की लाज दोनो बचाई जा सकती थीं। वैसे भी रिटायर्ड़ अभिभावक से ज्यादा पैसे की जरूरत युवा को होती है। जिसके सामने सारी जिंदगी पड़ी है। आज नयी पीढी में अधिकांश युवा ऐसे मिल जायेंगे जो कम समय में, रातों-रात अमीर बन जाने के लिये गलत हालातों में फंस जाते हैं। ऐसे में क्या समय के थपेड़ों से अनुभव प्राप्त कर जिंदगी की ठोस हकीकत को समझने वाले बुजुर्गों की नसीहतें युवा पीढी का मार्गदर्शन नहीं कर पातीं ?

रविवार, 1 नवंबर 2009

गंदा है पर धंधा है, समय बदला है हथकंडे नहीं

एक रपट :-
कुछ सालों पहले सड़क पर तंबू लगा ताकत की दवाईयां बेचने वाले अपने साथ बहुत सारी फोटुएं लिये रहते थे। जिनमें वे खुद किसी,उस समय के लोकप्रिय मर्दानी छवि वाले फिल्मी हीरो जैसे धर्मेंद्र या दारा सिंह के कंधे पर हाथ रखे मुस्कुराते खड़े नजर आते थे। गोया उन लोगों की मर्दानगी इन सड़क छाप व्यापारियों की देन हो। उस समय तकनिकी इतनी सक्षम नहीं थी फिर ऐसी फोटुएं कैसे खींची जाती थीं इसका पता एक खुलासे से हुआ। होता क्या था कि यह चंट लोग येन-केन-प्रकारेण अपने-आप को नायक का बहुत बड़ा पंखा या उसके शहर-गांव का बता किसी तरह स्पाट ब्वाय वगैरह को पटा कर हीरो को एक फोटो खिंचवाने के लिये राजी करवा लेते थे, कैमरा मैन इन्हीं का आदमी होता था, जैसे ही बटन दबने को होता था ये झट से अपना हाथ नायक के कंधे पर मुस्कुराते हुए धर देते थे, फिर यदि कोई नाराज होता भी था तो हाथ-पैर जोड़ क्षमा मांग नौ-दो-ग्यारह हो जाते थे।

एक जानकारी :-
दैनिक भास्कर की एक सहयोगी पत्रिका है 'अहा!जिंदगी'। जिसके अक्टूबर के अंक में किन्हीं मुनीर खान का जिक्र है। जो काफी बढा-चढा कर, विभिन्न बड़ी हस्तियों की तस्वीरों के साथ पेश किया गया है। जिनमें शीला दीक्षित और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा। रामदौस भी शामिल हैं। जानते हैं पत्रिका ने किस खिताब से नवाजा है उन अपने आप को वैज्ञानिक कहने वाले महाशय को, 'सहस्त्राब्दि का मसीहा'। यह दावा किया गया है कि उनकी जादुई दवा से हर रोग का ईलाज हो सकता है बिना किसी साइड़ इफेक्ट के। यह भी लिखा गया है कि दुनिया के नब्बे से ज्यादा देशों में पेटेंट के लिये आवेदन किया जा चुका है।

एक ख़बर :-
दो दिन पहले के भास्कर में ही किसी खबर के बीच छुपी खबर - "कैंसर और ब्रेन ट्यूमर जैसी बिमारियों के इलाज का दावा करने वाले स्वयंभू वैज्ञानिक मुनीर खान भूमिगत। पुलिस अब तक गिरफ्तार करने में नाकाम।