सोमवार, 28 दिसंबर 2009

वृद्धा ने शिवाजी को दी शिक्षा

शिवाजी महाराज ने मुगल सल्तनत के खिलाफ जंग शुरु कर दी थी। उनकी छापामार युद्ध नीति से औरंगजेब की नाक में दम आ गया था।
ऐसे ही एक बार शिवाजी ने एक गांव मे पड़ाव डाला। इनके खाने का इंतजाम एक वृद्धा के घर मे था। वह शिवाजी महाराज को तो जानती थी पर उनके चेहरे से अनभिज्ञ थी। वह यही समझ रही थी कि वह महाराज के सैंनिकों को भोजन करा रही है। कुछ ही देर मे उसने गरम-गरम चावल-दाल परोस दिया और मनुहार कर खिलाने लगी। शिवाजी जल्दी मे थे उन्होंने थाली सामने आते ही खाना शुरु किया ही था कि भोजन की गर्मी के कारण उन्हें हाथ खींच लेना पड़ा। यह देखते ही वृद्धा बोली, तू भी अपने महाराज की तरह बावला है। वह भी सीधे राजधानी पर हमला कर नुक्सान उठाता है और तू भी भोजन को बीच मे से खाना शुरु कर हाथ जलवाता है। अरे पगले, अपने महाराज को चाहिये कि वे पहले छोटी-छोटी जगहों पर विजय प्राप्त करें जिससे पीछे से हमला होने का ड़र खत्म हो जाये फिर सारी ताकत लगा राजधानी पर टूट पड़ें। उसी तरह तू भी खाना किनारे से शुरु कर, इससे खाना ठंड़ा भी हो जायेगा और तू आराम से खा भी पायेगा।
शिवाजी महाराज अपने इस नये गुरु का मुंह देखते रह गये। खाना खत्म कर उन्होंने वृद्धा के चरण स्पर्श किये और आगे बढ़ गये।

इतिहास गवाह है कि इसके बाद युद्ध में फिर कभी उन्हें पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा।

9 टिप्‍पणियां:

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

शिवाजी ने उस्की बात मानी भी . और सफ़लता भी पायी , अगर आज कोइ ऎसी राय राजा को दे तो शायद ही राजा माने

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

शिक्षाप्रद कथा!

Udan Tashtari ने कहा…

उम्दा प्रसंग!!




यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

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आपका साधुवाद!!

शुभकामनाएँ!

समीर लाल
उड़न तश्तरी

राज भाटिय़ा ने कहा…

तबी तो कहते है कि बुजुर्गो की सलाह माननी चाहिये, बहुत सुंदर शिक्षा.

संजय बेंगाणी ने कहा…

जय भवानी :)

प्रेरक कथा.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

सुन्दर व प्रेरक प्रसंग ! आभार ।

नेहा पाठक ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
नेहा पाठक ने कहा…

कभी- कभी अच्छे सुझाव ऐसी जगह से मिल जाते है, जहाँ से उम्मीद न हो। इसीलिये हमें हर किसी की बात कों ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए। किसी कों कम अक्लमंद सोचना हमारी मूर्खता है। आप सभी कों नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

अजय कुमार झा ने कहा…

जी इस प्रेरक प्रसंग के बारे में पहले भी पढा था शायद , तभी तो कहते हैं कि पहले के शासक अधिक दूरदर्शी थे और बुद्धिमान भी ॥