मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

क्या सचमुच जरुरी है आयोडीनयुक्त नमक ?

ज़रा सोचिये कहीं आप उस आयोडीन की कीमत तो नहीं चुका रहे जो गर्म होते ही वाष्प में बदल जाता है..........
वर्षों से साधारण नमक खाते-खिलाते अचानक हमारी सरकार को एक दिन विदेशी विशेषज्ञों के चेताने से यह ख्याल आया कि अरे! हमारे देश के नागरिक आयोडीन का अंश तो लेते ही नहीं । हड़कंप मच गया रातोंरात हर आम आदमी तक पहुंचने वाले माध्यम से उसे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का काम शुरू कर दिया गया। डरा-डरा कर समझाया गया कि “अब” यदि आयोडीन नामक रोग बचाऊ दवा नहीं लोगे तो ऐसे रोग का शिकार हो जाओगे जिसका इलाज बहुत मुश्किल है। डरना हमारी फितरत है, कोई भी आ कर डरा जाता है, हम डर गये और शुरु हो गया करोंड़ों अरबों का खेल।
इसके लिये नमक को चुना गया जिसे हर आमोखास इंसान अपने काम में लाता ही है। और दौड़ पड़ीं अरबों खरबों का "टर्न ओवर" करने वाली कंपनियां, इस रुपये में दो किलो बिकने वाले नमक को "हेल्थ प्रोडक्ट" बनाने के लिये। विदेशी भी इसी ताक में थे वे भी आ जुटे अपना ताम-झाम लेकर उस गरीब की “सहायता” करने जो नमक के साथ ही सूखी रोटी खा भगवान को दुआ देने लग जाता था।
वर्षों से अपनी सेहत से लापरवह हमें सेहतमंद बनाने की सुध भी उन्हीं अंग्रंजों को ही आयी जिन्होंने सालों हम पर राज कर हमारी “तकलीफों" को करीब से जाना। इतिहासकार “पट्टाभि सीतारमैया जी” के अनुसार, अंग्रेजों के जहाज यहां से माल भर इंग्लैंड जाते थे तो लौटते समय जहाजों का भार बनाए रखने के लिये उनमें रेत भर-भर कर लाई जाती थी। फिर बाद में रेत की जगह नमक लाना शुरु हो गया। अब जब उसके ढेरों के ढेर जमा होने लगे तो उन्होंने यहां के नमक पर पाबंदी लगानी शुरु कर दी। पर इसके विरोध में जन-जन उठ खड़ा हुआ। नमक सत्याग्रह कर दिया गया। अंग्रजों को झुकना पड़ा। पर वह इस सोना उगलने वाली खान को भूल नहीं पाये।
प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला नमक किसी भी तरह सेहत के लिये ठीक नहीं है ऐसा कोई दावा नहीं होने के बावजूद अंततोगत्वा रास्ता निकाल ही लिया गया नमक को आमदनी का जरिया बनाने का। क्योंकि यही एक ऐसा खाद्य पदार्थ था जिसे हर घर की रसोई में स्थान प्राप्त था। हर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब की जरूरत था। किसी भी दूसरी चीज के मुकाबले इसकी खपत कहीं ज्यादा थी। सो नमक में आयोडीन मिला लोगों की सेहत की हिफाजत की तथाकथित मुहिम शुरु कर दी गयी। जबकि वैज्ञानिकों के अनुसार आयोडीन गर्मी पाते ही वाष्प में बदल जाता है। भारत में जहां खाना बनाने की विधी में ज्यादातर तलने, भूनने, सेंकने तथा फिर भोजन में तरह-तरह के मसालों का उपयोग होता हो वहां बेचारा आयोडीन कब तक अपना अस्तित्व बचा कर रख सकता है। अब सोचिये आप उस आयोडीन की कीमत अदा करते हैं जो गर्म होते ही भोजन का साथ छोड़ देता है।
दूसरी बात शोधकर्ता बताते हैं कि हमारे द्वारा उपयोग में लाई जाने वाले फल, सब्जियों और आमिष खाद्यों में भी पर्याप्त मात्रा में आयोडीन होता है। और फिर एक स्वस्थ इंसान को कितना आयोडीन चाहिये, सिर्फ 100-125 माइक्रोग्राम। इसके अलावा बार-बार दुनिया भर से ये जानकारियां सामने आती रही हैं कि आजकल रक्त चाप जैसे रोगों की बढोतरी में इसी आयोडीन मिश्रित नमक का हाथ है। जिसके कारण बहुतेरे देशों में इसकी जरुरत को खारिज भी कर दिया गया है।
जनता के स्वास्थ्य को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित हमारे भाग्यविधाता यह भी भूल गये कि उनके इन सब तमाशों से साधारण नमक की दसियों गुना बढी कीमतों का उन हजारों-लाखों गरीब परिवारों पर क्या असर पड़ेगा जो आज भी नमक और प्याज (उसे भी कहां रहने दिया गया है किसी की हद में) के साथ दो रोटी खा कर अपनी जिंदगी काट रहें हैं। पर उस गरीब की पहले कब फिक्र की गयी थी जो अब की जाती।
अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं जब इसी तरह का खेल सरसों के तेल को ले कर शुरु करने की कोशिश की गयी थी, सिर्फ इसलिये कि "उनके" यहां के सड़ते हुए तेल को यहां खपाया जा सके।
पता नहीं कब चंद लोग अपनी बदनीयति से बाज आ देश की नीयति के बारे में सोचेंगे।

13 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक लेखन के लिए बधाई!

Udan Tashtari ने कहा…

जानकारीपूर्ण आलेख. सजगता जरुरी है.

बी एस पाबला ने कहा…

विचारोत्तेजक लेख

बी एस पाबला

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बेतरीन जानकारीपरक लेख....लेकिन होने वाला फिर भी कुछ नहीं !

शरद कोकास ने कहा…

मुश्किल तो यह है कि इतनी गहराई से कोई नही सोचता ।

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप ने एक दम सही बात कही, हम यहां आज तक साधारण नमक ही खा रहे है, ओर इस आयोडीन युक्त नमक का नाम भी भारत मै ही पहली ओर आखरी बार सुना था, लोग गांधी बाबा की बात पर यकीन ना कर के अग्रेजी बोलते है ओर उन का नमक भी खाते है, क्या बात है इन अंग्रेजॊ की...:)

Soumitro B ने कहा…

आपने बहुत ही सही बात पर टिपण्णी की है, सच है की हमे iodine की जरूरत है , परन्तु कितनी, इसका निर्धारण कौन करेगा। साब पहले जब बीमार पड़ते थे तब इलाज किया जाता था परन्तु आज के समय बहुत सी कंपनी आपको मानसिक तौर पर बीमार करके आपका इलाज या कहे अपने उत्पाद बेच रही है , किसी का नाम लेना ग़लत होगा परन्तु बहुत सी नेट्वोर्किंग कंपनी या pharmaceuticals जो पहले आपको बीमार करती है जैसे आप में प्रोटीन की कमी है, आपका immune system कमजोर है या फिर आपमें कैल्सियम की कमी है, तो फ़िर मेरी कंपनी का प्रोडक्ट का सेबन करके देखे तो उससे आपको जरूर लाभ होगा , और जनता इसी बहकाबे में फसती चली जाती है, प्रोटीन पावडर का सेवन कर आप भले ही healty नही होते पर वो कंपनी और बेचने वाला बहुत healthy हो जाता है, है ना सही तरकीब की पहले बीमार करो फिर........................................

महफूज़ अली ने कहा…

जानकारीपूर्ण आलेख.

Anil Pusadkar ने कहा…

महत्वपूर्ण जानकारी दी आपने शर्मा जी,मुझे इसकी जानकारी नही थी।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Is satik vivechan ke liye aabhaar.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

बेहद उपयोगी व जानकारी भरा लेख । आभार ।

बी एस पाबला ने कहा…

इस टिप्पणी के माध्यम से, सहर्ष यह सूचना दी जा रही है कि आपके ब्लॉग को प्रिंट मीडिया में स्थान दिया गया है।

अधिक जानकारी के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं।

बधाई।

बी एस पाबला

Neha Pathak ने कहा…

samsta pathako se mere naye blog ko ek baar padhne ka aagrah karna chaungi....link-
http://antarkaangaar.blogspot.com/

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