शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

इसे क्या कहें, बालों का कहर या जैसे को तैसा

परिवार के मुखिया कृपाशंकर दूबे, मितव्ययी, कर्मकांड़ी, अपने आचारों-व्यवहारों का कड़ाई से पालन करने वाले, एक सख्त मिजाज इंसान, जिनकी बात काटने की हिम्मत घर के किसी भी सदस्य की नहीं होती।
अच्छा घर और वर तथा वधू मिलते ही एक ही मंडप तथा मुहुर्त में अपने लड़के तथा लड़की की शादी कर एक ही साथ कन्यादान और वधू का गृह-प्रवेश करवा गंगा नहा लिये।
आज शादी के दूसरे दिन, नववधू की भोजन बनाने के रूप में अग्निपरीक्षा होनी है। सारे परिवार की उत्सुक निगाहें रसोई की तरफ लगी हुई हैं। प्रतिक्षा खत्म हुई वधू ने विभिन्न व्यंजन परोस दिये। खाना बहुत ही उम्दा और स्वादिष्ट बना था। हर सदस्य तृप्त तथा संतुष्ट नजर आ रहा था। तभी अचानक कृपाशंकर जी की भृकुटि पर बल पड़ गये, उनकी सब्जी में एक लम्बा सा बाल निकल आया था। जो निश्चित रूप से बहू का ही था। भोजन अधूरा छोड़ उन्होंने अपना आसन त्याग दिया तथा वहीं खड़े-खड़े अपने बेटे मोहन को बहू को उसके घर वापस छोड़ आने की आज्ञा सुना दी। सारा घर निस्तब्ध रह गया। किसी की भी हिम्मत प्रतिवाद करने की नहीं थी। परिस्थिति की गम्भीरता को समझ नववधू के आंसू थम ही नहीं रहे थे। तभी घर के बाहर से कुछ अजीब सी आवाजें तथा हलचल का आभास हुआ। जब तक वस्तुस्थिति का कुछ पता चलता, घर में दूबेजी की नवविवाहिता कन्या, कला, ने रोते हुए प्रवेश किया। सारे जने सन्न रह गये किसी विपत्ती को भांप कर। कन्या को बिठा कर सबने उससे इस तरह आने का कारण जानना चाहा, तो रोते-रोते बड़ी मुश्किल से कला ने बताया कि आज उसे पहली बार ससुराल में खाना बनाना था। सब ठीक था पर खाते समय श्वसुरजी की दाल में बाल निकल आया था।

8 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार झा ने कहा…

इसे यदि जीवन के उस चक्र के रूप में देखा जाये ....जो घूम कर वहीं पहुंच जाता है ..तो ठीक रहेगा न...हर बेटी किसी न किसी की बहू होती है..और हर बहू किसी न किसी की बेटी...बस बात यही समझने की है....और बाल कहां समझते हैं....इतनी दुनियादारी.....

Mithilesh dubey ने कहा…

अगर देखा जाये तो आप ने जो कुछ भी कहा वह बिल्कुल सत्य है। देर भले हो जाती है लेकिन करनी का फल मिलता जरुर है।

समयचक्र - महेंद्र मिश्र ने कहा…

ससुर की दाल में बाल मिला याने दाल काली भयो आनंद आ गया पढ़कर . आभार.

P.N. Subramanian ने कहा…

जरूर किसी खुन्नस खाए हुए प्रतिपक्ष वाले का काम होगा.

राज भाटिय़ा ने कहा…

है भगवान तु सब को हाथो हाथ ही उन के कर्मओ का फ़ल दे तो भारत मै कितनी शाति हो जाये सब सुखी हो जाये, कोई भुखा ना रहे, ... शर्मा जी बहुत सुंदर कहानी...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बेहतरीन रही यह लघु कथा!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

केवल बाल के लिए इतना कुछ ! कुछ ज्यादा हो गया ।

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

हिमांशु जी,
वर्तमान में यह कुछ ज्यादा और ज्यादती लगती है, पर 30-35 साल पहले यह कोई बड़ी बात नहीं थी। जब बहुओं की चाल, बाल और खाना बनाने के तरीकों को 'सुक्ष्मदर्शी' से देखा जाता था।