शनिवार, 16 मई 2009

कलयुगी श्रवण कुमार

आज हरिया अपने बेटे डा गोविन्द के साथ शहर जा रहा था। गाँव वाले अचंभित थे, गोविन्द के गाँव आने पर, उसके दो-दो नर्सिंग होम थे शहर में, इतना व्यस्त रहता था वह कि अपनी माँ के देहांत पर भी गाँव नहीं आ सका था। पर खुश भी थे, हरिया को चाहने वाले, यह सोच कर कि बीमार हरिया शहर में अपने बेटे के पास रह कर अपनी जिन्दगी के शेष दिन आराम से गुजार सकेगा।
उधर गोविन्द बाप को देख कर ही समझ गया था कि महीने दो महीने का खेल ही बचा है। उसे बाप की देह के किडनी इत्यादि अंग, बैंक बैलेंस में तब्दील होते नजर आ रहे थे।

7 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

विमानवीयकरण की कथा।

अखिलेश शुक्ल ने कहा…

प्रिय मित्र
आपकी रचना ने प्रभावित किया बधाई इन्हें प्रकाशित करने के लिए मेरे ब्लाग पर पधारें।
अखिलेश शुक्ल्
http://katha-chakra.blogspot.com

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

ओह

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

हैवानीयत की पराकाष्टा!!!!!!!!!

Chetan ने कहा…

kalyug me kya nahi ho sakataa

बेनामी ने कहा…

shri sharma ji aapne kalyugi shhawan kumar ke bare me likhe samay ke sath - sath lalch ka jankari . thank V. Patel Raipur.

बेनामी ने कहा…

shri sharma ji aapne kalyugi shhawan kumar ke bare me likhe samay ke sath - sath lalch ka jankari . thank V. Patel Raipur.