गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

जब सारे जाने कह रहे हैं कि कल नया साल है, तो जरूर होगा

सभी "अनदेखे अपने" भाई-बहनों के लिए कल और हर आने वाला हर दिन खुशी समृद्धी तथा स्वास्थ्य लेकर आये।

दुनिया के साथ ही हम सब हैं। जब सारे जने कह रहे हैं कि कल नया साल है तो जरूर होगा। सब एक दूजे को बधाईयां दे ले रहे हैं, अच्छी बात है। जिस किसी भी कारण से आपसी वैमनस्य दूर हो वह ठीक होता है। चाहे उसके लिये विदेशी अंकों का ही सहारा लेना पड़े। अब इस युग में अपनी ढपली अलग बजाने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। वे कहते हैं कि दूसरा दिन आधी रात को शुरु होता है तो चलो मान लेते हैं क्या जाता है। सदियों से सूर्य को साक्षात भगवान मान कर दिन की शुरुआत करते रहे तो भी कौन सा जग में सब से ज्यादा निरोग, शक्तिमान, ओजस्वी आदि-आदि रह पाये। कौन सी गरीबी घट गयी कौन सी दरिद्रता दूर हो गयी।
हर बार की तरह कल फिर एक नयी सुबह आयेगी अपने साथ कुछ नये अंक धारण किये हुए। साल भर पहले भी ऐसा ही हुआ था। होता रहा है साल दर साल। आगे भी ऐसा ही होता रहेगा। जो सक्षम हैं उन्हें एक और मौका मिल जाता है, अपने वैभव के प्रदर्शन का, अपनी जिंदगी की खुशियां बांटने, दिखाने का, पैसे को खर्च करने का। जो अक्षम हैं उनके लिये क्या नया और क्या पुराना। कल सुरज उगते ही वही चिंता, काम मिलेगा कि नहीं, चुल्हा जल भी पायेगा कि नहीं, बच्चों का तन इस ठंड में ढक भी पायेगा कि नहीं। उसको तो यह भी नहीं पता कि जश्न होता क्या है।
कुछेक की चिंता है कि इतने पैसे को खर्च कैसे करें और कुछ की कि इतने से पैसे को क्या खर्च करें। इन दिनों जो खाई दोनों वर्गों में फैली है उसका ओर-छोर नहीं है।
वैसे देखें तो क्या बदला है या क्या बदल जायेगा। कुछ कैसे भी जोड़-तोड़ लगा, साम, दाम ,दंड़, भेद की नीति लगा, किसी को भी कैसी भी जगह बैठा अपनी पीढी को तारने का जुगाड़ बैठाते रहेंगे। कुछ भेड़ों की गिनती करवा खुद को खुदा बनवाते रहेंगे। कुछ सदा की तरह न्याय की आंखों पर बंधी पट्टी का फायदा उठाते-उठवाते रहेंगे, और कुछ सदा की तरह कुछ ना कर पा कर कुढते-कुढते खर्च हो जायेंगे।
इस सब को अन्यथा ना लें। किसे दुर्भावना या पूर्वाग्रह से ग्रस्त भी नहीं है यह पोस्ट। अपनी तो यही कामना है कि कल आने वाला ही क्यों हर दिन अपने देश और देशवासियों के साथ-साथ इस धरा पर रहने वाले हर प्राणी के लिये खुशहाली, सुख, स्मृद्धी के साथ-साथ सुरक्षा की भावना भी अपने साथ लाये।

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

वृद्धा ने शिवाजी को दी शिक्षा

शिवाजी महाराज ने मुगल सल्तनत के खिलाफ जंग शुरु कर दी थी। उनकी छापामार युद्ध नीति से औरंगजेब की नाक में दम आ गया था।
ऐसे ही एक बार शिवाजी ने एक गांव मे पड़ाव डाला। इनके खाने का इंतजाम एक वृद्धा के घर मे था। वह शिवाजी महाराज को तो जानती थी पर उनके चेहरे से अनभिज्ञ थी। वह यही समझ रही थी कि वह महाराज के सैंनिकों को भोजन करा रही है। कुछ ही देर मे उसने गरम-गरम चावल-दाल परोस दिया और मनुहार कर खिलाने लगी। शिवाजी जल्दी मे थे उन्होंने थाली सामने आते ही खाना शुरु किया ही था कि भोजन की गर्मी के कारण उन्हें हाथ खींच लेना पड़ा। यह देखते ही वृद्धा बोली, तू भी अपने महाराज की तरह बावला है। वह भी सीधे राजधानी पर हमला कर नुक्सान उठाता है और तू भी भोजन को बीच मे से खाना शुरु कर हाथ जलवाता है। अरे पगले, अपने महाराज को चाहिये कि वे पहले छोटी-छोटी जगहों पर विजय प्राप्त करें जिससे पीछे से हमला होने का ड़र खत्म हो जाये फिर सारी ताकत लगा राजधानी पर टूट पड़ें। उसी तरह तू भी खाना किनारे से शुरु कर, इससे खाना ठंड़ा भी हो जायेगा और तू आराम से खा भी पायेगा।
शिवाजी महाराज अपने इस नये गुरु का मुंह देखते रह गये। खाना खत्म कर उन्होंने वृद्धा के चरण स्पर्श किये और आगे बढ़ गये।

इतिहास गवाह है कि इसके बाद युद्ध में फिर कभी उन्हें पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

ऊपर से प्रत्यक्ष खबर भेजने का नियम नहीं है.

भरी दोपहर दरवाजे पर दस्तक हुई, घोष बाबू ने दरवाजा खोला तो सामने फटिक खडा था

फटिक घोष गंगा घाट पर बैठे नदी के जल पर उतराती नौकाओं को देख रहे थे। कोई सवारियों को पार ले जाने के लिये लहरों से संघर्ष कर रही थी, तो कोई पानी मे जाल ड़ाले मछली पकड़ने का उपक्रम कर रही थी। बहुत से लोग घाट पर नहा भी रहे थे। बीच बीच में घोष बाबू एक नज़र अपने पोते बापी पर भी ड़ाल लेते थे जो पानी मे कागज की छोटी-छोटी नावें बना तैराने की कोशिश कर रहा था।

घोष बाबू और उनके पोते बापी का यह रोज का अटूट नियम था, संध्या समय गंगा घाट पर आ शीतल, मंद, सुगंध समीर का आनंद लेने का।
अचानक बापी एक ओर देख चिल्लाया, "दादू, देखो केष्टो!!!
"केष्टो"?, "क्या बक रहा है? किधर है"? घोष बाबू अचंभित हो बोले।
"उधर"। घाट के एक ओर अपनी उंगली का ईशारा कर बापी बोला। अपनी आंखों पर हाथ रख उसकी उंगली की सीध में घोष बाबू ने नज़र दौड़ाई, अरे!!! सचमुच वहां घाट पर केष्टो खड़ा था। घोर आश्चर्य, केष्टो उनका पुराना नौकर, जिसकी मृत्यु दो साल पहले हो चुकी थी, वह साक्षात यहां? घोष बाबू ने तुरंत बापी को उसे बुला लाने के लिये दौड़ाया। कुछ ही देर में केष्टो उनके सामने हाथ जोड़े खड़ा था। घोष बाबू आंखे फाड़े उसकी ओर देखे जा रहे थे, फिर बोले, "अरे तू तो मर गया था न? फिर यहां कैसे?" केष्टो ने अपने पुराने मालिक के चरण स्पर्श किये और ऊपर हाथ उठा कर बोला, "मालिक उस दफ्तर में मुझे धरती से लोगों को उपर ले जाने की नौकरी मिल गयी है।"
" अरे!!! तो यहां कैसे आया है?" घोष बाबू ने पूछा।
"हरिदास को लेने।" घाट पर नहा रहे जमिंदार के नौजवान बेटे की ओर उसने ईशारा किया।
"अरे बाप रे!!! हरिदास? अरे वह तो अच्छा खासा तंदरुस्त जवान है, और अभी महीना भर पहले ही तो उसकी शादी हुई है।"
"हां बाबू, पर उसका समय आ गया है। उसे जाना होगा।"

तभी घाट पर जोर का हल्ला मच गया। हरिदास ने जो ड़ुबकी लगायी तो वह फिर पानी के ऊपर ना आ सका। कुछ देर बाद ही उसकी लाश लहरों पर उतराने लगी।
तभी केष्टो बोला, "मालिक चलता हूं।"
घोष बाबू अवाक से यह सब देख रहे थे, केष्टो कि आवाज सुन जैसे होश मे आये, बोले "अरे केष्टो, सुन जरा, ऊपर तो तेरे को सब आने-जाने वालों का पता होता होगा?"
"हां मालिक" केष्टो ने जवाब दिया।
"तो तू मेरा एक काम कर सकेगा"? घोष बाबू ने पूछा।
" हां, क्यों नहीं, बोलिये"।
"जब मेरा समय आए तो मुझे छह महीने पहले बता सकेगा?"
"जरूर, मैं आप को खबर कर दूंगा।" इतना कह केष्टो हरिदास की आत्मा को ले ओझल हो गया।

समय बीतता गया। फटिक घोष निश्चिंत थे कि समय के पहले छह महीने तो मिल ही जायेंगे, कुछ काम बचा होगा तो निपट जायेगा। ऐसे ही गर्मी के दिनों में भरी दोपहर को दरवाजे पर दस्तक हुई। दोपहर के खाने के बाद की खुमारी घोष बाबू पर चढी हुई थी। धीरे-धीरे उठ कर दरवाजा खोला तो सामने केष्टो खड़ा था। इन्हें देख बोला, "बाबू, चलिये।" घोष बाबू के सारे शरीर में सिहरन दौड़ गयी। किसी तरह बोले, "पर तुझे तो कहा था ना, कि मुझे छह महीने पहले बता देना?" " हां बाबू, मैंने ऊपर बात की थी, पर वे बोले कि हमारे यहां प्रत्यक्ष रूप में खबर करने का नियम नहीं है। हमारे यहां से अप्रत्यक्ष रूप से संदेश भेजा जाता है। जब किसी व्यक्ति का शरीर अशक्त हो जाये, चेहरे पर झुर्रियां पड़ जायें, आंखों से दिखना कम हो जाये, दांत गिर जायें, बाल सफेद हो जायें तो समझ लेना चाहिये कि समय आ पहुंचा है।
चलिये....................................

बचपन में पढी कवि गुरु की यह व्यंग रचना अक्सर याद आती रहती है।
कई दिनों से अपना बक्सा बीमार है सो जुगाड़ कर इसे पोस्ट किया है:)

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

मेरा एक सुझाव है, सोच कर देखीए.

मेरा एक सुझाव है कि किसी भी दिग्गज ब्लाग पर "गपशप" जैसा कुछ शुरू किया जाय। अब यहां एक से बढ कर एक "पोपुलर" जगहें हैं जहां हर कोई खिंचा चला आता है। इनमें किसी पर भी ऐसा कुछ शुरु किया जाय जिसमें हर ब्लागर अपने क्षेत्र की कोई भी जानकारी, कोई घटना, कोई नयी खबर, कुछ अनोखा यदि हो तो सबके साथ बांटे। और उसकी प्रतिक्रिया भी तुरंत उपलब्ध हो सके। जैसा कि अभी ताऊजी के फर्रुखाबादी खेल में सब बढ-चढ कर भाग लेते हैं, पहेलियों के अलावा भी नोक-झोंक में। उसी तरह दुनिया-जहान की बातें एक ही जगह हो जायें। कहने को तो हर ब्लाग ऐसी ही जानकारी रखता है, पर वहां संजीदगी पीछा नहीं छोड़े रहती। अब इसकी तुलना किसी "ट्वीटर या फेसबुक" से ना कर एक अलग रूप का खिलंदड़ा ब्लाग बन जाये तो कैसा रहे? जिसमे तरह-तरह की जानकारियाँ उपलब्ध हों।
इसके लिये भी मेरी ताऊजी से ही गुजारिश है कि वह एक नया ब्लाग शुरू करें। उनकी चौपाल से ज्यादा मुफीद जगह और कौन सी हो सकती है। यदि ऐसा हो तो चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाने का समय थोड़ा देर से रखा जाय।

रविवार, 20 दिसंबर 2009

आस्ट्रेलियन दंपति ने बनाया “मन चाहे फल देने वाला पेड़”

घर में एक पेड़ लगा कर आठ तरह के फल पाने का करिश्मा कर दिखाया है आस्ट्रेलियन दम्पति ने

आस्ट्रेलिया के वेस्ट दंपति ने एक अनोखा करिश्मा कर दिखाया है। एक ऐसा करिश्मा जिसका जिक्र किस्से कहानियों में तो सुना पढा गया होगा पर असली जिंदगी में जिसे असंभव ही माना जाता रहा है। जी हां इस युगल ने बारह वर्षों के अथक प्रयास से एक ऐसी विधी खोज निकाली है जिससे एक ही पेड़ पर अपनी पसंद के सारे फल उगाये जा सकते हैं। उन्होंने इसे “फ्रुट सलाद ट्री” का नाम दिया है। जेम्स वेट और उनकी पत्नी कैरी वेट के मन मे, अपने फार्म पर काम करते हुए, कुछ अनोखा करने की इच्छा सदा बनी रहती थी। अखिरकार वर्षों की मेहनत रंग लायी और वे अपने बागीचे में ऐसा पेड़ तैयार करने में सफल हो गये जिस पर अपनी इच्छानुसार फल उगाये जा सकते थे। वेट दंपति ने एक पेड़ पर अलग-अलग प्रकार के फलों की कलमें लगा कर इस अद्भुत कारनामे को अंजाम दिया। किस पेड़ पर किस फल की कलम लगायी जाय, कलम को किस तरह लगाया जाय, उसकी साज-संभार, दिये जाने वाली खाद का प्रकार, यह सब बातों की जानकारी पाते करते तथा उसका सफ़ल परिणाम पाने में उन्होंने अपने जीवन के अमूल्य बारह साल खपा दिये। शुरु-शुरू में तो लोगों को विश्वास ही नहीं होता था तथा वे सोचते थे कि ऐसे ही पेड़ में फल लटका दिये गये हैं। पर धीरे-धीरे लोगों को सच्चाई का पता चलता गया और अब तो उनके ऐसे पेड़ों की इतनी मांग हो गयी है जिसे पूरा करने मे भी उन्हें पसीना आ जाता है।
कैरी का कहना है कि अपने ग्राहक की पसंद के अनुसार मौसम, मिट्टी इत्यादि को ध्यान मे रख वे पेड़ को तैयार करते हैं। इस तरह के “फलों के सलाद वाले पेड़” बोंसाई तरीके से भी बनाये जा सकते हैं। पेड़ के आकार का फलों के स्वाद पर कोई असर नहीं पड़ता है।

कहिये कैसा लगेगा जब आप एक पेड़ उगायेंगे और उसीसे संतरा, चकोतरा, मौसम्बी आदि इसी जाति के फल पा सकेंगे। या फिर एक पेड़ से आड़ू, खुबानी, आलूबुखारा, बेर जैसे एक जाति के फल ले सकेंगे।

यदि ऐसा "मुह मांगा फल" देने वाला पेड़ लगायें तो मुझे फल भेजना मत भूलियेगा। अधिक जानकारी के लिये वेट दंपति की वेब साईट को भी देखा जा सकता है।

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

आपके साथ भी ऐसा होता है क्या ? (:

* जब आप घर में अकेले हों और नहा रहे हों तभी फ़ोन की घंटी बजती है।

* जब आपके दोनों हाथ तेल आदि से सने हों तभी आपके नाक में जोर की खुजली होती है।

* जब भी कोई छोटी चीज आपके हाथ से गिरती है तो वहाँ तक लुढ़क जाती है जहाँ से उसे उठाना कठिन होता है।

* जब भी आप गर्म चाय या काफ़ी पीने लगते हैं तो कोई ऐसा काम आ जाता है जिसे आप चाय के ठंडा होने से पहले पूरा नहीं कर पाते।

* जब आप देर से आने पर टायर पंचर का बहाना बनाते हैं तो दूसरे दिन सचमुच टायर पंचर हो जाता है।

* जब आप यह सोच कर कतार बदलते हैं कि यह कतार जल्दी आगे बढेगी तो जो कतार आपने छोडी होती है वही जल्दी बढ़ने लगती है।

क्यों -----होता है क्या ? (: (: (:

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

उस्ताद बिस्मिल्ला खां को बालाजी का आशीर्वाद प्राप्त था.

उस्ताद बिसमिल्ला खां, संगीत की दुनिया का एक बेमिसाल फनकार, सुरों का बादशाह। जिन्होंने सिर्फ शादी-ब्याह के मौकों पर बजने वाली शहनाई को एक बुलंद ऊंचाई तक पहुंचा दिया। उन्हीं के जीवन से जुड़ी एक अनोखी और अलौकिक घटना उन्हीं की जुबानी :-

मेरा बचपन मेरे मामू के घर ही बीता था। वही मेरे प्रारंभिक गुरु भी थे। वे घंटों बालाजी के मंदिर में बैठ कर रियाज किया करते थे। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो उन्होंने मुझे भी वहीं बैठ कर सुर साधने का आदेश दिया। मैं भी मंदिर में बिना दिन रात की परवाह किये रियाज करने लगा। इसमें कभी-कभी आधी रात भी हो जाती थी। करीब ड़ेढ-दो साल बाद एक दिन मामू साहब ने मुझे अकेले में बुला कर कहा कि यदि मंदिर में तुम कुछ देखो तो उसका जिक्र किसी से भी नहीं करना। बात मेरी समझ में कुछ आयी कुछ नहीं आयी पर मैं तन-मन से शहनाई पर सुर साधने में लगा रहा। ऐसे ही एक दिन काफी रात हो गयी थी मैं एकाग्रचित हो गहरे ध्यान में डूबा शहनाई बजा रहा था कि अचानक मंदिर एक अलौकिक सुगंध से भर गया। मैं उस सुगंध का ब्यान नहीं कर सकता। मुझे लगा शायद किसी ने गंगा किनारे लोबान आदि जलाया होगा, पर धीरे-धीरे वह सुगंध तेज होती गयी। मेरी आंखें खुल गयीं। मैंने देखा मेरे सामने साक्षात बालाजी खड़े हैं। ठीक मंदिर में लगी तस्वीर के रूप में। मैं पसीने-पसीने हो गया। उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाया और बोले, बेटा बजाओ। मेरी तो घीघ्घी बंध गयी थी। फिर वे मुस्कुराये और अदृश्य हो गये। ड़र के मारे मेरा सारा बदन कांप रहा था। मैं वहीं सब कुछ छोड़-छाड़ कर घर की ओर भागा और मामू को जगा सारी बात बतानी शुरू की ही थी कि उन्होंने कस कर एक थप्पड़ मुझे जड़ दिया और कहा कि तुम्हें मना किया था ना कि कुछ भी घटित हो किसी को मत बताना। फिर उन्होंने मुझे पुचकारा और कभी भी ना घबड़ाने की हिदायत दी।
इसके बाद मैं वर्षों एकांत में शहनाई बजाता रहा और अपने ऊपर बालाजी का आशीर्वाद और मामू के प्यार का एहसास महसूस करता रहा।

आज यह महान आत्मा हमारे बीच नहीं हैं। पर क्या उनके अनुभवों से हम कुछ सीख सकते हैं ?

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

यह सब सच है !!!

* नीलगिरि के जंगलों में पाये जाने वाले गिरगिट की जीभ उसके शरीर की लंबाई से तीन गुनी लंबी होती है।          इसका कद करीब 45 से।मी। होता है जबकि जीभ 1.25 मी. लंबी होती है। अफ्रीका और मेडागास्कर के जंगलों    में पाये जाने वाले गिरगिटों की जीभ तो दो मीटर लंबी पायी गयी हैं।

* पेंसिल को लेड़ पेंसिल के नाम से जाना जाता है, पर वह ग्रेफाइट और चिकनी मिट्टी के मिश्रण से बनती है।

* अंग्रेजों के समय में “कोर आफ गाइड्स” नामक पल्टन के कर्नल ने सबसे पहले खाकी रंग के कपड़ों को              अपनाया था, क्योंकि उसके अनुसार इसे पहन कर जमीन पर लेटा आदमी दूर से नज़र नहीं आ पाता।

* बुड़ापेस्ट, एक नगर नहीं, बल्कि दो शहरों के नाम से मिल कर बना है। ड़ेन्यूब नदी के एक किनारे बुडा तथा        दूसरी ओर पेस्ट नगर बसे हुए हैं।

* इसी तरह बिस्कुट जिसे रोज लाखों लोग खाते हैं, वह भी दो शब्दों से मिल कर बना है। बिस और कुट जो फ्रेंच      भाषा के शब्द हैं, जिनका अर्थ है दो बार पकाया हुआ।

* “ट्रैफिक जाम” आधुनिक युग की देन नहीं है। इसके कारण जूलियस सीजर को भी आदेश पारित करना पड़ा       था कि रोम में दिन के समय कोई पहियेदार वाहन नहीं चलेगा।

रविवार, 13 दिसंबर 2009

कथा का "री मंचन" पर अब सुधार के साथ

मूषकराज ने कहा, देवी मुझे क्षमा करें। सच बहुत कटु होता है। आपकी अस्थिर बुद्धि और चंचल मन सुयोग्य पात्रों को भी नहीं पहचान पाए। मैं तो एक तुच्छ जीव हूँ..........................

कहते हैं ना कि इतिहास अपने आप को दोहराता है, सच मानिये सब कुछ वैसे ही हुआ जैसा वर्षों पहले घटा था बस घटना का अंत जरा बदल गया है। आज कल की नारियों की प्रचंड़ सफलता की आंधी में हमारे इस नायक के फैसले का पता भी नहीं चलना था यदि दंड़कारण्य के बीहड़ जंगलों का दौरा ना किया होता। कहानी पूरानी है पर उसका अंत अप्रत्याशित है।

घूमने का शौक फिर एक बार दंड़कारण्य के जंगलों तक ले आया था। दैवयोग से एक सुबह नदी किनारे एक साधू महाराज के दर्शन हो गये। उनसे कुछ ज्ञान पाने की गरज से मैं उनके साथ हो लिया। उन्होंने मुझसे पिंड़ छुड़ाने की बहुत कोशिश की पर अंत में वे मुझे अपने साथ अपनी कुटिया में ले गये। वहां एक सुलक्षिणी कन्या को देख मैंने, अपनी जिज्ञासा को रोक ना पा, उसका परिचय जानना चाहा। साधू महाराज एक अनजान को कुछ बताने से झिझक रहे थे पर कुछ देर बाद शायद सुपात्र समझ उन्होंने जो बताया वह आश्चर्य जनक था। उन्हीं के शब्दों में पूरी कथा सुनिये............

एक सुबह मैं नदी मे स्नान करने के पश्चात सूर्यदेव को अर्ध्य दे रहा था, तभी आकाशगामी एक चील के चंगुल से छूट कर एक छोटी सी चुहिया मेरी अंजली मे आ गिरी। वह बुरी तरह से घायल थी। मैं उसे अपने आश्रम में ले आया तथा मरहम-पट्टी कर उसे जंगल मे छोड़ देना चाहा पर शायद ड़र के मारे या किसी और कारणवश वह जाने को राजी ही नहीं हुई। मैने भी उसकी हालत देख उसे अपने पास रहने दिया। समय बीतता गया और कब मैं उसे पुत्रीवत स्नेह करने लग गया इसका पता भी नहीं चला और इसी मोहवश एक दिन अपने तपोबल से उसे मानव रूप दे दिया। कन्या जब बड़ी हुई तो उसके विवाह के लिए मैने एक सर्वगुण सम्पन्न मूषक के बारे मे उसकी राय जाननी चाही तो उसने अपनी पसंद दुनिया की सबसे शक्तिशाली शख्सियत को बताया। बहुत समझाने पर भी जब वह ना मानी तो उसे मैने सूर्यदेव के पास भेज दिया, जो मेरी नजर मे सबसे तेजस्वी देवता थे। चुहिया ने उनके पास जा अपनी इच्छा बतायी। इस पर सूर्यदेव ने उसे कहा कि मुझसे ताकतवर तो मेघ है, जो जब चाहे मुझे ढ़क लेता है तुम उनके पास जाओ। यह सुन मुषिका मेघराज के पास गयी और अपनी कामना उन्हें बताई। मेघराज ने मुस्कुरा कर कहा बालिके तुमने गलत सुना है। मुझ से शक्तिशाली तो पवन है जो अपनी मर्जी से मुझे इधर-उधर डोलवाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया ने पवनदेव को जा पकड़ा। पवनदेव ने उसकी सारी बात सुनी और फिर उदास हो बोले कि वह तो सदियों से पर्वत के आगे नतमस्तक होते आए हैं जो उनकी राह में सदा रोड़े अटकाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया मुंह बिचका कर वहां से सीधे पहाड़ के पास आई और उनसे अपने विवाह की इच्छा जाहिर की। अब आज के युग मे छोटी-छोटी बातें तेज-तेज चैनलों से पल भर में दुनिया मे फैल जाती हैं तो पर्वतराज को चुहिया की दौड़-धूप की खबर तो पता लगनी ही थी, वह भी तब जब उनके शिखर पर एक विदेशी कंपनी का टावर लगा हुअ था। सैकड़ों वर्षों पहले की तरह उन्होंने फिर उसे वही बताया कि चूहा मेरे से भी ताकतवर है क्योंकि वह अपने मजबूत पंजों से मुझमे भी छिद्र कर देता है। यह कह उन्होंने अपना पीछा छुड़वाया। इतना सुन चुहिया ने वापस मेरे पास आ चूहे से अपने विवाह की स्विकृति दे दी। मैने मूषकराज को खबर भेजी और यहीं इतिहास भी धोखा खा गया। मूषकराज मेरे घर आए और सारी बातें सुन कर कुछ देर चुप रहे फ़िर बोले देवी क्षमा करें। मैं आपसे विवाह नहीं कर सकता। सच कटू होता है। आपकी अस्थिर बुद्धी तथा चंचल मन, इतने महान और सुयोग्य पात्रों की काबलियत और गुण ना पहचान सके। मैं तो एक अदना सा चूहा हूं। मेरे साथ आपका निर्वाह ना हो सकेगा। इतना कह साधू महाराज उदास हो चुप हो गये। कुछ देर बाद मैने पूछा कि वह आज कल क्या कर रही है। तो ठंड़ी सांस ले मुनि बोले कि लेखिका हो गयी है और पानी पी-पी कर पुरुष वर्ग के विरुद्ध आग उगलती रचनाएं लिखती रहती है।

अब आप सब यह बतायें कि मेरी जंगल यात्रा सफल रही कि नहीं।

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

यहाँ होती है, संसार की सर्वोत्तम भांग की खेती.

मलाणा गाँव, जिसे भारत के बाहर ज्यादा जाना जाता है।
मलाणा, हिमाचल के सुरम्य पर दुर्गम पहाड़ों की उचाईयों पर बसा वह गांव जिसके ऊपर और कोई आबादी नहीं है। आत्म केन्द्रित से यहां के लोगों के अपने रीति रिवाज हैं, जिनका पूरी निष्ठा तथा कड़ाई से पालन किया जाता है, और इसका श्रेय जाता है इनके ग्राम देवता जमलू को जिसके प्रति इनकी श्रद्धा, खौफ़ की हद छूती सी लगती है। अपने देवता के सिवा ये लोग और किसी देवी-देवता को नहीं मानते। यहां का सबसे बडा त्योहार फागली है जो सावन के महिने मे चार दिनों के लिये मनाया जाता है। इन्ही दिनों इनके देवता की सवारी भी निकलती है, तथा साथ मे साल मे एक बार बादशाह अकबर की स्वर्ण प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। कहते हैं एक बार अकबर ने अपनी सत्ता मनवाने के लिये जमलू देवता की परीक्षा लेनी चाही थी तो उसने अनहोनी करते हुए दिल्ली मे बर्फ़ गिरवा दी थी तो बादशाह ने कर माफी के साथ-साथ अपनी सोने की मूर्ती भिजवाई थी। इस मे चाहे कुछ भी अतिश्योक्ति हो पर लगता है उस समय गांव का मुखिया जमलू रहा होगा जिसने समय के साथ-साथ देवता का स्थान व सम्मान पा लिया होगा। सारे कार्य उसी को साक्षी मान कर होते हैं। शादी-ब्याह भी यहां, मामा व चाचा के रिश्तों को छोड, आपस मे ही किए जाते हैं। वैसे तो यहां आठवीं तक स्कूल,डाक खाना तथा डिस्पेंसरी भी है पर साक्षरता की दर नहीं के बराबर होने के कारण इलाज वगैरह मे झाड-फ़ूंक का ही सहारा लिया जाता है।भेड पालन यहां का मुख्य कार्य है, वैसे नाम मात्र को चावल,गेहूं, मक्का इत्यादि की फसलें भी उगाई जाती हैं पर आमदनी का मुख्य जरिया है भांग की खेती। यहां की भांग जिसको मलाणा- क्रीम के नाम से दुनिया भर मे जाना जाता है, उससे बहुत परिष्कृत तथा उम्दा दरजे की हिरोइन बनाई जाती है तथा विदेश मे इसकी मांग हद से ज्यादा होने के कारण तमाम निषेद्धों व रुकावटों के बावजूद यह बदस्तूर देश के बाहर कैसे जाती है वह अलग विषय है।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

यहाँ के लोगों ने कभी कचहरी का दरवाजा नहीं देखा

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। अनोखे लोग, अनोखे रीति-रिवाज, अनोखे स्थल। ऐसी ही एक अनोखी जगह है, हिमाचल की पार्वती घाटी या रूपी घाटी मे 2770मी की ऊंचाई पर बसा गावं "मलाणा"।

विद्वानों के अनुसार यह विश्व का लोकतांत्रिक प्रणाली से चलने वाला सबसे पुराना गावं है। यहां पहुंचने के दो रास्ते हैं, पहला कुल्लू जिले के नग्गर इलाके का एक दुर्गम चढ़ाई और तिक्ष्ण उतराई वाला, जिसका बरसातों मे बहुत बुरा हाल हो जाता है, पर्यटकों के लिये तो खास कर ना जाने लायक। दूसरा अपेक्षाकृत सरल, जो 'जरी' नामक स्थान से होकर जाता है। यहां मलाणा हाइडल प्रोजेक्ट बन जाने से जरी से बराज तक सुंदर सडक बन गयी है, जिससे गाडियां बराज तक पहुंचने लग गयीं हैं। यहां से पार्वती नदी के साथ-साथ करीब 2किमी चलने के बाद शुरू होती है 3किमी की सीधी चढ़ाई, पगडंडी के रूप मे। घने जंगल का सुरम्य माहौल थकान महसूस नहीं होने देता पर रास्ता बेहद बीहड तथा दुर्गम है। कहीं-कहीं तो पगडंडी सिर्फ़ दो फ़ुट की रह जाती है सो बहुत संभल के चलना पड़ता है। पहाडों पर रहने वालों के लिए तो ऐसी चढ़ाईयां आम बात है पर मैदानों से जाने वालों को तीखी चढ़ाई और विरल हवा का सामना करते हुए मलाणा तक पहुंचने मे करीब चार घंटे लग जाते हैं।

कुछ सालों पहले तक यहां किसी बाहरी व्यक्ती का आना लगभग प्रतिबंधित था। चमडे की बनी बाहर की कोई भी वस्तु को गावं मे लाना सख्त मना था। पर अब कुछ-कुछ जागरण हो रहा है,लोगों की आवाजाही बढ़ी है, पर अभी भी बाहर वालों को दोयम नजर से ही देखा जाता है। यहां करीब डेढ सौ घर हैं तथा कुल आबादी करीब पांच-छह सौ के लगभग है जिसे चार भागों मे बांटा गया है। यहां के अपने रीति-रिवाज हैं जिनका पूरी निष्ठा तथा सख्ती के साथ पालन होता है। अपने किसी भी विवाद को निबटाने के लिये यहां दो सदन हैं, ऊपरी तथा निचला। यही सदन यहां के हर विवाद का फ़ैसला करते हैं। यहां के निवासियों ने कभी भी कचहरी का मुंह नही देखा है।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

ये वो हैं जिनके बिना देशों की सुरक्षा दाँव पर लग सकती है.

आज किसी भी देश के लिये उसका गुप्तचर विभाग उसकी सेना का एक आवश्यक अंग बन चुका है। इसके बिना देश की सुरक्षा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हर देश का अपना गुप्तचर संगठन और प्रणाली है। अमेरिका और रूस जैसी बड़ी शक्तियों के बारे में तो अक्सर समाचार आते रहते हैं। इसीलिये उनकी गुप्तचर एजेंसियों का नाम सब को पता रहता है पर अन्य दूसरे देशों के बहुत से ऐसे संगठन हैं जो किसी भी मायने में किसी से कम नहीं हैं। इनमें से कुछ की जानकारी निम्नानुसार है।

सी.आई.ए. :- अमेरिका की यह संस्था दुनिया का सबसे बड़ा गुप्तचर संगठन है। इसका जाल सारे संसार में फैला हुआ है। परन्तु इसके कारण बहुत बार अमेरिका को बदनामी भी सहनी पड़ी है।

के.जी.बी. :- इसका पूरा नाम कामिटेट गोसुदस्त्रवेनाई बीजोपास्तनोस्ती है। इसका मुख्य काम रूस में कम्युनिस्ट शासन को मजबूत बनाना, देश की सीमाओं की देख-रेख तथा विदेशों में गुप्तचरी करना है। करीब दो लाख सदस्यों वाली यह संस्था हर तरह से सी.आई.ए. के समकक्ष है।

डी.जी.आई. :- क्यूबा की इस जासूसी संस्था को रूस की के.जी.बी. की कार्बन कापी माना जाता है। इसके अनेक ऊंचे पदों पर रुसी अधिकारी पदासीन हैं। इसका मुख्य काम अमेरिका समेत उसके सहायक देशों की जासूसी करना है।

सिक्योरिटि इंटेलिजेंस सर्विस :- कनाडा सरकार ने इसका गठन 1981 में किया था। यह “नाटो” की सहायता से अपना काम-काज करती है।

मोस्साद :- इजरायल का यह संगठन अपने आप में एक मजबूत एजेंसी है। इजरायल को सदा युद्धों का सामना करना पड़ता रहा है और उसमें इसकी प्रभावी भूमिका रही है।

सावाक :- ईरान की यह गुप्तचर संस्था कफी बदनाम रही है। 1956 में इसकी नींव सी.आई.ए. और मोस्साद ने मिल कर डाली थी। ईरान के शाह रजा पहलवी का इस पर वरद हस्त था। कहते हैं इसीके जुल्मों के कारण ईरान में क्रान्ति हुई थी।

एम15 और एम16 :- इन दो संगठनों का अस्तित्व ब्रिटेन में 1909 में आया। जहां अमेरिका के साथ मिल कर इन्होंने कफी नाम कमाया वहीं कयी असफलताओं ने इन्हें हंसी का पात्र भी बनाया है।

ए.एस.आई.ओ. :- आस्ट्रेलियन सिक्यूरिटी एंड इंटेलिजेंस आर्गनाइजेशन की नींव शीत युद्ध के दौरान आंतरिक सुरक्षा संगठन के रूप में डाली गयी थी। बाद में इसके दो भाग कर दिये गये। एक को देश में विदेशी जासूसों पर शिकंजा कसने का काम तथा दूसरे को देश में आंतरिक सुरक्षा बनाये रखने की जिम्मेदारी सौंप दी गयी।

रा :- हमारे इस संगठन को कफी सूझ-बूझ से चलाया जाता रहा। पर एक दिन इसको भी राजनैतिक कारणों से सबके सामने आना पड़ा। इसकी भी अपनी बहुत सी उपलब्धियां हैं।

पढने, सुनने देखने में (फिल्मों इत्यादि में) जासूस और उनके कारनामे चाहे कितने भी आकर्षक लगें पर सच्चाई यही है कि यह एक अलग तरह का संसार है। जिसकी अंधेरी सुरंगों से वापस लौटना बहुत मुश्किल होता है। दुनिया की नज़रों से दूर बिना किसी पहचान के, गुप्त जगहों में, गुप्त रह कर, गुप्त योजनाओं को कार्यान्वित करने वाले यह गुप्तचर हर समय कितने तनाव और आशंका में जीते हैं इसका अंदाजा भी आम आदमी नहीं लगा सकता। ऊपर से विड़ंबना यह है कि चाहे कितने भी बड़े काम को ये अंजाम दें, ना तो इनके नाम का किसी को पता चलता है और नही उसका कोई सार्वजनिक पारितोषिक इन्हें मिलता है।

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

नारद मुनि संभवत: गुप्तचरों के सरताज हैं.

सृष्टि के साथ-साथ ही असुरक्षा की भावना भी अस्तित्व में आ गयी होगी। इसीलिये अपने को सुरक्षित रखने के लिये दूसरों के भेद जानने की प्रवृति भी अपने पैर जमाने लग गयी होगी और इसी से इजाद हुई होगी गुप्तचरी की कला।
देखा जाय तो देवताओं की भलाई के लिये सदा तत्पर रहने वाले नारद जी को सबसे पहला गुप्तचर माना जा सकता है। जिन्होंने एक तरह से खुद बदनामी मोल लेकर भी सुरों का भला करना नहीं छोड़ा।

रामायण-महाभारत में भी गुप्तचरों की वृहद जानकारी मिलती है। रावण की कूटनीति में गुप्तचरी को खासा स्थान प्राप्त था। रामायण में उसके विभिन्न गुप्तचरों के नामों का जगह-जगह उल्लेख मिलता है। शुक, सारण, प्रभाष, सरभ तथा शार्दुल उसके प्रमुख गुप्तचर थे। शुक और सारण को ही युद्ध के समय वानर भेष में रामसेना का भेद लेते पकड़ा गया था। उधर विभीषण के लंका के बाहर रहने के बावजूद उनके गुप्तचर लंका में सक्रिय थे जो समय-समय पर उन्हें रावण की गतिविधियों की जानकारी देते रहते थे। श्री राम के लंका विजय के बाद अयोध्या आने पर उनके गुप्तचर भद्रमुख ने ही उन्हें धोबी के कथन की जानकारी दी थी।

महाभारत में तो पग-पग पर गुप्तचारी के कारनामों का उल्लेख मिलता है। धृतराष्ट्र के प्रमुख गुप्तचर का नाम कणिक था। जिससे उसे सारे राज्य की खबरें मिला करती थीं। पांड़वों के अज्ञातवास के दौरान सैंकड़ों गुप्तचर उनका पता लगाने के लिये दुर्योधन ने छोड़ रखे थे। यह गुप्तचरों का ही काम था जो पांडव लाक्षागृह से सकुशल निकल पाये थे। कौरवों को गुप्तचरों द्वारा ही जयद्रथ वध की अर्जुन की प्रतिज्ञा का पता चला था।
महाभारत में शत्रू की सूचना प्राप्त करने के अनेकों उपाय बताये गये हैं। इस काम के लिये साधू, भिक्षुक, नटों, नर्तकियों और अंधे लोगों को उपयुक्त बताया गया है। पर साथ ही साथ संकट काल में इन्हें देश से निर्वासित करने की भी सलाह दी गयी है।
गुप्तचरों के काम की कोई सीमा नहीं होती। जहां संकट के समय इन्हें हर छोटी-बड़ी सूचना अपने अधिकारी को देनी होती है वहीं शांतिकाल में भी राज्य की आंतरिक व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी भी इनकी होती है।

चाणक्य ने तो इस विधा को नयी ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया था। जिसके फलस्वरूप ही चंद्रगुप्त नि:शंक हो अपना राज कर सके।

आज हालत यह है की इंसान तो इंसान जानवर तथा मशीनो का भी उपयोग जासूसी में होने लग गया है। जिसमें शत्रू मित्र का भेद भी ख़त्म हो चुका है। देशों की बात तो दूर अब तो व्यक्तिगत जासूसी आम हो गयी है। यहाँ तक की शादी के पहले भावी वर तथा वधू के आचरण को जानने के लिए लोग गुप्तचरों की सेवा बेहिचक लेने लगे हैं।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

ताजमहल को बचाने, संवारने में इनका भी योगदान रहा है.

ताजमहल के संरक्षण में कईयों का योगदान रहा है अब तक...........
ये तो सभी जानते हैं कि भारत की पहचान बन चुका आगरे का ताजमहल किसने बनवाया, क्यूं बनवाया, कैसे बनवाया, इत्यादि,इत्यादि। परन्तु इसके बनने के बाद इसकी साज-संभाल, देख-रेख कितनों ने की यह शायद सबको मालुम ना हो। इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि इसके बनने के कुछ ही सालों के बाद 1655 में ही इसमें कुछ दरारें उभर आयीं थीं। इसकी जानकारी उसी समय बादशाह औरंगजेब को दी गयी। वह इस तरह के खर्चों से दूर रहता था, झुंझलाने के बावजूद उसने ताज की मरम्मत करवाई।
इसके बाद 1812 में कैप्टन जोसेफ अलेक्जेंडर जो आगरा के एग्जेक्यूटिव इंजीनियर थे, ने इसका रख-रखाव करवाया। फिर दोबारा 1873-74 में ताज की नींव में गड़बड़ी पायी गयी और फिर बड़े पैमाने पर इसकी मरम्मत का काम करना पड़ा था।
फिर आता है 1984 का साल जब श्री महेश चंद्र मेहता ने इसको आस-पास के प्रदूषण से बचाने के लिये मुहिम छेड़ी। जिसके ही कारण 1996 में अदालत ने 292 कारखानों को वहां से हटाने का आदेश पारित कर ताज की उम्र में बढोतरी की। इसी जागरूकता के कारण श्री मेहता को 1997 में मेगसासे एवार्ड से नवाजा गया।
नौ अप्रैल 98 को युनेस्को और पुरातत्व विभाग ने मिल कर ताज के रख-रखाव के लिये एक प्रोजेक्ट तैयार किया।
13-05-1998 सरकार ने एक प्रस्ताव पास कर इसक चारों ओर किसी भी प्रकार के निर्माण पर पाबंदी लगा दी।
सन 2000 में ताज के 500 मीटर के दायरे में किसी भी तरह के वाहन की पार्किंग या आवाजाही पर रोक लगा दी गयी।
22 जून 2002, ताज ग्रुप आफ होटल और पुरातत्व विभाग के द्वारा एक "नेशनल कल्चर फंड़" बनाया गया। जो इसकी देख-रेख और सुविधायें बढाने पर अपना ध्यान देता है।
दिसम्बर 2002 मायावती की सरकार का इसके चारों ओर ताज कारीडोर बनाने के घातक मंसूबे का पर्दाफाश हुआ। पर ऐसा होने के पहले करीब चालीस लाख क्यू. मीटर मिट्टी को जमुना में डाला जा चुका था। पर फिर भी ताज की रक्षा हो ही गयी।
ताजमहल भारत की ही नहीं विश्व की धरोहर बन चुका है। इसके संरक्षण और सुरक्षा की जिम्मेदारी को तो निभाना ही है। साथ-साथ इसका भी ध्यान रखना जरूरी है कि कुदरती प्रदूषण के साथ-साथ घिनौनी नियत वालों की काली नजरों से भी इसका बचाव होता रहे।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

लो, कर लो बात !! दुर्योधन का भी मन्दिर है भाई

हमारे देश में सबसे बड़ा खलनायक माने जाने वाले रावण के समर्थकों का एक अच्छा खासा वर्ग है। वाल्मिकि जी के अनुसार उसमें बहुत सारे गुणों का होना ही उसे कहीं-कहीं पूज्य बनाता है। पर दुर्योधन को तो सदा बुराईयों का पुतला ही माना गया है। पर आश्चर्य की बात है कि उसकी भी पूजा होती है और वह भी भगवान के रूप में।
महाराष्ट्र का अहमदनगर जिला। इसी जिले के एक छोटे से गांव, "दुरगांव", में दुर्योधन का मंदिर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि संपूर्ण भारत में यह इकलौता दुर्योधन का मंदिर है। जिसके प्रति यहां के लोगों में अटूट श्रद्धा है। उनका विश्वास है कि भगवान दुर्योधन उनकी विपत्ति में रक्षा तो करते ही हैं, उनकी मन्नतों को भी पूरा करते हैं।
एक चबूतरे पर बने इस मंदिर का निर्माण तेरहवीं शताब्दी का माना जाता है। इस ऊंचे शिखर वाले मंदिर में दो तल हैं। ऊपर वाले भाग में दुर्योधन की बैठी अवस्था वाली करीब दो फुट की मूर्ती है। नीचे गर्भ गृह में भगवान शिव के दो लिंग विद्यमान हैं। अपनी तरह के इस अनोखे मंदिर की अपनी अनोखी परंपरा भी है। यह मंदिर बरसात के चार महिनों में पूरी तरह बंद (सील बंद) कर दिया जाता है। जिसके पीछे यह धारणा है कि यदि दुर्योधन की दृष्टि बादलों पर पड़ जाएगी तो यहां पानी नहीं बरसेगा। क्योंकि महाभारत में अपनी पराजय के बाद जब दुर्योधन ने एक तालाब में छुपने की कोशिश की थी तो उसके जल ने श्री कृष्ण के ड़र से उसे आश्रय नहीं दिया था। दुर्योधन की वह नराजगी अभी भी बरकरार है। दुर्योधन की नजरें मेघों पर ना पड़ें इसलिये मंदिर को पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। इस मंदिर के इसी क्षेत्र में बनने की भी एक कथा प्रचलित है। बलराम जी अपनी बहन सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे पर श्री कृष्ण ने उसका विवाह अर्जुन से करवा दिया था। इसलिये पांडवों से बदला लेने के लिये दुर्योधन ने भगवान शिव की तपस्या कर उनसे वरदान प्राप्त किया था कि युद्ध में वह कभी भी अर्जुन से परास्त नहीं होगा ना ही अर्जुन उसका वध कर पायेगा। उसने वह तप इसी जगह किया था इसीलिये इस मंदिर का निर्माण यहां किया गया है।
यहां हर सात साल के बाद एक विशाल मेला लगता है, जिसमें आने वाले लोगों को लंगर के रूप में भोजन उपलब्ध करवाया जाता है।

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

गरीब देश की गरीब पार्टी का गरीब नेता, होटल का बिल करोंड़ों का !!!!!

चिकने घड़े पर पानी ठहर भी जाये, किसी ढीठ को उसकी करतूतों का आईना दिखाने पर शर्म आ भी जाये, कुत्ते की पूंछ सीधी हो भी जाय पर हमारे देश में पायी जाने वाली एक खास प्रजाती की फितरत नहीं बदल सकती, चाहे साक्षात भगवान भी आ कर जोर लगा लें। इनके कारनामों पर टनों कागज़ काला हो चुका है पर मजाल है किसी के कान पर जूं भी रेंगी हो। अब तो इनके बारे में लिखना या कुछ बताना भी मुर्खता लगती है। फिर भी कभी-कभी कुछ ऐसी खबरें आती हैं कि लगता है कि उसे ज्यादा से ज्यादा लोग जाने और शायद धौंकनी की फूंक से लोहा भस्म हो ही जाये।
आज एक ऐसे जनता के सेवक की खबर है जो गरीबों की समझी जाने वाली पार्टी का सदस्य बन भारत के भाग्यविधाताओं की जमात में जा बैठा है। यह पार्टी अपने आप को सर्वहारा लोगों की तथा जमीन से जुड़े होने का दम भरती है। अभी कुछ दिनों पहले जब सरकार ने खर्च कम करने की बात की थी तो इस पार्टी की अगुआ ने व्यंग से कहा था कि हमें तो कहने की जरूरत नहीं है, हम तो सदा सादगी में विश्वास रखते हैं। उन के रहन-सहन से लगता भी है कि वह जैसा कहती हैं ,करती भी होंगी। पर कल ही उनके एक साथी को, जो केन्द्र में मंत्री भी बन गये हैं, एक नोटिस जारी किया गया है, पांच सितारा होटल का कमरा खाली करने के लिये, जहां वह पिछले छह माह से कुंड़ली मारे बैठे हैं। ये महाशय पहली बार सांसद बने हैं। इन्हें बंगला भी अलाट हो चुका है पर उसकी सजावट का काम पूरा नहीं हो पाने के कारण ये वहां रह नहीं पा रहे थे।
राजधानी में हर राज्य का अपना आलीशान ‘गेस्ट हाऊस’ होता है। जो किसी भी अच्छे होटल से किसी भी नजर से कम नहीं होता। वहां भी तो रहा जा सकता था। वहां रहने से इनकी इज्जत कम तो नहीं हो जाती उल्टे अपने राज्य में हो सकता है लोगों का विश्वास और बढ जाता। पर माले मुफ्त दिले बेरहम।
अब इन महाशय का होटल का बिल है “सिर्फ 36 करोड़” रुपये का। जिसे चुकाने का आदेश इनकी मुखिया ने इन्हें दिया है। इनका कहना है कि मुझे तो अभी तक कोई बिल मिला ही नहीं है। अब सोचने की बात है कि इतना छोटा-मोटा बिल क्या ये अपनी जेब से चुकायेंगे। और यदि चुकाते हैं तो वह पैसा कहां से आयेगा? क्या इन्होंने अपनी सम्पति का खुलासा किया है?
दूसरी बात अगला छह माह तक ऐश करता रहा तब इनकी मुखिया की नज़र इन पर क्यों नहीं पड़ी?
अब नाम में क्या रखा है।वैसे जिसने यह बात कही है वह भी इस उक्ति के बाद अपना नाम लिखने का लोभ छोड़ ना सका था। :)

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

क्या सचमुच जरुरी है आयोडीनयुक्त नमक ?

ज़रा सोचिये कहीं आप उस आयोडीन की कीमत तो नहीं चुका रहे जो गर्म होते ही वाष्प में बदल जाता है..........
वर्षों से साधारण नमक खाते-खिलाते अचानक हमारी सरकार को एक दिन विदेशी विशेषज्ञों के चेताने से यह ख्याल आया कि अरे! हमारे देश के नागरिक आयोडीन का अंश तो लेते ही नहीं । हड़कंप मच गया रातोंरात हर आम आदमी तक पहुंचने वाले माध्यम से उसे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का काम शुरू कर दिया गया। डरा-डरा कर समझाया गया कि “अब” यदि आयोडीन नामक रोग बचाऊ दवा नहीं लोगे तो ऐसे रोग का शिकार हो जाओगे जिसका इलाज बहुत मुश्किल है। डरना हमारी फितरत है, कोई भी आ कर डरा जाता है, हम डर गये और शुरु हो गया करोंड़ों अरबों का खेल।
इसके लिये नमक को चुना गया जिसे हर आमोखास इंसान अपने काम में लाता ही है। और दौड़ पड़ीं अरबों खरबों का "टर्न ओवर" करने वाली कंपनियां, इस रुपये में दो किलो बिकने वाले नमक को "हेल्थ प्रोडक्ट" बनाने के लिये। विदेशी भी इसी ताक में थे वे भी आ जुटे अपना ताम-झाम लेकर उस गरीब की “सहायता” करने जो नमक के साथ ही सूखी रोटी खा भगवान को दुआ देने लग जाता था।
वर्षों से अपनी सेहत से लापरवह हमें सेहतमंद बनाने की सुध भी उन्हीं अंग्रंजों को ही आयी जिन्होंने सालों हम पर राज कर हमारी “तकलीफों" को करीब से जाना। इतिहासकार “पट्टाभि सीतारमैया जी” के अनुसार, अंग्रेजों के जहाज यहां से माल भर इंग्लैंड जाते थे तो लौटते समय जहाजों का भार बनाए रखने के लिये उनमें रेत भर-भर कर लाई जाती थी। फिर बाद में रेत की जगह नमक लाना शुरु हो गया। अब जब उसके ढेरों के ढेर जमा होने लगे तो उन्होंने यहां के नमक पर पाबंदी लगानी शुरु कर दी। पर इसके विरोध में जन-जन उठ खड़ा हुआ। नमक सत्याग्रह कर दिया गया। अंग्रजों को झुकना पड़ा। पर वह इस सोना उगलने वाली खान को भूल नहीं पाये।
प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला नमक किसी भी तरह सेहत के लिये ठीक नहीं है ऐसा कोई दावा नहीं होने के बावजूद अंततोगत्वा रास्ता निकाल ही लिया गया नमक को आमदनी का जरिया बनाने का। क्योंकि यही एक ऐसा खाद्य पदार्थ था जिसे हर घर की रसोई में स्थान प्राप्त था। हर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब की जरूरत था। किसी भी दूसरी चीज के मुकाबले इसकी खपत कहीं ज्यादा थी। सो नमक में आयोडीन मिला लोगों की सेहत की हिफाजत की तथाकथित मुहिम शुरु कर दी गयी। जबकि वैज्ञानिकों के अनुसार आयोडीन गर्मी पाते ही वाष्प में बदल जाता है। भारत में जहां खाना बनाने की विधी में ज्यादातर तलने, भूनने, सेंकने तथा फिर भोजन में तरह-तरह के मसालों का उपयोग होता हो वहां बेचारा आयोडीन कब तक अपना अस्तित्व बचा कर रख सकता है। अब सोचिये आप उस आयोडीन की कीमत अदा करते हैं जो गर्म होते ही भोजन का साथ छोड़ देता है।
दूसरी बात शोधकर्ता बताते हैं कि हमारे द्वारा उपयोग में लाई जाने वाले फल, सब्जियों और आमिष खाद्यों में भी पर्याप्त मात्रा में आयोडीन होता है। और फिर एक स्वस्थ इंसान को कितना आयोडीन चाहिये, सिर्फ 100-125 माइक्रोग्राम। इसके अलावा बार-बार दुनिया भर से ये जानकारियां सामने आती रही हैं कि आजकल रक्त चाप जैसे रोगों की बढोतरी में इसी आयोडीन मिश्रित नमक का हाथ है। जिसके कारण बहुतेरे देशों में इसकी जरुरत को खारिज भी कर दिया गया है।
जनता के स्वास्थ्य को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित हमारे भाग्यविधाता यह भी भूल गये कि उनके इन सब तमाशों से साधारण नमक की दसियों गुना बढी कीमतों का उन हजारों-लाखों गरीब परिवारों पर क्या असर पड़ेगा जो आज भी नमक और प्याज (उसे भी कहां रहने दिया गया है किसी की हद में) के साथ दो रोटी खा कर अपनी जिंदगी काट रहें हैं। पर उस गरीब की पहले कब फिक्र की गयी थी जो अब की जाती।
अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं जब इसी तरह का खेल सरसों के तेल को ले कर शुरु करने की कोशिश की गयी थी, सिर्फ इसलिये कि "उनके" यहां के सड़ते हुए तेल को यहां खपाया जा सके।
पता नहीं कब चंद लोग अपनी बदनीयति से बाज आ देश की नीयति के बारे में सोचेंगे।

सोमवार, 30 नवंबर 2009

आयोडीन नमक जरूरी है क्या ?

सवाल बहुत देर से उठ रहा है। पर है सोचने लायक। सदियों से साधारण नमक खाते-खाते, क्या सचमुच ही हमें अब आयोडीन की जरूरत आन पड़ी थी?
या यह सब एक सोची समझी साजिश के तहत ही हुआ था और रुपये का दो किलो मिलने वाला नमक आज दस रुपये किलो में लोग लेने को मजबूर कर दिए गए हैं। कुछ समय पहले आप सब को याद होगा, ऐसा ही एक षड्यंत्र सरसों के तेल को लेकर भी रचा गया था। उसी सरसों के तेल को जिसका उपयोग हमारे यहाँ पता नहीं कब से होता आया है और बहुत से परिवारों में तो बना इस तेल के भोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

मनुष्य के शरीर को आयोडीन चाहिए, पर कितना? आप सब के विचार जानना चाहता हूँ। असलियत कल।

रविवार, 29 नवंबर 2009

पढ़ कर देखिए आनन्द आयेगा

एक धर्मोपदेशक घूम-घूम कर लोगों को उपदेश दिया करते थे। ऐसे ही एक दिन वह एक गांव में जा पहुंचे। सारे गांव वाले अपने-अपने खेतों पर काम करने जा चुके थे। सिर्फ एक जना उनको मिला जो उन्हें गांव के पंचायत भवन में ले गया। उन्हें वहां ठहरा कर उस गांव वाले ने उनका परिचय और आने का कारण जाना। संत महोदय कुछ उलझन में थे, वह वहां ज्यादा रुक भी नहीं सकते थे और बिना उपदेश दिये आगे जाना भी उन्हें गवारा नहीं था। उन्हें सोच में पड़ा देख गांव वाले ने उनकी परेशानी का कारण जानना चाहा तो संतजी ने बताया कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप यहां अकेले हो तो मुझे प्रवचन देना चाहिये या नहीं। यह सुन गांव वाला बोला, महाराज मैं तो निपट गंवार आदमी हूं फिर भी इतना जानता हूं कि यदि मैं अपने तबेले में जा कर देखूं कि वहां सिर्फ एक जानवर के सिवा सारे पशु भाग गये हैं तो भी मैं उस जानवर को चारा जरूर दूंगा? संतजी की दुविधा दूर हो गयी और वे पूरे तीन घंटे तक अपना उपदेश देते रहे। फिर अपनी बात खत्म कर उन्होंने अपने एक मात्र श्रोता से पूछा, हां भाई कैसा रहा आज का प्रवचन?
गांव वाले ने तुरंत जवाब दिया, महाराज मैने तो पहले ही आप से कहा था कि मैं तो निपट गंवार इंसान हूं इतनी ज्ञान की बातें मुझे कहां पता। फिर भी इतना तो मुझे पता है कि अपने तबेले में जा कर देखूं कि वहां एक को छोड़ सारे जानवर भाग गये हैं तो उसे मैं उसी का चारा दूंगा, सारे जानवरों की घास उसी अकेले को ही नहीं खिला दूंगा।

शनिवार, 28 नवंबर 2009

सुमधुर ध्वनि बिखेरती अद्भुत चट्टाने

राजस्थान की सुप्रसिद्ध पर्वत माला अरावली।
बांसवाड़ा जिले से करीब बीस कि.मी. की दूरी पर इसी पर्वतमाला के उपर स्थित है माता नन्दिनी देवी का मंदिर। इसी मंदिर की पिछली तरफ हैं चार चट्टानें। जो प्रकृति का एक अद्भुत करिश्मा हैं।
पर्वत शिखर पर च्ट्टानें तो बहुत सारी बिखरी पड़ी हैं। पर यह चार शिलाखंड़ अपने आप में अद्भुत विलक्षणता समेटे हैं। इसे प्रकृति का अनोखा करिश्मा समझें या कुछ और क्योंकि ये चट्टाने अपने आस-पास की चट्टानों से बिल्कुल अलग हैं। इनकी खासियत है कि यदि इन पर किसी चीज से प्रहार किया जाय तो इनमें से अलग-अलग तरह की खनकने की ध्वनि निकलती है। ऐसा लगता है जैसे किसी धातु के बने पिंड़ पर चोट की जा रही हो। एक तरफ जहां इनमें से एक चट्टान के स्वरुप ने वर्षों से तरह-तरह के मौसमों के कारण एक गोलाकार शिवलिंग का आकार ले लिया है, जिस पर यहां आने वाले श्रद्धालुओं ने इसको दैविय प्रतीक मान पूजा-अर्चना करनी शुरु कर दी है, तो वहीं दूसरी तरफ यहां आने वाले लोगों को घंटों इन चट्टनों को वाद्य यंत्रों की तरह प्रयोग कर भजन, गीत गाते देखा सुना जा सकता है। इन चट्टानों को लेकर तरह-तरह के मत हैं। कुछ कहते हैं कि इनमें किसी धातु की अत्यधिक मात्रा मिली हुई है जिस कारण यह खनक भरी ध्वनि उत्पन्न करती हैं तो किसी की राय में इनका खोखला होना इस तरह की मधुर ध्वनि उत्पन्न करने का कारण है। कुछ इन्हें उल्का पिंड़ मानते हैं क्योंकि सिर्फ यह चार चट्टानों से ही मधुर ध्वनि नकलती है आसपास की बाकि चट्टानें आम शिलापिंडों जैसी ही हैं।

प्रकृति की इस अद्भुत देन के अनबूझे रहस्य से फिलहाल तो पर्दा नहीं उठा है पर प्रयास जारी हैं।

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

"ताजमहल" नाम है स्वाभिमान, गौरव तथा आस्था का. इसीलिए ठीक एक साल पहले......

"ताज महल" सिर्फ एक होटल ही नहीं है, अब वह स्वाभिमान, गौरव तथा आस्था का प्रतीक बन चुका है। शायद इसीलिए ठीक एक साल पहले...................................

बंबई , रात धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। ऐसे में दो भद्र पुरुष बातें करते करते रात के भोजन के लिये पर्क के अपोलो होटल की ओर बढ रहे थे। जब वे होटल के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो द्वारपाल ने उनमें से एक को इंगित करते हुए कहा, महोदय आपके मित्र का स्वागत है, पर मुझे खेद है कि आप अंदर नहीं जा सकते। जिसे मना किया गया था वह थे जमशेदजी टाटा और उन्हें रोकने का कारण था उस होटल में युरोपियन के सिवा और किसी को प्रवेश नहीं देने का प्रावधान।

उसी क्षण जमशेदजी ने निर्णय लिया कि वह अपने इसी शहर में एक ऐसा होटल बनायेंगे जो संसार के सर्वश्रेष्ठ होटलों में से एक होगा। जिसमें किसी तरह की रोक-टोक नहीं होगी। जिसमें आम इंसान भी बिना विदेश गये विदेशी भव्यता का अनुभव कर सकेगा। हालांकि उन्हें इस व्यवसाय का कोई अनुभव नहीं था। पर जो ठान लिया सो ठान लिया। उन्होंने अपोलो बंदर के पास जमीन खरीद कर होटल, जिसका नाम उन्होंने ताजमहल रखा था, का निर्माण शुरु करवा दिया। उन्होंने सोच रखा था कि इस इमारत की हर बात अनोखी होगी। अनोखा रंग, अनोखा ढंग, अनोखी साज-सज्जा, अनोखा कला संग्रह। शुरुआत भी हुई 40 फिट की नींव से, जो उस जमाने में हैरत की बात थी। अंतत: 1903 में सत्रह मेहमानों के साथ होटल "ताजमहल" का विधिवत उद्घाटन संम्पन्न हुआ।
जमशेद जी ने अपने इंजीनियरों को हिदायत दे रखी थी कि होटल का शिल्प ऐसा होना चाहिये कि उसके हर कमरे में समुद्री वायु आराम से परवाज कर सके। साथ ही हर कमरे में रहने वाले को समुद्र के बिल्कुल करीब होने का एहसास हो। सचमुच ताज की खिड़की में खड़े होने पर यही एहसास होता है जैसे हाथ बढा कर सागर को छुआ जा सकता हो। हर कमरे से समुद्र अपनी भव्यता के साथ नज़र आता है। जमशेदजी की दूरदर्शिता इसी से जानी जा सकती है कि उन्होंने भविष्य में सागर की ओर होने वाली भीड़-भाड़ को ध्यान में रख ताज का मुख्य द्वार पीछे की ओर बनवाया था। उनके लिये यह पैसा कमाने का जरिया ना होकर देश की धरोहर का ख्याल ज्यादा था। जहां हर देश वासी बेरोकटोक आ सके। वे जब भी विदेश जाते वहां ताज को ही ध्यान में रख खरीदारी करते। उन्होंने पैसे की परवाह किये बगैर ऐसी-ऐसी चीजें वहां से भारत भेजीं जिनका नाम भी यहां ना सुना गया था। जिनमें एक बिजली का जेनेरेटर भी था। उस समय बंबई में बिजली की रौशनी वाली यह पहली इमारत थी। इसको बाहर से देखने के लिये ही दूर-दूर से लोग आते थे। इसके बनने और शुरु होने के बाद भी बहुत सारी अड़चनों का सामना जमशेद जी को करना पड़ा था। बहुतेरी बार इसकी आमदनी बिल्कुल ना के बराबर हो गयी थी। और कोई होता तो वह इसे बेचने का फैसला कर चुका होता पर यह जमशेदजी ही थे जो इसे भारत का ताज बनाना चाहते थे इसे बेचने का ख्याल उन्हें सपने में भी नहीं आया। उस समय जब संचार व्यवस्था ना के बराबर थी उन्होंने विदेशों के यात्रा एजेंटों से संपर्क बनाये रखा, फिर एक समय ऐसा आया कि विदेश से आने वाले पर्यटक की लिस्ट में यहां ठहरने का कार्यक्रम वरीयता सूची में होने लगा।

विदेशों में आज भारत के दो ताजमहलों की अपनी पहचान है। एक नारी के सम्मान का प्रतीक है तो दूसरा शहर के गौरव का प्रतीक।

आज सौ से ज्यादा उपन्यासों, यात्रा विवरणों आदि में ताज का उल्लेख मिलता है। विश्व की जानी-मानी हस्तियां यहां आकर भारतीय सत्कार का आनंद ले चुकी हैं। सातवें दशक में इसी का एक और नया भाग ‘ताज इंटकांटिनेंटल’ भी बन कर तैयार हो गया था। अब तो ताज की श्रृंखला पूरे देश में फैलती जा रही है।
ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

बुधवार, 25 नवंबर 2009

ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

बंबई , रात धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। ऐसे में दो भद्र पुरुष बातें करते करते रात के भोजन के लिये पर्क के अपोलो होटल की ओर बढ रहे थे। जब वे होटल के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो द्वारपाल ने उनमें से एक को इंगित करते हुए कहा, महोदय आपके मित्र का स्वागत है, पर मुझे खेद है कि आप अंदर नहीं जा सकते। जिसे मना किया गया था वह थे जमशेदजी टाटा और उन्हें रोकने का कारण था उस होटल में युरोपियन के सिवा और किसी को प्रवेश नहीं देने का प्रावधान। उसी क्षण जमशेदजी ने निर्णय लिया कि वह अपने इसी शहर में एक ऐसा होटल बनायेंगे जो संसार के सर्वश्रेष्ठ होटलों में से एक होगा। जिसमें किसी तरह की रोक-टोक नहीं होगी। जिसमें आम इंसान भी बिना विदेश गये विदेशी भव्यता का अनुभव कर सकेगा। हालांकि उन्हें इस व्यवसाय का कोई अनुभव नहीं था। पर जो ठान लिया सो ठान लिया। उन्होंने अपोलो बंदर के पास जमीन खरीद कर होटल, जिसका नाम उन्होंने ताजमहल रखा था, का निर्माण शुरु करवा दिया। उन्होंने सोच रखा था कि इस इमारत की हर बात अनोखी होगी। अनोखा रंग, अनोखा ढंग, अनोखी साज-सज्जा, अनोखा कला संग्रह। शुरुआत भी हुई 40 फिट की नींव से, जो उस जमाने में हैरत की बात थी। अंतत: 1903 में सत्रह मेहमानों के साथ होटल "ताजमहल" का विधिवत उद्घाटन संम्पन्न हुआ।
जमशेद जी ने अपने इंजीनियरों को हिदायत दे रखी थी कि होटल का शिल्प ऐसा होना चाहिये कि उसके हर कमरे में समुद्री वायु आराम से परवाज कर सके। साथ ही हर कमरे में रहने वाले को समुद्र के बिल्कुल करीब होने का एहसास हो। सचमुच ताज की खिड़की में खड़े होने पर यही एहसास होता है जैसे हाथ बढा कर सागर को छुआ जा सकता हो। हर कमरे से समुद्र अपनी भव्यता के साथ नज़र आता है। जमशेदजी की दूरदर्शिता इसी से जानी जा सकती है कि उन्होंने भविष्य में सागर की ओर होने वाली भीड़-भाड़ को ध्यान में रख ताज का मुख्य द्वार पीछे की ओर बनवाया था। उनके लिये यह पैसा कमाने का जरिया ना होकर देश की धरोहर का ख्याल ज्यादा था। जहां हर देश वासी बेरोकटोक आ सके। वे जब भी विदेश जाते वहां ताज को ही ध्यान में रख खरीदारी करते। उन्होंने पैसे की परवाह किये बगैर ऐसी-ऐसी चीजें वहां से भारत भेजीं जिनका नाम भी यहां ना सुना गया था। जिनमें एक बिजली का जेनेरेटर भी था। उस समय बंबैइ में बिजली की रौशनी वाली यह पहली इमारत थी। इसको बाहर से देखने के लिये ही दूर-दूर से लोग आते थे। इसके बनने और शुरु होने के बाद भी बहुत सारी अड़चनों का सामना जमशेद जी को करना पड़ा था। बहुतेरी बार इसकी आमदनी बिल्कुल ना के बराबर हो गयी थी। और कोई होता तो वह इसे बेचने का फैसला कर चुका होता पर यह जमशेदजी ही थे जो इसे भारत का ताज बनाना चाहते थे इसे बेचने का ख्याल उन्हें सपने में भी नहीं आया। उस समय जब संचार व्यवस्था ना के बराबर थी उन्होंने विदेशों के यात्रा एजेंटों से संपर्क बनाये रखा, फिर एक समय ऐसा आया कि विदेश से आने वाले पर्यटक की लिस्ट में यहां ठहरने का कार्यक्रम वरीयता सूची में होने लगा। आज सौ से ज्यादा उपन्यासों, यात्रा विवरणों आदि में ताज का उल्लेख मिलता है। विश्व की जानी-मानी हस्तियां यहां आकर भारतीय सत्कार का आनंद ले चुकी हैं। सातवें दशक में इसी का एक और नया भाग ‘ताज इंटकांटिनेंटल’ भी बन कर तैयार हो गया था। अब तो ताज की श्रृंखला पूरे देश में फैलती जा रही है।
ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

ये भी खूब रही :) :) :)

एक कबीले के मुखिया के मर जाने पर उसके शहर से आये बेटे को मुखिया बना दिया गया। ठंड आने के पहले कबीले वाले उसके पास गये और पूछा कि इस बार कैसी ठंड पड़ेगी? कबीले के मुखियों को पीढी दर पीढी से चले आ रहे तजुर्बों से आने वाले मौसम इत्यादि की जानकारी होना आम बात थी। अब जवान मुखिया को इतना तजुर्बा तो था नहीं ना ही उसने इस तरह की बातें अपने बुजुर्गों से सीखी थीं। उसने ऐसे ही कह दिया कि ठीक-ठाक सर्दी पड़ेगी। आप लोग लकड़ियां इकठ्ठी कर लो। कह तो दिया पर फिर भी कुछ अंदाज लेने के लिये वह मौसम विभाग चला गया, वहां उसने पूछा कि इस बार सर्दी कैसी होगी? उन्होंने कहा ठीक-ठाक ही पड़ेगी। लौट कर उसने अपने लोगों से और लकड़यां एकत्र करने को कह दिया। हफ्ते दस दिन बाद फिर अपनी बात सुनिश्चित करने के लिये मुखिया मौसम विभाग गया और पूछा, क्या कहते हैं आप लोग ठंड पड़ेगी ना? वहां से जवाब मिला एकदम पक्की पड़ेगी। लड़के ने वापस आ अपने लोगों को और लकड़ियां एकत्र करने को कह दिया। पर मन ही मन वह अपनी अनभिज्ञता से घबड़ाया हुआ भी था कि कहीं मेरी बात गलत हो गयी तो लोग क्या कहेंगे। सो एक बार फिर वह मौसम विभाग पहुंच गया और बोला, आपकी खबर सर्दी के बारे में पक्की है ना? वहां के अफसर ने जवाब दिया, पक्की? अरे, इस बार रेकार्ड़ तोड़ सर्दी पड़ेगी। युवा मुखिया ने चकित हो पूछा, आप इतने विश्वास के साथ कैसे कह रहे हैं?क्योंकि कबीले वाले पागलों की तरह अंधाधुन लकड़ियां इकठ्ठी किये जा रहे हैं भाई, इससे बड़ा प्रमाण और क्या चाहिये।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

बिना इन्टरनेट के हिंदी लिखने में सहायता करें

आज मुझसे सुश्री नेहा जी, जो अपना ब्लाग शुरु करना चाहती हैं, ने ई मेल द्वारा, बिना इंनटरनेट हिंदी लिख सकने की जानकारी चाही है। मेरी आप सब से गुजारिश है कि ऐसा सबसे सरल तरीका बताने का कष्ट करें, जिसमें सारे के सारे हिंदी के शब्द (संयुक्ताक्षर वगैरह) आसानी से लिखे जा सकें। जिससे हिंदी ब्लाग परिवार में एक और नया सदस्य शामिल हो सके।

रविवार, 22 नवंबर 2009

इंसान की भूल की अनोखी सजा भुगतती एक कब्र

मध्य प्रदेश के इटावा-फ़र्रुखाबाद मार्ग पर जुगराम जी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। उसी के पास जरा सा आगे जाने पर एक मकबरा है जो अपने नाम और खुद से जुड़ी प्रथा के कारण खासा मशहूर है। इसे 'चुगलखोर के मकबरे' के नाम से जाना जाता है और प्रथा यह है कि यहां से गुजरने वाला हर शख्स इसकी कब्र पर कम से कम पांच जूते मारता है। क्योंकि यहां के लोगों में ऐसी धारणा है कि इसे जूते मार कर आरंभ की गयी यात्रा निर्विघ्न पूरी होती है।

ऐसा क्यों है इसकी कोई निश्चित प्रामाणिकता तो नहीं है पर जैसा यहां के लोग बताते हैं कि बहुत पहले इस विघ्नसंतोषी, सिरफिरे इंसान ने अपने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये दो राजाओं को आपस में गलत अफवाहें फैला कर लड़वा दिया था। वह तो युद्ध के दौरान ही सच्चाई का पता चल गया और व्यापक जनहानि होने से बच गयी। इसे पकड़ मंगवाया गया और मौत की सजा दे दी गयी। पर ऐसा नीच कृत्य करने वाले को मर कर भी चैन ना मिले इसलिये उसका मकबरा बनवा कर यह फर्मान जारी कर दिया गया कि इधर से हर गुजरने वाला इस कब्र पर पांच जूते मार कर ही आगे जायेगा। जिससे भविष्य में और कोई ऐसी घिनौनी हरकत ना करे।

है ना अनोखी सजा! जो ना जाने कब से दी जा रही है और ना जाने कब तक दी जाती रहेगी।

शनिवार, 21 नवंबर 2009

कोई भी देश भूगोल में बाद में टूटता है, पर पहले उसे दिमाग में तोड़ा जाता है

करीब बीस साल पहले श्री बालकवि बैरागीजी ने, जो उस समय संसद सदस्य थे, चेताया था कि भाषा के साथ-साथ बोलियों का एक दुराग्रह तैयार किया जा रहा है। इससे सावधान रहने की जरूरत है। यह एक बहुत लंबी मार करने वाली साजिश है, देश तोड़ने की। उन्होंने इस षड़यंत्र की कार्यप्रणाली का भी खुलासा किया था। उनके अनुसार, भारत विरोधी अभियान के तहत उन महानुभावों को, उनके जाने अनजाने, शामिल कर लिया जाता है जो भाषा शास्त्र पर शोध आदि कर रहे होते हैं। उन्हें विदेश भ्रमण करवा, फैलोशिप वगैरह दिलवा कर और उनके लेखों आदि को बड़े पैमाने पर छपवाने का प्रलोभन दिया जाता है। यह काम होता है भारत के विभिन्न अंचलों में बोली जाने वाली आंचलिक बोलियों पर शोध एवं अनुसंधान के नाम पर। हमारे यहां वैसे ही हजारों बोलियां तथा उपबोलियां हैं जिनको लेकर आये दिन आंदोलन खड़े किए जाते रहते हैं। बात बिगड़ती जाती है। इसी को लेकर विदेशी कूटकर्मियों ने भारत के नक्शे में बोलियों के आधार पर सैंकड़ों दरारें ड़ाल दी हैं। बोलियों के अंचलों को रेखांकित कर भारत के टुकड़े नक्शों में कर दिये हैं। पहले भाषा के नाम पर लड़ता झगड़ता देश अब बोलियों के लिये उलझने लगा है। इसके लिये कितना विदेशी पैसा बरसात की तरह बरसाया जा रहा है उसकी कल्पना भी आम आदमी नहीं कर सकता।
पता नहीं हमारी आंख कब खुलेगी। देश का एक बहुत बड़ा तथाकथित बुद्धिवादी वर्ग आंखें बंद किए बैठा है। बोलियों के दायरे बहुत छोटे पर अत्यंत संवेदनशील होते हैं। यह सब सोचा समझा षड़यंत्र है भारत को छोटा और छोटा कर कमजोर करने का। कोई भी देश भूगोल में बाद में टूटता है पर पहले दिमाग में टूटता या तोड़ा जाता है। एक बार दिमाग में टूटन आ जाये तो फिर वह बाहर भी आकार लेना शुरु कर देती है। पर बीस साल पहले चेताने के बावजूद क्या हम चेत पाये हैं।
अपने व्यक्तिगत बैर के बदले को लोग कैसे अलग रंग देते हैं, देखिये भास्कर के श्री राजकुमार केसवानीजी द्वारा दी गयी एक जानकारी के द्वारा :-
1916 में लहौर के एक फोकटिया तथाकथित पत्रकार, लालचंद, को जब एक नाटक का टिकट मुफ्त में ना देकर उपकृत नहीं किया गया तो उन महाशय ने पूरी नाटक मंडली के विरुद्ध विष वमन करना शुरु कर दिया और उसका मुख्य निशाना बनी नाटक की नायिका, मिस गौहर, जो कि नाटक में सीता का किरदार निभा रही थी। लालचंद ने लोगों की भावनाओं को उभाड़ने के लिये लिख मारा कि मुस्लिम औरत का सीता बनना कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। नतीजा लालचंद के मन मुताबिक ही हुआ, थियेटर पर हमला कर जबर्दस्त नुक्सान किया गया। कंपनी के मालिक कवास जी की सदमे से मौत हो गयी।

जब पैसा आता है, तो दिमाग कहाँ चला जाता है ?

पैसा, शोहरत या सत्ता के आते ही उससे मिली ताकत को लोग संभाल नहीं पाते। पता नहीं दिमाग में कैसा "लोचा" आ जाता है कि वह अजीबोगरीब हरकतें करवाने लग जाता है। इस तरह मिले मद को पचा नहीं पाता। शोहरतिये की तो छोड़िये उसके साथ के लगे-बंधे ही अपने आप को दूसरी दुनिया का समझने लगते हैं। उनके और उनके चाहने वालों के बारे में अखबारों में अक्सर कुछ ना कुछ छपता रहता है, वहीं से कुछ "नमूने" देखिये :-
एक मंत्रीजी हवाई दौरे पर थे। एक जगह नीचे उन्हें कुछ लोग नज़र आए तो उन्होंने वहीं अपना हेलीकाप्टर उतरवाने की जिद की। चालक के लाख समझाने पर भी उन पर कोई असर नहीं हुआ, तो सबकी जान जोखिम में डाल खेतों में काप्टर उतारना पड़ा। लदा हुआ इंसान जनता का सेवक जो था।

एक ऐसे ही सेवक के लिये उनके पिच्छलगू हाथी ही ले आये थे, हेलीपैड तक। पायलट पर क्या बीती होगी।

एक बार अपने आराध्य महोदय के लिये उनके चमचों ने हेलीपैड पर कालीन ही बिछा दिया था, कि कहीं प्रभू के पैर गंदे ना हो जायें (मन का क्या है) वह तो चालक ने दूर से देख लिया नहीं तो कालीन ने धरा का भार कुछ हल्का कर ही देना था।

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में ही धन मति फेर देता हो, दुनिया भर में ऐसे असंयमियों के किस्से सुने जा सकते हैं।
स्पेन में सागर के सामने खड़े एक भव्य होटल में एक भद्र पुरुष को समुंद्र की आवाज से इतनी परेशानी हुई कि उन्होंने वहां के स्टाफ को बुला उसकी आवाज बंद करवाने का आदेश दे डाला।

स्पेन में ही एक सज्जन को अपने होटल का बिस्तर कुछ ऊंचा लगा तो उन्होंने पलंग के पाये ही कटवाने का हुक्म दे दिया। यह अलग बात है कि प्रबंधन ने शालिनता से ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

एक पाव भर की रजाई, ठण्ड दूर रखने का हल्का-फुल्का साधन

सर्दी की दस्तक के साथ-साथ गर्म कपड़े, कंबल और रजाईयां भी आल्मारियों से बाहर आने को आतुर हो रहे हैं। रजाई का नाम सुनते ही एक रूई से भरे एक भारी-भरकम कपड़े का ख्याल आ जाता है, जो जाड़ों में ठंड रोकने का आम जरिया होता है। पहाड़ों में तो चार-चार किलो की रजाईयां आम हैं ज्यादा सर्दी या बर्फ पड़ने पर तो बजुर्गों या अशक्त लोगों को दो-दो रजाईयां भी लेनी पड़ती हैं। अब सोचिये इतना भार शरीर पर हो तो नींद में हिलना ड़ुलना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कोई पाव भर भार वाली रजाई से ठंड दूर करने की बात करे तो अजीब सा लगेगा। पर पुराने समय में राजा-महाराजाओं के वक्त में राज परिवार के लोग कैसे ठंड से बचाव करते होंगे। ठीक है सर्दी दूर करने के और भी उपाय हैं या थे, पर ओढने के लिये कभी न कभी, कुछ-न कुछ तो चाहिये ही होता होगा। अवध के नवाबों की नजाकत और नफासत तो जमाने भर में मशहूर रही है। उन्हीं के लिये हल्की-फुल्की रजाईयों की ईजाद की गयी। ये खास तरह की रजाईयां, खास तरीकों से, खास कारीगरों द्वारा सिर्फ खास लोगों के लिये बनाई जाती थी। जिनका वजन होता था, सिर्फ एक पाव या उससे भी कम। जी हां एक पाव की रजाई पर कारगर इतनी कि ठंड छू भी ना जाये। धीरे-धीरे इसके फनकारों को जयपुर में आश्रय मिला और आज राजस्थान की ये राजस्थानी रजाईयां दुनिया भर में मशहूर हैं।

इन हल्की रजाईयों को पहले हाथों से बनाया जाता था। जिसमें बहुत ज्यादा मेहनत, समय और लागत आती थी। समय के साथ-साथ बदलाव भी आया। अब इसको बनाने में मशीनों की सहायता ली जाती है। सबसे पहले रुई को बहुत बारीकी से अच्छी तरह साफ किया जाता है। फिर एक खास अंदाज से उसकी धुनाई की जाती है, जिससे रूई का एक-एक रेशा अलग हो जाता है। इसके बाद उन रेशों को व्यव्स्थित किया जाता है फिर उसको बराबर बिछा कर कपड़े में इस तरह भरा जाता है कि उसमें से हवा बिल्कुल भी ना गुजर सके। फिर उसकी सधे हुए हाथों से सिलाई कर दी जाती है। सारा कमाल रूई के रेशों को व्यवस्थित करने और कपड़े में भराई का है जो कुशल करीगरों के ही बस की बात है। रूई जितनी कम होगी रजाई बनाने में उतनी ही मेहनत, समय और लागत बढ जाती है। क्योंकि रूई के रेशों को जमाने में उतना ही वक्त बढ जाता है।
छपाई वाले सूती कपड़े की रजाई सबसे गर्म होती है क्योंकि मलमल के सूती कपड़े से रूई बिल्कुल चिपक जाती है। सिल्क वगैरह की रजाईयां देखने में सुंदर जरूर होती हैं पर उनमें उतनी गर्माहट नही होती। वैसे भी ये कपड़े थोड़े भारी होते हैं जिससे रजाई का भार बढ जाता है।

तो अब जब भी राजस्थान जाना हो तो पाव भर की रजाई की खोजखबर जरूर लिजिएगा।

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

दादा जी, अब भाग लो (:

बहुत बार ऐसा हुआ है कि अकेले बैठे यादों की जुगाली करते अचानक कोई बात याद आ जाती है और बरबस हंसी फूट पड़ती है। ऐसा ही एक वाक्या है जो याद आते ही हंसी ला देता है चेहरे पर। सारा खेल उसमें भाषा का है, हिंदी और बंगला का घालमेल। बहुत बार इच्छा हुई उसे आपस में बांटने की पर उसका मजा थोड़ी बहुत बंगला जानने वाले ले सकते हैं नहीं तो भाषा अमर्यादित सी लगती है। इसी से संकोचवश निर्मल हास्य से वंचित रह जाना पड़ता है। आज भी पूरा लिख ड़ाला था पर फिर आने वाले दिनों पर टाल दिया। उसके बदले यह खानापूर्ती सही -


एक छोटा सा बच्चा एक घर के दरवाजे की घंटी बजाने की काफी देर से कोशिश कर रहा था, पर उसका हाथ घंटी तक नहीं पहुंच पा रहा था। एक बुजुर्ग उधर से निकले और यह सोच कि शायद उसे अंदर जाना है, उसकी सहयता करने के लिये उन्होंने घंटी बजा दी, और बच्चे की तरफ देख बोले, अब ठीक है?
बच्चा बोला, हां, पर अब भाग लो !

सोमवार, 16 नवंबर 2009

कौन था वह? लार्ड कर्जन को मारना चाहता था या बचाना ?

दो-तीन दिन पहले अवधिया जी तथा भाटिया जी की पोस्टों को देख कर वायसराय लार्ड कर्जन के जीवन में घटी कुछ अजीबोगरीब घटनाओं के बारे मे पढा हुआ याद आ गया।


सन 1899 मे लार्ड कर्जन वायसराय बन कर भारत आए तो बीकानेर के महाराजा के निमंत्रंण पर वे राजस्थान के दौरे पर बीकानेर पहुंच गये। उन्हें वैसे भी राजस्थान से कुछ ज्यादा ही लगाव था। उनके वहां पहुंचने पर महाराजा ने उनके सम्मान में एक भव्य भोज का इंतजाम किया था। भोज का कार्यक्रम देर रात तक चलता रहा। उसके बाद कर्जन सीधे सोने चले गये। उस दिन पूर्णमासी की रात थी। अचानक किसी अजीबोगरीब हलचल या आवाज से उनकी नींद टूट गयी। वे खिड़की पर जा खड़े हुए तो उन्हें बागीचे में कुछ लोग नजर आये, जो सफेद कपड़े पहने एक ओर चले जा रहे थे। उन सब के पीछे कुछ दूरी पर एक आदमी अपने सिर पर एक बड़ा सा संदूक उठाए चल रहा था। किसी का भी चेहरा साफ नजर नहीं आ रहा था। सब जने तो बाग से निकल गये पर वह संदूक वाला आदमी पीछे रह गया। जब खिड़की के पास से वह गुजरने लगा तो कर्जन ने देखा कि उसके सर पर संदूक ना हो कर एक ताबूत था। आश्चर्यचकित हो उन्होंने आवाज लगाई कि ठहरो, कौन हो तुम ? इतना सुनते ही वह आदमी रुका और धीरे से अपने चेहरे से ताबूत को थोड़ा सा हटा ऊपर देखने लगा। पूरे चांद की रोशनी में सब कुछ साफ नजर आ रहा था। वायसराय ने जो देखा उससे उनका खून जम सा गया। उन्होंने अपनी जिंदगी में इतना खौफनाक चेहरा कभी नहीं देखा था। तभी उस आदमी के चेहरे पर एक अजीब सी डरावनी वीभत्स हंसी उभर आयी और वह हंसता हुआ एक कोने में जा गायब हो गया। कर्जन ने तुरंत द्वारपालों को दौड़ाया पर कहीं भी किसी के होने का कोई निशान नहीं था। महाराजा को भी इसकी खबर दी गयी। उस पूरी रात और दूसरे दिन सारे बीकानेर का चप्पा-चप्पा छान मारा गया, आस-पास के सभी इलाकों में भी वैसे चेहरे वाले की खोज की गयी पर सब बेकार।

हांलाकि कर्जन इस बात को धीरे-धीरे भूल गये थे। पर बात यहीं खत्म नहीं हुए थी। होनी अभी भी अपना खेल दिखाने को तैयार बैठी थी। कुछ सालों के बाद सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें पेरिस में आयोजित एक समारोह में भाग लेने जाना पड़ा था। “प्लेस ला दूर्त” में उस दिन बहुत ज्यादा गहमा-गहमी थी। महलों जैसे उस भवन की चौथी मंजिल पर सम्मेलन का आयोजन किया गया था। सरी लिफ्टों में लंबी-लंबी लाईनें लगी हुए थीं। खास लोगों की लिफ्ट के पस जब कर्जन पहुंचे तो वहां मौजूद लोगों ने सौजन्यवश उनसे आग्रह किया कि वह पहले जा कर सम्मेलन में शरीक हो जायें। कर्जन ने उनलोगों को धन्यवाद देते हुए लिफ्ट की ओर कदम बढये ही थे कि उन्हें अंदर सिर झुकाए कोई बैठा नजर आया। इनके पास पहुंचते ही उसने अपना सिर धीरे से उठाया तो कर्जन को तुरंत वह चेहरा याद आ गया जो सालों पहले उन्होंने बीकानेर के महल के उद्यान में ताबूत उठाये देखा था। यकीनन ही यही था वह इंसान, पर हज़ारों मील दूर यहां कैसे? उनके सारे शरीर में ठंडी लहर की झुनझुनी दौड़ गयी। तभी उस आदमी के चेहरे पर फिर वैसी ही एक शैतानी हंसी उभर आयी। कर्जन तुरंत वापस बाहर आ गये। लोगों के कारण पूछने पर उन्होंने जरूरी कागजात भुल आने की बात कही। वहां से वह तुरंत सुरक्षा अधिकारियों के पास गये और उस भयानक चेहरे वाले के बारे में पूछ-ताछ की। अधिकारियों ने ऐसे किसी भी आदमी के बारे में जानकारी होने से इंकार किया।

तभी इमारत में एक जोरदार धमाका हुआ। सभी लोग उस ओर दौड़ पड़े। वहां दिल दहला देने वाला दृष्य सामने था। लिफ्ट को संभालने वाले लोहे की रस्सियों के टूट जाने की वजह से लिफ्ट नीचे आ गिरी थी। बहुत से व्यक्ति काल के गाल में समा गये थे। पर उस भयानक चेहरे वाले इंसान का कहीं भी कोई अता-पता नहीं था।

कौन था वह, इंसान या कोई और? वह कर्जन को मारना चाहता था या बचाना? इसका जवाब ना तो कभी दुनिया को मिल पाया और नही लार्ड कर्जन को।

शनिवार, 14 नवंबर 2009

Aisee kyaa bhuul hui ki gaayab mujhko kiyaa?


पता नहीं ऐसी कौन सी खता हो गयी कि ब्लागवानी ने मेरी "पोस्ट" लेने से इंकार कर दिया। रोज नहाता हूं , पूजा-पाठ से भी गुरेज नहीं करता, सभी के लिये दोस्ताना, आदर का भाव रखता हूं फिर कौन सी बिल्ली छींक गयी कि ऐसा-वैसा-जैसा भी समझ में आता है बिना द्वेष भाव रखे लिखे हुए में ऐसे कौन से एलर्जी के जीवाणुं आ गये जो उसे बहिष्कृत कर दिया गया। हां अपनी फोटो जरूर बदलने की जुर्रत की थी। दो दिन से लग रहा था कि कुछ तो गड़बड़ है पर ध्यान नहीं दिया। वैसे भी इस ससुरे कमप्यूटर के बारे में इतनी ही जानकारी है जितनी सूट पहनने की। कपड़ा कैसा है या दर्जी कैसे सिलता है उस बारे में शून्य बटे सन्नाटा ही रहता है। परसों ऐसे ही ब्लागवाणी के नये ब्लागों पर नजर गयी तो वहां "अलग सा" टंगा दिखा। घंटियां बजने लगीं। क्लिक किया तो बकलम खुद को पाया। पर पिछले सारे आंकड़े गायब थे। उसी को फिर ले हुजूर के दरबार में दस्कत दी तो मेहरबानी से पिछली सीट पर जगह तो मिल गायी। पर ऐसा क्यूं हुआ समझ नहीं पा रहा हूं सो आप सब के सामने दुखड़ा ले कर हाजिर हूं।

 
यह सब इतना तुका-बेतुका इस लिये सफेद पर काला किया है कि आप की सहायता मिल सके, गलती समझने  में
 

अपने चारों ओर रहस्य का आवरण लपेटे "बिल्ली"

दुनिया के सैकड़ों-हजारों जीव- जंतुओं मे दो ऐसे प्राणी हैं जो अपने इर्द-गिर्द सदा रहस्य और ड़र का कोहरा लपेटे रहते हैं। पहला है बिल्ली और दूसरा सांप। वैसे इस मामले में बिल्ली सांप से कहीं आगे है। इसी की जाति के शेर, बाघ, तेंदुए आदि जानवर ड़र जरूर पैदा करते हैं पर रहस्यात्मक वातावरण नहीं बनाते। पर अफ्रीकी मूल के इस प्राणी, "बिल्ली" को लेकर विश्व भर के देशों में अनेकों किस्से, कहानियां और अंधविश्वास प्रचलित हैं। जहां जापान मे इसे सम्मान दिया जाता है क्योंकि किसी समय इसने वहां चूहों के आतंक को खत्म कर खाद्यान संकट का निवारण किया था। वहीं दूसरी ओर इसाई धर्म में इसे बुरी आत्माओं का साथी समझ नफ़रत की जाती रही है। फ्रांस मे तो इसे कभी जादूगरनी तक मान लिया गया था। हमारे यहां भी इसको लेकर तरह-तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। एक ओर तो इसके रोने की आवाज को अशुभ माना जाता है। आज के युग मे भी यदि यह रास्ता काट जाए तो अच्छे-अच्छे पढे-लिखे लोगों को ठिठकते देखा जा सकता है। रात के अंधेरे में आग के शोलों कि तरह दिप-दिप करती आंखों के साथ यदि काली बिल्ली मिल जाए तो देवता भी कूच करने मे देर नहीं लगाते। संयोग वश यदि किसी के हाथों इसकी मौत हो जाए तो सोने की बिल्ली बना दान करने से ही पाप मुक्ति मानी जाती है। दूसरी ओर दिवाली के दिन इसका घर में दिखाई देना शुभ माना जाता है।दुनिया भर की ड़रावनी फिल्मों मे रहस्य और ड़र के कोहरे को घना करने मे सदा इसकी सहायता ली जाती रही है।
यह हर तरह के खाद्य को खाने वाली है पर इसका चूहे और दूध के प्रति लगाव अप्रतिम है। इसे पालतू तो बनाया जा सकता है पर वफादारी की गारंटी शायद नहीं ली जा सकती।
सांपों को लेकर भी तरह-तरह की भ्रान्तियां मौकापरस्तों द्वारा फैलाई जाती रही हैं। जैसे इच्छाधारी नाग-नागिन की विचित्र कथाएं। जिन पर फिल्में बना-बना कर निर्माता अपनी इच्छायें पूरी कर चुके हैं। एक और विश्वास बहुत प्रचलित है, नाग की आंखों मे कैमरा होना, जिससे वह अपना अहित करने वाले को खोज कर बदला लेता है। चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने मे हो। सपेरों और तांत्रिकों द्वारा एक और बात फैलाई हुई है कि सांप आवश्यक अनुष्ठान करने पर अपने द्वारा काटे गये इंसान के पास आ अपना विष वापस चूस लेता है।
पर सच्चाई तो यह है कि दूध ना पीने वाला यह जीव दुनिया के सबसे खतरनाक प्राणी, इंसान, से ड़रता है। चोट करने या गलती से छेड़-छाड़ हो जाने पर ही यह पलट कर वार करता है। उल्टे यह चूहे जैसे जीव-जंतुओं को खा कर खेती की रक्षा ही करता है। जिससे इसे किसान मित्र भी कहा जाता है।
दुनिया के दूसरे प्रणियों की तरह ये भी प्रकृति की देन हैं। जरूरत है उल्टी सीधी अफवाहों से लोगों को अवगत करा अंधविश्वासों की दुनिया से बाहर लाने की।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

विश्वास तो करना ही पडेगा

कुछ ऐसे तथ्य जो अजीब तो हैं पर सच हैं :-
१, १८७३ में जब "कोलगेट" ने दांतों के लिए पेस्ट बनाया तो उसे जार में बाजार में पेश किया गया था।

२, टाइम पत्रिका ने १९८२ में "मैन आफ द ईयर " के लिए कंप्यूटर को चुना था। ऐसा पहली बार हुआ था की किसी वस्तु को यह खिताब दिया गया हो।

३, दुनिया में पहाडों की १०९ सबसे ऊंची चोटियां एशिया में हैं, जिनमे से ९६ हिमालय की हैं।

४, यदि सेव, आलू और प्याज को नाक बंद कर खाया जाय तो उनका स्वाद एक जैसा ही लगता है। आजमा कर देखिएगा। (:

५, एक छींक की गति 'सौ मील' घंटे की होती है।

६, 'शाप लिफ्टिंग' में सबसे पहला नाम बाईबिल का है।

बुधवार, 11 नवंबर 2009

प्रेम या स्नेह सिर्फ़ इंसान की ही बपौती नहीं है.

इटली का केंप्गलिया रेलवे स्टेशन। सुबह का समय, गाड़ियों की आने-जाने की आवाजों, यात्रियों की अफरा-तफरी के बीच "एल्वियो बारलेतानी" सर झुकाए अपने काम में मशगूल था। तभी उसे अपने पैरों के पास किसी चीज का एहसास हुआ। उसने चौंक कर नीचे देखा तो एक मरियल सा कुत्ता, जिसके शरीर तथा पंजों में जगह-जगह घाव हो गये थे, उसके पैरों में लोटने की कोशिश कर रहा था। तभी एल्वियो ने उसे पहचान लिया और वैसे ही उसे अपनी गोद में उठा लिया। उसके आंसू थम नहीं रहे थे। उसकी यह हालत देख उसके सहयोगी भी उसके इर्द-गिर्द इकट्ठा हो गये। फिर तो पूरा स्टेशन ही "लैंपो वापस आ गया" की आवाजों से गूंज उठा।

यह सत्य कथा है एक कुत्ते "लैंपो" की वफादारी और प्रेम की जो बत्तीस दिनों के बाद पूरे बारह सौ कि.मी. की यात्रा, पता नहीं कैसे, पूरी कर वापस अपने मालिक के पास आ पहुंचा था।

एल्वियो के बच्चे एक दिन कहीं से एक पिल्ला घर ले आये, जिसे घर में रखने की इजाजत उन्हें अपने अभिभावकों से भी मिल गयी। उसका नाम रखा गया "लैंपो"। अब बारलेतानी परिवार में एक और सदस्य की बढोतरी हो गयी थी। समय के साथ-साथ वह घर के बाहर भी सबका दुलारा बनता गया। एल्वियो को अपने कार्यालय आने के लिये अपने घर से ट्रेन पकड़नी पड़ती थी। एक दिन जब एल्वियो अपने बच्चों को स्कूल छोड़ स्टेशन आया तो लैंपो साथ ही था। ट्रेन के आते ही वह पहले ही अंदर जा एक सीट पर बैठ गया। अचभे से भरे एल्वियो को उसका भी टिकट लेना पड़ा। फिर तो यह रोजमर्रा की बात हो गयी। लैंपो रोज एल्वियो के साथ स्टेशन पर ट्रेन में चढ कर आने-जाने लगा। यहां भी अपनी खूबसूरती, चपलता और बुद्धीमानी के कारण एल्वियो के सहयोगियों की आंखों का तारा बन बैठा था।
पर एल्वियो के बास को यह सब पसंद नहीं था। उसे कुत्तों से चिढ थी। एक दिन उसने साफ-साफ कह दिया कि यदि लैंपो का स्टेशन आना नहीं रोका गया तो वह उसे म्युन्सपैलिटी के हवाले कर देगा। अधिकारी को मनाने की तथा लैंपो घर में ही रखने की बहुत कोशिशें की गयीं पर दोनों ही जैसे मानने को तैयार नहीं थे। दोनों ही अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे। तो एक दिन यह फैसला किया गया कि लैंपो को किसी दूर की गाड़ी में चढा दिया जाए, जिससे यह रोज-रोज की तकरार खत्म हो सके। । और एक दिन इटली की सबसे दूरगामी गाड़ी में लैंपो को भीगी आंखों और दुखी मन से चढा दिया गया। उस दिन एल्वियो के घर ना खाना बना ना किसी ने कुछ खाया। धीरे-धीरे दिन बीतते गये और लैंपो की याद धुंधली पड़ती गयी। एल्विनो परिवार भी आहिस्ता-आहिस्ता उसकी याद भुलाने की कोशिश में अपने काम से लग गया था कि अचानक लैंपो फिर उनकी जिंदगी में लौट आया और इस बार सुपर हीरो बन कर।
और अब तो वह बॉस का भी दुलारा था।

रविवार, 8 नवंबर 2009

रामदेव जी, सारी सृष्टि का जन्म ही "वैसी" जगह से होता है तो?

वैसे ऐसे लोगों के खिलाफ़ कुछ कहना नहीं चाहिए जो लोगों की भलाई में जुटे हुए हों। पर कभी-कभी कुछ ऐसी बात हो जाती है कि मजबूर हो कर कहना ही पड़ता है।
दो-एक दिन पहले श्रीमति जी, अपने हद से ज्यादा पसंदिदा चैनलों को छोड़ सर्च के चक्कर में पड़ी हुईं थीं (बहुत ज्यादा संभावाना थी कि उनके वालों पर विज्ञापन फेंके जा रहे हों) कि अचानक रामदेव बाबा सामने आ गये, और मेरे कानों में कुछ अंडे जैसे शब्द पड़े। सर्चिंग रोकी गयी।
रामदेव जी अंडे की बुराईयों को तरह-तरह के उदाहरण दे कर समझा रहे थे। इतना तो ठीक था पर अचानक उन्होंने उसे और बदतर दिखाने के लिये कहा कि जो चीज (क्षमा चाहता हूं इसमें एक शब्द भी मेरा नहीं है) पैखाने के रास्ते बाहर आती है वह कैसे अच्छी हो सकती है। इस बात को उन्होंने दो-तीन बार दोहराया। बोले कि उसकी सिर्फ पैकिंग ही अच्छी है बाकी उसमेँ ऐसा कुछ नहीं होता कि उसे खाया जाय। "ऐसी जगह से निकलने वाली कोई भी चीज अच्छी हो ही नहीं सकती। वह त्याज्य होती है।" यह बात ठीक है कि वे अपनी रौ में बोलते चले गये और उनका आशय लोगों को मांस भक्षण से दूर करना था, पर अतिरेक में उनका तर्क कुतर्क में बदल गया। इतने विद्वान आदमी के मुच से ऐसी बातें कुछ शोभा नहीं देतीं। आगे उन्होंने कुछ गंद खाने वाले पशुओं का भी जिक्र किया। वह अलग विषय है।
मैं और मेरा पूरा परिवार पुर्णतया शाकाहारी हैं। रामदेव जी की और उनके अभियान के भी हम सब प्रसंशक हैं। पर जो बात उन्होंने अंडे के उद्गम को ले कर कही वही खलने वाली है। उन्हें भी पता ही होगा कि सारी सृष्टि का सुत्रपात ही जन्नेद्रिंयों से होता है। बड़-बड़े ऋषि-मुनि, विद्वान, प्रभू भक्त, यहां तक कि हमारे आराध्यों को भी मां की कोख से ही जन्म लेना पड़ा है। तो ऐसे रास्ते से आने पर वह सब त्याज्य तो नहीं हो गये। मैं खाने-खिलाने की बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ उनका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि कुछ कर्मकांडों में गो-मुत्र पान करने का विधान है। ऐसी भी कथाएं मिलती हैं कि ऋषियों ने गाय के गोबर में अनपचे अन्न को ग्रहण किया था। फिर धरती का अमृत कहे जाने वाले शहद को क्या कहेंगे जो मक्खी के पेट से बाहर आया उसका लार रूपी भोजन होता है।
हर चीज का आज व्यवसायी करण होता जा रहा है। रामदेव जी भी उससे बच नहीं पा रहे हैं। बाज़ार में खुद को टिका पाना किसी के लिये भी टेढी खीर होता जा रहा है। पर जो भी हो अतिरेक से बचना भी बहुत जरूरी है।

शनिवार, 7 नवंबर 2009

किस्मत से ज्यादा क्या सचमुच नहीं मिलता ? (:

बात कुछ पूरानी जरूर है पर है बड़ी दिलचस्प। उस समय संचार व्यवस्था तो थी नहीं। लोग आने-जाने वालों, व्यापारियों, घुम्मकड़ों, सैलानियों से ही देश विदेश की खबरें, जानकारियां प्राप्त करते रहते थे।

ऐसे ही अपने आस-पास के व्यापारियों की माली हालत अचानक सुधरते देख छोटी-मोटी खेतीबाड़ी करने वाले जमुना दास ने अपने पड़ोसी की मिन्नत चिरौरी कर उसकी खुशहाली का राज जान ही लिया। पड़ोसी ने बताया कि दूर देश के राज में बहुत खुशहाली है। वहां इतना सोना है कि लोग रोज जरूरत की मामूली से मामूली आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी सोने का उपयोग करते हैं। वहां हर चीज सोने की है। सोना मिट्टी के मोल मिलता है।

ऐसी बातें सुन जमुना दास भी उस देश की जानकारी ले वहां जाने को उद्यत हो गया। पर उसके पास जमा-पूंजी तो थी नहीं। पर इस बार प्याज की फसल ठीक-ठाक हुई थी, उसी की बोरियां ले वह अपने गंत्व्य की ओर रवाना हो गया। उसकी तकदीर का खेल कि वहां के लोगों को मसाले वगैरह की जानकारी नहीं थी, प्याज को चखना तो दूर उसका नाम भी नहीं सुना था। जब जमुना दास ने उसका उपयोग बताया तो वहां के लोग उसे खा खूशी से पागल हो गये और जमुना का सारा प्याज मिनटों में खत्म हो गया। उसकी बोरियों को उन लोगों ने सोने से भर दिया। जमुना वापस अपने घर लौट आया। उसके तो वारे-न्यारे हो चुके थे। अब वह जमुना दास नहीं सेठ जमुना दास कहलाने लग गया था।

उसकी जिंदगी बदलते देख उसके पड़ोसी समर से भी नहीं रहा गया। एक दिन वह भी हाथ जोड़े जमुना दास के पास आया और एक ही यात्रा में करोड़पति होने का राज पूछने लगा। उस समय लोगों के दिलों में आज की तरह द्वेष-भाव ने जगह नहीं बनाई थी। पड़ोसी, रिश्तेदारों की बढोत्तरी से, किसी की भलाई कर लोग खुश ही हुआ करते थे। जमुना ने भी समर को सारी बातें तथा हिदायतें विस्तार से बता समझा दीं और उस देश जाने के लिये प्रोत्साहित किया। पर बात वही थी जमुना जैसी, समर की जमा-पूंजी भी उसकी खेती ही थी। संयोग से उसने इस बार लहसुन की अच्छी फसल ली थी सो वही ले कर वह विदेश रवाना हो गया।

ठीक-ठाक पहुंच कर उसने भी अपना सामान वहां के लोगों को दिखाया। भगवान की कृपा, लहसुन का स्वाद तो उन लोगों को इतना भाया कि वे सब प्याज को भी भूल गये, इतने दिव्य स्वाद से परिचित करवाने के कारण वे सब अपने को समर का ऋणी मानने लग गये। पर उन लोगों के सामने धर्मसंकट आ खड़ा हुआ। इतनी अच्छी चीज का मोल भी वे लोग कीमती वस्तु से चुकाना चाहते थे। उनके लिये सोने का कोई मोल नहीं था। तो क्या करें ? तभी वहां के मुखिया ने सब को सुझाया कि सोने से कीमती चीज तो अभी उनके पास कुछ दिनों पहले ही आई है। उसी को इस व्यापारी को दे देते हैं। क्योंकि इतनी स्वादिष्ट चीज के बदले किसी अनमोल वस्तु को दे कर ही इस व्यापारी का एहसान चुकाया जा सकता है। सभी को यह सलाह बहुत पसंद आयी और उन्होंने समर के थैलों को प्याज से भर अपने आप को ऋण मुक्त कर लिया।
बेचारा समर (: (: (: (:

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

क्या बाप या अभिभावक अक्लमंद नहीं हो सकते ?

आप कहेंगे कि बार-बार विज्ञापनों का रोना ले बैठता हूं। पर इन्हें आप की अदालत में लाना जरूरी लगता है। सरकारी विज्ञापन तो वैसे ही माशा-अल्लाह होते हैं। "जागो ग्राहक जागो" में एक नया नमूना आया है।
एक बाप अपने कम्प्यूटर पर विदेश से एक बड़ी रकम अपने नाम दर्ज देख खुशी से उछल पड़ता है तो उसका बेटा उसे समझाता है कि यह धोखा-धड़ी है, अपने बैंक इत्यादि के नम्बर किसी को ना दें। कोई मुफ्त में किसी को एक पैसा नहीं देता।
विज्ञापन में या उसे पेश करने वाले की नियत में कोई खराबी नहीं है। पर एक जिम्मेदार, अनुभवी, उम्रदराज इंसान को बेवकूफी करते ना दिखा उसे नयी पीढी, जो कम तजुर्बेकार है, को भी समझाते दिखाया जा सकता था। बाप की जगह बेटे और बेटे की जगह बाप को दे कर अनुभव की गरिमा और बुजुर्गियत की लाज दोनो बचाई जा सकती थीं। वैसे भी रिटायर्ड़ अभिभावक से ज्यादा पैसे की जरूरत युवा को होती है। जिसके सामने सारी जिंदगी पड़ी है। आज नयी पीढी में अधिकांश युवा ऐसे मिल जायेंगे जो कम समय में, रातों-रात अमीर बन जाने के लिये गलत हालातों में फंस जाते हैं। ऐसे में क्या समय के थपेड़ों से अनुभव प्राप्त कर जिंदगी की ठोस हकीकत को समझने वाले बुजुर्गों की नसीहतें युवा पीढी का मार्गदर्शन नहीं कर पातीं ?

रविवार, 1 नवंबर 2009

गंदा है पर धंधा है, समय बदला है हथकंडे नहीं

एक रपट :-
कुछ सालों पहले सड़क पर तंबू लगा ताकत की दवाईयां बेचने वाले अपने साथ बहुत सारी फोटुएं लिये रहते थे। जिनमें वे खुद किसी,उस समय के लोकप्रिय मर्दानी छवि वाले फिल्मी हीरो जैसे धर्मेंद्र या दारा सिंह के कंधे पर हाथ रखे मुस्कुराते खड़े नजर आते थे। गोया उन लोगों की मर्दानगी इन सड़क छाप व्यापारियों की देन हो। उस समय तकनिकी इतनी सक्षम नहीं थी फिर ऐसी फोटुएं कैसे खींची जाती थीं इसका पता एक खुलासे से हुआ। होता क्या था कि यह चंट लोग येन-केन-प्रकारेण अपने-आप को नायक का बहुत बड़ा पंखा या उसके शहर-गांव का बता किसी तरह स्पाट ब्वाय वगैरह को पटा कर हीरो को एक फोटो खिंचवाने के लिये राजी करवा लेते थे, कैमरा मैन इन्हीं का आदमी होता था, जैसे ही बटन दबने को होता था ये झट से अपना हाथ नायक के कंधे पर मुस्कुराते हुए धर देते थे, फिर यदि कोई नाराज होता भी था तो हाथ-पैर जोड़ क्षमा मांग नौ-दो-ग्यारह हो जाते थे।

एक जानकारी :-
दैनिक भास्कर की एक सहयोगी पत्रिका है 'अहा!जिंदगी'। जिसके अक्टूबर के अंक में किन्हीं मुनीर खान का जिक्र है। जो काफी बढा-चढा कर, विभिन्न बड़ी हस्तियों की तस्वीरों के साथ पेश किया गया है। जिनमें शीला दीक्षित और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा। रामदौस भी शामिल हैं। जानते हैं पत्रिका ने किस खिताब से नवाजा है उन अपने आप को वैज्ञानिक कहने वाले महाशय को, 'सहस्त्राब्दि का मसीहा'। यह दावा किया गया है कि उनकी जादुई दवा से हर रोग का ईलाज हो सकता है बिना किसी साइड़ इफेक्ट के। यह भी लिखा गया है कि दुनिया के नब्बे से ज्यादा देशों में पेटेंट के लिये आवेदन किया जा चुका है।

एक ख़बर :-
दो दिन पहले के भास्कर में ही किसी खबर के बीच छुपी खबर - "कैंसर और ब्रेन ट्यूमर जैसी बिमारियों के इलाज का दावा करने वाले स्वयंभू वैज्ञानिक मुनीर खान भूमिगत। पुलिस अब तक गिरफ्तार करने में नाकाम।

शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

बच्चों की मासूमियत छीनते ये विज्ञापन

भोजन की मेज पर पति-पत्नि बात कर रहे हैं किसी के बच्चे के विदेश जाने की। साथ ही बैठा तीन-चार साल का बच्चा उनकी बातें बुरा सा मुंह बना कर सुन रहा है। उनकी बात खत्म होते ही वह अपने पिता से पूछता है कि मेरे भविष्य के बारे में तुमने क्या सोचा है?
दूसरा दृष्य, बाप थका-हारा काम से लौट कर अभी खड़ा ही होता है कि बच्चा फिर सवाल दागता है, क्या सोचा? बाप पूछता है किस बारे में ? बच्चा कहता है मेरे भविष्य के बारे में। एक अदना सा बच्चा जिसके दूध के दांत भी पूरे नहीं टूटे होंगे, उसके मुंह से ऐसी बातें निकलवा कर यह विज्ञापन दाता क्या जताना चाहते हैं। क्या आज के मां-बापों को अपने बच्चों की फिक्र नहीं है। या कि आदमी की जेब से पैसा निकलवा कर उसके मरने के बाद के हसीन सपने दिखाने वाली ये कंपनियां बताना चाहती हैं कि तुम्हारे बच्चों की फिक्र तुमसे ज्यादा हम करते हैं। या फिर पश्चिम की तर्ज पर बच्चों को बचपन से ही मां-बाप के विरुद्ध खड़े करने की साजिश है। समय के फेर से संयुक्त परिवार तो खत्म होते ही जा रहे हैं, रही-सही कसर यह धन-लोलूप बाजार, जिसके लिये नाते, रिश्ते, ममता, स्नेह का कोई मोल नहीं है, पूरी करने पर उतारू है। यह विज्ञापन है "बजाज आलियांस" का। अभी इसकी दो किश्तें ही प्रसारित हुई हैं शायद। आगे क्या गुल खिलाता है वही जाने!!!!!!

बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

उन लोगों के लिए जो हिंदी को हेय समझते हैं

हिंदी को चाहने वालों के लिये अच्छी और उसको दोयम समझने वालों की जानकारी के लिये एक खबर। हमारी एक आदत है कि जब तक पश्चिम किसी बात पर मोहर ना लगा दे हम उसे प्रमाणिक नहीं मानते। खास कर काले अंग्रेज।
तो एक सवाल उठा कि दुनिया में तरह-तरह की अनेकों लिपियां हैं पर उनमें वैज्ञानिक दृष्टि से सर्वोतम या श्रेष्ठ कौन है ? तरह-तरह की खोजें शुरु हुईं और फ्रांस के वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगात्मक तरीके से जो उत्तर प्राप्त किया उससे यह निष्कर्ष सामने आया कि देवनागरी विश्व की श्रेष्ठतम लिपि है।
उन्होंने विभिन्न लिपियों के वर्णों के अनुसार चीनी-मिट्टी के समानुपातिक खोखले खांचे बनाए। जिनके दो सिरे खुले रखे गये। जब देवनागरी लिपि के अक्षरों मे एक ओर से फूंक मारी गयी तो पाया गया कि उसमें से वैसी ही ध्वनि सुनाई पड़ती है जिन अक्षरों के अनुसार उन्हें निरूपित किया गया है। यानि 'अ' अक्षर से 'अ' और 'ग' से 'ग' ही उच्चारित हुआ। देवनागरी के बाद ग्रीक तथा लेटिन लिपियां अपने वर्णों के अनुरूप पायी गयीं।
अन्य लिपियों के वर्ण आकारों से मिलने वाली ध्वनियां त्रुटिपूर्ण पाई गयीं।
पर दुख तो इसी बात का है कि इसी भाषा से नाम-दाम-यश-शोहरत पाने वाले भी जब मंच पर आते हैं तो उन्हें भी हिंदी बोलने में शर्म आती है। और किसी विधा को छोड़ भी दें तो हम सबने देखा ही है कि हिंदी गानों से अपनी पहचान बनाने वाले 'तथाकथित गवैइये' जब बोलना शुरू करते हैं तो अंग्रेजी में बोल कर शायद यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि गाते जरूर हैं हम हिंदी में पर.........

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

धनतेरस और आने वाली दीपावली सब के लिए मंगलमय हो

आप सभी को इन शुभ दिनों की बधाई। सब जने, परिवार सहित, स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें। सोने के समय को छोड़ जीवन में सदा आलोक छाया रहे।
भले ही नोक-झोंक होती रहे पर हमारा आपसी प्रेम, स्नेह तथा अपनापा बना रहे, प्रभू से यही प्रार्थना है।

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

राधा नौ मन तेल होने पर ही क्यूँ नाचेगी ?

एक मुहावरा है “ना नौ मन तेल होगा ना राधा नाचेगी”। अब सोचने की बात यह है कि राधा नाचेगी ही क्यूं ? बिना मतलब के तो कोई नाचता नहीं। तो कोई खास आयोजन होगा, पर यदि ऐसा है तो नौ मन तेल की शर्त क्यूं रखी गयी है ?
ऐसा लगता है कि ये राधाजी कोई बड़ी जानी-मानी डांसिंग स्टार होंगी और किसी अप्रख्यात जगह से उन्हें बुलावा आया होगा। हो सकता है कि उस जगह अभी तक बिजली नहीं पहुंची हो और वहां सारा कार्यक्रम मशाल वगैरह की रोशनी में संम्पन्न होना हो। इस बात का पता राधा एण्ड़ पार्टी को वेन्यू पहुंच कर लगा होगा और अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल हर चीज ना पा कर आर्टिस्टों का मूड उखड़ गया होगा और उन्होंने ऐसी शर्त रख दी होगी जिसको पूरा करना गांव वालों के बस की बात नहीं होगी। फिर सवाल उठता है कि नौ मन तेल ही क्यूं राउंड फिगर में दस या पन्द्रह मन क्यूं नहीं ? तो हो सकता है कि यह आंकड़ा काफी दर-मोलाई के बाद फिक्स हुआ हो।
ऐसा भी हो सकता है कि पेमेन्ट को ले कर मामला फंस गया हो। वहां ग्रामिण भाई कुछ नगद और कुछ राशन वगैरह दे कर आयोजन करवाना चाहते हों पर राधा के सचिव वगैरह ने पूरा कैश लेना चाहा हो। बात बनते ना देख उसने इतने तेल की ड़िमांड रख दी हो जो पूरे गांव के भी बस की बात ना हो।

तो मुहावरे का लब्बो-लुआब यह निकलता है कि एक विख्यात ड़ांसिंग स्टार अपने आरकेस्ट्रा के साथ किसी छोटे से गांव में अपना प्रोग्राम देने पहुंचीं। उन दिनों मैनेजमेंट गुरु जैसी कोई चीज तो होती नहीं थी सो गांव वालों ने अपने हिसाब से प्रबंध कर लिया होगा और यह व्यवस्था राधा एण्ड कंपनी को रास नहीं आयी होगी। पर उन लोगों ने डायरेक्ट मना करने की बजाय अपनी एण्ड़-बैण्ड़ शर्त रख दी होगी। जो उस हालात और वहां के लोगों के लिये पूरा करना नामुमकिन होगा। इस तरह वे जनता के आक्रोश और अपनी बदनामी दोनों से बचने में सफल हो गये होंगे। इसके बाद इस तरह के समारोह करवाने वाले और सारी व्यवस्थाओं के साथ-साथ नौ-दस मन तेल का भी इंतजाम कर रखने लग गये होंगे क्योंकि फिर कभी राधाजी और तेल के नये आंकड़ों की खबर नहीं आयी।
इस बारे में नयी जानकारियों का स्वागत है।

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

ये भी इसी दुनिया के लोग हैं !

अभी पिछले दिनों सोनिया गांधी के हवाई सफर की काफी चर्चा रही थी। पर इन दो उदाहरणों को देख आप क्या कहेंगे :-

* ब्रुनेई के सुल्तान को पिछले दिनों लगा कि उनके सर के बाल काफी बढ गये हैं तो उन्हें सेट करवाने के लिये उन्होंने अपने प्रिय "नाई" केन मोडेस्टु को लंदन से बुलवा भेजा। खबर भेजते ही उन्हें भय लगा कि वो महाशय अपने साथ कहीं "सुअर फ्लू" के वाइरस भी ना ले आयें, सो उन्होंने मोडेस्टु साहब के लिये जहाज में एक प्रायवेट लक्जरी केबिन की व्यवस्था करवाई। जिसके ताम-झाम पर खर्च आया सिर्फ नौ लाख रुपये। इस पूरी यात्रा में आने-जाने का खर्च 12 लाख रुपये पड़ा। यानि एक बार के केश कर्तन पर खर्च आया बारह लाख रुपये। तकदीर के धनी मोडेस्टु साहब जिन्हें लंदन में 50 डालर मिलते हैं एक बार कटिंग करने के, पिछले सोलह सालों से सुल्तान के प्रिय बने हुए हैं और हर बार बुलाने पर बिना किसी गिले-शिकवे के 7000 मील का चक्कर लगाने को तैयार बैठे रहते हैं।

* पिछले दिनों मिसेज ओबामा को भी लगा होगा कि कहीं बाजार से सब्जी-भाजी लाने वाला नौकर पांच-दस रुपये तो नहीं दबा रहा, तो जांच करने के लिये वे भी एक दिन निकल पड़ीं सब्जी बाजार की ओर। पर यह क्या इतना आसान था कि अमेरिका की प्रथम महिला एवेंई सब्जी भाजी खरीद ले। तो हुआ क्या देखिये, आई मीन पढिये -
मैडम के जाने के पहले ही बाजार को करीब तीन दर्जन सुरक्षा वाहनों ने घेर लिया था। उनकी हथियार बंद लिमोजिन कार के साथ दर्जनों गाड़ियों का बेड़ा चल रहा था। बाजार को बैरीकेड्स लगा कर लोगों की आवा-जाही घंटों पहले रोक दी गयी थी। सारे इलाके में विस्फोटक पहचानू कुत्तों को फैला दिया गया था। सारी चीजों की गहन छानबीन की गयी थी। इतना ही नहीं एक सर्व सुसज्जित अपाचे हेलीकाप्टर मैडम के वहां रहते पूरे समय आकाश में मंडराता रहा था। इतने ताम-झाम के बाद ही श्रीमती ओबामा मिशेल कुछ अंडे, टमाटर और आलू खरीद पायीं।

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

प्रभू को यहीं क्यों अवतार लेना पङता है ?

बहुत बार यह विचार आता है कि हमारे ही यहां भगवन को अवतार लेने की क्यों जरुरत पड़ती रही है? और भी तो देश हैं, वहां भी तो अच्छे बुरों का जमावड़ा रहता है, वहां भी पाप और पुण्य दोनो फलते-फूलते हैं, तो फिर इसी धरा पर क्यों बार-बार, हर बार पदार्पण करने की जरुरत महसूसती है उन्हें? जबकि बाकि जगह अपने दूत या पैगम्बरों को भेज कर ही उनका काम चल जाता है।

दो ही बातें हो सकती हैं, या तो प्रभू को हमसे जबर्दस्त लगाव और प्यार है, या फिर हम इतने बड़े और भारी पापी हैं कि देवदूतों का बस हमारे ऊपर नहीं चल पाता और खुद ईश्वर को इस भूमि से विपदा दूर करने के लिये तरह-तरह के वेष धर कर आना पड़ता है। बार-बार, हर-बार।

इतने पर भी ना हम सुधरे और नहीं वह थका।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

ऐसा सिर्फ हमारे देश में ही हो सकता है !!!

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के पुनासा ब्लाक का सुरगाओं बनजारी गांव का एक सरकारी प्रायमरी स्कूल। यहां के हेड़ मास्टर साहब, श्रीमान गोदिआ चक्रे, अपने "जरूरी कामों" में ज्यादातर व्यस्त रहने के कारण अपनी अनुपस्थिति में स्कूल सुचारु रूप से चलता रहे, इसलिये एक सोलह साल के लड़के को कार्यभार सौंप खुद फारिग हो गये।
यह सोलह साला लड़का, जिसका नाम प्रताप है, गांव में गायें चराने का काम करता है। यह न सिर्फ स्कूल के बच्चों को "कंट्रोल" करता था बल्कि स्कूल के दूसरे शिक्षकों पर भी अपना हुक्म चलाता था। चलाता भी क्यों ना आखिर उसकी नियुक्ति हेड़ मास्साब द्वारा जो की गयी थी। प्रताप को वेतन भी चक्रे साहब ही देते थे।
बात तो एक न एक दिन सामने आनी ही थी, जब पता चला कि हेड मास्साब गायब रहते हैं तो उच्च अधिकारियों द्वारा जांच की गयी और पाया गया कि प्रताप साहब सिर्फ स्कूल चलाते ही नहीं थे बल्कि उन्होंने अपने नियम-कायदे भी दूसरे शिक्षकों पर थोप रखे थे।
सारे मामले को गंभीरता से लेते हुए चक्रे जी को सस्पेंड कर दिया गया है।
*********************
यहां सवाल यह उठता है कि स्कूल के बाकि शिक्षकों की क्या "कमजोरी" थी कि वे सब इस हिमाकत को चुप-चाप देखते, सहते रहे ?

सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

भूटान से ही कुछ सीखें

कभी जगतगुरु होने का दावा करने वाला अपना देश आज कहाँ आ खडा हुआ है? चारों ओर भर्ष्टाचार, बेईमानी, चोर-बाजारी का आलम है । कारण सब जानते हैं। साफ सुथरी छवि वाले, पढ़े-लिखे, ईमानदार, देश-प्रेम का जज्बा दिल में रखने वालों के लिए सत्ता तक पहुँचना सपना बन गया है। धनबली और बाहुबलीयों ने सत्ता को रखैल बना कर रख छोडा है। ऐसे में हमारे एक अदने से पड़ोसी ने जो राह दिखाई है क्या हम उससे कोई सीख ले सकते हैं ?
हमारा छोटा सा पड़ोसी "भूटान"। उसने अपने स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों के लिए कुछ मापदंड तय किए हैं। उसके लिए पढ़े-लिखे योग्य व्यक्तियों को ही मौका देने के लिए पहली बार लिखित और मौखिक परीक्षाओं का आयोजन किया गया है। इसमें प्रतियोगियों की पढ़ने-लिखने की क्षमता, प्रबंधन के गुण, राजकाज करने का कौशल तथा कठिन समय में फैसला लेने की योग्यता को परखा जाएगा। इस छोटे से देश ने अच्छे तथा समर्थ लोगों को सामने लाने का जो कदम उठाया है, क्या हम उससे कोई सीख लेने की हिम्मत कर सकते हैं ?

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

इसे क्या कहें, बालों का कहर या जैसे को तैसा

परिवार के मुखिया कृपाशंकर दूबे, मितव्ययी, कर्मकांड़ी, अपने आचारों-व्यवहारों का कड़ाई से पालन करने वाले, एक सख्त मिजाज इंसान, जिनकी बात काटने की हिम्मत घर के किसी भी सदस्य की नहीं होती।
अच्छा घर और वर तथा वधू मिलते ही एक ही मंडप तथा मुहुर्त में अपने लड़के तथा लड़की की शादी कर एक ही साथ कन्यादान और वधू का गृह-प्रवेश करवा गंगा नहा लिये।
आज शादी के दूसरे दिन, नववधू की भोजन बनाने के रूप में अग्निपरीक्षा होनी है। सारे परिवार की उत्सुक निगाहें रसोई की तरफ लगी हुई हैं। प्रतिक्षा खत्म हुई वधू ने विभिन्न व्यंजन परोस दिये। खाना बहुत ही उम्दा और स्वादिष्ट बना था। हर सदस्य तृप्त तथा संतुष्ट नजर आ रहा था। तभी अचानक कृपाशंकर जी की भृकुटि पर बल पड़ गये, उनकी सब्जी में एक लम्बा सा बाल निकल आया था। जो निश्चित रूप से बहू का ही था। भोजन अधूरा छोड़ उन्होंने अपना आसन त्याग दिया तथा वहीं खड़े-खड़े अपने बेटे मोहन को बहू को उसके घर वापस छोड़ आने की आज्ञा सुना दी। सारा घर निस्तब्ध रह गया। किसी की भी हिम्मत प्रतिवाद करने की नहीं थी। परिस्थिति की गम्भीरता को समझ नववधू के आंसू थम ही नहीं रहे थे। तभी घर के बाहर से कुछ अजीब सी आवाजें तथा हलचल का आभास हुआ। जब तक वस्तुस्थिति का कुछ पता चलता, घर में दूबेजी की नवविवाहिता कन्या, कला, ने रोते हुए प्रवेश किया। सारे जने सन्न रह गये किसी विपत्ती को भांप कर। कन्या को बिठा कर सबने उससे इस तरह आने का कारण जानना चाहा, तो रोते-रोते बड़ी मुश्किल से कला ने बताया कि आज उसे पहली बार ससुराल में खाना बनाना था। सब ठीक था पर खाते समय श्वसुरजी की दाल में बाल निकल आया था।

भगवान् का न्याय

भादों मास की एक शाम। आकाश में घने बादल गहराते हुए रौशनी को विदा करने पर आमदा थे। दामिनी एक सिरे से दूसरे सिरे तक लपलपाती हुई माहौल को और भी डरावना बना रही थी। जैसे कभी भी कहीं भी गिर कर तहस-नहस मचा देगी। हवा तूफान का रूप ले चुकी थी।
ऐसे में उस सुनसान इलाके में, एक जर्जर अवस्था में पहुंच चुके खंडहर में, एक आदमी ने दौड़ते हुए आकर शरण ली। तभी दो सहमे हुए मुसाफिरों ने भी बचते बचाते वहां आ कर जरा चैन की सांस भरी। फिर एक व्यापारी अपने सामान को संभालता हुआ आ पहुंचा। धीरे-धीरे वहां सात-आठ लोग अपनी जान बचाने की खातिर इकट्ठा हो गये। बरसात शुरु हो गयी थी। लग रहा था जैसे प्रलय आ गयी हो। इतने में एक फटे हाल बच्चा अपने पालतू सूअर के साथ अंदर आ गया। उसके आते ही मौसम ने प्रचंड रूप धारण कर लिया। बादलों की कान फोड़ने वाली आवाज के साथ-साथ ऐसा लगने लगा जैसे बिजली जमीन को छू-छू कर जा रही हो। सबको लगने लगा कि उस अछूत बच्चे के आने से ही प्रकृति का कहर बढ़ा है। यदि यह इस मंदिर में रहेगा तो भगवान के कोप से बिजली जरूर यहीं गिरेगी। इस पर सबने एक जुट हो, उस डरे, सहमे बच्चे और सूअर को जबर्दस्ती धक्के दे कर बाहर निकाल दिया। डर के मारे रोते हुए बच्चे ने कुछ दूर एक घने पेड़ के नीचे शरण ली।
उसके वहां पहुंचते ही जैसे आसमान फट पड़ा हो, बादलों की गड़गड़ाहट से कान बहरे हो गये। बिजली इतनी जोर से कौंधी कि नजर आना बंद हो गया। एक पल बाद जब कुछ दिखाई पड़ने लगा, तब तक उस खंडहर का नामोनिशान मिट चुका था। प्रकृति भी धीरे-धीरे शांत होने लगी थी।

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

छोटे कद पर विराट व्यक्तित्व के धनी शास्त्री जी

एक ही दिन जन्मदिन होने के कारण छोटे कद पर विराट व्यक्तित्व के धनी शास्त्रीजी को वह सम्मान नहीं मिल पाता, जिसके वह हकदार रहे हैं। वैसे भी वह चमकदार मेहराबों के बनिस्पत नींव का पत्थर होना ज्यादा पसंद करते थे। उनकी सादगी को दर्शाते ये दो संस्मरण उस समय के हैं, जब वे प्रधान मंत्री थे।
एक बार देश की एक बड़ी कपहा बनाने वाली कंपनी ने ललिताजी के लिए कुछ सिल्क की साड़ियां उपहार स्वरुप देने की पेशकश की। साड़ियां काफी खुबसूरत तथा मुल्यवान थीं। शास्त्रीजी ने उनकी कीमत पूछी, जब काफी जोर देने पर उन्हें कीमत बताई गयी तो उन्होंने यह कह कर साफ मना कर दिया कि मेरी तन्ख्वाह इतनी नहीं है कि मैं इतनी मंहगी साड़ी ललिताजी के लिए ले सकूं, और अपने निर्णय पर वे अटल रहे।
एक बार उनके बड़े बेटे हरिकिशनजी को एक ख्याति प्राप्त घराने से अच्छे पद का प्रस्ताव मिला, उन्होंने शास्त्रीजी से अनुमती चाही, तो उन्होंने जवाब दिया कि यह नौकरी मेरे प्रधान मंत्री होने के कारण तुम्हें दी जा रही है, यदि तुम समझते हो कि तुम इस पद के साथ न्याय कर पाओगे और तुम इस के लायक हो तो मुझे कोई आपत्ती नहीं है। हरिकिशनजी ने भी वह प्रस्ताव तुरंत नामंजूर कर दिया।इन्हीं आदर्शों की वजह से चाहे अंत समय तक उनका अपना कोई घर नहीं था नही ढ़ंग की गाड़ी थी, पर वे याद किए जाएंगें, जब तक भारत और उसका इतिहास रहेगा।
आज के वंशवादी, सत्ता पिपासु तथाकथित नेता क्या ऐसा सोच भी सकते हैं। जिनमें कुछ एक को छोड़ उनके राज्य के बाहर ही कोई उन्हें नहीं जानता और ना जानना चाहता है।

बुधवार, 30 सितंबर 2009

भोले भंडारी तो सदा साथ रहे पर चिपलूनकरजी का इन्तजार ही करता रहा. .

प्रभू की असीम कृपा, बड़ों के आशीर्वाद और आप सब के स्नेहाशीष से अपने बड़े पुत्र के विवाह के सारे मंगल कार्य निर्विघ्न रूप से सम्पन्न करवा हम 26 सित. को उज्जैन से वापस आ गये थे। 27 को ही जब मैं पूरा विवरण लिख पोस्ट करने लगा तो सारी बातें किसी अनजानी, अनचाही डाउनलोडिंग के कारण धुल-पुछ गयीं। सो देर हो गयी।
पिछले पूरे महीने से मेरा रक्तचाप सामान्य होने में टालमटोल करता रहा। साथ उज्जैन जाने वालों में पांच, पचहत्तर पार के आदरणीय बुजुर्गों के स्वास्थय, सभी के खान-पान-आराम, सीधी गाड़ी ना होने की वजह से गाड़ियों को बदलना, उनके समय का टकराव, सामान का चढाना-उतारना यह सब सोच-सोच कर दिमाग का दही बना हुआ था। पर इन पांच दिनों में मुझे स्पष्ट एहसास हुआ कि भगवान भोले शंकर सदा मेरे साथ रहे थे। उनकी शक्ति, मेरे छोटे भाई प्रशांत, जो मेरे से 14-15 साल छोटा है, मुझे और अपनी भाभी को तनावग्रस्त देख ऐसे समझाता संभालता रहा जैसे वह मेरा बुजुर्ग हो। उसकी पत्नि, पूनम ने सारे काम जैसे अपने जिम्मे ले रखे थे, यहां और वहां उज्जैन में भी हर छोटे बड़े की छोटी-बड़ी जरूरतों को हर जगह हर वक्त उपस्थित हो इस लड़की ने बिना थके, परेशान हुए पूरा कर किसी को भी शिकायत का मौका नहीं दिया। पूनम के छोटे भाई सुधीर, जिसकी टेलेपैथी का कनेक्शन मुझसे सबसे ज्यादा जुड़ा हुआ है, मेरे कजिन दिवाकरजी, जिन्होंने अपनी सौम्यता से लोगों के दिल में जगह बना ली, उनके अनुज प्रभाकर ने सारे माहौल को खुशगवार बनाये रखा। इनके अलावा नीरज, निहार, अरुण, मेरे अभिन्न मित्र त्यागराजनजी तथा भट्टाचार्यजी और इस गर्मी में कुल्लू से आये जीवनजी तथा कृष्णजी मे समाहित हो किसी भी क्षण को मुश्किल में नहीं बदलने दिया।
साथ के बुजुर्ग जो इस लम्बी यात्रा पर जाने से कतरा रहे थे, लौटने के बाद यही कहते रहे कि ना जाते तो सदा पछतावा ही रहता। भोले भंडारी की कृपा से किसी को राई-रत्ती भी तकलीफ नही हुई। नवरात्रों के बावजूद गाडियों में किसी अवांछित तत्व या बेकाबू भीड़-भाड़ का सामना नहीं करना पड़ा। और तो और अपनी लेट-लतीफी के कारण मशहूर भारतीय रेल हर बार अपने समय से 10-15 मिनट पहले ही हमें मिलती रही, जिससे सामान उतारने-चढाने में कोई दिक्कत पेश नहीं आई।
उज्जैन में भी भगवान महाकाल ने अपने दर्शनों को आतुर अपने भक्तों को खुद से आलिंगनबद्ध होने का भरपूर मौका दिया, अपनी आरती में सम्मलित होने का सौभाग्य प्रदान किया , जिससे सारे लोग गदगद हो प्रभू का गुणगान करते रहे।
इस कारण नहीं कि उज्जैन में श्री अशोकजी से हमारे संबंध बन गये हैं तो मैं ऐसा लिख रहा हूं। सच में इतने विनम्र, सरल ह्रदय, भगवान में अटूट विश्वास रखने वाले परिवार मैंने बहुत कम देखे हैं। अस्सी साल पार करने के बावजूद परिवार के मुखिया दादाजी का सारी स्थियों पर पूरा नियंत्रण था। मेरे बार-बार कहने पर ही उन्होंने आराम करने घर जाना मंजूर किया। पुत्रवधू के चाचा, शिव कुमार जी अपनी अस्वस्थ पत्नि और बच्चे को छोड़ कर पूरा आयोजन सफल बनाने में जुटे रहे। अपनी माताजी की बिमारी के बावजूद सुश्री आरती की छोटी बहन पल्लवी और भाई भानू की कार्यक्षमता को देख कर एहसास हुआ कि बड़े भी उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। भानू के मित्रों ने भी दिन-रात एक कर रखा था। भगवान इन सारे प्यारे बच्चों को लम्बी उम्र के साथ-साथ जीवन की हर खुशी प्रदान करे, यही मेरी कामना है। बस एक कमी महसूस होती रही, कि उज्जैन जाकर भी चिपलूनकर जी से मिलना नहीं हो पाया। गलती मेरी ही थी, मैने उन्हें तारीख याद नहीं दिलवाई। यह कसक मन में सदा रहेगी।
प्रसंग वश एक बात और बतलाना चाहूंगा। हमारी रिजर्वेशन 90 दिन पहले करवा ली गयी थी। इस कारण कुछ लोगों का चलते समय अचानक कोई जरूरी काम आ जाने की वजह से जाना नहीं हो पाया था। इससे जाते और आते वक्त 6 सीटें खाली थीं हमारे पास। तो सबने खोज-खोज कर अशक्त एवं जरूरतमंदों को उस जगह का लाभ दे दिया। हम सबने महसूस किया कि उनके ह्रदय से दी गयी आशीषों ने भी हमारे सामने किसी अड़चन को फटकने नहीं दिया। एक वृद्ध दंपत्ति, जिनकी तबीयत भी ठीक नहीं थी, टिकट दलाल के धोखे में आ, अपना पैसा और जगह दोनों गंवा चुके थे, ने जाते-जाते हमें अपने आशीर्वाद से सराबोर कर रख दिया।
कहते हैं ना कि सच्चे मन से यदि अपने-आप को प्रभू की शरण में सौंप दिया जाए तो वह तारनहार सुनता जरूर है और कुछ भी अलभ्य नहीं रह जाता। तो कुछ ऐसा ही अनुभव रहा मेरा।
रुकता हूं।
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३०.०९.०९
अफरा तफरी में दो दिन और निकल गये। अच्छा ही हुआ। कल आशीर्वाद समारोह में अपने हरदिल अजीज श्री पाबलाजी ने अपनी बिटिया के साथ आ कर मुझे जो खुशी प्रदान की मैं उसका विवरण नहीं कर सकता। अद्भुत क्षण थे वह।

रविवार, 20 सितंबर 2009

मेरे बड़े बेटे के मंगल परिणय पर आप सादर आमंत्रित हैं.

मैं आप सब को, सृष्टि के रचयिता की असीम अनुकंपा से उपलब्ध, अपने बड़े बेटे के विवाह के शुभ अवसर पर सादर आमंत्रित करता हूं। मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि आप नवदंपति को अपना स्नेहाशिष दे मुझे अनुग्रहित करें।
विवाह का अयोजन महाकाल की नगरी "उज्जैन" में 22 सितम्बर को तथा आशीर्वाद समारोह रायपुर में 29 सितम्बर को "निरंजन धर्मशाला" में सम्पन्न होगा।
आप सब की प्रतीक्षा रहेगी।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

क्या हम सब सुविधा भोगी नहीं हो गए हैं?

अरब से ज्यादा आबादी वाले देश को नचा रहे हैं पाँच-साढ़े पाँच सौ लोग। तमाशा हो रहा है संसद में। तमाशे में शामिल कुछ लोग अपना उल्लू सध जाने के बाद ऊँघ रहे हैं कुछ बतिया रहे हैं कुछ, कुछ बोलना जरूरी है इसलिए बोल रहे हैं और कुछ सिर्फ़ अपनी उपस्थिति टी वी पर दर्शाने के लिए बार-बार खड़े हो कर व्यवधान डाल रहे हैं।आधे से ज्यादा को तो शायद पता भी नहीं होगा की मुद्दा क्या है। कारों के काफिलों और उनमे से उतरते सजे सजायेअपने भाग्य विधातायों को देख लगता ही नहीं कि देश में गरीबी या मंहगाई जैसी भी कोई समस्या है। अभी मुहीम चल रही है, खर्च कम कराने की। इस पर कईयों की त्योरियां चढ़ गयी हैं। हैं !!!! , हम क्या "मैंगो मैंन" हैं की हमारे खर्च में कटौती की जा रही है। कुछ ऐसे हैं जो मीडिया के सामने दो-तीन दिन सायकिल पर ख़ुद को बैठा दिखला सुर्खियाँ बटोरने की कोशिश करेंगे। हवाई जहाज में क्लास बदलने का फैशन भी अब आम हो गया है। हम सब को भी यह सब देख अब शायद अजीब सा नहीं लगता। आज हमें भी अंधेरे की इतनी आदत हो गयी है कि हम रोशनी के लिए लड़ना ही नहीं चाहते। केवल नेतायों और व्यवस्था को दोष देने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि हम सब इस भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा हैं। आज जिस बदलाव की जरूरत है उसे वे लोग नहीं ला सकते जो ख़ुद दोहरा जीवन जीते हैं। बाजार की ताकतों ने एक नकली संसार रच दिया है जिसकी माया ने सब को ठग रखा है। हम सब सुविधा भोगी हो गए हैं।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

रमन सिंह, एक मुख्य मंत्री ऐसा भी

हमारे प्रणव दा की खर्चों में कटौती की अपील पर जहां कुछ 'तकदीर के धनियों' के माथे पर बल पड़ गये हैं, अपनी शानो-शौकत में किफायत बरतने के निर्देश पर। वहीं कुछ 'राज महल' में मत्था टेकते वक्त अपनी किफायतों का वर्णन कर सर्वोच्च सत्ता की कृपा दृष्टि का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में जुटे हैं। गोया यह भी एक मौका हो गया भविष्य संवारने का।
यहां इनके कच्चे चिट्ठे खोलने की बजाय मैं एक ऐसे मुख्य मंत्री की ओर सबका ध्यान ले जाना चाहता हूं जो सत्ता में आने के बावजूद किफायत के पक्ष में रहा है। ना ज्यादा ताम-झाम, ना दिखावा, नाहीं उपलब्ध होने के बावजूद सरकारी साधनों का उपयोग। ये हैं छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री, श्री रमन सिंह।
मैं ना किसी पार्टी के पक्ष में हूं ना विपक्ष में, पर जो दिखता है वह बतला रहा हूं। यह भला आदमी प्रणव दा की अपील के पहले से ही जहां तक हो सकता है अपने क्षेत्र का पैसा बचाने की सोचता रहता है। एक पिछड़े और गरीब प्रांत की उन्नति यदि कोई चाहता है तो उसकी टांग खिंचाई के बदले उसे प्रोत्साहन मिलना ही चाहिये। भले ही यह विपक्ष का नेता है, पर जो चीज जनता के हित में है उसे तो उजागर होना ही चाहिये। जिनके लिये आज प्रणव जी को निर्देश देने पड़ रहे हैं उन भले लोगों के भी आंख, कान, दिमाग है। उन्हें देश और देश की जनता क्यों नहीं दिखाई पड़ती। प्रधान मंत्री की बात ना भी करें, क्योंकि उनकी मजबूरी हो सकती है, पद की गरिमा के कारण। वैसे भी आज सोनिआ जी का एकानामी क्लास से सफर एयर इंडिआ को काफी मंहगा पड़ा सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर, तो रमन सिंह जी के अलावा एक और शख्शियत है जो किफायत में विश्वास रखती है। वह हैं हमारी रेल मंत्री ममता बनर्जी।
अंत में मैं आप सबसे एक बात पूछना चाहता हूं। अभी दो-चार दिन पहले दो मंत्री श्रेष्ठों ने कहा था कि वह होटलों का खर्च अपनी जेब से दे रहे हैं। इस बात पर कितने लोगों ने विश्वास किया होगा ?

रविवार, 13 सितंबर 2009

श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को दो बार गीता का उपदेश दिया था

छोटी अवधी के बड़े युद्ध का खात्मा हो चुका था। धीरे-धीरे चारों ओर जन-जीवन सामान्य होने की ओर अग्रसर था। युधिष्ठिर सिंहासनारूढ हो चुके थे। सारे मित्र राजाओं की उचित सम्मान के साथ विदाई हो चुकी थी। श्री कृष्ण भी कुछ समय पश्चात द्वारका लौटने की मंशा जाहिर कर चुके थे। हांलाकि पांड़व खास कर अर्जुन अभी उन्हें जाने देना नहीं चाहते थे। फिर भी जाना तो था ही।
इसी तरह एक बार उद्यान में घूमते-घूमते दोनों सखाओं, श्रीकृष्ण और अर्जुन में, विभिन्न विषयों पर वार्तालाप हो रहा था। ऐसे ही बातों-बातों में युद्धभूमि और फिर गीता के उपदेशों की बात होने लगी। तभी अचानक अर्जुन ने कहा, केशव, आपने युद्धभूमि में गीता का उपदेश देकर मेरे साथ-साथ सारी दुनिया का उपकार किया था। आपका वह विराट स्वरूप आज भी मेरे मन-मस्तिष्क में छाया हुआ है। पर मेरी एक प्रार्थना है कि आप यहां से जाने के पहले मुझे फिर एक बार उस अमृत का पान करवा जायें। क्योंकि उस समय के माहौल, युद्ध के कारण मानसिक तनाव, विचलित मन और आपके विराट स्वरूप के दर्शन से दिग्भ्रमित बुद्धी के कारण मैं तब गीता की सारगर्भिता को पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं कर पाया था। इसलिये कृपया एक बार फिर मुझे अपनी मोक्षदायिनी वाणी से कृतार्थ करने की कृपा करें।
श्रीकृष्ण अपने सबसे प्रिय सखा की बात कैसे टालते। वे अर्जुन को ले राजमहल के सभागार में आये और फिर एक बार गीता के उपदेशों की अमृत धारा बहाई।
विद्वानों के अनुसार दोनों बार दिये गये उपदेशों के आध्यात्मिक महत्व में कोई फर्क नहीं है। सिर्फ परिस्थितियों और समय को छोड़ कर। पहली बार सुनने वाले अर्जुन मोहग्रस्त थे तो दूसरी बार विस्मृतिग्रस्त। पहली बार गीता युद्धभूमि में तनाव ग्रस्त माहौल में सुनाई गयी थी, दूसरी शांत माहौल में थोड़े विस्तार के साथ। पहली गीता में कुल अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं, जबकि बाद वाली गीता में छत्तीस अध्याय और करीब एक हजार श्लोक हैं। क्योंकि पहली बार समयाभाव था, पर दूसरी बार ऐसी कोई बात नहीं थी। पहली बार महर्षि वेदव्यासजी ने पूरे उपदेश श्रीकृष्णजी से कहलवाए थे जबकी दूसरी बार परोक्ष रूप से अनेक ऋषी गण, जैसे जनमेजय, नारद, कश्यप, वैशंपायन आदि विद्वान उपदेश देते हैं। जबकि सब का सार एक ही है।
दूसरी बार कही गयी गीता को "अनुगीता" के नाम से जाना जाता है, यानि बाद की गीता।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

जब-जब जो-जो होना है, तब-तब सो-सो होना ही है, तो घबडाहट क्यूं?

फिजिक्स की क्लास में एक बच्चे ने सर से कहा कि बरसात में मुझे जब बिजली चमकती है और बादल गरजते हैं तो बहुत ड़र लगता है, मैं क्या करूं? टीचर ने समझाया, देखो बेटा, जब बिजली चमकती है और बादल गरजते हैं तो जो कुछ होना होता है वह हो चुका होता है। हमें कुछ देर बाद ही आवज और चमक दिखाई पड़ती है। इसलिये डरने की कोई बात ही नहीं है। यदि पहले कुछ होता है तो हमें पता चलने से पहले ही हो चुका होता है। उसमें फिर ड़रने के लिये कोई बचता ही नहीं है। इस डर को बाहर निकालो और अपने अध्ययन में दिल लगाओ। जब जो होना है उसे कोई नहीं रोक पायेगा। सब निश्चित है।

उस बच्चे की तरह हम सब अंत से डरते, अनहोनी की आशंका में इस खुदा की नेमत जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा एवंई गवां देते हैं। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारे, चर्च में जा कर अपनी रक्षा, अनहोनी से बचाव या संकट में उससे सहायता की गुहार लगाते रहते हैं। कितने जने हैं जो वहां जा कर कुछ मांगने की अपेक्षा उसे इस सुंदर जीवन को देने का धन्यवाद करते हैं?

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क्या आप जानते हैं कि श्री कृष्णजी ने अर्जुन को दो बार गीता का उपदेश दिया था?
आगामी कल।

बुधवार, 9 सितंबर 2009

मुर्गे को मुर्गी की फीगर की चिंता

डान की बेटी शादी की दुसरी सुबह गुस्से से तमतमाई हुई अपने कमरे से बाहर निकली। उसकी मां ने उसे ऐसी हालत में देख उसे नार्मल करने को कहा, बेटी सब ठीक हो जायेगा। बेटी बोली वह तो ठीक है, पर अंदर पड़ी लाश का क्या करूं ?
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एक मुर्गी ने बेकरी वाले के यहां जा दो अंडे मांगे। बेकरी वाले ने हैरान हो पूछा, अरे तुम्हें अंडों की क्या जरूरत है? मुर्गी ने शर्माते हुए कहा, मेरा मुर्गा कहता है कि दो रुपयों के लिये तुम अपनी फ़ीगर मत खराब करो।

सोमवार, 7 सितंबर 2009

पानी की समस्या इतिहास बनने की कगार पर

चलो देर से ही सही नींद तो खुली। वैसे इसे देर भी नहीं कह सकते क्योंकी जब-जब, जो-जो, होना है। तब-तब सो-सो होता है। आखिर में सागर के अथाह जल की ओर ध्यान गया ही सरकार का। वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धी हासिल कर ही ली। रोज दिल दहलाती, जी जलाती, आग उगलती खबरों के बीच ठंड़ी हवा का झोंका बन कर आयी यह खबर कि समुद्री पानी को पीने योग्य बना लिया गया है।

ऐसा नहीं है कि इससे पहले सागर से पीने का पानी बनाने की बात नहीं सोची गयी पर उस पर खर्च इतना आता था कि उसका वहन सब के बस का नहीं था। और तब ना ही इतना प्रदुषण था ना ही बोतलबंद पानी का इतना चलन। अब जब पानी दूध से भी मंहगा होता जा रहा है, तो कोई उपाय तो खोजना ही था। फिलहाल लक्षद्वीप के कावारती द्वीप के रहने वालों को सबसे पहले इसका स्वाद चखने को मिल गया है। और यह संभव हो पाया है "राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान" के अथक प्रयासों के कारण। आशा है साल के खत्म होते-होते तीन संयत्र काम करना शुरु कर देंगे। एक लाख लीटर रोज की क्षमता वाले एक संयत्र ने तो 2005 से ही काम करना शुरु कर दिया है।

शुरु-शुरु में समुद्र तटीय इलाकों में इस पानी को पहुंचाने की योजना है। समुद्री पानी को पेयजल में बदलने के लिये निम्न ताप वाली "तापीय विलवणीकरण प्रणाली (L.T.T.D.) का उपयोग किया जाता है। यह प्रणाली सस्ती तथा पर्यावरण के अनुकूल है। इस योजना के सफल होने पर सरकार बड़े पैमाने पर बड़े संयत्रों को स्थापित करने की योजना बना रही है। अभी एक करोड़ लीटर रोज की क्षमता वाले संयत्र की रुपरेखा पर काम चल रहा है। सारे काम सुचारू रूप से चलते रहे तो दुनिया में कम से कम पानी की समस्या का तो स्थायी हल निकल आयेगा।

16 जून की अपनी एक पोस्ट में मुझे लगा था कि सागर की इतनी जल राशि के रहते पानी के लिये उतनी चिंता की आवश्यकता नहीं है जितनी की खोज की । सही भी है विज्ञान के इस युग में जब टायलेट का पानी साफ कर उपयोग में लाया जा सकता है तो फिर समुद्री पानी को क्यों नहीं । रही बात खर्चे की तो आज जो कीमत हम बोतलों में बंद पानी की दे रहे हैं, जिसके पूर्ण शुद्ध होने पर भी शक विद्यमान है, उससे तो सस्ता ही पड़ेगा सागर के पानी को साफ करना। आखिर अरबों लोगों, जीव-जंतुओं की प्यास का सवाल है।

शनिवार, 5 सितंबर 2009

सीकरी, फर्श से अर्श और अर्श से फर्श तक

सूर्य की तेज गर्मी और तपते रेगिस्तान में एक व्यक्ति नंगे पैर एक दरागाह की तरफ बढा जा रहा था। दुनिया से बेखबर सिर्फ अपनी मंजिल को पाने के लिये बेताब। उसे तो अपने पैरों में पड़े छालों से रिसते खून से उत्पन्न वेदना का भी एहसास नहीं हो रहा था। यह व्यक्ति था सम्राट अकबर। दरागाह थी शेख सलीम चिश्ती साहब की और जगह थी सीकरी नामक एक गांव की।
दुनिया जानती है कि अपनी संतान ना होने के कारण सम्राट अकबर ने सलीम चिश्ती की दरागाह पर जा मन्नत मांगी थी और शेख साहब के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी। इससे अकबर की खुशी की सीमा ना रही। उसने अपने पुत्र का नाम भी शेख साहब के नाम पर सलीम रखा और उस गांव सीकरी को अपनी राजधानी बनाने का फ़ैसला कर लिया।
यूं सीकरी के भाग्य ने पलटा खाया। एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित यह छोटा सा गांव देखते-देखते पूरे देश की राजधानी बन गया। अपनी गुजरात विजय को अविस्मरणीय बनाने के लिये अकबर ने इसका नाम फतेहपुर सीकरी रख दिया। इसे ऊंची-ऊंची दिवारों से घेर कर अनेकों सुंदर भवनों, मस्जिदों बाग-बगीचों का निर्माण कर सजा दिया गया। दिवारों में भी आवागमन के लिये सात दरवाजे बनाये गये जिनका नाम, दिल्ली दरवाजा, आगरा दरवाजा, ग्वालियर दरवाजा, अजमेरी दरवाजा, मथुरा दरवाजा, बीरबल दरवाजा और चंद्रफूल दरवाजा रखा गया। यहां के भवन ज्यादातर लाल पत्थरों से बनाये गये हैं। यहीं शेख साहब तथा उनके परिवार वालों की कब्रें भी हैं जिन्होंने समय के साथ-साथ तीर्थ स्थल की जगह ले ली है। यहां हर साल भव्य तरीके से उर्स मनाया जाता है जहां दुनिया भर से लाखों लोग अपनी मन्नत पूरी करवाने आते हैं।
पर काल के गाल में सबको समाना पड़ता है। उसकी मजबूत दाढों से आज तक कोई नहीं बच पाया है। वही सीकरी जिसकी तूती सारे देश में गूंजती थी, राजधानी दिल्ली चले जाने के बाद, अपना महत्व धीरे-धीरे खोती चली गयी। आज हालत यह है कि सारे भवनों, स्मारकों, बावड़ियों का अस्तित्व खतरे में है। हर जगह विराने का साम्राज्य है। पर्यटक आते जरूर हैं पर बुलंद दरवाजे जैसी कुछ जगहों को देख लौट जाते हैं। रह जाता है पूरा शहर अपने गौरवमयी इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने को आतुर।