बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

नोबेल फाउंडेशन ने ग्यारह बार अनदेखी की थी नेहरूजी की

यह तो सभी जानते हैं कि पुर्वाग्रहों के चलते, शांति पुरस्कार के लिए, नोबेल फाउंडेशन ने गांधीजी की अनदेखी की थी। बाद में नोबेल समिति ने अपनी भूल मान भी ली थी। हालांकि सारी कार्यवाही गोपनीय होती है। लेकिन अभी इस समिति ने 1901 से 1956 तक का पूरा ब्योरा सार्वजनिक किया है, जिससे पता चलता है कि इस फाउंडेशन ने भारत के पहले प्रधान मंत्री के नाम को भी गंभीरता से नहीं लिया। वह भी एक-दो बार नहीं, पूरे ग्यारह बार उनके नाम को खारिज किया गया।
1950 में नेहरुजी के नाम से दो प्रस्ताव भेजे गये थे। उन्हें अपनी गुटनिरपेक्ष विदेश नीति और अहिंसा के सिद्धांतो के पालन करने के कारण नामांकित किया गया था। पर उस समय राल्फ बुंचे को फिलीस्तीन में मध्यस्थता करने के उपलक्ष्य में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। 1951 में नेहरूजी को तीन नामांकन हासिल हुए थे। पर उस बार फ्रांसीसी ट्रेड यूनियन नेता लियोन जोहाक्स को चुन लिया गया था। 1953 में भी नेहरुजी का नाम बेल्जियम के सांसदों की ओर से प्रस्तावित किया गया था, लेकिन इस वर्ष यह पुरस्कार, द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिकी सेनाओं का नेतृत्व करनेवाले जार्ज सी. मार्शल के हक में चला गया। 1954 में फिर नेहरुजी को दो नामांकन प्राप्त हुए, पर फिर कहीं ना कहीं तकदीर आड़े आयी और इस बार यह पुरस्कार किसी इंसान को नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय के पक्ष में चला गया। अंतिम बार नेहरुजी का नाम 1955 में भी प्रस्तावित किया गया था। परन्तु इस बार यह खिताब किसी को भी ना देकर इसकी राशि पुरस्कार संबंधी विशेष कोष में जमा कर दी गयी थी।
ऐसा तो नहीं था कि गोरे-काले का भेद भाव या फिर एक ऐसे देश, जो वर्षों गोरों का गुलाम रहा हो, का प्रतिनिधित्व करनेवाले इंसान को यह पुरस्कार देना उन्हें नागवार गुजरा हो।

3 टिप्‍पणियां:

संजीव तिवारी ने कहा…

आश्‍चर्यजनक जानकारी दी है आपने, आंखें खुल गई हमारी ।

राज भाटिय़ा ने कहा…

आज भि काले ओर गोरे का भेद भाव तो है ही, यह हमीं है जो आज भी गोरी को अपनी मां बना कर सर पे बिठा रखा हैं, नोवेल फाउंडेशन ने ग्यारह बार नही हर बार की है यह अनदेखी....
धन्यवाद

mahashakti ने कहा…

नेहरू दुत्‍कारे जाने लायक ही थे, जिसे आदमी छिछोरेपन से पूरी दुनिया वाकिफ थी, उसे तो कोई भी सम्‍मान नही दिया जाना था। जब वह खुद कहते है कि वह दुर्भाग्‍य से हिन्‍दू है। उनकी मानसिकता का पता चल ही जाता है। नेहरू और गांधी दोनो इसी काबिल थे भारतीयो के ऑंखो पर पट्टी बंधी है तभी ये पूजे जाते है बाकी तो पूरा विश्‍व इनकी कारगुजारियों को जानती है।

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