मंगलवार, 23 सितंबर 2008

तारे जमीं पर और आस्कर

कुछ दिन पहले फ़िल्म अभिनेता राजपाल यादव ने एक चुटकुला सुनाया था कि एक बाप अपने संघर्षरत बेटे को टी वी पर एनिमल किंगडम देखते देख पूछता है कि अब तो कुत्ते बिल्लीयां भी पर्दे पर आ गये तुम कब आओगे। पढ़ सुन कर हंसी आती है पर सच यह है कि माता-पिता कि अपनी संतानों से अपेक्षायें काफी बढ़ गयी हैं। जिसका नज़ारा हम आये दिन छोटे पर्दे पर बढ़ते रियाल्टी शोज़ के रूप में देखते हैं। भाग लेने वाले बच्चों से ज्यादा उनके माँ-बाप टेंश्नाए रहते हैं। अपनी जिंदगी के अधूरे सपनों को वह अपनी संतानों द्वारा पूरा होता देखना चाहते हैं उसके लिए चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े।
तारे जमीं पर मैने भी देखी है, अच्छी भी लगी थी। उस समय भी एक प्रश्न मन में उठा था, आज यह समाचार पढ़ कर फिर उस सवाल ने सर उठाया कि फ़िल्म का नायक बच्चा यदि अच्छा चित्रकार ना होता तो पिक्चर का अंत क्या होता। आज हजारों ऐसे बच्चे हैं जिन्हें डिस्लेक्सिया नाम की बिमारी नहीं है, पर वह सब ना पढ़ने में अच्छे हैं नाही किसी कला में, यहां तक कि उनकी किसी चीज विशेष में रुचि तक नहीं है। पर उनके माता-पिता, पालक, परिवार तारे---, या रियाल्टी शोज़ देख कर सफलता के दिवाने हो कर अपने बच्चों से अपेक्षा करने लग जायें कि पढ़ाई ना सही खेल में, खेल ना सही नाच में, गाने में कहीं तो कुछ करो। आमीर ने बहुत अच्छी फ़िल्म बनाई पर उनकी यह बात गले नहीं उतरती कि हर बच्चे में कुछ विलक्षण प्रतिभा छुपी होती है। उल्टे वह महत्वाकाक्षीं मां-बाप की सुप्त कामनाओं को हवा दे देते हैं। उन्होंने तो जिद पकड़ कर अपने नायक को हीरो बना दिया पर आम जिंदगी में ऐसा होना क्या संभव है।
आस्कर पाने वाली फ़िल्में जिंदगी के काफी करीब होती रही हैं। इसलिए तारे----, क्युंकि हमारी फ़िल्म है, सिर्फ़ इसलिए उससे ज्यादा अपेक्षा करना ठीक नहीं होगा।
मेरे अनुसार अब तक आस्कर के लिए भेजी गयीं फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म "मदर इंडिया" थी। पर उस समय जूरी को यह समझाना मुश्किल हो गया था कि एक माँ अपने भूख से बिलखते बच्चों को बचाने के लिए साहूकार का प्रस्ताव क्यों नहीं मान लेती है।

2 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

ऑस्कर पूरा लॉबिंग का खेला है एक स्टेज पर आने के बाद!!

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप की बात से सहमत हू, ्वेसे बहुत कम फ़िल्मे हे जो सही हो ....
धन्यवाद