फिर वही दहशतगर्दी, वही आतंक, फिर वही सडकों पर बहता निर्दोष खून। फिर वही अपना वर्चस्व साबित करने के लिए निहत्थे, बेकसूर, बेगुनाह लोगों की हत्या।
यही सब फिर दोहराया गया, राजधानी दिल्ली में आज शाम को। कितने घर उजड गये, कितने परिवार बर्बाद हो गये, कोई हिसाब नहीं, और यह सब अपनी ताकत की नुमाईश के लिए। इस दहशतगर्दी मे किसी सियासतदान की जान नही गयी, कोई धर्म का ठेकेदार नहीं मरा। जान गंवाई उन निरीह बच्चों, महिलाओं तथा पुरुषों ने जो पहले ही जिंदगी की जद्दोजहद से रोज दो-चार होते रहते हैं।
घटना घट जाने के बाद वही रटी-रटायी सरकारी बयानबाजी आनी शुरु हो जाती है। मिडीया अटकलें लगाना शुरु कर देता है जिम्मेदार नाम के बारे में। कुछ देर बाद कोई संगठन अपना नाम उजागर कर देता है। फिर सब कुछ धीरे-धीरे अपनी जगह पर वैसा ही हो जाता है जैसा पहले था। पर कुछ बदनसीब लोग रह जाते हैं, जिंदगी भर को दर्द सहने के लिए, जिनकी ना तो कोई गलती थी ना किसी से कोई बैर था, इस सवाल के साथ कि हे प्रभू ये तेरा कैसा न्याय है?
यही सब फिर दोहराया गया, राजधानी दिल्ली में आज शाम को। कितने घर उजड गये, कितने परिवार बर्बाद हो गये, कोई हिसाब नहीं, और यह सब अपनी ताकत की नुमाईश के लिए। इस दहशतगर्दी मे किसी सियासतदान की जान नही गयी, कोई धर्म का ठेकेदार नहीं मरा। जान गंवाई उन निरीह बच्चों, महिलाओं तथा पुरुषों ने जो पहले ही जिंदगी की जद्दोजहद से रोज दो-चार होते रहते हैं।
घटना घट जाने के बाद वही रटी-रटायी सरकारी बयानबाजी आनी शुरु हो जाती है। मिडीया अटकलें लगाना शुरु कर देता है जिम्मेदार नाम के बारे में। कुछ देर बाद कोई संगठन अपना नाम उजागर कर देता है। फिर सब कुछ धीरे-धीरे अपनी जगह पर वैसा ही हो जाता है जैसा पहले था। पर कुछ बदनसीब लोग रह जाते हैं, जिंदगी भर को दर्द सहने के लिए, जिनकी ना तो कोई गलती थी ना किसी से कोई बैर था, इस सवाल के साथ कि हे प्रभू ये तेरा कैसा न्याय है?

3 टिप्पणियां:
जब तक हिजडो की सरकारे आती रहे गी तब तक गुण्डे मवाली यही करेगे, जागो जागो...
बहुत अफ़्सोस हुआ यह सब पढ कर, लेकिन भगवान के घर ना अंधेर हे ना देर, उस ने हमे दिमाग दिया हे, उस से हम इन हिजडो की सरकार बदल सकते हे, अपने वोट का इस्तेमाल करो
भगवान के घर ना अंधेर हे ना देर, उस ने हमे दिमाग दिया हे, उस से हम इन हिजडो की सरकार बदल सकते हे, अपने वोट का इस्तेमाल करो
दरअसल देश और यहाँ के बाशिंदे इसी तरह की त्रासदियों को भोगने के लिए अभिशप्त हैं। चरम पर पहुँच चुके भ्रष्टाचार, अय्याशी और क्षेत्रवाद के बीच देश के बारे में सोचने के लिए किसी के पास फुरसत ही नहीं है। हम सहिष्णुता की आड़ में कायरता दिखाते आए हैं। राष्ट्र के बारे में सोच कर निर्णय लेने का समय और क्षमता हमारे पास है ही नहीं। निर्णय के कारक तो सीधे वोट बैक और तुष्टिकरण से जुड़े हुए हैं।
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