मंगलवार, 26 अगस्त 2008

बंगाली भिड़ा बंगाली से, घाटे में रहा बंगाली

1967-68 मे, एक समय देश का पहले नम्बर का औद्योगिक राज्य, लगातार हडताल, बंद और आंदोलानों की वजह से, देखते-देखते उद्योगों से खाली होने लगा था। इससे वामपंथियों का दबदबा तो जरूर बढ़ा मगर पश्चिम बंगाल जर्जरावस्था को प्राप्त हो गया था। कभी भारत की राजधानी रहा कलकत्ता शहर, देश के अंदर और बाहर डाईंग सिटी के नाम से जाना जाने लग गया था। बेरोजगार होते नौजवान, बढ़ती बेकारी, लगातार बंद होते उद्योगों से वामपंथियों की नींद टूटी तो उन्होनें राज्य को संभालने के लिए कुछ कदम उठाए। उनको सफ़ल होता देख विपक्षी दल की जमीन पैरों तले खिसकनी शुरू हो गयी है। क्या ममता बनर्जी सिर्फ़ एक बात का जवाब देंगीं कि यदि टाटा अपनी परियोजना सिंगुर से हटा कर किसी और राज्य मे ले जाते हैं तो बंगाल मे कोई और उद्योगपति अपनी परियोजना लगाने की हिम्मत कर सकेगा। उनका यह कहना कि टाटा की बंगाल की वामपंथी सरकार से मिलीभगत है, किसी के गले नहीं उतर रहा। किसी उद्योग के स्थापित होने पर जैसी राजनीति हो रही है उससे कम से कम बंगाल के लोगों का कोई भला होने से रहा। इससे बंगाल के औद्योगिक विकास को निश्चित रूप से धक्का लगेगा। ममता बनर्जी का कहना है कि बंगाल के सिंगुर इलाके मे टाटा की नैनो कार परियोजना के लिए किसानों की 400 एकड जमीन बिना उनकी सहमती के ली गयी है वह उन्हें वापस दे दी जाये। जब की यह जमीन राज्य सरकार ने किसानों से लेकर टाटा समुह को दी है और इसका प्रयाप्त मुआवजा दिया गया है। निष्पक्ष हो सारे मामले को देखने से साफ़ पता चलता है कि वामपंथियों के खिलाफ़ जा अपनी हाथ से फ़िसलती राजनीति पर पकड मजबूत करने के लिए वह जो भी कर रहीं हैं उससे बंगालियों को ही नुक्सान होगा। पहले सोनार बांग्ला का जो नुक्सान वामपंथियों ने किया था, वही अब ममताजी कर रही हैं। यदि वे किसानों की सच्ची हितैषी हैं तो उन्हें अपना सारा जोर किसानों के परिवारों की आमदनी बढ़ाने पर लगाना चाहिए जिससे किसान परिवार के सारे सदस्य खेती पर ही निर्भर ना रहें उसकी जिम्मेवारी घर के एक दो लोगों पर छोड बाकी सदस्य अन्य उद्योग-धंदो मे लग कर परिवार तथा देश में खुशहाली ला सकें। क्योंकी औद्योगीकरण की रफ़्तार को बढ़ाए बिना कोई भी, कहीं भी, कभी भी उत्थान नहीं कर सकता।
शायद हमारे देश की नियती ही ऐसी है कि इसकी भलाई के लिए होने वाले काम में भी कभी पक्ष और विपक्ष के नेता सहमत नहीं होते। पर जहां उनका उल्लू सधना होता है तो सारे गलबहियां डाले नजर आते हैं।

2 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

सही है!!

राज भाटिय़ा ने कहा…

सहमत हे भईया जी आप से, धन्यवाद