शनिवार, 23 अगस्त 2008

छप्पनभोग, कौन-कौन से हैं

अक्सर सुनने मे आता है कि भगवान को छप्पनभोग का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इनमे किन-किन खाद्य पदार्थों का समावेश होता है, आईए देखते हैं --
1-रसगुल्ला, 2-चन्द्रकला, 3-रबड़ी, 4-शूली, 5-दधी, 6-भात, 7-दाल, 8-चटनी, 9-कढ़ी, 10-साग-कढ़ी, 11-मठरी, 12-बड़ा, 13-कोणिका, 14- पूरी, 15-खजरा, 16-अवलेह, 17-वाटी, 18-सिखरिणी, 19-मुरब्बा, 20-मधुर, 21-कषाय, 22-तिक्त, 23-कटु पदार्थ, 24-अम्ल {खट्टा पदार्थ}, 25-शक्करपारा, 26-घेवर, 27-चिला, 28-मालपुआ, 29-जलेबी, 30-मेसूब, 31-पापड़, 32-सीरा, 33-मोहनथाल, 34-लौंगपूरी, 35-खुरमा, 36-गेहूं दलिया, 37-पारिखा, 38-सौंफ़लघा, 39-लड़्ड़ू, 40-दुधीरुप, 41-खीर, 42-घी, 43-मक्खन, 44-मलाई, 45-शाक, 46-शहद, 47-मोहनभोग, 48-अचार, 49-सूबत, 50-मंड़का, 51-फल, 52-लस्सी, 53-मठ्ठा, 54-पान, 55-सुपारी, 56-इलायची,-----------------------------------------------------------------------------------------भगवान हैं भाई, हजम करते होंगे। अपन तो पढ़-सुन कर ही अघा गये।

4 टिप्‍पणियां:

हर्षवर्धन ने कहा…

छप्पन भोग का नाम पहली बार जाना। इस जुमले का इस्तेमाल तो अक्सर करता हूं। लेकिन, ये क्या एक साथ खाया जाता है।

sanjay Tiwari ने कहा…

भाई अपने को तो गड़बड़ लग रही है. इसमें तिक्त, कसाय कोई व्यंजन नहीं स्वाद है. लस्सी जैसे शब्द तो आज प्रचलित हुए हैं और छप्पन भोग की परंपरा पुरानी है.
गलत जानकारी.

Alag saa ने कहा…

यह जानकारी जगन्नाथ पुरी के एक पुजारीजी से ली थी। कषाय, तिक्त जैसे स्वादों वाले व्यंजनों का समावेश होना चाहिए, यह अर्थ हो सकता है।
रही लस्सी की बात तो उन्होंने घोल शब्द का प्रयोग किया था। बंगाल, ओडिसा, असम तथा बिहार के कुछ इलाकों मे दही-चीनी-पानी के मिश्रण को घोल का नाम दिया जाता है। लस्सी खासकर उत्तर भारत में प्रचलित शब्द है। इस मिश्रण को तो उतना ही पुराना होना चाहिए जितना पुराना दही है। नाम चाहे कुछ भी हो। प्रसाद का निर्माण दिए गये नाम वाले पदार्थों से मिलते-जुलते स्वाद, तासीर तथा उपलब्धता पर निर्भर करता है ना कि सिर्फ़ नाम पर।

शुक्र है किसी ने रसगुल्ले के नाम पर एतराज नहीं किया, जिसका जन्म दो एक सौ साल पहले ही हुआ है।

dr.ashish nagar ने कहा…

NIiu Hkksx dh ijEijk lqO;ofLFkr :i esa oLrqr% vkpk;Z oYyHk ds lEçnk; esa fodflr gqà gSA JhfoÎys”kth }kjk bl lsok ds lanHkZ esa leqfpr ekxZn”kZu vius xzUFk esa JhÑ’.kksikldksa ds fy;s çnku dj fn;k x;k gSA ijUrq iDoké dsoy NIiu gh ugha vfirq NIiu çdkj ds gqvk djrs gSaA Hkkjr esa ikd”kkó vR;Ur le`) jgk gSA Bkdqjth ds vkxs mudh :fp ds vuqlkj l[kjh vul[kjh Hkksx fdl Øe ls tek dj ltk;k tkuk gS ;g rd fufÜpr gSA