मंगलवार, 19 अगस्त 2008

इस बार चूहा स्वाभिमानी था

इतिहास तो सब का होता होगा, चाहे वह इंसान हो, चाहे जानवर या कीड़े-मकोड़े ही क्यों ना हो और यदि ऐसा है तो उन सब का भी दुहरता है कि नहीं इसी का पता लगाने की मैने ठानी। इसके लिए उस कहानी को, जिसमे एक ऋषी ने चुहिया को इंसान का रूप दे पाला-पोसा था, पर उसका विवाह चूहे से ही हो पाया था, अपनी थिसिस बना, अपनी खोज शुरू की। काफ़ी भटकने के पश्चात भी जब मुझे कोई सिद्ध महात्मा के दर्शन ना हो पाये तो मैने नक्सलियों के खौफ़ के बावजूद बस्तर के घने जंगलों का रुख किया। इस बार मेरी मेहनत रंग लायी और वहां मुझे एक पहुंचे हुए महात्माजी के दर्शन हो ही गये। पहले तो उन्होंने कुछ भी बताने से साफ़ मना कर दिया पर मेरी जिद व हठ के सामने आखिर वे नरम पड़ गये और फिर उन्होंने जो बताया उसके सामने "रिप्ले का विश्वास करो या ना करो" भी मुंह छुपाता नजर आता है। पूरी बात उन्हीं के शब्दों मे आप के सामने है ---------------- 

कोई सोलह-एक साल पहले की बात है। एक सुबह मैं नदी मे स्नान करने के पश्चात सूर्यदेव को अर्ध्य दे रहा था, तभी आकाशगामी एक चील के चंगुल से छूट कर एक छोटी सी चुहिया मेरी अंजली मे आ गिरी। वह बुरी तरह घायल थी। मैं उसे अपने आश्रम ले आया तथा मरहम-पट्टी कर उसे जंगल मे छोड़ देना चाहा पर शायद ड़र के मारे या किसी और कारणवश वह जाने को राजी ही नहीं हुई। मैने भी उसकी हालत देख अपने पास रख लिया। समय बीतता गया और कब मैं उसे पुत्रीवत स्नेह करने लग गया इसका पता भी नहीं चला और इसी मोहवश एक दिन अपने तपोबल से उसे मानव रूप दे दिया। कन्या जब बड़ी हुई तो उसके विवाह के लिए मैने एक सर्वगुण सम्पन्न मूषक के बारे मे उसकी राय जाननी चाही तो उसने अपनी पसंद दुनिया की सबसे शक्तिशाली शख्सियत को बताया। बहुत समझाने पर भी जब वह ना मानी तो उसे मैने सूर्यदेव के पास भेज दिया, जो मेरी नजर मे सबसे तेजस्वी देवता थे। चुहिया ने उनके पास जा अपनी इच्छा बतायी। इस पर सूर्यदेव ने उसे कहा कि मुझसे ताकतवर तो मेघ है, जो जब चाहे मुझे ढ़क लेता है तुम उनके पास जाओ। यह सुन मुषिका मेघराज के पास गयी और अपनी कामना उन्हें बताई। मेघराज ने मुस्कुरा कर कहा बालिके तुमने गलत सुना है। मुझ से शक्तिशाली तो पवन है जो अपनी मर्जी से मुझे इधर-उधर डोलवाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया ने पवनदेव को जा पकड़ा। पवनदेव ने उसकी सारी बात सुनी और फिर उदास हो बोले कि वह तो सदियों से पर्वत के आगे नतमस्तक होते आए हैं जो उनकी राह में सदा रोड़े अटकाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया मुंह बिचका कर वहां से सीधे पहाड़ के पास आई और उनसे अपने विवाह की इच्छा जाहिर की। अब आज के युग मे छोटी-छोटी बातें तेज-तेज चैनलों से पल भर में दुनिया मे फैल जाती हैं तो पर्वतराज को चुहिया की दौड़-धूप की खबर तो पता लगनी ही थी, वह भी तब जब उनके शिखर पर एक विदेशी कंपनी का टावर लगा हुअ था। सैकड़ों वर्षों पहले की तरह उन्होंने फिर उसे वही बताया कि चूहा मेरे से भी ताकतवर है क्योंकि वह अपने मजबूत पंजों से मुझमे भी छिद्र कर देता है। यह कह उन्होंने अपना पीछा छुड़वाया। इतना सुन चुहिया ने वापस मेरे पास आ चूहे से अपने विवाह की स्विकृति दे दी। मैने मूषकराज को खबर भेजी और यहीं इतिहास भी धोखा खा गया। मूषकराज मेरे घर आए और सारी बातें सुन कर कुछ देर चुप रहे फ़िर बोले देवी क्षमा करें। मैं आपसे विवाह नहीं कर सकता। सच कटू होता है। आपकी अस्थिर बुद्धी तथा चंचल मन, इतने महान और सुयोग्य पात्रों की काबलियत और गुण ना पहचान सके। मैं तो एक अदना सा चूहा हूं। मेरे साथ आपका निर्वाह ना हो सकेगा। इतना कह साधू महाराज उदास हो चुप हो गये। कुछ देर बाद मैने पूछा कि वह आज कल क्या कर रही है। तो ठंड़ी सांस ले मुनि बोले कि लेखिका हो गयी है और पानी पी-पी कर पुरुष वर्ग के विरुद्ध आग उगलती रचनाएं लिखती रहती है। 
अब आप ही बतायें कि मेरी खोज सफ़ल रही कि नहीं।

1 टिप्पणी:

राज भाटिय़ा ने कहा…

अरे भाईया वो चुहिया तो शेरनी समझती हे अपने आप को, बात यह हे की बाकी के प्राणी तो अपनी इज्जत के डर से कुछ नही कहते ,ओर कुछ सोचते हे छोडो इसे इस की बकबास पर ध्यान ही मत दो जाओ ही नही उस तरफ़, अरे भईया मस्त रहॊ
धन्यवाद इस सच्ची मुच्ची कथा के लिये